नागवंश

नागवंश  

नागवंश प्राचीन काल का एक राजकुल था। इस वंश के कुछ सिक्कों पर बृहस्पति नाग, देवनाग और गणपति नाग नाम लिखे प्राप्त हुए हैं। नागवंश का शासनकाल 150 से 250 विक्रम संवत के मध्य जान पड़ता है।[1]

प्रामाणिकता

प्राचीन काल में नागवंशियों का राज्य भारत के कई स्थानों में तथा सिंहल में भी था। पुराणों में स्पष्ट लिखा है कि सात नागवंशी राजा मथुरा भोग करेंगे, उसके पीछे गुप्त राजाओं का राज्य होगा। नौ नाग राजाओं के जो पुराने सिक्के मिले हैं, उन पर 'बृहस्पति नाग', 'देवनाग', 'गणपति नाग' इत्यादि नाम मिलते हैं। ये नागगण विक्रम संवत 150 और 250 के बीच राज्य करते थे। इन नव नागों की राजधानी कहाँ थी, इसका ठीक पता नहीं है, पर अधिकांश विद्वानों का मत यही है कि उनकी राजधानी 'नरवर' थी। मथुरा और भरतपुरसे लेकर ग्वालियर और उज्जैन तक का भू-भाग नागवंशियों के अधिकार में था।[2]

पुराण उल्लेख

प्राचीन काल से ही भारत में नागों की पूजा की परंपरा रही है। माना जाता है कि 3000 ईसा पूर्व आर्य काल में भारत में नागवंशियों के कबीले रहा करते थे, जो सर्प की पूजा करते थे। उनके देवता सर्प थे। यही कारण था कि प्रमुख नाग वंशों के नाम पर ही जमीन पर रेंगने वाले नागों के नाम पड़े थे। पुराणों के अनुसार कश्मीर में कश्यप ऋषि की पत्नी कद्रू से उन्हें आठ पुत्र मिले थे, जिनके नाम क्रमश: इस प्रकार थे-

  1. अनंत (शेषनाग)
  2. वासुकी
  3. तक्षक
  4. कर्कोटक
  5. पद्म
  6. महापद्म
  7. शंख
  8. कुलिक

कश्मीर का अनंतनाग इलाका अनंतनाग समुदायों का गढ़ था। उसी तरह कश्मीर के बहुत सारे अन्य इलाके भी कद्रुके दूसरे पुत्रों के अधीन थे। कुछ अन्य पुराणों के अनुसार नागों के प्रमुख पाँच कुल थे- अनंत, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक और पिंगला। जबकि कुछ और पुराणों ने नागों के अष्टकुल बताये हैं- वासुकी, तक्षक, कुलक, कर्कोटक, पद्म, शंख, चूड़, महापद्म और धनंजय। अग्निपुराण में 80 प्रकार के नाग कुलों का वर्णन है, जिसमें वासुकीतक्षक, पद्म, महापद्म प्रसिद्ध हैं। नागों का पृथक् नागलोक पुराणों में बताया गया है। अनादिकाल से ही नागों का अस्तित्व देवी-देवताओं के साथ वर्णित है। जैनबौद्ध देवताओं के सिर पर भी शेष छत्र होता है। असमनागालैंडमणिपुरकेरल और आंध्र प्रदेश में नागा जातियों का वर्चस्व रहा है। भारत में इन आठ कुलों का ही क्रमश: विस्तार हुआ, जिनके नागवंशी रहे थे- नल, कवर्धा, फणि-नाग, भोगिन, सदाचंद्र, धनधर्मा, भूतनंदि, शिशुनंदि या यशनंदि तनक, तुश्त, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अहि, मणिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना, गुलिका, सरकोटा इत्यादि।[3]

अन्य तथ्य

  • कृष्ण काल में नाग जाति ब्रज में आकर बस गई थी। इस जाति की अपनी एक पृथक् संस्कृति थी। कालिया नाग को संघर्ष में पराजित करके श्रीकृष्ण ने उसे ब्रज से निर्वासित कर दिया था, किंतु नाग जाति यहाँ प्रमुख रूप से बसी रही। मथुरा पर उन्होंने काफ़ी समय तक शासन भी किया।
  • नागसेन आदिनाग नरेश ब्रज के इतिहास में उल्लेखनीय रहे, जिन्हें गुप्त वंश के शासकों ने पराजित किया था। नाग देवताओं के अनेक मंदिर आज भी ब्रज में विद्यमान हैं।
  • इतिहास में यह बात प्रसिद्ध है कि महाप्रतापी गुप्तवंशी राजाओं ने शक या नागवंशियों को परास्त किया था। प्रयाग के क़िले के भीतर जो स्तंभलेख है, उसमें स्पष्ट लिखा है कि महाराज समुद्रगुप्त ने गणपति नाग को पराजित किया था। इस गणपति नाग के सिक्के बहुत मिलते हैं।
  • महाभारत में भी कई स्थानों पर नागों का उल्लेख है। पांडवों ने नागों के हाथ से मगध राज्य छीना था। खांडव वन जलाते समय भी बहुत से नाग नष्ट हुए थे।
  • जनमेजय के सर्प-यज्ञ का भी यही अभिप्राय मालूम होता है कि पुरुवंशी आर्य राजाओं से नागवंशी राजाओं का विरोध था। इस बात का समर्थन सिकंदर के समय के प्राप्त वृत्त से होता है। जिस समय सिकंदर भारत में आया, तब उससे सबसे पहले तक्षशिला का नागवंशी राजा ही मिला था। उस राजा ने सिकंदर का कई दिनों तक तक्षशिला में आतिथ्य किया और अपने शत्रु पौरव राजा के विरुद्ध चढ़ाई करने में सहायता पहुँचाई। सिकंदर के साथियों ने तक्षशिला में राजा के यहाँ भारी-भारी साँप पले देखे थे, जिनकी नित्य पूजा होती थी। यह शक या नाग जाति हिमालय के उस पार की थी। अब तक तिब्बती भी अपनी भाषा को 'नागभाषा' कहते हैं।[2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  भारतीय संस्कृति कोश, भाग-2 |प्रकाशक:यूनिवर्सिटी पब्लिकेशन, नई दिल्ली-110002 |संपादन: प्रोफ़ेसर देवेन्द्र मिश्र |पृष्ठ संख्या: 437 |
  2. ↑ 2.0 2.1 देखने की परिभाषा नागवंश (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 15 फ़रवरी, 2012।
  3.  नागों के प्रमुख कुल (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 13 जनवरी, 2013।

विक्रम संवत  

विक्रम संवत
नव संवत्सर (विक्रमी)
विवरण'विक्रम संवत' अत्यंत प्राचीन संवत है। भारत के सांस्कृतिक इतिहास की दृष्टि से सर्वाधिक लोकप्रिय राष्ट्रीय संवत 'विक्रम संवत' ही है।
आरम्भकर्तासम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य
शुरुआतलगभग 2,068 वर्ष यानी 57 ईसा पूर्व में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि से
पौराणिक महत्त्वपुराणों के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ब्रह्मा ने सृष्टि निर्माण किया था, इसलिए इस पावन तिथि को 'नव संवत्सर' पर्व के रूप में भी मनाया जाता है।
शास्त्रीय मान्यताशास्त्रीय मान्यतानुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि के दिन प्रात: काल स्नान आदि से शुद्ध होकर हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प और जल लेकर ओम भूर्भुव: स्व: संवत्सर- अधिपति आवाहयामि पूजयामि च इस मंत्र से नव संवत्सर की पूजा करनी चाहिए।
विशेषचंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने देश के सम्पूर्ण ऋण को, चाहे वह जिस व्यक्ति का भी रहा हो, स्वयं चुकाकर 'विक्रम संवत' की शुरुआत की थी।
अन्य जानकारीसम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने देशवासियों को शकों के अत्याचारी शासन से मुक्त किया था। उसी विजय की स्मृति में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से 'विक्रम संवत' का आरम्भ हुआ था।

विक्रम संवत (अंग्रेज़ीVikram Samvat) अत्यन्त प्राचीन संवत है। साथ ही ये गणित की दृष्टि से अत्यन्त सुगम और सर्वथा ठीक हिसाब रखकर निश्चित किये गये है। किसी नवीन 'संवत' को चलाने की शास्त्रीय विधि यह है कि जिस नरेश को अपना संवत चलाना हो, उसे संवत चलाने के दिन से पूर्व कम-से-कम अपने पूरे राज्य में जितने भी लोग किसी के ऋणी हों, उनका ऋण अपनी ओर से चुका देना चाहिये। 'विक्रम संवत' का प्रणेता सम्राट विक्रमादित्यको माना जाता है। कालिदास इस महाराजा के एक रत्नमाने जाते हैं। कहना नहीं होगा कि भारत के बाहर इस नियम का कहीं पालन नहीं हुआ। भारत में भी महापुरुषों के संवत उनके अनुयायियों ने श्रद्धावश ही चलाये; लेकिन भारत का सर्वमान्य संवत 'विक्रम संवत' ही है और महाराज विक्रमादित्य ने देश के सम्पूर्ण ऋण को, चाहे वह जिस व्यक्ति का रहा हो, स्वयं देकर इसे चलाया। इस संवत के महीनों के नाम विदेशी संवतों की भाँति देवता, मनुष्य या संख्यावाचक कृत्रिम नाम नहीं हैं। यही बात तिथि तथा अंश (दिनांक) के सम्बन्ध में भी है, वे भी सूर्य-चन्द्र की गति पर आश्रित हैं। सारांश यह कि यह संवत अपने अंग-उपांगों के साथ पूर्णत: वैज्ञानिक सत्य पर स्थित है।

इन्हें भी देखेंपंचांगराष्ट्रीय शाके एवं हिजरी संवत

शास्त्रों व शिलालेखों में उल्लेख

'विक्रम संवत' के उद्भव एवं प्रयोग के विषय में कुछ कहना कठिन है। यही बात 'शक संवत' के विषय में भी है। किसी विक्रमादित्य राजा के विषय में, जो ई. पू. 57 में था, सन्देह प्रकट किए गए हैं। इस संवत का आरम्भ गुजरात में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से (नवम्बर, ई. पू. 58) और उत्तरी भारत में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा (अप्रैल, ई. पू. 58) से माना जाता है। बीता हुआ विक्रम वर्ष ईस्वी सन+57 के बराबर है। कुछ आरम्भिक शिलालेखों में ये वर्ष कृत के नाम से आये हैं[1]

विद्वान मतभेद

विक्रम संवत के प्रारम्भ के विषय में भी विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ लोग ईसवी सन 78 और कुछ लोग ईसवी सन 544 में इसका प्रारम्भ मानते हैं। फ़ारसी ग्रंथ 'कलितौ दिमनः' में पंचतंत्र का एक पद्य 'शशिदिवाकर योर्ग्रहपीडनम्श' का भाव उद्धृत है। विद्वानों ने सामान्यतः 'कृत संवत' को 'विक्रम संवत' का पूर्ववर्ती माना है। किन्तु 'कृत' शब्द के प्रयोग की व्याख्या सन्तोषजनक नहीं की जा सकी है। कुछ शिलालेखों में मावल-गण का संवत उल्लिखित है, जैसे- नरवर्मा का मन्दसौर शिलालेख। 'कृत' एवं 'मालव' संवत एक ही कहे गए हैं, क्योंकि दोनों पूर्वी राजस्थान एवं पश्चिमी मालवा में प्रयोग में लाये गये हैं। कृत के 282 एवं 295 वर्ष तो मिलते हैं, किन्तु मालव संवत के इतने प्राचीन शिलालेख नहीं मिलते। यह भी सम्भव है कि कृत नाम पुराना है और जब मालवों ने उसे अपना लिया तो वह 'मालव-गणाम्नात' या 'मालव-गण-स्थिति' के नाम से पुकारा जाने लगा। किन्तु यह कहा जा सकता है कि यदि कृत एवं मालव दोनों बाद में आने वाले विक्रम संवत की ओर ही संकेत करते हैं, तो दोनों एक साथ ही लगभग एक सौ वर्षों तक प्रयोग में आते रहे, क्योंकि हमें 480 कृत वर्ष एवं 461 मालव वर्ष प्राप्त होते हैं।

यह मानना कठिन है कि कृत संवत का प्रयोग कृतयुग के आरम्भ से हुआ। यह सम्भव है कि 'कृत' का वही अर्थ है जो 'सिद्ध' का है, जैसे- 'कृतान्त' का अर्थ है 'सिद्धान्त' और यह संकेत करता है कि यह कुछ लोगों की सहमति से प्रतिष्ठापित हुआ है। 8वीं एवं 9वीं शती से विक्रम संवत का नाम विशिष्ट रूप से मिलता है। संस्कृत के ज्योति:शास्त्रीय ग्रंथों में यह शक संवत से भिन्नता प्रदर्शित करने के लिए यह सामान्यतः केवल संवत नाम से प्रयोग किया गया है। 'चालुक्य विक्रमादित्य षष्ठ' के 'वेडरावे शिलालेख' से पता चलता है कि राजा ने शक संवत के स्थान पर 'चालुक्य विक्रम संवत' चलाया, जिसका प्रथम वर्ष था - 1076-77 ई.।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  नन्द-यूप शिलालेख में 282 कृत वर्ष; तीन यूपों के मौखरी शिलालेखों में 295 कृत वर्ष; विजयगढ़ स्तम्भ-अभिलेख में 428; मन्दसौर में 461 तथा गदाधर में 480

कश्यप  

कश्यप नाम के कई ऋषि हुए हैं जिनमें से एक की गणना प्रजापतियों में होती है। इस ऋषि ने दक्ष की दितिअदितिदनु आदि नाम की ग्यारह कन्याओं से विवाह किया था। अदिति के गर्भ से देवता उत्पन्न हुए। दिति ने दैत्यों को और दनु ने दानवों को जन्म दिया। कश्यप एक गोत्र का नाम भी है। यह गोत्र इतना व्यापक है कि जिसके गोत्र का पता नहीं चलता, उसका गोत्र कश्यप मान लिया जाता है क्योंकि सभी जीव-धारियों की उत्पत्ति कश्यप से ही मानी जाती है।[1]

पौराणिक उल्लेख

  • प्राचीन वैदिक ॠषियों में प्रमुख ॠषि, जिनका उल्लेख एक बार ऋग्वेद में हुआ है। अन्य संहिताओं में भी यह नाम बहुप्रयुक्त है। इन्हें सर्वदा धार्मिक एवं रह्स्यात्मक चरित्र वाला बतलाया गया है एवं अति प्राचीन कहा गया है।
  • ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार उन्होंने 'विश्वकर्मभौवन' नामक राजा का अभिषेक कराया था। ऐतरेय ब्राह्मणों ने कश्यपों का सम्बन्ध जनमेजय से बताया गया है।
  • शतपथ ब्राह्मण में प्रजापति को कश्यप कहा गया हैः

"स यत्कुर्मो नाम। प्रजापतिः प्रजा असृजत। 
यदसृजत् अकरोत् तद् यदकरोत् तस्मात् कूर्मः कश्यपो वै कूर्म्स्तस्मादाहुः सर्वाः प्रजाः कश्यपः।"

  • महाभारत एवं पुराणों में असुरों की उत्पत्ति एवं वंशावली के वर्णन में कहा गया है की ब्रह्मा के छः मानस पुत्रों में से एक 'मरीचि' थे जिन्होंने अपनी इच्छा से कश्यप नामक प्रजापति पुत्र उत्पन्न किया।
  • कश्यप ने दक्ष प्रजापति की 17 पुत्रियों से विवाहकिया। दक्ष की इन पुत्रियों से जो सन्तान उत्पन्न हुई उसका विवरण निम्नांकित है -
  1. अदिति से आदित्य (देवता)
  2. दिति से दैत्य
  3. दनु से दानव
  4. काष्ठा से अश्व आदि
  5. अनिष्ठा से गन्धर्व
  6. सुरसा से राक्षस
  7. इला से वृक्ष
  8. मुनि से अप्सरागण
  9. क्रोधवशा से सर्प
  10. सुरभि से गौ और महिष
  11. सरमा से श्वापद (हिंस्त्र पशु)
  12. ताम्रा से श्येन-गृध्र आदि
  13. तिमि से यादोगण (जलजन्तु)
  14. विनता से गरुड़ और अरुण
  15. कद्रु से नाग
  16. पतंगी से पतंग
  17. यामिनी से शलभ
  1. दिति
  2. अदिति
  3. दनु
  4. विनता
  5. खसा
  6. कद्रु
  7. मुनि
  8. क्रोधा
  9. रिष्टा
  10. इरा
  11. ताम्रा
  12. इला
  13. प्रधा।
  • इन्हीं से सब सृष्टि हुई।
  • कश्यप एक गोत्र का भी नाम है। यह बहुत व्यापक गोत्र है। जिसका गोत्र नहीं मिलता उसके लिए कश्यप गोत्र की कल्पना कर ली जाती है, क्योंकि एक परम्परा के अनुसार सभी जीवधारियों की उत्पत्ति कश्यप से हुई।[2]
  • एक बार समस्त पृथ्वी पर विजय प्राप्त कर परशुरामने वह कश्यप मुनि को दान कर दी। कश्यप मुनि ने कहा-'अब तुम मेरे देश में मत रहो।' अत: गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए परशुराम ने रात को पृथ्वी पर न रहने का संकल्प किया। वे प्रति रात्रि में मन के समान तीव्र गमनशक्ति से महेंद्र पर्वत पर जाने लगे। [3]
  • सत युग में दक्ष प्रजापति की दो कन्याएं थी- कद्रुतथा विनता। उन दोनों का विवाह महर्षि कश्यप के साथ हुआ। एक बार प्रसन्न होकर कश्यप ने उन दोनों को मनचाहा वर मांगने को कहा। कद्रु ने समान पराक्रमी एक सहस्त्र नाग-पुत्र मांगे तथा विनता ने उसके पुत्रों से अधिक तेजस्वी दो पुत्र मांगे। कालांतर में दोनों को क्रमश: एक सहस्त्र, तथा दो अंडे प्राप्त हुए। 500 वर्ष बाद कद्रु के अंडों के नाग प्रकट हुए। विनता ने ईर्ष्यावश अपना एक अंडा स्वयं ही तोड़ डाला। उसमें से एक अविकसित बालक निकला जिसका ऊर्ध्वभाग बन चुका था, अधोभाग का विकास नहीं हुआ थां उसने क्रुद्ध होकर माँ को 500 वर्ष तक कद्रु की दासी रहने का शाप दिया तथा कहा कि यदि दूसरा अंडा समय से पूर्व नहीं फोड़ा तो वह पूर्णविकसित बालक माँ को दासित्व से मुक्त करेगा। पहला बालक अरुण बनकर आकाश में सूर्य का सारथि बन गया तथा दूसरा बालक गरुड़ बनकर आकाश में उड़ गया।
  • विनता तथा कद्रु एक बार कहीं बाहर घूमने गयीं। वहां उच्चैश्रवा नामक घोड़े को देखकर दोनों की शर्त लग गयी कि जो उसका रंग ग़लत बतायेगी, वह दूसरी की दासी बनेगी। अगले दिन घोड़े का रंग देखने की बात रही। विनता ने उसका रंग सफ़ेद बताया था तथा कद्रु ने उसका रंग सफ़ेद, पर पूंछ का रंग काला बताया था। कद्रु के मन में कपट था। उसने घर जाते ही अपने पुत्रों को उसकी पूंछ पर लिपटकर काले बालों का रूप धारण करने का आदेश दिया जिससे वह विजयी हो जाय। जिन सर्पों ने उसका आदेश नहीं माना, उन्हें उसने शाप दिया कि वे जनमेजय के यज्ञ में भस्म हो जायें। इस शाप का अनुमोदन करते हुए ब्रह्मा ने कश्यप को बुलाया और कहा-'तुमसे उत्पन्न सर्पों की संख्या बहुत बढ़ गयी है। तुम्हारी पत्नी ने उन्हें शाप देकर अच्छा ही किया, अत: तुम उससे रुष्ट मत होना।' ऐसा कहकर ब्रह्मा ने कश्यप को सर्पों का विष उतारने की विद्या प्रदान की। विनता तथा कद्रु जब उच्चैश्रवा को देखने अगले दिन गयीं तब उसकी पूंछ काले नागों से ढकी रहने के कारण काली जान पड़ रही थी। विनता अत्यंत दुखी हुई तथा उसने कद्रु की दासी का स्थान ग्रहण किया। [4]
  • गरुड़ ने सर्पों से पूछा कि कौन-सा ऐसा कार्य है जिसको करने से उसकी माता को दासित्व से छुटकारा मिल जायेगा? उसके नाग भाइयों ने अमृत लाकर देने के लिए कहा। गरुड़ ने अमृत की खोज में प्रस्थान किया। उसको समस्त देवताओं से युद्ध करना पड़ा। सबसे अधिक शक्तिशाली होने के कारण गरुड़ ने सभी को परास्त कर दिया। तदनंतर वे अमृत के पास पहुंचा। अत्यंत सूक्ष्म रूप धारण करके वह अमृतघट के पास निरंतर चलने वाले चक्र को पार कर गया। वहां दो सर्प पहरा दे रहे थे। उन दोनों को मारकर वह अमृतघट उठाकर ले उड़ा। उसने स्वयं अमृत का पान नहीं किया था, यह देखकर विष्णु ने उसके निर्लिप्त भाव पर प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि कह बिना अमृत पीये भी अजर-अमर होगा तथा विष्णु-ध्वजा पर उसका स्थान रहेगा। गरुड़ ने विष्णु का वाहन बनना भी स्वीकार किया। मार्ग में इन्द्र मिले। इन्द्र ने उससे अमृत-कलश मांगा और कहा कि यदि सर्पों ने इसका पान कर लिया तो अत्यधिक अहित होगा। गरुड़ ने इन्द्र को बताया कि वह किसी उद्देश्य से अमृत ले जा रहा है। जब वह अमृत-कलश कहीं रख दे, इन्द्र उसे ले ले। इन्द्र ने प्रसन्न होकर गरुड़ को वरदान दिया कि सर्प उसकी भोजन सामग्री होंगे। तदनंतर गरुड़ अपनी माँ के पास पहुंचा। उसने सर्पों को सूचना दी कि वह अमृत ले आया है। सर्प विनता को दासित्व से मुक्त कर दें तथा स्नान कर लें। उसने कुशासन पर अमृत-कलश रख दियां जब तक सर्प स्नान करके लौटे, इन्द्र ने अमृत चुरा लिया था। सर्पों ने कुशा को ही चाटा जिससे उनकी जीभ के दो भाग हो गए, अत: वे द्विजिव्ह कहलाने लगे [5]
  • इन्द्र को बालखिल्य महर्षियों से बहुत ईर्ष्या थी। रुष्ट होकर बालखिल्य ने अपनी तपस्या का भाग कश्यप मुनि को दिया तथा इन्द्र का मद नष्ट करने के लिए कहा। कश्यप ने सुपर्णा तथा कद्रु से विवाह किया। दोनों के गर्भिणी होने पर वे उन्हें सदाचार से घर में ही रहने के लिए कहकर अन्यत्र चले गये। उनके जाने के बाद दोनों पत्नियां ऋषियों के यज्ञों में जाने लगीं। वे दोनों ऋषियों के मना करने पर भी हविष्य को दूषित कर देती थीं। अत: उनके शाप से वे नदियां (अपगा) बन गयीं। लौटने पर कश्यप को ज्ञात हुआ। ऋषियों के कहने से उन्होंने शिवाराधना की। शिव के प्रसन्न होने पर उन्हें आशीर्वाद मिला कि दोनों नदियां गंगासे मिलकर पुन: नारी-रूप धारण करेंगी। ऐसा ही होने पर प्रजापति कश्यप ने दोनों का सीमांतोन्नयन संस्कार किया। यज्ञ के समय कद्रु ने एक आंख से संकेत द्वारा ऋषियों का उपहास किया। अत: उनके शाप से वह कानी हो गयी। कश्यप ने पुन: ऋषियों को किसी प्रकार प्रसन्न किया। उनके कथनानुसार गंगा स्नान से उसने पुन: पुर्वरूप धारण किया। [6]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  पुस्तक- भारतीय संस्कृति कोश | प्रकाशन- यूनिवर्सिटी पब्लिकेशन नई दिल्ली | पृष्ठ- 191
  2.  हिन्दू धर्मकोश |लेखक: डॉ राजबली पाण्डेय |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 170 |
  3.  बाल्मीकि रामायण, बाल कांड, सर्ग 76, श्लोक 11-16
  4.  महाभारत, आदिपर्व, अध्याय 16, 20 । अ0 23 श्लोक 1 से 3 तक भा0 2।11।12।–
  5.  महाभारत, आदिपर्व, अध्याय 28, अ0 29 श्लोक 1 से 14 तक, अ0 30, श्लोक 32 से 52 तक अध्याय 32, 33, 34
  6.  ब्रह्म पुराण, 100।-

शेषनाग  

शेषनाग
भगवान शेष
विवरण'भगवान शेष' साक्षात नारायण के स्वरूप हैं एवं उनके लिए शैय्या रूप हो उन्हें धारण करते हैं।
अन्य नामनागराज अनन्त
विशेषगन्‍धर्व, अप्‍सरा, सिद्ध, किन्‍नर, नाग आदि कोई भी इनके गुणों की थाह नहीं लगा सकते, इसी से इन्‍हें 'अनन्‍त' कहते हैं।
संबंधित लेखभगवान विष्णु
अन्य जानकारीये अपने सहस्‍त्र मुखों के द्वारा निरन्‍तर भगवान का गुणानुवाद करते रहते हैं और अनादि काल से यों करते रहने पर भी अघाते या ऊबते नहीं।

शेषनाग भगवान की सर्पवत्‌ आकृति विशेष होती है। सारी सृष्टि के विनाश के पश्चात्‌ भी ये बचे रहते हैं, इसीलिए इनका नाम 'शेष' हैं। सर्पाकार होने से इनके नाम से 'नाग' विशेषण जुड़ा हुआ है। शेषनाग स्वर्ण पर्वत पर रहते हैं। शेष नाग के हज़ार मस्तक हैं। वे नील वस्त्र धारण करते हैं तथा समसत देवी-देवताओं से पूजित हैं। उस पर्वत पर तीन शाखाओं वाला सोने का एक ताल वृक्ष है जो महाप्रभु की ध्वजा का काम करता है।[1]

रात्रि के समय आकाश में जो वक्राकृति आकाशगंगा दिखाई पड़ती है और जो क्रमश: दिशा परिवर्तन करती रहती है, यह निखिल ब्रह्मांडों को अपने में समेटे हुए हैं। उसकी अनेक शाखाएँ दिखाई पड़ती हैं। वह सर्पाकृति होती है। इसी को शेषनाग कहा गया है। पुराणों तथा काव्यों में शेष का वर्ण श्वेत कहा गया है। आकाशगंगा श्वेत होती ही है। यहाँ 'ऊँ' की आकृति में विश्व ब्रह्मांड को घेरती है। 'ऊँ' को ब्रह्म कहा गया है। वही शेषनाग है।

पुराणों में उल्लेखित

इनका आख्यान विभिन्न पुराणों में मिलता है। कालिका पुराण में कहा गया है कि प्रलयकाल आने पर जब सारी सृष्टि नष्ट हो जाती है तब भगवान विष्णु अपनी प्रिया लक्ष्मीके साथ इनके ऊपर शयन करते हैं और उनके ऊपर ये अपनी फणों की छाया किए रहते हैं। इनका पूर्ण फण कमल को ढके रहता है, उत्तर का फण भगवान के शिराभाग का और दक्षिण फण चरणों का आच्छादन किए रहता है। प्रतीची का फण भगवान विष्णु के लिए व्यंजन का कार्य करता है। इनके ईशान कोण का फण शंख, चक्र, नंद, खड्गगरुड़ और युग तूणीर धारण करते हैं तथा आग्नेय कोण के फण गदा, पद्म आदि धारण करते हैं।

पुराणों में इन्हें सहस्रशीर्ष या सौ फणवाला कहा गया है। इनके एक फण पर सारी वसुंधरा अवस्थित कही गई है। ये सारी पृथ्वी को धूलि के कर्ण की भाँति एक फण पर सरलतापूर्वक लिए रहते हैं। पृथ्वी का भार अत्याचारियों के कारण जब बहुत प्रवर्धित हो जाता है तब इन्हें अवतार भी धारण करना पउता है। लक्ष्मण और बलराम इनके अवतार कहे गए हैं। इनका कही अंत नहीं है इसीलिए इन्हें 'अनंत' भी कहा गया है। गोस्वामी तुलसीदास ने लक्ष्मण की वंदना करते हुए उन्हें शेषावतार कहा है :

बंर्दौं लछिमन पद जलजाता। सीतल सुभग भगत सुखदात।।
रघुपति कीरति बिमल पताका। द्वंड समान भयउ जस जाका।।
सेष सहस्रसीस जगकारन। जो अवतरेउ भूमि भय टारन।।[2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  वाल्मीकि रामायणकिष्किंधा कांड,40।50-53
  2.  बाल काण्ड, 17।3,4
  3.  महाभारतआदि पर्व, अ0 35,36

वासुकी  

वासुकी पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रसिद्ध नागराज थे। इनका जन्म कश्यप के औरस और कद्रु के गर्भ से हुआ माना गया है। वासुकी नागोंके दूसरे राजा थे, जिनका इलाका कैलाश पर्वत के आस-पास का क्षेत्र था। पुराणों अनुसार वासुकी नाग अत्यंत विशाल और लंबे शरीर वाले माने जाते हैं। समुद्र मंथन के दौरान देवताओं और दानवों ने मंदराचल पर्वत को मथनी तथा वासुकी को नेती (रस्सी) बनाया था।

  • वासुकी को देवताओं ने 'नागधन्वातीर्थ' में नागराज के पद पर बैठाया था।
  • नागों के दूसरे राजा वासुकी की पत्नी का नाम शतशीर्षा था।
  • भगवान शिव का परम भक्त होने के कारण वासुकी का उनके शरीर पर निवास था।
  • जब वासुकी को ज्ञात हुआ कि नागकुल का नाश होने वाला है और उसकी रक्षा केवल उसकी भगिनी[1] के पुत्र द्वारा ही होगी, तब इसने अपनी बहन का विवाह जरत्कारु से कर दिया।
  • जरत्कारु के पुत्र आस्तीक ने जनमेजय के नागयज्ञ के समय सर्पों की रक्षा की, अन्यथा नागवंश का समूल नष्ट हो जाता।
  • समुद्र मंथन के समय वासुकी ने मंदराचल पर्वत का बाँधने के लिए रस्सी का काम किया था।
  • त्रिपुरदाह के समय वह शिव के धनुष की डोर बना था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  बहन

तक्षक  

तक्षक पाताल[1] में निवास करने वाले आठ नागों में से एक है। यह माता 'कद्रू' के गर्भ से उत्पन्न हुआ था तथा इसके पिता कश्यप ऋषि थे। तक्षक 'कोशवश' वर्ग का था।[2]यह काद्रवेय नाग है।[3] माना जाता है कि तक्षक का राज तक्षशिला में था।

  • श्रृंगी ऋषि के शाप के कारण तक्षक ने राजा परीक्षितको डँसा था, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी थी।
  • इससे क्रुद्ध होकर बदला लेने की नीयत से परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने सर्पयश किया था, जिससे डरकर तक्षक इंद्र की शरण में गया।
  • इस पर जनमेजय की आज्ञा से ऋत्विजों के मंत्रपढ़ने पर इंद्र भी खिंचने लगे, तब इंद्र ने डरकर तक्षक को छोड़ दिया।[4]
  • जब तक्षक अग्निकुण्ड के समीप पहुँचा, तब आस्तीक ऋषि की प्रार्थना पर यज्ञ बंद हुआ और तक्षक के प्राण बचे।
  • यह नाग ज्येष्ठ मास के अन्य गणों के साथ सूर्य रथ पर अधिष्ठित रहता है।[5]
  • यह शिव की ग्रीवा के चारों ओर लिपटा रहता है।[6]
  • पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार भारत में तक्षक जाति थी, जिसका जातीय चिह्न सर्प था।
  • इसका युद्ध राजा परीक्षित से हुआ था, जिसमे परीक्षित मारे गये थे।
  • जनमेजय ने तक्षशिला के समीप इन तक्षकों से युद्ध किया और इन्हें परास्त किया था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  महाताल
  2.  भागवत पुराण, 5.24.29; ब्रह्म पुराण, 2.17.34, 20.24; मत्स्य पुराण, 6.39, 8.7; वायु पुराण, 39.54, 50.23, 54.11, 69
  3.  विष्णु पुराण, 1.21
  4.  भागवत पुराण, 12.6.16-13
  5.  भागवत पुराण, 12.11.35
  6.  ब्रह्माण्ड पुराण, 2.25.88; मत्स्य पुराण, 154.444

कर्कोटक  

Disamb2.jpgकर्कोटकएक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- कर्कोटक (बहुविकल्पी)

कर्कोटक पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिव के गण और नागों के राजा थे। भगवान शिव की स्तुति के कारण कर्कोटक जनमेजय के नाग यज्ञ से बच निकले थे और उज्जैन में उन्होंने शिव की घोर तपस्या की थी। कर्कोटेश्वर का एक प्राचीन उपेक्षित मंदिर आज भी चौबीस खम्भा देवी के पास कोट मोहल्ले में है। वर्तमान में यह कर्कोटेश्वर मंदिर हरसिद्धि के प्रांगण में स्थित है।

कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार नागों की माँ ने उन्हें अपना वचन भंग करने के कारण शाप दिया कि वे सब जनमेजय के नाग यज्ञ में जल मरेंगे। इससे भयभीत होकर शेषनागहिमालय पर, कम्बल नाग ब्रह्माजी के लोक में, शंखचूड़ मणिपुर राज्य में, कालिया नाग यमुना में, धृतराष्ट्र नाग प्रयाग में, एलापत्र ब्रह्मलोक में और अन्य कुरुक्षेत्र में तप करने चले गए। एलापत्र ने ब्रह्म जी से पूछा- "भगवान ! माता के शाप से हमारी मुक्ति कैसे होगी?" तब ब्रह्माजी ने कहा, "आप महाकाल वन में जाकर महामाया के सामने स्थित शिवलिंग की पूजा करो। तब कर्कोटक नाग वहाँ पहुँचा और उन्होंने शिवजी की स्तुति की। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर कहा कि "जो नाग धर्म का आचरण करते हैं, उनका विनाश नहीं होगा।" इसके उपरांत कर्कोटक नाग वहीं लिंग में प्रविष्ट हो गया। तब से उस लिंग को कर्कोटेश्वर कहते हैं। यह माना जाता है कि जो लोग पंचमीचतुर्दशीऔर रविवार को कर्कोटेश्वर की पूजा करते हैं, उन्हें सर्प पीड़ा नहीं होती।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  प्रमुख नाग कुल (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 13 जनवरी, 2013।

पांडव  

संक्षिप्त परिचय
पांडव
द्रौपदी के साथ पाँचों पाण्डव
पालक पितापाण्डु
पालक माताकुंती
जन्म विवरणदुर्वासा ऋषि द्वारा दिये गये मंत्र की सहायता से देवताओं का आह्वान करके कुंती तथा माद्री ने पाण्डवों को प्राप्त किया था।
समय-कालमहाभारत
शासन-राज्यइन्द्रप्रस्थहस्तिनापुर
संदर्भ ग्रंथमहाभारत
प्रसिद्ध घटनाएँअज्ञातवासलाक्षागृहद्रौपदी चीरहरणजयद्रथ वधमहाभारत युद्ध
अन्य विवरण'पाण्डव' महाभारत के पाँच प्रसिद्ध वीर योद्धा थे। इन्हें युधिष्ठिरभीमअर्जुननकुलऔर सहदेव के नाम से जाना जाता है।
संबंधित लेखपाण्डुकुंतीद्रौपदीदुर्वासाश्रीकृष्ण
अन्य जानकारीकुंती ने मंत्र की सहायता से धर्मराजवायु देव और इन्द्र देव से क्रमश: युधिष्ठिरभीमतथा अर्जुन जैसे पुत्रों को पाया। कुंती ने यह मंत्र माद्री को भी प्रदान किया, जिससे माद्री ने अश्विनीकुमारों को आमन्त्रित किया और नकुल तथा सहदेव जैसे पुत्रों की माता बनी।

पांडव अथवा पाण्डव महाभारत के वे पाँच प्रसिद्ध वीर योद्धा थे, जिन्हें महाराज पाण्डु और कुंती के पुत्रों के रूप में जाना जाता है। महाभारत का अधिकांश घटनाक्रम पाण्डवों और कौरवों से ही सम्बन्धित है। पाण्डु द्वारा अज्ञानतावश ऋषि किन्दम तथा उनकी पत्नी की मृत्यु वन में उस समय हो गई, जब वे मृग रूप में प्रणय क्रिया कर रहे थे। अपनी मृत्यु से पूर्व किन्दम ऋषि ने पाण्डु को यह शाप दिया कि- "यदि काम के वशीभूत होकर उन्होंने अपनी पत्नी के साथ सहवास किया तो वे मृत्यु को प्राप्त होंगे"। पाण्डु नि:संतान थे। उनकी पत्नी कुंती को महर्षि दुर्वासा ने एक ऐसा मंत्रदिया था, जिसके द्वारा वह किसी भी देवता का आह्वान कर सकती थी। कुंती ने मंत्र का प्रयोग करके धर्मराजवायु और इन्द्र देव का आह्वान करके उनसे क्रमश: युधिष्ठिरभीमतथा अर्जुन जैसे पुत्रों को पाया। कुंती ने यह मंत्र माद्री को भी प्रदान किया, जिससे माद्री ने अश्विनीकुमारों को आमन्त्रित किया और नकुल तथा सहदेव जैसे पुत्रों की माता बनी।

पौराणिक कथा

एक बार सभी देवगण गंगा में स्नान करने के लिए गये। वहाँ उन्होंने गंगा में बहता एक कमल का फूल देखा। इन्द्र उसका कारण खोजने गंगा के मूलस्थान की ओर बढ़े। गंगोत्री के पास एक सुंदरी रो रही थी। उसका प्रत्येक आंसू गंगा जल में गिरकर स्वर्ण कमल बन जाता था। इन्द्र ने उसके दु:ख का कारण जानना चाहा तो वह इन्द्र को लेकर हिमालय पर्वत के शिखर पर पहुँची। वहाँ एक देव तरुण एक सुंदरी के साथ क्रीड़ारत था। इन्द्र ने उसकी अपमानजनक भर्त्सना की तथा दुराभिमान के साथ बताया कि वह सारा स्थान उसके अधीन है। उस देव पुरुष के दृष्टिपात मात्र से ही इन्द्र चेतनाहीन होकर जड़वत हो गये। देव पुरुष ने इन्द्र को बताया कि वह रुद्र हैं तथा उन्होंने इन्द्र को एक पर्वतहटाकर गुफ़ा का मुंह खोलने का आदेश दिया। ऐसा करने पर इन्द्र ने देखा कि गुफ़ा के अंदर चार अन्य तेजस्वी इन्द्र विद्यमान थे। रुद्र के आदेश पर इन्द्र ने भी वहाँ प्रवेश किया। रुद्र ने कहा- "तुमने दुराभिमान के कारण मेरा अपमान किया है, अत: तुम पांचों पृथ्वी पर मानव-रूप में जन्म लोगे। तुम पांचों का विवाह इस सुंदरी के साथ होगा, जो कि लक्ष्मी है। तुम सब सत्कर्मों का संपादन करके पुन: इन्द्रलोक की प्राप्ति कर पाओगे।" अत: पांचों पांडव तथा द्रौपदी का जन्म हुआ। पंचम इन्द्र ही पांडवों में अर्जुन हुए थे।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  महाभारत, आदिपर्व, अध्याय 196, श्लोक 1 से 36 तक

खांडव वन  

खांडव वन को इंद्रप्रस्थ कहा गया है। खांडव वन एक प्रसिद्ध अरण्य था। महाभारत में इसका प्रमुखता से वर्णन आता है। तक्षक पहले कुरुक्षेत्र में, बाद में खांडव वन में छिपकर रहा था। नागराज तक्षक की इंद्र ने छिपने में सहायता की थी। अग्नि खांडव को प्रज्वलित लपटों में लेकर भक्षण करना चाहता था। उसने सात बार प्रयत्न किया कि खांडव का भक्षण करे। ब्रह्मा ने परामर्श दिया कि वह कृष्ण और अर्जुन की सहायता लें। कृष्ण और अर्जुन ने खांडव में रहने वाले प्राणियों को मारने से रोका था। इंद्रऔर देवताओं का उनसे संघर्ष हुआ। लेकिन इंद्र की नहीं चली। नागराज तक्षक का पुत्र बचकर भाग गया। असुर माया को भी छोड़ दिया गया। दहित खांडव वन के सभी प्राणी व्याकुल हो उठे। इस खांडव वन दाह से अग्नि की तृप्ति हुई।[1]

कथा

श्वैतकि के यज्ञ में निरंतर बारह वर्षों तक घृतपान करने के उपरांत अग्नि देवता को तृप्ति के साथ-साथ अपच हो गया। उन्हें किसी का हविष्य ग्रहण करने की इच्छा नहीं रही। स्वास्थ्य की कामना से अग्निदेव ब्रह्मा के पास गये। ब्रह्मा ने कहा की यदि वे खांडव वन को जला देंगे तो वहाँ रहने वाले विभिन्न जंतुओं से तृप्त होने पर उनकी अरुचि भी समाप्त हो जायेगी। अग्नि ने कई बार प्रयत्न किया, किंतु इन्द्र ने तक्षक नाग तथा जानवरों की रक्षा के हेतु अग्निदेव को खांडव वन नहीं जलाने दिया। अग्नि पुनः ब्रह्मा के पास पहुंचे। ब्रह्मा से कहा की नर और नारायण रूप में अर्जुनतथा कृष्ण खांडव वन के निकट बैठे हैं, उनसे प्रार्थना करें तो अग्नि अपने मनोरथ में निश्चित सफल होंगे।

अग्निदेव की कामना

एक बार अर्जुन और कृष्ण अपनी रानियों के साथ जल-विहार के लिए गये। अग्निदेव ने उन दोनों को अकेला पाकर ब्राह्मण के वेश में जाकर उनसे यथेच्छा भोजन की कामना की। उनकी स्वीकृति प्राप्त कर अग्निदेव ने अपना परिचय दिया तथा भोजन के रूप में खांडव वन की याचना की। अर्जुन के यह कहने पर कि उसके पास वेगवहन करने वाला कोई धनुष, अमित बाणों से युक्त तरकश तथा वेगवान रथ नहीं है, अग्निदेव ने वरुण देव का आवाहन करके गांडीव धनुष, अक्षय तरकश, दिव्य घोड़ों से जुता हुआ एक रथ[2]लेकर अर्जुन को समर्पित किया। अग्नि ने कृष्ण को भी एक चक्र समर्पित किया।

गांडीव धनुष अलौकिक था। वह वरुण से अग्नि को और अग्नि से अर्जुन को प्राप्त हुआ था। वह देव, दानव तथा गंधर्वों से अनंत वर्षों तक पूजित रहा था। वह किसी शस्त्र से नष्ट नहीं हो सकता था तथा अन्य लाख धनुषों की समता कर सकता था। उसमें धारण करने वाले के राष्ट्र को बढाने की शक्ति विद्यमान थी। उसके साथ ही अग्निदेव ने एक अक्षय तरकश भी अर्जुन को प्रदान किया था, जिसके बाण कभी समाप्त नहीं हो सकते थे। गति को तीव्रता प्रदान करने के लिए जो रथ अर्जुन को मिला, उसमें आलौकिक घोड़े जुते हुए थे तथा उसके शिखर पर एक दिव्य वानर बैठा था। उस ध्वज में अन्य जानवर भी विद्यमान रहते थे, जिनके गर्जन से दिल दहल जाता था। पावक ने कृष्ण को एक दिव्य चक्र प्रदान किया, जिसका मध्य भाग वज्र के समान था। वह मानवीय तथा अमानवीय प्राणियों को नष्ट कर पुनः कृष्ण के पास लौट आता था।

खांडव वन का दहन

तदनंतर अग्निदेव ने खांडव वन को सब ओर से प्रज्वलित कर दिया। जो भी प्राणी बाहर भागने की चेष्टा करता, अर्जुन तथा कृष्ण उसका पीछा करते। इस प्रकार दहित खांडव वन के प्राणी व्याकुल हो उठे। उनकी सहायता के लिए इन्द्र समस्त देवताओं के साथ घटनास्थल पर पहुँचे, किंतु उन सबकी भी अर्जुन तथा कृष्ण के सम्मुख एक न चली। अंततोगत्वा वे सब मैदान में भाग खड़े हुए। तभी इन्द्र के प्रति एक आकाशवाणी हुई- 'तुम्हारा मित्र तक्षक नाग कुरुक्षेत्र गया हुआ है, अतः खांडव वन दाह से बच गया है। अर्जुन तथा कृष्ण 'नर-नारायण' हैं, अतः उनसे कोई देवताजीत नहीं पायेगा।' यह सुनकर इन्द्र भी अपने लोक की ओर बढे। खांडव वन–दाह से अश्वसेन, मायासुर तथा चार शांगर्क नामक पक्षी बच गये थे। इस वन दाह से अग्नि देव तृप्त हो गये तथा उनका रोग भी नष्ट हो गया।

उसी समय इन्द्र मरुद्गण आदि देवताओं के साथ प्रकट हुए तथा देवताओं के लिए भी जो कार्य कठिन है, उसे करने वाले अर्जुन तथा कृष्ण को उन्होंने वर मांगने के लिए कहा। अर्जुन ने सब प्रकार के दिव्यास्त्रों की कामना प्रकट की। इन्द्र ने कहा कि शिव को प्रसन्न कर लेने पर ही दिव्यास्त्र प्राप्त होंगे। कृष्ण ने इन्द्र से वर प्राप्त किया कि अर्जुन से उनका[3] प्रेम नित्य प्रति बढता जाये।[4]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  महाभारतआदिपर्व अध्याय 1, 2, 61 123, 223-232, वनपर्व, अध्याय 48, 49, 160
  2.  जिस पर कपिध्वज लगी थी
  3.  कृष्ण का
  4.  महाभारत आदिपर्व,अध्याय 221 से 227 तक, अध्याय 233, श्लोक 7 से14 तक

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