मेहर
गौरवशाली इतिहास
मेहर शब्द मेतरक से बना हे | मेतरक का अर्थ सूर्य है | अत मेहर समाज सूर्यवंशी है, सूर्य के उपासक है | मेतरक मिहिर ,मेर ,मेहर माहिर सौराष्ट्रवनशि आदि नामो से जाना जाता है|मेहर समाज के पुर्वज सूर्य के समान तेजवान रहे हैं, तभी इनको मेहर उपाधि प्राप्त हुइ | मेहर समाज का इतिहास प्राचीन भारत की संस्कृति के साथ - साथ गौरवशाली एवं सम्रधशाली रहा है | मेहरों का प्रारंभिक व्याख्यान सिकनदर के आक्रमण के समय से प्राप्त होता है, जब मेहरों नें आक्रमणकारिओं से लोहा लिया और अपने प्राणों की आहुति दी | प्रसिध्ध चीनी ह्वेन सांग ने अपनी भारत यात्रा मे मेहर राजा की राजधानी भिनमाल का उललेख किया है | सन 696 पंजाब और राजस्थान में मेहर समाज के वंशजों का राज्य था | 6 वीं शताब्दी के मध्य मेहरवंशी राजा थे | दिदवाना , शिवा और कालिनजर बुंदेलखंड के शिलालेखग में प्रमाण मिलते हैं कि 11 वीं सदी में मेहर वंशी राज्य करते थे , जिनकि राजधानी राजगरद थी | गुजराती साहित्य परिशद सम्मेलन सन 1933 में समपन्न हुआ ,जिसमें उल्लेख किया कि अन्य योध्दाओं को हराकर मेहर समाज ने अपना आधिपत्य सथापित किया | मेहरों का प्राचीन निवास सथान अरावालि पर्वत का पशचिमी भाग है , जहाँ से कालान्तर में मेहर विभिन्न छेत्रों में बसते चले गये | इतिहास में इनकी कई शाखाओं का उल्लेख मिलता है ,जो आज भारत के विभिन्न प्रान्तों मे निवासरत है | इतिहासकारों का मत है, कि जिस हुद जनजाति ने भारत पर आक्रमण किया था, उसकी एक शाखा बाद मे मेर कहलाती है | हुद परशचमि व भारत तक आ गए थे ,वर्तमान में मेहर पशचिमी व मधयभारत मे बड़ी सन्खया मे निवास करते हैं | प्राचीन आखयानों से स्पष्ट है कि मेहर राजस्थान में एक पेशेवर लड़ाकू जनजाति थी |मेहर के अपभ्रंश मारवाड़ के दक्षिण मे उपद्रवी मेहर निवास करते हैं ,जिनको दवाने पुलिस की संख्या बढ़ाना आवश्यक है ,जिसके प्रत्येक वर्ष 1500 रुपये अंग्रजों को देना स्वीकार किया गया | ब्रिटिश काल मे जब रजवाड़े समाप्त होने लगे,तब एसी जाति के लिये जिविका चलाना कठिन हो गाया | अतः राजस्थान से अन्य शहरों मे पलायन कर जीविकोपार्जन की खोज मे निकल गए | जहाँ काम मिला वहाँ रहने लगे और जन - जीवन मे घुल मिल गए |
शूरवीर व दयावान समाज
गुप्तवंश के राज्य के पतन होने के प्रसंग मे मेहर समाज का उल्लेख मिला हे | गुप्त राजा के अशक्त होने पर प्रतिज्ञावान और शूरवीर मेहर प्रजा ने हमला करके गुप्तवंश की सत्ता को हाथ मे लेकर उनके पोते को सौप दि थी | मेहर समाज दयावान होने का घोतक हे | इस वीर समाज का उल्ल्येख ताम्रपत्र से मिला | सौराष्ट्रवादि माहिर मंडल है ,जिसकी इस देश मे पंजाब ,गुजरात ,राजस्थान आदि राज्यों मे शूरवीरता के लिये प्रसिद्ध रही हे| समाज की संस्कृति भारत के प्राचीन संस्कृति से समुर्ध है | मेहर समाज मे अनेक शूरवीरता हुए ,जैसे -कालवा मेहर ,जिनकी प्रतिमा कालवा मेहर चौराहा जुनागढ गुजरात मे सथापित है | अंग्रेजी सामाराज्य से पहले मेहर समाज राजस्थान ,गुजरात राज्यो मे योद्धाओं के रुप मे प्रसिंघ्द रहे ,प्राचीन राजाओं के मुगलों से युद ,जिसमे हुअ जिसमे मेहर जाति ने क्षत्रिय राजाओं कि सेना की आग्रिम पंकित मे रहकर गौरवान्वित किया है |
मेहर शिरोमणि - बापु मालदेव
बापु मालदेव राणा जी का जन्म ४ अगस्त १८८४ को बखरला गुजरात मे हुआ था | आपके पिता जी का नाम राणा बापु केश्वाला तथा माता जी का नाम श्रीमती जायनी माँ था |आप तीन भाई - बहिने थे | बड़े भाई का नाम श्री नागार्जुन राना रेश्वाला तथा बहिन का नाम श्रीमति देवी माँ था | बापु जी इन दोनों से छोटे ठेबापू जी- की पत्नी का नाम श्रीमति वाली माँ था |आपने मेट्रिक तक शिक्षा प्राप्त करके सामाजिक विकास के कार्यो के साथ अपने जिविकोपजरन हेतु सरकारी अस्पताल भवसिजी पोरबंदर मे सेवारत रहे |इनके बचपन का नाम मालदेव राणा रेश्वाला था | ससमाज उत्थान और अन्य प्रतिबिन्धित कार्यो को करने के करण समाज ने अप्पको बापु मालदेव राणा के रुप मे जाना |प्रारंभ मे आपने गुजरात मे बसे समाज के पिछड़े लोगो को मुख्य धारा से जोड़ने एबं नारी उत्थान का कार्य किया |बाद मे गुजरात के बाहर मेहर समाज के लोगो के बीच एक नई दिशा देने का प्रयास किया |आपके समाज से अज्ञानता ,अशिक्षा ,अंधविश्वास दहेज़ प्रथा जेसी बुरितियो को समाप्त करने के लिये समान को जागृत करने जीवन पर्यत प्रयास किय गया |इसी घडी मे १९५० के दशक मे आपका आगमन भोपाल मे हुआ , यंहा पर आपके हजारो कि संख्या मे मेहर बन्धुओं को समाज उत्थान हेतु प्रेरित करने का सफल प्रयास किया |आपने अपना सम्पूर्ण जीवां समाज प्रेरणा से हे| मध्यप्रदेश मे लाखो कि संख्या निवारित मेहर समाज भरा समाज चहुंमुखी विकास हेतु प्रयास किये जा रहे हे | इस घडी मे मेहर समाज जाग्रति संध द्धारा बर्ष २००७ से सतत रुप से अचक प्रयास किये जा रहे हे
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