प्रद्योत राजवंश

प्रद्योत राजवंश  

प्रद्योत राजवंश प्राचीन भारत में राज्य करने वाला वंश था। 6वीं सदी ई. पू. 'वीतिहोत्र' नामक वंश ने हैहय राजवंश को हटाकर अवन्ति में अपनी राजनीतिक सत्ता की स्थापना की। परंतु इसके तुरंत बाद ही प्रद्योत राजवंश के शासकों ने वीतिहोत्रों के राज्य पर अपना अधिकार कर लिया। प्रद्योत वंश के अभ्युदय के साथ यहाँ के इतिहास के बारे में साक्ष्य मिलने शुरू हो जाते हैं।

पौराणिक साक्ष्य

पुराणों से प्रमाण मिलता है कि गौतम बुद्ध के समय 'अमात्य पुलिक'[1] ने समस्त क्षत्रियों के सम्मुख अपने स्वामी की हत्या करके अपने पुत्र 'प्रद्योत' को अवन्ति के सिंहासन पर बैठाया था। 'हर्षचरित' के अनुसार इस अमात्यका नाम 'पुणक' या 'पुणिक' था। इस प्रकार वीतिहोत्र कुल के शासन की समाप्ति हो गई तथा 546 ई. पू. यहाँ प्रद्योत राजवंश का शासन स्थापित हो गया।[2]

चण्ड प्रद्योत

राजा प्रद्योत अपने समकालीन समस्त राजाओं में प्रमुख था, इसलिए उसे "चण्ड" कहा जाता था। प्रद्योत के समय अवन्ति की उन्नति चरमोत्कर्ष पर थी। चंड प्रद्योत का वत्स नरेश 'उद्मन' के साथ दीर्घकालीन संघर्ष हुआ, किंतु बाद में उसने अपनी पुत्री 'वासवदत्ता' का विवाह उद्मन से कर मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किया। बौद्ध ग्रंथ "विनयपिटक" के अनुसार चण्ड प्रद्योत के मगध नरेश बिम्बिसार के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध थे। जब चण्ड प्रद्योत पीलिया रोग से ग्रसित था, तब बिम्बिसार ने अपने राजवैद्य 'जीवक' को उज्जयिनीभेजकर उसका उपचार कराया था, परंतु उसके उत्तराधिकारी अजातशत्रु के अवन्ति नरेश से संबंध अच्छे नहीं थे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  सुनिक
  2. ↑ 2.0 2.1 मालवा के विभिन्न राजवंश (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 11 अप्रैल, 2013।

प्रद्योत  

Disamb2.jpgप्रद्योतएक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- प्रद्योत (बहुविकल्पी)

प्रद्योत प्राचीन भारत के प्रद्योत राजवंश का प्रथम राजा था। वह शुनक का पुत्र था।[1] इसका पिता शुनक सूर्य वंशके अंतिम राजा रिपुंजय अथवा अरिंजय का महामात्य था। उसने रिपुंजय का वध कर राजगद्दी पर अपने पुत्र प्रद्योत को बिठाया था, जिससे आगे चलकर 'प्रद्योत राजवंश' की स्थापना हुई।

  • पुराणों से प्रमाण मिलता है कि गौतम बुद्ध के समय अमात्य पुलिक[2] ने समस्त क्षत्रियों के सम्मुख अपने स्वामी की हत्या करके अपने पुत्र प्रद्योत को अवन्तिके सिंहासन पर बैठाया था। 'हर्षचरित' के अनुसार इस अमात्य का नाम पुणक या पुणिक था। इस प्रकार वीतिहोत्र कुल के शासन की समाप्ति हो गई तथा 546 ई. पू. यहाँ प्रद्योत राजवंश का शासन स्थापित हो गया।[3]
  • 'भविष्यपुराण' में प्रद्योत को क्षेमक का पुत्र कहा गया है एवं इसे ‘म्लेच्छहंता’ उपाधि दी गयी है।[4] इसके पिता क्षेमक अथवा शुनक का म्लेच्छों ने वध किया। अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए नारदकी सलाह से इसने ‘म्लेच्छयज्ञ’ आरम्भ किया। उस यज्ञ के लिए इसने सोलह मील लम्बा एक यज्ञकुंण्ड तैयार करवाया। इसके पश्चात् इसने वेद मंत्रों के साथ निम्नलिखित म्लेच्छ जातियों को जलाकर भस्म कर दिया-

हारहूण, बर्बर, गुरुंड, शकखसयवनपल्लव, रोमज, खरसंभव द्वीप के कामस, तथा सागर के मध्य भाग में स्थित चीन के म्लेच्छ लोग। इसी यज्ञ के कारण इसे ‘म्लेच्छहंता’ उपाधि प्राप्त हुयी।[5]

  • राजा प्रद्योत अपने समकालीन समस्त राजाओं में प्रमुख था, इसलिए उसे 'चण्ड' कहा जाता था। उसके समय अवन्ति की उन्नति चरमोत्कर्ष पर थी।
  • चण्ड प्रद्योत का वत्स नरेश उदयन के साथ दीर्घकालीन संघर्ष हुआ, किंतु बाद में उसने अपनी पुत्री वासवदत्ता का विवाह उदयन से कर मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किया।
  • बौद्ध ग्रंथ 'विनयपिटक' के अनुसार चण्ड प्रद्योत के मगध नरेश बिम्बिसार के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध थे। जब चण्ड प्रद्योत पीलिया रोग से ग्रसित था, तब बिम्बिसार ने अपने राजवैद्य जीवक को उज्जयिनीभेजकर उसका उपचार कराया था, परंतु उसके उत्तराधिकारी अजातशत्रु के अवन्ति नरेश से संबंध अच्छे नहीं थे।
  • 'मंझिमनिकाय' से ज्ञात होता है कि चण्ड प्रद्योत के सम्भावित आक्रमण के भय से अजातशत्रु ने अपनी राजधानी राजगृह की सुदृढ़ क़िलेबंदी कर ली थी।
  • प्रद्योत राजवंश में कुल पाँच राजा हुए, जिनके नाम क्रम से इस प्रकार थे-
  1. प्रद्योत
  2. पालक
  3. विशाखयूप
  4. जनक (अजक)
  5. नंदवर्धन (नंदिवर्धन अथवा वर्तिवर्धन)
  • इन सभी राजाओं ने कुल एक सौ अड़तीस वर्षों तक राज्य किया।[6] इस वंश का राज्यकाल संभवतः 745 ई. पू. से 690 ई. पू. के बीच माना जाता है। उक्त राजाओं के नाम सभी पुराणों में एक से मिलते हैं। जनक तथा नंदवर्धन राजाओं के नामांतर केवल वायुपुराण में प्राप्त है। चण्ड प्रद्योत के पश्चात् उसका पुत्र 'पालक' संभवतः अपने अग्रज गोपाल को हटाकर उज्जयिनी के राजसिंहासन पर बैठा था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  वायुपुराण में इसे सुनीक का पुत्र कहा गया है।
  2.  सुनिक
  3.  मालवा के विभिन्न राजवंश (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 18 जून, 2015।
  4.  भवि.प्रति.1.4.
  5.  प्रद्योत (हिन्दी) ट्रांसलिटरल फाउंडेशन। अभिगमन तिथि: 18 जून, 2015।
  6.  विष्णुपुराण 4.22.24

पालक प्रद्योत  

पालक प्रद्योत भारतीय इतिहास में 'प्रद्योत राजवंश' के संस्थापक राजा प्रद्योत का पुत्र था। संभवतः अपने अग्रज गोपाल को हटाकर वह उज्जयिनी के राजसिंहासन पर बैठा था।

  • पालक को मगध नरेश उदयन ने कई बार पराजित किया, किंतु अंततः पालक की उदयन की हत्या करने की योजना फलीभूत हो गई।
  • प्रद्योत राजवंश में कुल पाँच राजा हुए, जिनके नाम क्रम से इस प्रकार हैं-
  1. प्रद्योत
  2. पालक
  3. विशाखयूप
  4. जनक (अजक)
  5. नंदवर्धन (नंदिवर्धन अथवा वर्तिवर्धन)
  • इन सभी राजाओं ने कुल एक सौ अड़तीस वर्षों तक राज्य किया।[1] इस वंश का राज्यकाल संभवतः 745 ई. पू. से 690 ई. पू. के बीच माना जाता है। उक्त राजाओं के नाम सभी पुराणों में एक से मिलते हैं। जनक तथा नंदवर्धन राजाओं के नामांतर केवल वायुपुराण में प्राप्त है।
  • चण्ड प्रद्योत के पश्चात् उसका पुत्र पालक संभवतः अपने अग्रज गोपाल को हटाकर उज्जयिनी के राजसिंहासन पर बैठा था।[2]
  • पालक एक अत्याचारी शासक था। प्रजा ने उसके विरुद्ध सफल विद्रोह कर उसे गद्दी से हटाकर आर्यक को वहाँ का राजा बनाया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  विष्णुपुराण 4.22.24
  2.  प्रद्योत (हिन्दी) ट्रांसलिटरल फाउंडेशन। अभिगमन तिथि: 18 जून, 2015।

नन्दिवर्धन  

नन्दिवर्धन अथवा 'नन्दवर्धन' अथवा 'वर्तिवर्धन' को पुराणोंके अनुसार 'प्रद्योत राजवंश' का अंतिम शासक बताया गया है। इसके बारे में अधिक जानकारी का अभाव है।

  • पुराणों के अनुसार नन्दिवर्धन शिशुनाग वंश के अंतिम शासक पंचमक के पूर्व अवन्ति का राजा था।
  • मगध की बढ़ती शक्ति के समक्ष धीरे-धीरे अवन्ति कमज़ोर होता जा रहा था। अंततः मगध नरेश शिशुनाग ने प्रद्योत राजवंश का अंत कर दिया तथा शूरसेन सहित अवन्ति राज्य को भी मगध में मिला लिया।

हैहय वंश  

हैहय वंश (नवीं शताब्दी और पौराणिक काल) 

ऐतिहासिक संदर्भ
पौराणिक संदर्भ

कलचुरी वंश

कोकल्ल प्रथम ने लगभग 845 ई. में कलचुरी वंश की स्थापना की थी। उसने त्रिपुरी को अपनी राजधानी बनाया था।

  1. शंकरगण
  2. लक्ष्मणराज
  3. गांगेयदेव विक्रमादित्य
  4. कर्णदेव

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  ऐतिहासिक स्थानावली
  2.  ऐतिहासिक स्थानावली
  3.  पार्जीटर-डाइनेस्टीज़ ऑफ़ कलिएज, पृष्ठ. 23-4।
  4.  महाभारत, शान्तिपर्व, अध्याय 57.
  5.  महाभारत, सभापर्व, अध्याय 38, द्रोणपर्व, अध्याय 70 आश्वमेधिकपर्व, अध्याय 29

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