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Showing posts from September, 2020

उपनाम में छुपा है पूरा इतिहास

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उपनाम में छुपा है पूरा इतिहास पूरे विश्व में यह वाक्य प्रचलित है, 'नाम में क्या रखा है।' सही भी है कि नाम में क्या रखा है। नाम तो कुछ भी हो सकता है, लेकिन उपनाम में सचमुच में ही कुछ न कुछ है तभी तो भाषाविदों के नेतृत्व में ब्रिटेन के ब्रिस्टल स्‍थित पश्चिमी इंग्लैंड यूनिवर्सिटी ( UWE) उपनामों पर शोध के लिए लाखों पॉउंड खर्च कर रही है।  उपनामों पर शोध करके उनके पीछे के इतिहास को सार्वजनिक किया जाएगा और यह भी की उपनामों के इस डाटा को सर्चेबल सॉफ्टवेयर में डालकर सुरक्षित रखा जाएगा। उपनाम को अंग्रेजी में सरनेम ( surname) कहा जाता है।  ब्राह्मणों के 8 प्रकार जानिए कौन से...   अब जब हम ब्रिटिश नागरिक की बात करते हैं जो उनमें वे भारतीय भी शामिल होते हैं जिनके पूर्वज कई वर्षों पूर्व ही ब्रिटेन में जाकर बस गए थे और जिनकी पीढ़ियाँ अब पूरी तरह से ब्रिटिश हैं। इन भारतीय ब्रिटिश नागरिकों के उपनामों पर भी शोध होगा, जिनमें शामिल है पटेल, सिंह, अहमद और स्मिथ।  भारत में तो उपनामों का समंदर है। अनगिनत उपनाम जिन्हें लिखते-लिखते शायद सुबह से शाम हो जाए। यदि उपनामों पर शोध करने लगे तो कई ...

मारवाड़ के मीणा..

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मारवाड़ के मीणा.. मारवाड़ का गोडवाड़ मीना राज्य ---------------------------------------           प्राचीन काल से  सम्पूर्ण  गोडवाड़ पर मीना आदिपत्य रखते थे | अरावली श्रंखला की गोद में बसा नाडोल उसकी राजधानी थी गोडवाड़ वर्तमान पाली सिरोही जालोर का ही अधिकांश हिस्सा  है | हाडा चौहान राजवंश के पृष्ट -27 पर राव गनपत सिंह चितलवाना ने लिखा है की सांभर के वक्पतिराज के देहांत और बड़े भाई के सिंहासनासीन होने व मन मुटाव के कारण लक्ष्मण या लाखन ने नवीन भूमि अधिग्रहण करने के लिएसांभर देश के एक सीमांत प्रदेश जिसके उत्तर में मंडव्य पुर ,दक्षिण में हस्तिकुंडी,पश्चिम में जबालिपुर के राज्य थे और पूर्व में मेर जाति वालों के अधीन था जो जितने के लिए अपने मन माफिक पाया यानि 958 ई० में नाडोल में मेर मिनाओ के राज्य थे उक्त पुस्तक के पृष्ट-30 पर उल्लेख है की लक्ष्मण ने अपने भुजबल एवं अटल दृढ़ता से विक्रम संवत 1022 महा सुदी 2 के दिन अर्थात सन 967 के आस पास नाडोल पर अपने राज्य की स्थापना की | यहाँयह स्पष्ट करना उचित होगा की लक्ष्मण को मेर मिनाओ से नाडोल का राज...

मेहर

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गौरवशाली इतिहास मेहर शब्द मेतरक से बना हे | मेतरक का अर्थ सूर्य है | अत मेहर समाज सूर्यवंशी है, सूर्य के उपासक है | मेतरक मिहिर ,मेर ,मेहर माहिर सौराष्ट्रवनशि आदि नामो से जाना जाता है|मेहर समाज के पुर्वज सूर्य के समान तेजवान रहे हैं, तभी इनको मेहर उपाधि प्राप्त हुइ | मेहर समाज का इतिहास प्राचीन भारत की संस्कृति के साथ - साथ गौरवशाली एवं सम्रधशाली रहा है | मेहरों का प्रारंभिक व्याख्यान सिकनदर के आक्रमण के समय से प्राप्त होता है, जब मेहरों नें आक्रमणकारिओं से लोहा लिया और अपने प्राणों की आहुति दी | प्रसिध्ध चीनी ह्वेन सांग ने अपनी भारत यात्रा मे मेहर राजा की राजधानी भिनमाल का उललेख किया है | सन 696 पंजाब और राजस्थान में मेहर समाज के वंशजों का राज्य था | 6 वीं शताब्दी के मध्य मेहरवंशी राजा थे | दिदवाना , शिवा और कालिनजर बुंदेलखंड के शिलालेखग में प्रमाण मिलते हैं कि 11 वीं सदी में मेहर वंशी राज्य करते थे , जिनकि राजधानी राजगरद थी | गुजराती साहित्य परिशद सम्मेलन सन 1933 में समपन्न हुआ ,जिसमें उल्लेख किया कि अन्य योध्दाओं को हराकर मेहर समाज ने अपना आधिपत्य सथापित किया | मेहरों का प्राचीन निव...

मेवाड़ में जातिगत सामाजिक ढ़ाँचा : एक विश्लेषण

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राजस्थान मेवाड़ में जातिगत सामाजिक ढ़ाँचा : एक विश्लेषण राहुल तनेगारिया ऐतिहासिक मेवाड़ समाज : एक धर्म सहिष्णु समाज ब्राह्मण वर्ण की जातियाँ राजपूत : कुल तथा अन्तर्जातीय विवाह व्यवस्था दासया चाकर राजपूतों का स्थान खाण्डा करने की प्रथा : राजपूतों का वीरात्मक प्रदर्शन समाज में कायस्थों का स्थान वैश्य-महाजन जातियाँ तथा समाज पर उनका प्रभाव चारण-भाट जाति का सामाजिक महत्व मेवाड़ की कृषि व्यवसायी जातियाँ मेवाड़ की पशु-पालक जातियाँ राजपूत-प्रथा का परिणाम : धाबाई जाति मेवाड़ की शिल्प तथा दस्तकार जातियाँ मेवाड़ की सेवक जातियाँ मेवाड़ की निम्न तथा उपेक्षित जातियाँ मेवाड़ की मुस्लिम धर्म समुदाय मेवाड़ में बोहरा - मुस्लिम समुदाय मेवाड़ में इसाई समुदाय का अस्तित्व   मेवाड़ का सामाजिक ढाँचा परम्परागत रुप से ऊँच-नीच पद-प्रतिष्ठा तथा वंशोत्पन्न जातियो के आधार पर संगठित था। सामाजिक संगठन में प्रत्येक जाति का महत्व उस जाति की वंशोत्पन्नि तथा उसके द्वारा अंगीकृत व्यवसाय पर निर्भर थी। जाति-व्यवस्था का स्थायित्व प्रदान करने तथा अस्तित्व का अक्षुण्ण बनाये रखने में जाति पंचायतों की भूमिका महत्वपूर्ण रही। जाति पंचायत...

(अजमेर मेरवाड़ा)

Ajmer Merwara Jump to navigation Jump to search Ajmer-Merwara  ( अजमेर मेरवाड़ा ) , also known as Ajmer Province [1]  and as Ajmer-Merwara-Kekri, is a former province of British India in the historical  Ajmer  region. The province consisted of the districts of  Ajmer and  Merwar , which were physically separated from the rest of British India forming an enclave amidst the many princely states of  Rajasthan . Unlike these states, which were ruled by local nobles who acknowledged British suzerainty,  Ajmer-Merwara  was administered directly by the British. In 1842 the two districts were under a single commissioner, then they were separated in 1856 and were administered by the East India Company. अनुक्रमणिका History In ancient times, the Mair Gurjars were the dominant inhabitants. They were defeated by the  Chauhan  Kings  Rao Anoop  and  Rao Anhal , whose descendents the  Rawats   Cheeta - Kathat were the domi...