चालुक्य वंश
चालुक्य वंश
| शासक | शासनकाल |
|---|---|
| जयसिंह चालुक्य | - |
| रणराग | - |
| पुलकेशी प्रथम | (550-566 ई.) |
| कीर्तिवर्मा प्रथम | (566-567 ई.) |
| मंगलेश | (597-98 से 609 ई.) |
| पुलकेशी द्वितीय | (609-10 से 642-43 ई.) |
| विक्रमादित्य प्रथम | (654-55 से 680 ई.) |
| विनयादित्य | (680 से 696 ई.) |
| विजयादित्य | (696 से 733 ई.) |
| विक्रमादित्य द्वितीय | (733 से 745 ई.) |
| कीर्तिवर्मा द्वितीय | (745 से 753 ई.) |
चालुक्यों की उत्पत्ति का विषय अत्यंत ही विवादास्पद है। वराहमिहिर की 'बृहत्संहिता' में इन्हें 'शूलिक' जाति का माना गया है, जबकि पृथ्वीराजरासो में इनकी उत्पति आबू पर्वत पर किये गये यज्ञ के अग्निकुण्ड से बतायी गयी है। 'विक्रमांकदेवचरित' में इस वंश की उत्पत्ति भगवान ब्रह्म के चुलुक से बताई गई है। इतिहासविद् 'विन्सेण्ट ए. स्मिथ' इन्हें विदेशी मानते हैं। 'एफ. फ्लीट' तथा 'के.ए. नीलकण्ठ शास्त्री' ने इस वंश का नाम 'चलक्य' बताया है। 'आर.जी. भण्डारकरे' ने इस वंश का प्रारम्भिक नाम 'चालुक्य' का उल्लेख किया है। ह्वेनसांग ने चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय को क्षत्रिय कहा है। इस प्रकार चालुक्य नरेशों की वंश एवं उत्पत्ति का कोई अभिलेखीय साक्ष्य नहीं मिलता है।
वंश शाखाएँ
दक्षिणपथ मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत था। जब मौर्य सम्राटों की शक्ति शिथिल हुई, और भारत में अनेक प्रदेश उनकी अधीनता से मुक्त होकर स्वतंत्र होने लगे, तो दक्षिणापथ में सातवाहन वंश ने अपने एक पृथक् राज्य की स्थापना की। कालान्तर में इस सातवाहन वंश का बहुत ही उत्कर्ष हुआ, और इसने मगध पर भी अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। शकों के साथ निरन्तर संघर्ष के कारण जब इस राजवंश की शक्ति क्षीण हुई, तो दक्षिणापथ में अनेक नए राजवंशों का प्रादुर्भाव हुआ, जिसमें वाकाटक, कदम्ब और पल्लव वंश के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन्हीं वंशों में से वातापि या बादामी का चालुक्य वंश और कल्याणी का चालुक्य वंश भी एक था।
वराहमिहिर
वराहमिहिर | |
| पूरा नाम | वराहमिहिर |
| जन्म | ई. 499 |
| जन्म भूमि | 'कपिथा गाँव', उज्जैन |
| मृत्यु | ई. 587 |
| अभिभावक | पिता- आदित्यदास |
| संतान | पुत्र- पृथुयशा |
| मुख्य रचनाएँ | बृहज्जातक, बृहत्संहिता और पंचसिद्धांतिका |
| पुरस्कार-उपाधि | महाराज विक्रमादित्य ने मिहिर को मगधदेश का सर्वोच्च सम्मान वराह प्रदान किया। |
| विशेष | वराह मिहिर की मुलाक़ात 'आर्यभट' के साथ हुई। इस मुलाक़ात का यह प्रभाव पड़ा कि वे आजीवन खगोलशास्त्री बने रहे। आर्यभट वराहमिहिर के गुरु थे, ऐसा भी उल्लेख मिलता है। |
| अन्य जानकारी | भविष्य शास्त्र और खगोल विद्या में उनके द्वारा किए गये योगदान के कारण राजा विक्रमादित्य द्वितीय ने वराह मिहिर को अपने दरबार के नौ रत्नों में स्थान दिया। |
वराहमिहिर (अंग्रेज़ी: Varāhamihira, जन्म: ई. 499 - मृत्यु: ई. 587) ईसा की पाँचवीं-छठी शताब्दी के भारतीय गणितज्ञ एवं खगोल शास्त्री थे। वराहमिहिर ने ही अपने पंचसिद्धान्तिका नामक ग्रंथ में सबसे पहले बताया कि अयनांश का मान 50.32 सेकेण्ड के बराबर है। कापित्थक (उज्जैन) में उनके द्वारा विकसित गणितीय विज्ञान का गुरुकुल सात सौ वर्षों तक अद्वितीय रहा। वरःमिहिर बचपन से ही अत्यन्त मेधावी और तेजस्वी थे। अपने पिता आदित्यदास से परम्परागत गणित एवं ज्योतिष सीखकर इन क्षेत्रों में व्यापक शोध कार्य किया। समय मापक घट यन्त्र, इन्द्रप्रस्थ में लौहस्तम्भ के निर्माण और ईरान के शहंशाह नौशेरवाँ के आमन्त्रण पर जुन्दीशापुर नामक स्थान पर वेधशाला की स्थापना - उनके कार्यों की एक झलक देते हैं।[1]
जीवन परिचय
वराह मिहिर का जन्म उज्जैन के समीप 'कपिथा गाँव' में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पिता आदित्यदास सूर्य के उपासक थे। उन्होंने मिहिर को (मिहिर का अर्थ सूर्य) भविष्य शास्त्र पढ़ाया था। मिहिर ने राजा विक्रमादित्य के पुत्र की मृत्यु 18 वर्ष की आयु में होगी, यह भविष्यवाणी की थी। हर प्रकार की सावधानी रखने के बाद भी मिहिर द्वारा बताये गये दिन को ही राजकुमार की मृत्यु हो गयी। राजा ने मिहिर को बुला कर कहा, 'मैं हारा, आप जीते'। मिहिर ने नम्रता से उत्तर दिया, 'महाराज, वास्तव में मैं तो नहीं 'खगोल शास्त्र' के 'भविष्य शास्त्र' का विज्ञान जीता है'। महाराज ने मिहिर को मगध देश का सर्वोच्च सम्मान वराहप्रदान किया और उसी दिन से मिहिर वराह मिहिर के नाम से जाने जाने लगे। भविष्य शास्त्र और खगोल विद्या में उनके द्वारा किए गये योगदान के कारण राजा विक्रमादित्य द्वितीय ने वराह मिहिर को अपने दरबार के नौ रत्नों में स्थान दिया।
वराह मिहिर की मुलाक़ात 'आर्यभट' के साथ हुई। इस मुलाक़ात का यह प्रभाव पड़ा कि वे आजीवन खगोलशास्त्री बने रहे। आर्यभट वराहमिहिर के गुरु थे, ऐसा भी उल्लेख मिलता है। आर्यभट की तरह वराह मिहिर का भी कहना था कि पृथ्वी गोल है। विज्ञान के इतिहास में वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बताया कि सभी वस्तुओं का पृथ्वी की ओर आकर्षित होना किसी अज्ञात बल का आभारी है। सदियों बाद 'न्यूटन' ने इस अज्ञात बल को 'गुरुत्वाकर्षण बल' नाम दिया।
टीका टिप्पणी और संदर्भ
भारतीय संस्कृति के सर्जक, पेज न. (67)
- ↑ 1.0 1.1 वराहमिहिर जीवनी - Biography of Varahamihira (हिंदी) जीवनी डॉट ऑर्ग। अभिगमन तिथि: 22 मार्च, 2018।
- ↑ पोलिटकिल हिस्ट्री आफ एंशेंट इंडिया- पृ. 406
बाहरी कड़ियाँ
- जानिए महान ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर के बारे में
- वराहमिहिर की वह भविष्यवाणी ...
- महान ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर की जीवन कहानी
वराहमिहिर जीवनी - Biography of Varahamihira in Hindi Jivani
वराहमिहिर (वरःमिहिर) ईसा की पाँचवीं-छठी शताब्दी के भारतीय गणितज्ञ एवंखगोलज्ञ थे। वाराहमिहिर ने ही अपनेपंचसिद्धान्तिका में सबसे पहले बताया किअयनांश का मान 50.32 सेकेण्ड केबराबर है।
कापित्थक (उज्जैन) में उनके द्वाराविकसित गणितीय विज्ञान का गुरुकुल सातसौ वर्षों तक अद्वितीय रहा। वरःमिहिरबचपन से ही अत्यन्त मेधावी और तेजस्वीथे। अपने पिता आदित्यदास से परम्परागतगणित एवं ज्योतिष सीखकर इन क्षेत्रों मेंव्यापक शोध कार्य किया। समय मापक घटयन्त्र, इन्द्रप्रस्थ में लौहस्तम्भ के निर्माण औरईरान के शहंशाह नौशेरवाँ के आमन्त्रण परजुन्दीशापुर नामक स्थान पर वेधशाला कीस्थापना - उनके कार्यों की एक झलक देतेहैं।
वराहमिहिर (Varahamihira) का जन्म505 ईस्वी में हुआ था | ब्रूहजातक मेंउन्होंने अपने पिता आदित्यदास का परिचयदेते हुए लिखा है कि “मैंने कालपी नगर मेंसूर्य से वर प्राप्त कर अपने पिताआदित्यदास से ज्योतिषशास्त्र की शिक्षाप्राप्त की | ” इसके बाद वे उज्जयिनीजाकर रहने लगे | यही उन्होंने ब्रुह्जातककी रचना की | वो सूर्य के उपासक थे | वराहमिहिर (Varahamihira) नेलघुजातक ,विवाह-पटल ,ब्रुह्क्तसंहिता , योगयात्रा और पंचसिधान्तिका नामक ग्रंथोकी ढ़कना की | वो विक्रमादित्य के नवरत्नोंमें से एक माने जाते है |
वराहमिहिर (Varahamihira) भारतीयज्योतिष साहित्य के निर्माता है | उन्होंनेअपने पंचसिद्धान्तिका नामक ग्रन्थ से पांचसिद्धांतो की जानकारी दी है जिसमेभारतीय तथा पाश्चात्य ज्योतिष विज्ञान कीजानकारी सम्मिलित है | उन्होंने अपनीबृहत्संहिता नामक ज्ञानकोष में तत्कालीनसमय की संस्कृति तथा भौगोलिक स्थितिकी जानकारी दी है | फलत ज्योतिष कीजानकारी उनके ग्रंथो में अधिक है | जन्मकुंडली बनाने की विद्या को जिसहोरोशास्त्र के नाम से जाना जाता है उनकाबृहत्जातक ग्रन्थ इसी शास्त्र पर आधारितहै | लघुजातक इसी ग्रन्थ का संक्षिप्त रूपहै |
योगयात्रा में यात्रा पर निकलते समय शुभअशुभ आदि संबधी घटनाओं का वर्णन है | इन ग्रंथो में ज्ञान के साथ साथ अन्धविश्वासको भी काफी बल मिला | यदि अन्धविश्वाससंबंधी बातो को दरकिनार कर दे तो इसग्रन्थ की अच्छे बाते हमारे ज्ञान में सहायकहोगी | पृथ्वी की अयन-चलन नाम की ख़ासगति के कारण ऋतुये होती है इसका ज्ञानकराया | गणित द्वारा की गयी नई गणनाओंके आधार पर पंचाग का निर्माण किया | वराहमिहिर के अनुसार “समय समय परज्योतिषीयो को पंचाग सुधार करते रहनाचाहिए क्योंकि गढ़ नक्षत्रो तथा ऋतुओ कीस्थिति में परिवर्तन होते रहते है ” |
राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के पुत्र की मृत्युका दिन भी उन्होंने ज्योतिष के आधार परउन्हें बताया था। उन्होंने यह भी बताया थाकि उनके पुत्र की मृत्यु को उस दिन कोईनहीं टाल सकेगा उसे बनेला जंगली सूअरमारेगा।
यह सुनकर राजा ने अपने पुत्र के प्राण रक्षाके काफी प्रयत्न किए, किन्तु वे उसकी मृत्युका ना रोक सके। पुत्र की मृत्यु का समाचारसुनकर राजा ने मिहिर को राज दरबार मेंआमंत्रित किया और कहा आप पूर्णज्योतिषज्ञ है, मुझे इसका पूर्ण विश्वास होगया हैं। यह कह कर राजा ने उनके मगधराज्य का सबसे बड़ा पुरस्कार ‘वराह चिन्ह’ देकर सम्मानित किया। इसके बाद हीमिहिर को वराह मिहिर कहा जाने लगा था।
वाराहमिहिर ने आर्यभट्ट प्रथम द्वाराप्रतिपादित ज्या सारणी को और अधिकपरिशुद्धत बनाया। उन्होंने शून्य एवंऋणात्मक संख्याओं के बीजगणितीय गुणोंको परिभाषित किया। वराहमिहिर ‘संख्या-सिद्धान्त’ नामक एक गणित ग्रन्थ के भीरचयिता हैं जिसके बारे में बहुत कम ज्ञातहै। इस ग्रन्थ के बारे में पूरी जानकारी नहींहै क्योंकि इसका एक छोटा अंश ही प्राप्तहो पाया है। प्राप्त ग्रन्थ के बारे में पुराविदोंका कथन है कि इसमें उन्नत अंकगणित, त्रिकोणमिति के साथ-साथ कुछ अपेक्षाकृतसरल संकल्पनाओं का भी समावेश है।वराहमिहिर ने ही वर्तमान समय में पास्कलत्रिकोण (Pascal’s triangle) के नाम सेप्रसिद्ध संख्याओं की खोज की। इनकाउपयोग वे द्विपद गुणाकों (binomial coefficients) की गणना के लिये करतेथे। वराहमिहिर का प्रकाशिकी में भीयोगदान है। उन्होने कहा है कि परावर्तनकणों के प्रति-प्रकीर्णन (back-scattering) से होता है। उन्होने अपवर्तनकी भी व्याख्या की है। वराहमिहिर की मृत्युसन 587 में हुई थी।
कृतियाँ
550 ई. के लगभग इन्होंने तीन महत्वपूर्णपुस्तकें बृहज्जातक, बृहत्संहिता औरपंचसिद्धांतिका, लिखीं। इन पुस्तकों मेंत्रिकोणमिति के महत्वपूर्ण सूत्र दिए हुए हैं, जो वराहमिहिर के त्रिकोणमिति ज्ञान केपरिचायक हैं।
पंचसिद्धांतिका में वराहमिहिर से पूर्वप्रचलित पाँच सिद्धांतों का वर्णन है। येसिद्धांत हैं : पोलिशसिद्धांत, रोमकसिद्धांत, वसिष्ठसिद्धांत, सूर्यसिद्धांत तथापितामहसिद्धांत। वराहमिहिर ने इनपूर्वप्रचलित सिद्धांतों की महत्वपूर्ण बातेंलिखकर अपनी ओर से 'बीज' नामकसंस्कार का भी निर्देश किया है, जिससे इनसिद्धांतों द्वारा परिगणित ग्रह दृश्य हो सकें।इन्होंने फलित ज्योतिष के लघुजातक, बृहज्जातक तथा बृहत्संहिता नामक तीनग्रंथ भी लिखे हैं। बृहत्संहिता में वास्तुविद्या, भवन-निर्माण-कला, वायुमंडल की प्रकृति, वृक्षायुर्वेद आदि विषय सम्मिलित हैं।
अपनी पुस्तक के बारे में वराहमिहिरकहते है:
ज्योतिष विद्या एक अथाह सागर है औरहर कोई इसे आसानी से पार नहीं करसकता। मेरी पुस्तक एक सुरक्षित नाव है, जो इसे पढ़ेगा वह उसे पार ले जायेगी।
यह कोरी शेखी नहीं थी। इस पुस्तक कोअब भी ग्रन्थरत्न समझा जाता है।
कृतियों की सूची
पंचसिद्धान्तिका,
बृहज्जातकम्,
लघुजातक,
बृहत्संहिता
टिकनिकयात्रा
बृहद्यात्रा या महायात्रा
योगयात्रा या स्वल्पयात्रा
वृहत् विवाहपटल
लघु विवाहपटल
कुतूहलमंजरी
दैवज्ञवल्लभ
लग्नवाराहि
मृत्यु
इस महान् वैज्ञानिक की मृत्यु ईस्वी सन्587 में हुई। वराह मिहिर की मृत्यु के बादज्योतिष गणितज्ञ ब्रह्म गुप्त ( ग्रंथ- ब्रह्मस्फुटसिद्धांत, खण्ड खाद्य), लल्ल(लल्लसिद्धांत), वराह मिहिर के पुत्र पृथुयशा(होराष्ट पंचाशिका) और चतुर्वेद पृथदकस्वामी, भट्टोत्पन्न, श्रीपति, ब्रह्मदेव आदि नेज्योतिष शास्त्र के ग्रंथों पर टीका ग्रंथ लिखे।
तथ्य
गुप्त काल के प्रसिद्ध खगोलशास्त्रीवराहमिहिर है।
इनके प्रसिद्ध ग्रंथ 'वृहत्संहिता' तथा'पञ्चसिद्धन्तिका' है।
वृहत्संहिता में नक्षत्र-विद्या, वनस्पतिशास्त्रम्, प्राकृतिक इतिहास, भौतिक भूगोल जैसे विषयों पर वर्णन है।
राय-चौधरी के अनुसार एरिआकेवृहत्संहित में उल्लिखित अर्यक भी होसकता है।

वृहज्जातक
वृहज्जातक भारत के महान खगोलशास्त्री एवं ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर द्वारा रचित ज्योतिष संंबंधी एक ग्रंथ है। वृहज्जातक में वराहमिहिर के अनुसार केमद्रुम योग उस समय होता है जब चंद्रमा के आगे या पीछे वाले भावों में ग्रह न हो अर्थात चंद्रमा से दूसरे और चंद्रमा से द्वादश भाव में कोई भी ग्रह नहीं हो। यह योग इतना अनिष्टकारी नहीं होता जितना कि वर्तमान समय के ज्योतिषियों ने इसे बना दिया है। व्यक्ति को इससे भयभीत नहीं होना चाहिए क्योंकि यह योग व्यक्ति को सदैव बुरे प्रभाव नहीं देता अपितु वह व्यक्ति को जीवन में संघर्ष से जूझने की क्षमता एवं ताकत देता है, जिसे अपनाकर जातक अपना भाग्य निर्माण कर पाने में सक्षम हो सकता है और अपनी बाधाओं से उबर कर आने वाले समय का अभिनंदन कर सकता है।
बाहरी कड़ियाँ
वृहत्संहिता
वृहत्संहिता भारत के महान खगोलशास्त्री एवं ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर द्वारा रचित एक ग्रंथ है। वराहमिहिर द्वारा छठी शताब्दी संस्कृत में रचित एक विश्वकोश है जिसमें मानव रुचि के विविध विषयों पर लिखा गया है।
विशेषता
- इसमें खगोलशास्त्र, ग्रहों की गति, ग्रहण, वर्षा, बादल, वास्तुशास्त्र, फसलों की वृद्धि, इत्रनिर्माण, लग्न, पारिवारिक संबन्ध, रत्न, मोती एवं कर्मकांडों का वर्णन है।
- वृहत्संहिता में 106 अध्याय हैं। यह अपने महान संकलन के लिये प्रसिद्ध है।
पंचसिद्धांतिका
पंचसिद्धांतिका (अंग्रेज़ी: Pancha-Siddhantika) भारत के महान खगोलशास्त्री एवं ज्योतिषाचार्य वराहमिहिरद्वारा रचित एक ग्रंथ है। महाराजा विक्रमादित्य के काल में इस ग्रंथ की रचना हुई थी। वराहमिहिर ने तीन महत्वपूर्ण ग्रन्थ वृहज्जातक, वृहत्संहिता और पंचसिद्धांतिका की रचना की।
विशेषता
- इस ग्रंथ की रचना का काल ई. 520 माना जाता है।
- पंचसिद्धान्तिका में खगोल शास्त्र का वर्णन किया गया है।
- इसमें वराहमिहिर के समय प्रचलित पाँच खगोलीय सिद्धांतों का वर्णन है।
- इस ग्रन्थ में ग्रह और नक्षत्रों का गहन अध्ययन किया गया है। इन सिद्धांतों द्वारा ग्रहों और नक्षत्रों के समय और स्थिति की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
- इसमें त्रिकोणमिति के महत्वपूर्ण सूत्र दिए गये हैं, जो वराहमिहिर के त्रिकोणमिति ज्ञान के परिचायक हैं।
- पंचसिद्धांतिका में वराहमिहिर से पूर्व प्रचलित पाँच सिद्धांतों का वर्णन है जो सिद्धांत पोलिशसिद्धांत, रोमकसिद्धांत, वसिष्ठसिद्धांत, सूर्यसिद्धांत तथा पितामहसिद्धांत हैं।
- वराहमिहिर ने इन पूर्व प्रचलित सिद्धांतों की महत्वपूर्ण बातें लिखकर अपनी ओर से 'बीज' नामक संस्कार का भी निर्देश किया है, जिससे इन सिद्धांतों द्वारा परिगणित ग्रह दृश्य हो सकें।[1]
टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ वाराहमिहिर/Varahmihir (हिंदी) एकात्मता स्तोत्र। अभिगमन तिथि: 21 मार्च, 2018।
वाराहमिहिर के नाम के बारे में एक कथा प्रचलित है। वाराहमिहिर ने ज्योतिष-शास्त्र में विशेष योग्यता प्राप्त थी। उनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने उन्हें नव-रत्न की उपाधि दी। राजा विक्रमादित्य के पुत्र-जन्म के समय मिहिर ने भविष्यवाणी की कि अमुक वर्ष के अमुक दिन एक सुअर (वाराह) इस बालक को मार डालेगा। राजा ने अपने पुत्र की सुरक्षा के लिए बहुत इंतजाम किये लेकिन अंत में मिहिर की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई। तब से मिहिर वाराहमिहिर कहलाये। वाराहमिहिर सूर्य के उपासक थे। यह माना जाता है कि सूर्य के आशीर्वाद से ही उनको ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त हुआ।
वाराहमिहिर ने तीन महत्वपूर्ण ग्रन्थ, वृहज्जातक, वृहत्संहिता और पंचसिद्धांतिका की रचना की।
वृहज्जातक में वाराहमिहिर ने ज्योतिष विज्ञान विशेषतः यात्रा मुहूर्त, विवाह मुहूर्त, जन्म-कुंडली आदि का वर्णन किया है।
पंचसिद्धान्तिका में खगोल शास्त्र का वर्णन किया गया है। इसमें वाराहमिहिर के समय प्रचलित पाँच खगोलीय सिद्धांतों का वर्णन है। इस ग्रन्थ में ग्रह और नक्षत्रों का गहन अध्ययन किया गया है। इन सिद्धांतों द्वारा ग्रहों और नक्षत्रों के समय और स्थिति की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इन पुस्तकों में त्रिकोणमिति के महत्वपूर्ण सूत्र दिए हुए हैं, जो वाराहमिहिर के त्रिकोणमिति ज्ञान के परिचायक हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि वाराहमिहिर कुछ समय महरौली (मिहिरावली), दिल्ली में भी रहे। इतिहासकारों के अनुसार चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा वहां पर 27 मंदिरों का निर्माण कराया गया था। यह कार्य वाराहमिहिर के मार्गदर्शन में किया गया। इन मंदिरों को मुस्लिम शासकों द्वारा नष्ट कर दिया गया। इस स्थान को मिहिरावली यानी वाराहमिहिर (मिहिर) की देखरेख में बने मंदिरों की पंक्ति (अवली) के नाम से जाना गया। जगप्रसिद्ध कुतुबमीनार एक समय में वाराहमिहिर की वेधशाला थी।पृथ्वीराज रासो
पृथ्वीराज रासो | |
| कवि | चंदबरदाई |
| मूल शीर्षक | पृथ्वीराज रासो |
| मुख्य पात्र | पृथ्वीराज चौहान |
| देश | भारत |
| शैली | काव्य |
| विषय | जीवन चरित्र का वर्णन |
| विधा | महाकाव्य |
| विशेष | 'पृथ्वीराज रासो' वीर रस का हिंदी का सर्वश्रेष्ठ काव्यहै। |
पृथ्वीराज रासो हिन्दी भाषा में लिखा गया एक महाकाव्यहै, जिसमें पृथ्वीराज चौहान के जीवन-चरित्र का वर्णन किया गया है। यह कवि चंदबरदाई की रचना है, जो पृथ्वीराज के अभिन्न मित्र तथा राजकवि थे। इसमें दिल्लीश्वर पृथ्वीराज के जीवन की घटनाओं का विशद वर्णन है। यह एक विशाल महाकाव्य है। यह तेरहवीं शती की रचना है। डॉ. माताप्रसाद गुप्त इसे 1400 वि. के लगभग की रचना मानते हैं। पृथ्वीराज रासो की ऐतिहासिकता विवादग्रस्त है।[1]
हिन्दी साहित्य का महाकाव्य
इस पुस्तक के बारे में संदेह यह है कि यह रचना 'डिंगल' की है अथवा 'पिंगल' की। यह ग्रंथ एक से अधिक रचयिताओं का हो सकता है। 'पृथ्वीराज रासो' ढाई हज़ार पृष्ठों का संग्रह है। इसमें पृथ्वीराज व उनकी प्रेमिका संयोगिता के परिणय का सुन्दर वर्णन है। यह ग्रंथ ऐतिहासिक कम काल्पनिक अधिक है। 'पृथ्वीराज रासो' तथा 'आल्हाखण्ड' हिन्दी साहित्य के आदि काल के दो प्रसिद्ध महाकाव्य हैं। पृथ्वीराज रासो को हम साहित्यिक परम्परा का विकसनशील महाकाव्य और आल्हाखण्ड को लोक-महाकाव्य की संज्ञा दे सकते हैं। रासो का वृहत्तम रूपान्तर जो नागरीप्रचारिणी सभा से प्रकाशित है, 69 समय (सर्ग) का विशाल ग्रन्थ है। इसमें अन्तिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के जीवन-वृत्त के साथ सामन्ती वीर-युग की सभ्यता, रहन-सहन, मान-मर्यादा, ख़ान-पान तथा अन्य जीवन-विधियों का इतना क्रमवार और सही वर्णन हुआ है कि इसमें तत्कालीन समग्र युगजीवन अपने समस्त गुण-दोषों के साथ यथार्थ रूप में चित्रित हो उठा है।
टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ रासो काव्य : वीरगाथायें (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 15 मई, 2011।
- ↑ हिन्दी साहित्य का इतिहास, वीरगाथा काल (संवत् 1050 - 1375) अध्याय 3, लेखक - रामचन्द्र शुक्ल
- संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो: सं. हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा नामवर सिंह, साहित्य भवन लि., प्रयाग;
- पृथ्वीराज रासो : सं. कविराय मोहन, साहित्य संस्थान, संस्थान, राजस्थान विश्व विद्यापीठ, उदयपुर।
- पृथ्वीराज-विजय : सं. गौरीशंकर हीराचंद ओझा, अजमेर ;
- सुर्जन चरित महाकाव्य (चंद्रशेखर कृत) सं. डा. चंद्रधर शर्मा, हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी;
बाहरी कड़ियाँ
आबू पर्वत
आबू पर्वत सिरोही, राजस्थान में अरावली श्रृंख़ला की एक चोटी है। यह पर्वत चोटी समुद्र तल से 1219 मीटर ऊँची है। आबू पर्वत राजस्थानी राजाओं की ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में प्रसिद्ध रहा। यहाँ आज भी सुन्दर पहाड़ी पर स्वास्थ्य-निवास है। मन्दिरों और प्रकृति सौन्दर्य के कारण आबू पर्वत प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भी है।
दिलवाड़ा जैन मंदिर
जैन वास्तुकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण स्वरूप दो प्रसिद्ध संगमरमर के बने मंदिर जो दिलवाड़ा या देवलवाड़ा मंदिर कहलाते हैं, इस पर्वतीय नगर के जगत् प्रसिद्ध स्मारक हैं। विमलसाह के मंदिर के एक अभिलेख के अनुसार राजा भीमदेव प्रथम के मंत्री विमलसाह ने यह मंदिर बनवाया था। मंदिर पर 18 करोड रुपए व्यय हुआ था। कहा जाता है कि विमलसाह ने पहले कुंभेरिया के पार्श्वनाथ के 360 मंदिर बनवाए थे, किंतु उनकी इष्टदेवी अंबाजी ने किसी बात पर रुष्ट होकर पांच मंदिरों को छोड़ अवशिष्ट सारे मंदिर नष्ट कर दिए और स्वप्न में उन्हें दिलवाड़ा में आदिनाथ का मंदिर बनाने का आदेश दिया, किंतु आबू पर्वत के परमार नरेश ने विमलसाह को मंदिर के लिए भूमि देना तभी स्वीकार किया, जब उन्होंने संपूर्ण भूमि को रजतखण्डों से ढक दिया। इस प्रकार 56 लाख रूपये में यह जमीन खरीदी गई थी। इस मंदिर में आदिनाथ की मूर्ति की आंखें असली हीरे की बनी हुई हैं और उसके गले में बहुमूल्य रत्नों का हार है। मंदिर का प्रवेश द्वार गुंबद वाले मंडप से होकर है, जिसके सामने एक वर्ग आकृति भवन है।[1]
इसमें 6 स्तंभ और 10 हाथियों की प्रतिमाएं हैं। इसके पीछे मध्य में मुख्य पूजा गृह है, जिसमें एक प्रकोष्ठ में ध्यान मुद्रा में अवस्थित जिन की मूर्ति है। इस प्रकोष्ठ की छत शिखर रूप में बनी है यद्यपि वह अधिक ऊँची नहीं है। इसके साथ एक दूसरा प्रकोष्ठ बना है, जिसके आगे एक मंडप स्थित है। इस मंडप के गुम्बद में 8 स्तंभ हैं। संपूर्ण मंदिर एक प्रांगण के अंदर घिरा हुआ है, जिसकी लंबाई 128 फुट और चौड़ाई 75 फुट है। इसके चतुर्दिक् छोटे स्तम्भों की दुहरी पंक्तियां हैं, जिनसे प्रांगढ़ की लगभग 52 कोठरियों के आगे बरामदा सा बन जाता है। बाहर से मंदिर नितांत सामान्य दिखाई देता है और इससे भीतर के अद्भुत कला वैभव का तनिक भी आभास नहीं होता। किंतु सफेद संगमरमर के गुंबद का भीतरी भाग, दीवारें, छतें तथा स्तंभ अपनी महीन नक्काशी और अभूतपूर्व मूर्तिकारी के लिए संसार-प्रसिद्ध हैं। इस मूर्तिकारी में तरह-तरह के फूल-पत्ते, पशु-पक्षी तथा मानवों की आकृतियां इतनी बारीकी से चित्रित हैं मानो यहां के शिल्पियों की छेनी के सामने कठोर संगमरमर मोम बन गया हो। पत्थर की शिल्प कला का इतना महान वैभव भारत में अन्यत्र नहीं है।
दूसरा मंदिर जो तेजपाल का कहलाता है, निकट ही है और पहले की अपेक्षा प्रत्येक बात में अधिक भव्य और शानदार दिखाई देता है। इसी शैली में बने तीन अन्य जैन मंदिर भी यहां आस-पास ही हैं। किंवदंती है कि वशिष्ठ का आश्रम देवलवाड़ा के निकट ही स्थित था। अर्बुदा देवी का मंदिर यहीं पहाड़ के ऊपर है।
टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 64 |
भारतकोश, ज्ञान का हिन्दी महासागर
ह्वेन त्सांग | |
| पूरा नाम | ह्वेन त्सांग |
| अन्य नाम | युवानच्वांग, युवान चांग या युआन-त्यांग, चेन आई |
| जन्म | 602 ई. |
| मृत्यु | 5 फ़रवरी, 664 ई. |
| भाषा | संस्कृत, चीनी |
| पुरस्कार-उपाधि | सान-त्सांग |
| प्रसिद्धि | दार्शनिक, घुमक्कड़ और अनुवादक |
| विशेष योगदान | बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार |
| धर्म | बौद्ध धर्म |
| अन्य जानकारी | भारत में ह्वेन त्सांग ने बुद्धके जीवन से जुड़े सभी पवित्र स्थलों का भ्रमण किया और उपमहाद्वीप के पूर्व एवं पश्चिम से लगे इलाक़ों की भी यात्रा की। |
ह्वेन त्सांग / ह्वेन सांग / युवान चांग या युआन-त्यांग (संस्कृत: मोक्षदेव, अंग्रेज़ी:Xuanzang, जन्म: 602 ई. लगभग मृत्यु: 5 फ़रवरी, 664 ई. लगभग) मेम त्रिपिटक के रूप में ज्ञात एक प्रसिद्ध चीनी बौद्ध भिक्षु था जिसका जन्म चीन के लुओयंग स्थान पर सन् 602 ई. में हुआ था। इसके साथ ही वह एक दार्शनिक, घुमक्कड़ और अनुवादक भी था। उनका मूल नाम चेन आई था। ह्वेन त्सांग, जिन्हें मानद उपाधि सान-त्सांग से सुशोभित किया गया। उन्हें मू-चा ति-पो भी कहा जाता है। जिन्होंने बौद्ध धर्मग्रंथों का संस्कृत से चीनी अनुवाद किया और चीन में बौद्ध चेतना मत की स्थापना की। इसने ही भारत और चीनके बीच आरम्भिक तंग वंश काल में समन्वय किया था। ह्वेन त्सांग चार बच्चों में सबसे छोटा था। इसके प्रपितामह राजधानी के शाही महाविद्यालय में 'निरीक्षक' थे, और पितामह प्राध्यापक थे। इसके पिता एक कन्फ़्यूशस वादी थे, जिन्होंने अपनी राजसी नौकरी त्याग कर राजनीतिक उठापलट, जो कि चीन में कुछ समय बाद होने वाला था, से अपने को बचाया।
यात्रियों का राजकुमार
फ़ाह्यान की तरह ह्वेन त्सांग भी चीनी बौद्ध भिक्षु था। वह फ़ाह्यान के करीब 225 वर्ष उपरांत भारत पहुंचा था। ह्वेन त्सांग ने गांधार, कश्मीर, पंजाब, कपिलवस्तु, बनारस, गया एवं कुशीनगर की यात्रा की थी लेकिन भारत में सबसे महत्वपूर्ण समय कन्नौज में बीता। तब वहां का राजा हर्षवर्धन था। उसके निमंत्रण पर वह 635 से 643 ईसवी तक 8 साल कन्नौज में रहा। यहीं से वह स्वदेश रवाना हुआ। ऐसा माना जाता है कि ह्वेन त्सांग भारत से 657 पुस्तकों की पांडुलिपियां अपने साथ ले गया था। चीन पहुंचकर उसने अपना शेष जीवन इन ग्रंथों का अनुवाद करने में बिता दिया।तथागत बुद्ध की जन्मस्थली में बौद्ध धर्मका प्रचार और वैभव देखकर ह्वेन त्सांग निहाल हो गया था। उसने 6 वर्षों तक नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन भी किया। चीनी यात्रियों में सर्वाधिक महत्व ह्वेनसांग का ही है। उसे ‘प्रिंस ऑफ ट्रैवलर्स ‘अर्थात' यात्रियों का राजकुमार कहा जाता है।[1]
टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ अहा! ज़िन्दगी, अप्रैल 2018, पृष्ठ संख्या- 68
सम्मान
जब ह्वेन त्सांग भारत में थे, तो एक विद्वान के रूप में ह्वेन त्सांग की ख्याति इतनी फैली की उत्तर भारत के शासक शक्तिशाली राजा हर्षवर्धन ने भी उनसे मिलना एवं उन्हें सम्मानित करना चाहा। इस राजा के संरक्षण के कारण, 643 ई. में ह्वेन त्सांग की वापसी चीन यात्रा काफ़ी सुविधाजनक रही। उनकी ख्याति मुख्य रूप से बौद्ध सूत्रों के अनुवाद की व्यापकता एवं भिन्नता तथा मध्य एशिया और भारत की यात्रा के दस्तावेज़ों के कारण है, जो विस्तृत एवं सटीक आंकड़ों के कारण इतिहासकारों एवं पुरातत्त्वविदोम के लिए अमूल्य हैं।
राजधानी में वापसी
ह्वेन त्सांग, तांग की राजधानी चांग-अन में 16 साल के बाद 645 ई. में लौटे। राजधानी में ह्वेन त्सांग का भव्य स्वागत हुआ और कुछ दिनों बाद शहंशाह ने उन्हें दरबार में बुलाया, जो विदेशी भूमि के उनके वृतांत से इतने रोमांचित हुए कि उन्होंने इस बौद्ध भिक्षु को मंत्री पद का प्रस्ताव दिया। लेकिन ह्वेन त्सांग ने धर्म की सेवा को प्राथमिकता दी, इसलिए उन्होंने सम्मानपूर्वक शाही प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ अहा! ज़िन्दगी, अप्रैल 2018, पृष्ठ संख्या- 68
हर्ष के प्रशासन की प्रशंसा
ह्नेनसांग ने दक्षिण के काञ्ची एवं चालुक्य राज्य की भी यात्रा की थी। पुलकेशिन द्वितीय की शक्ति की उसने प्रशंसा की है। हर्ष के प्रशासन एवं प्रजा कल्याण की भावना का वह प्रशंसक था। ह्नेनसांग ने अपराधी प्रवृत्ति के लोगों की संख्या के उल्प होने की बात कही है। शारीरि दण्ड का प्रचलन कम था तथा सामाजिक बहिष्कार एवं अर्थ दण्ड के रूप में दण्ड दिया जाता था। ह्नेनसांग के अनुसार राजा वर्ष के अधिकांश समयों में निरीक्षण यात्रा पर रहता था और यात्रा के दौरान वह अस्थायी निर्माण कार्य करवा कर उसमें निवास करता था। हर्ष का समूचा दिन तीन भागों में विभाजित था-
- प्रथम भाग (दिन का) राज्य के कार्यो में
- शेष दो भाग (दिन का) धर्मार्थ कार्यों पर व्यतीत होता था।
ह्नेनसांग ने हर्ष की सैन्य व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उसकी सेना में क़रीब 50,000 पैदल सैनिक, लगभग एक लाख घुड़सवार एवं 60,000 हाथियों की संख्या थी। सेना का महत्त्वपूर्ण भाग रथ सेना होती थी।
जयसिंह चालुक्य
जयसिंह को चालुक्य साम्राज्य का प्रथम शासक माना जाता है। कैरा ताम्रपत्र अभिलेखीय साक्ष्य से यह प्रमाणित होता है कि, जयसिंह, चालुक्य राजवंश का प्रथम ऐतिहासिक शासक था।
रणराग
रणराग, वातापी के चालुक्य नरेश जयसिंह का पुत्र एवं उत्तराधिकारी था।
- रणराग सम्भवतः 520 ई. में वातापी के राज्यसिंहासन पर बैठा।
- गदा युद्ध में कुशल होने के कारण उसने 'रण रागसिंह' की उपाधि धारण की थी।
पुलकेशी प्रथम
पुलकेशी प्रथम (550-566 ई.), चालुक्य नरेश रणराग का पुत्र था। पुलकेशी प्रथम को पुलकेशिन प्रथम के नाम से भी जाना जाता था।
- यह चालुक्य वंश का सबसे प्रतापी राजा था।
- पुलकेशी प्रथम दक्षिण में वातापी में चालुक्य वंश का प्रवर्तक था।
- दक्षिणापथ में चालुक्य साम्राज्य के राज्य की स्थापना छठी सदी के मध्य भाग में हुई, जब कि गुप्त साम्राज्य का क्षय प्रारम्भ हो चुका था।
- यह निश्चित है, कि 543 ई. तक पुलकेशी नामक चालुक्य राजा वातापी (बीजापुर ज़िले में, बादामी) को राजधानी बनाकर अपने पृथक् व स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर चुका था।
- महाराज मंगलेश के 'महाकूट अभिलेख' से प्रमाणित होता है कि, उसने 'हिरण्यगर्भ', 'अश्वमेध', 'अग्निष्टोम', 'अग्नि चयन', 'वाजपेय', 'बहुसुवर्ण', 'पुण्डरीक' यज्ञ करवाया था।
- इसने 'रण विक्रम', 'सत्याश्रय', 'धर्म महाराज', 'पृथ्वीवल्लभराज' तथा 'राजसिंह' आदि की उपाधियाँ धारण की थीं।
- उनका प्राचीन इतिहास अन्धकार में है, पर उसने वातापी के समीपवर्ती प्रदेशों को जीत कर अपनी शक्ति का विस्तार किया था, और उसी उपलक्ष्य में अश्वमेध यज्ञ भी किया था। इस यज्ञ के अनुष्ठान से सूचित होता है कि, वह अच्छा प्रबल और दिग्विजयी राजा था।
कीर्तिवर्मा प्रथम
कीर्तिवर्मा प्रथम बादामी के चालुक्य वंश के नरेश पुलकेशी प्रथम का पुत्र था। वह लगभग 566-67 ई. में सिंहासन पर बैठा था और चालुक्य राजा बना। कई दृष्टियों से उसे चालुक्यों की राजनीतिक शक्ति का संस्थापक कहा जा सकता है। यह माना जाता है कि कीर्तिवर्मा की विजयी सेना ने उत्तर में बिहार और बंगाल तक तथा दक्षिण में चोलऔर पांड्य क्षेत्रों तक प्रयाण किया था। किंतु कदाचित् यह अत्युक्तिपूर्ण प्रशंसा हैं।
- कीर्तिवर्मा अपने पिता के समान प्रतापी और विजेता था।
- अभिलेखों में उसे मगध, अंग, बंग, कलिंग, मुद्रक, गंग, मषक, पाण्ड्य, चोल, द्रमिक, मौर्य, नल, कदम्बआदि राज्यों का विजेता कहा गया है।
- कदम्ब वंश का शासन वातापी के दक्षिण-पूर्व में था, और सम्भवतः मौर्य और नल वंशों के छोटे-छोटे राज्य भी दक्षिणापथ में विद्यमान थे।
- कीर्तिवर्मा प्रथम ने सम्भवतः बनवासी के कदम्बों, वेलारी, कार्नूल एवं कोंकण के मौर्यों को युद्ध में हराया।
- 'महाकूट स्तम्भ' लेख से प्रमाणित होता है कि, उसने 'बहुसुवर्ण' एवं 'अग्निस्टोम' यज्ञ को सम्पन्न करवाया था।
- कीर्तिवर्मा प्रथम ने 'पुरुरण पराक्रम', 'पृथ्वी वल्लभ' एवं 'सत्याश्रय' की उपाधि धारण की थी।
- 598 ई. के लगभग कीर्तिवर्मा प्रथम की मुत्यु हो गई। उसके बाद उसका भाई मंगलेश अगला चालुक्य शासक बना, चूंकि कीर्तिवर्मा के पुत्र अल्पवयस्क थे।
मंगलेश
मंगलेश ने गद्दी पर बैठने के उपरान्त कलचुरियों को पराजित किया था। कीर्तिवर्मा प्रथम के बाद उसके पुत्र पुलकेशी द्वितीय को राजा बनना चाहिए था।
- उसके चाचा (कीर्तिवर्मा के भाई) मंगलेश (597-98 से 609 ई.) ने बल प्रयोग करके वातापी की गद्दी पर अधिकार कर लिया, और कुछ समय तक अपने अग्रज द्वारा स्थापित राज्य का उपभोग किया।
- वल्लभी नरेश ने मंगलेश द्वारा आरम्भ किये गये विजय अभियान को रोकने का प्रयत्न किया, किंतु इस कार्य में वह अल्प सफलता ही प्राप्त कर सका।
- मंगलेश ने कदम्बों को समूल से नष्ट कर दिया था।
- ऐहोल अभिलेख के उल्लेख के आधार पर प्रतीत होता है कि, मंगलेश अपने पुत्र को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता था।
- इस बीच में पुलकेशी द्वितीय भी शान्त नहीं बैठा था। उसने राज्य प्राप्त करने का प्रयत्न जारी रखा था।
- अंत में गृह युद्ध द्वारा मंगलेश को मारकर पुलकेशी द्वितीय राजसिंहासन पर आरूढ़ हो गया।
पुलकेशी द्वितीय
पुलकेशी द्वितीय, पुलकेशी प्रथम का पौत्र तथा चालुक्य वंश का चौथा राजा था, जिसने 609-642 ई. तक राज्य किया। वह महाराजाधिराज हर्षवर्धन का समसामयिक तथा प्रतिद्वन्द्वी था। उसने 620 ई. में दक्षिण पर हर्ष का आक्रमण विफल कर दिया।
प्रसिद्धि
वातापी के चालुक्य वंश में पुलकेशी द्वितीय सबसे अधिक शक्तिशाली और प्रसिद्ध हुआ है। मंगलेश और पुलकेशी के गृह-कलह के अवसर पर चालुक्य वंश की शक्ति बहुत ही क्षीण हो गई थी और कीर्तिवर्मा प्रथम द्वारा विजित अनेक प्रदेश फिर से स्वतंत्र हो गए थे। इतना ही नहीं, अनेक अन्य राजाओं ने भी चालुक्य साम्राज्य पर आक्रमण प्रारम्भ कर दिए थे। इस दशा में पुलेकशी द्वितीय ने बहुत धीरता और शक्ति का परिचय दिया। उसने न केवल विद्रोही प्रदेशों को फिर से विजय किया, अपितु अनेक नए प्रदेशों की भी विजय की।
विक्रमादित्य प्रथम
विक्रमादित्य प्रथम पुलकेशी द्वितीय का पुत्र था, तथा पिता की मृत्यु के बाद राज्य का वास्तविक उत्तराधिकारी था। पुलकेशी द्वितीय की मृत्यु के बाद बादामी सहित कुछ अन्य दक्षिणी प्रान्तों की कमान पल्लवों के हाथों में रही। इस दौरान 642 से 655 ई. तक चालुक्यों की राजगद्दी ख़ाली रही। 655 में विक्रमादित्य प्रथम राजगद्दी पर विराजित होने में कामयाब हुआ। उसने बादामी को पुन: हासिल किया और शत्रुओं द्वारा विजित कई अन्य क्षेत्रों को भी पुन: अपने साम्राज्य में जोड़ा। उसने 681 ई. तक शासन किया था।
- पल्लवराज नरसिंह वर्मन प्रथम से युद्ध करते हुए पुलकेशी द्वितीय की मृत्यु हो गई थी और वातापी पर भी पल्लवों का अधिकार हो गया था।
- संकट के इस समय में भी चालुक्यों की शक्ति का पूरी तरह से अन्त नहीं हुआ था।
- विक्रमादित्य प्रथम अपने पिता के समान ही वीर और महात्वाकांक्षी था।
- उसने लगभग 655 से 681 ई. में चालुक्य राजगद्दी प्राप्त की थी।
- उसके सिंहासनारूढ़ होने के समय चोलों, पाण्ड्योंएवं केरलों ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया था।
- विक्रमादित्य प्रथम ने न केवल वातापी को पल्लवोंकी अधीनता से मुक्त किया, अपितु तेरह वर्षों तक निरन्तर युद्ध करने के बाद पल्लवराज की शक्ति को बुरी तरह कुचलकर 654 ई. में कांची की भी विजय कर ली।
- उसने पल्लवों के राज्य कांची पर अधिकार कर अपने पिता की पराजय का बदला लिया था।
- उसने 'श्रीपृथ्वीवल्लभ', 'भट्टारक', 'महाराजाधिराज', 'परमेश्वर', 'रण रसिक' आदि उपाधियाँ धारण की।
- विक्रमादित्य प्रथम सम्भवतः अपने शासन काल के अन्तिम दिनों में पल्लव नरेश परमेश्वर वर्मन प्रथम से पराजित हो गया था।
- यह विजय संदिग्ध है, क्योंकि पल्लवकालीन अभिलेख परमेश्वर वर्मन की विजय तथा चालुक्यों के अभिलेख में विक्रमादित्य प्रथम की विजय का उल्लेख मिलता है।
- वैसे निष्कर्षतः यही अनुमान लगाया जाता है कि, अन्तिम रूप से पल्लव ही विजयी रहे थे।
विनयादित्य
विनयादित्य (680 से 696 ई.), विक्रमादित्य प्रथम का पुत्र और राजसिंहासन का उत्तराधिकारी था। उसके समय में चालुक्य साम्राज्य की शक्ति अक्षुण्ण बनी रही।
- अभिलेखों में इसका उल्लेख 'त्रैराज्यपल्लवपति' के रूप में किया गया है।
- 'जेजुरी ताम्रपत्र' के अनुसार- विनयादित्य ने अपने शासन के ग्यारहवें एवं चौदहवें वर्ष में पल्लवों, कलभों, मालवों एवं चोलों पर विजय प्राप्त की थी।
- मालवों कों जीतने के उपरान्त विनयादित्य ने 'सकलोत्तरपथनाथ' की उपाधि धारण की थी।
- इसके अतिरिक्त उसने 'युद्धमल्ल', 'भट्टारक', 'महाराजाधिराज', 'राजाश्रय' आदि की उपाधियाँ धारण कीं।
- 'सिरसी लेख' में उसे 'सकलोन्तरापथनाथ', 'पलिध्वज', 'पंचमहाशब्द', 'पद्मरागमणि' आदि का प्राप्त कहा गया है।
विजयादित्य
विजयादित्य (696 से 733 ई.), विनयादित्य का पुत्र एवं राजसिंहासन का उत्तराधिकारी था। उसके समय में चालुक्य साम्राज्य की शक्ति पुर्ण रूप से अक्षुण्ण बनी रही।
- उसके शासनकाल के अब तक लगभग 40 अभिलेख प्राप्त हो चुके हैं।
- अपने शासन के दौरान उसने लगभग चार प्रदेशों को जीता था, पर इसके विषय में स्पष्ट जानकारी का अभाव है।
- विजयादित्य का शासन काल ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान एवं स्थापत्य तथा ललित कलाओं के विकास का काल था।
- उसने बीजापुर ज़िले के 'पट्टडकल' नामक स्थान में 'विजयेश्वर शिव मंदिर' का निर्माण कराया था।
- उसकी बहन कुमकुम देवी ने 'लक्ष्मेश्वर' में 'आनेसेज्येयवसादि' नामक एक भव्य जैन मंदिर का निर्माण कराया।
- विजयादित्य पिता की भांति उसने 'श्रीपृथ्वीवल्लभ', 'महाराजाधिराज', 'परमेश्वर', 'सत्याश्रम', 'भट्टारक', 'साहसरसिक' तथा 'समस्त भुवनाश्रय' आदि का विरुद्ध धारण किया था।
विक्रमादित्य द्वितीय
विक्रमादित्य द्वितीय (733 से 745 ई.), विजयादित्य का पुत्र और राजसिंहासन का उत्तराधिकारी था। विक्रमादित्य द्वितीय ने भी अपने समय में चालुक्य साम्राज्य की शक्ति को अक्षुण्ण बनाये रखा।
- 'नरवण', 'केन्दूर', 'वक्रकलेरि' एवं 'विक्रमादित्य' की रानी 'लोक महादेवी' के 'पट्टदकल' अभिलेख से यह प्रमाणित होता है कि, विक्रमादित्य द्वितीय ने पल्लवनरेश नंदि वर्मन द्वितीय को पराजित किया।
- उसने कांची को भी विजित किया था और कांची को बिना क्षति पहुंचाये, वहां के 'राजसिंहेश्वर मंदिर' को अधिक आकर्षक बनाने के लिए रत्नादि भेंट किया।
- इसने इस मंदिर की दीवार पर एक अभिलेख उत्कीर्ण करवाया और साथ ही पल्लवों की 'वातापीकोड' की तरह 'कांचिनकोड' की उपाधि धारण की थी।
- सम्भवतः पल्लवों के राज्य कांची को विक्रमादित्य द्वितीय ने तीन बार विजित किया था।
- विक्रमादित्य द्वितीय के शासनकाल में ही दक्कन पर अरबों ने आक्रमण किया था।
- 712 ई. में अरबों ने सिन्ध को जीतकर अपने अधीन कर लिया था, और स्वाभाविक रूप से उनकी यह इच्छा थी, कि भारत में और आगे अपनी शक्ति का विस्तार करें।
- अरबों ने लाट देश (दक्षिणी गुजरात) पर आक्रमण किया, जो इस समय चालुक्य साम्राज्य के अंतर्गत था।
- विक्रमादित्य द्वितीय के शौर्य के कारण अरबों को अपने प्रयत्न में सफलता नहीं मिली और यह प्रतापी चालुक्य राजा अरब आक्रमण से अपने साम्राज्य की रक्षा करने में समर्थ रहा।
- सम्भवतः विक्रमादित्य ने पाण्ड्यों, चोलों, केरलों, एवं कलभ्रों को भी परास्त किया था।
- प्रथम पत्नी 'लोक महादेवी' ने 'पट्टलक' में विशाल शिव मंदिर (विरुपाक्षमहादेव मंदिर) का निर्माण करवाया था, जो अब 'विरुपाक्ष महादेव मंदिर' के नाम से प्रसिद्ध है।
- इस विशाल मंदिर के प्रभान शिल्पी 'आचार्य गुण्ड' थे, जिन्हें 'त्रिभुवनाचारि', 'आनिवारितचारि' तथा 'तेन्कणदिशासूत्रधारी' आदि उपाधियों से विभूषित किया गया था।
- विक्रमादित्य द्वितीय के रचनात्मक व्यक्तित्व का विवरण 'लक्ष्मेश्वर' एवं 'ऐहोल' अभिलेखों से प्राप्त होता है।
- विक्रमादित्य द्वितीय ने 'वल्लभदुर्येज', 'कांचियनकोंडु', 'महाराधिराज', 'श्रीपृथ्वीवल्लभ', 'परमेश्वर' आदि उपाधियां धारण की थीं।
- विक्रमादित्य ने लगभग 745 ई. तक शासन किया।
कीर्तिवर्मा द्वितीय
कीर्तिवर्मा द्वितीय (745 से 753 ई.), विक्रमादित्य द्वितीयका पुत्र एवं उत्तराधिकारी था।
- अपने पिता की मृत्यु के बाद वह विशाल चालुक्य साम्राज्य का स्वामी बना।
- इसने अपने युवराज काल में ही पल्लव नरेश नन्दि वर्मन को परास्त कर बहुमूल्य रत्न, हाथी एवं सुवर्ण प्राप्त किया था।
- कीर्तिवर्मा द्वितीय ही सम्भवतः बादामी के चालुक्य शासकों की शृंखला का अंतिम शासक था।
- उसने 'सार्वभौम', 'लक्ष्मी', 'पृथ्वी का प्रिय', 'राजाओं का राज' एवं 'महाराज' आदि की उपाधियाँ धारण की थीं।
- चालुक्यों के सामंत दंतिदुर्ग (राष्टकूट) ने कीर्तिवर्मा द्वितीय को परास्त कर लगभग 753 ई. में अपने को स्वतंत्र शासक के रूप में स्थापित किया।
- दंतिदुर्ग की इस विजय के विषय में 'समनगढ़' अभिलेख से जानकारी मिलती है।
अन्हिलवाड़
अन्हिलवाड़ | |
| विवरण | अन्हिलवाड़ प्राचीन गुजरात की महिमामयी राजधानी थी, जिसकी स्थापना चावड़ा वंश के वनराज या बंदाज द्वारा 746 ई. में हुईं थी। इसको गुजरात के पाटन के नाम से भी जाना जाता है। |
| राज्य | गुजरात |
| स्थापना | वनराज या बंदाज द्वारा 746 ई. में। |
| संबंधित लेख | पाटन |
| अन्य जानकारी | अन्हिलवाड़ में चावड़ा वंश का शासनकाल 942 ई. तक रहा। इस वर्ष चालुक्य अथवा सोलंकी वंश के नरेश मूलराज ने गुजरात के इस भाग पर अधिकार कर लिया। चालुक्य-शासनकाल में गुजरात उन्नति के शिखर पर पहुंच गया। |
अन्हिलवाड़ अथवा अन्हलवाड़ा प्राचीन गुजरात की महिमामयी राजधानी थी जिसकी स्थापना चावड़ा वंश के वनराज या बंदाज द्वारा 746 ई. में हुईं थी। उसे इस कार्य में जैनाचार्य शीलगुण से विशेष सहायता मिली थी। इसको गुजरात का पाटन नगर भी कहा जाता है।
अन्हिलवाड़
अन्हिलवाड़ | |
| विवरण | अन्हिलवाड़ प्राचीन गुजरात की महिमामयी राजधानी थी, जिसकी स्थापना चावड़ा वंश के वनराज या बंदाज द्वारा 746 ई. में हुईं थी। इसको गुजरात के पाटन के नाम से भी जाना जाता है। |
| राज्य | गुजरात |
| स्थापना | वनराज या बंदाज द्वारा 746 ई. में। |
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| अन्य जानकारी | अन्हिलवाड़ में चावड़ा वंश का शासनकाल 942 ई. तक रहा। इस वर्ष चालुक्य अथवा सोलंकी वंश के नरेश मूलराज ने गुजरात के इस भाग पर अधिकार कर लिया। चालुक्य-शासनकाल में गुजरात उन्नति के शिखर पर पहुंच गया। |
अन्हिलवाड़ अथवा अन्हलवाड़ा प्राचीन गुजरात की महिमामयी राजधानी थी जिसकी स्थापना चावड़ा वंश के वनराज या बंदाज द्वारा 746 ई. में हुईं थी। उसे इस कार्य में जैनाचार्य शीलगुण से विशेष सहायता मिली थी। इसको गुजरात का पाटन नगर भी कहा जाता है।
इतिहास
चावड़ा वंश के वनराज के पिता जयकृष्ण का राज्य, कच्छ की रण के निकटस्थ पंचसर नामक स्थान पर था। वनराज ने नए नगर को सरस्वती नदी के तट पर स्थित प्राचीन ग्रामलखराम की जगह बसाया था। यह सूचना हमें जैन पट्टावलियों से मिलती है। धर्मसागर कृत प्रवचन परीक्षा में 1304 ई. तक अन्हलवाड़ा के राजाओं का वर्णन है। एक किंवदंती के अनुसार जब 770 ई. के लगभग अरबआक्रमणकारियों ने काठियावाड़ के प्रसिद्ध नगर वल्लभीपुर को नष्ट कर दिया तो वहां के राजपूतों ने अन्हलवाड़ा बसाया था।
अन्हलवाड़ा में चावड़ा वंश का शासनकाल 942 ई. तक रहा। इस वर्ष चालुक्य अथवा सोलंकी वंश के नरेश मूलराज ने गुजरात के इस भाग पर अधिकार कर लिया। चालुक्य-शासनकाल में गुजरात उन्नति के शिखर पर पहुंच गया। मूलराज ने सिद्धपुर में रुद्रमहालय नामक देवालय निर्मित किया था। इस वंश में सिद्धराज जयसिंह (1094-1143 ई.) सबसे प्रसिद्ध राजा था। यह गुजरात की प्राचीन लोक-कथाओं में मालवा के भोज की तरह ही प्रसिद्ध है। जैनाचार्य हेमचंद्र, सिद्धराज के ही राज्याश्रय में रहते थे। हेमचंद्र और उनके समकालीन सोमेश्वर के ग्रन्थों में 12वीं शती के पाटन के महान् ऐश्वर्य का विवरण मिलता है।
सिद्धराज के समय में इस नगर में अनेक सत्रालय और मठ स्थापित किए गए थे। इनमें विद्वानों और निर्धनों को नि:शुल्क भोजन तथा निवासस्थान दिया जाता था। इस काल में पाटन, गुजरात की राजनीति, धर्म तथा संस्कृति का एकमात्र महान् केन्द्र था। जैन धर्म की भी यहां 12वीं शती में बहुत उन्नति हुई। सिद्धराज विद्या तथा कलाओं का प्रेमी था और विद्वानों का आश्रयदाता था।
सिद्धराज के पश्चात् मुसलमान आक्रमणकारियों ने इस नगर की सारी श्री समाप्त कर दी। गुजरात में किंवदंती है कि महमूद गजनवी ने इस नगर को लूटा ही था किंतु मुहम्मद तुग़लक़ ने इसे पूरी तरह उजाड़ कर हल चलवा दिए थे। मुहम्मद तुग़लक़ से पहले अलाउद्दीन खिलजी ने 1304 ई. में पाटन नरेश कर्ण बघेला को परास्त किया था और इस प्रकार यहाँ के प्राचीन हिंदू राज्य की इतिश्री कर दी थी। 15वीं शती में गुजरात का सुलतान अहमदशाह पाटन से अपनी राजधानी उठा कर नए बसाए हुए नगर अहमदाबादमें ले गया और इसके साथ ही पाटन के गौरव का सूर्य अस्त हो गया।
पाटन
पाटन या पाटण अब भी एक छोटा-सा क़स्बा है जो महसाणा से 25 मील दूर है। स्थानीय जनश्रुति है कि महाभारत में उल्लिखित हिडिंब वन पाटन के निकट ही स्थित था और भीम ने हिडिंब राक्षस को मारकर उसकी बहिन हिडिंबा से यहीं विवाह किया था। पाटन के खण्डहर सहस्त्रलिंग झील के किनारे स्थित हैं। इसकी खुदाई में अनेक बहुमूल्य स्मारक मिले हैं- इनमें मुख्य हैं भीमदेव प्रथम की रानी उदयमती की बाव या बावड़ी, रानी महल और पार्श्वनाथ का मंदिर। ये सभी स्मारक वास्तुकला के सुंदर उदाहरण हैं।
टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ऐतिहासिक स्थानावली | पृष्ठ संख्या= 24-25| विजयेन्द्र कुमार माथुर | वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग | मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार
चालुक्य साम्राज्य
चालुक्यों की उत्पत्ति का विषय अत्यंत ही विवादास्पद है। वराहमिहिर की 'बृहत्संहिता' में इन्हें 'शूलिक' जाति का माना गया है, जबकि पृथ्वीराजरासो में इनकी उत्पति आबू पर्वत पर किये गये यज्ञ के अग्निकुण्ड से बतायी गयी है। 'विक्रमांकदेवचरित' में इस वंश की उत्पत्ति भगवान ब्रह्म के चुलुक से बताई गई है। इतिहासविद् 'विन्सेण्ट ए. स्मिथ' इन्हें विदेशी मानते हैं। 'एफ. फ्लीट' तथा 'के.ए. नीलकण्ठ शास्त्री' ने इस वंश का नाम 'चलक्य' बताया है। 'आर.जी. भण्डारकरे' ने इस वंश का प्रारम्भिक नाम 'चालुक्य' का उल्लेख किया है। ह्वेनसांग ने चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय को क्षत्रिय कहा है। इस प्रकार चालुक्य नरेशों की वंश एवं उत्पत्ति का कोई अभिलेखीय साक्ष्य नहीं मिलता है।
जयसिंह जगदेकमल्ल
जयसिंह जगदेकमल्ल (1015 से 1045 ई.) को 'जयसिंह द्वितीय' के नाम से भी जाना जाता है। अच्चण द्वितीय पश्चिमी चालुक्यों की बढ़ती हुई शक्ति व दबाव को रोकने में विफल रहा था। ऐसी स्थिति में उसका भाई 'जयसिंह जगदेकमल्ल' उसे गद्दी से हटाकर स्वयं सिंहासन पर बैठा। इसका विरुद्ध 'जगदेकमल्ल' था, जो इसकी वीरता का परिचायक था।
- जयसिंह जगदेकमल्ल ने 1015 ई. में अपने पूर्वजों की रणरक्त नीति का अनुसरण करते हुए अपने राज्य की रक्षा की।
- परमार राजा भोज कलचुरि राजा गंगेयदेव तथा चोलशासक राजेन्द्र चोल ने एक संघ बनाकर जयसिंह पर आक्रमण किए।
- जयसिंह ने इनका सामना किया और इन्हें रोकने में पूरी तरह से सफल रहा।
- 'तिरुवांलगाडु अभिलेख' में राजेन्द्र चोल को तैलप वंश का उन्मूलक कहा गया है।
- जयसिंह ने 'सिंगदे', 'जयदेक्कमल्ल', 'त्रैलोकमल्ल', 'मल्लिकामोद', 'विक्रमसिंह' आदि उपाधियाँ धारण की थीं।
- 26 वर्ष के शासन के बाद 1045 ई. में जयसिंह की मृत्यु हो गई।
तैल चालुक्य
तैल चालुक्य अथवा 'तैलप द्वितीय' चालुक्य राजवंश का प्रतिष्ठापक था। उसकी राजधानी कल्याणी थी। 972 ई. के आसपास उसने अन्तिम राष्ट्रकूट राजा कर्क द्वितीय को परास्त किया था। तैल चालुक्य द्वारा प्रतिष्ठापित राजवंश ने 1119 ई. तक शासन किया।
- कल्याणी के अपने सामन्त राज्य को राष्ट्रकूटों की अधीनता से मुक्त कर तैलप ने मान्यखेट पर आक्रमण किया। परमार राजा सीयक हर्ष राष्ट्रकूटों की इस राजधानी को तहस-नहस कर चुका था, पर उसने दक्षिणापथ में स्थायी रूप से शासन करने का प्रयत्न नहीं किया था। वह आँधी की तरह आया था, और मान्यखेट को उजाड़ कर आँधी की ही तरह वापस लौट गया था। अब जब तैलप ने उस पर आक्रमण किया, तो राष्ट्रकूट राजा कर्क (करक) उसका मुक़ाबला नहीं कर सका।
- राष्ट्रकूट राज्य का अन्त हो गया, और तैलप के लिए दिग्विजय का मार्ग निष्कंटक हो गया।
- विजय यात्रा करते हुए तैलप ने सबसे पूर्व लाट देश(दक्षिणी गुजरात) की विजय की, और फिर कन्नड़ देश को परास्त किया। कन्नड़ के बाद सुदूर दक्षिण में चोल राज्य पर चढ़ाई की गई। पर तैलप के सबसे महत्त्वपूर्ण युद्ध परमार राजा वाकपतिराज मुञ्ज के साथ हुए।
- परमार वंश के महत्त्वाकांक्षी राजा दक्षिणापथ को अपनी विजयों का उपयुक्त क्षेत्र मानते थे।
- सीयक हर्ष ने भी पहले मान्यखेट को ही अपनी महत्त्वाकांक्षाओं का शिकार बनाया था।
- वाकपतिराज मुञ्ज ने छः बार चालुक्य राज्य पर चढ़ाई की, और छठी बार उसे बुरी तरह से परास्त किया था। पर सातवीं बार जब उसने दक्षिणापथ में विजय यात्रा की, तो गोदावरी के तट पर घनघोर युद्ध हुआ, जिसमें मुञ्ज तैलप के हाथ पड़ गया, और चालुक्य राज ने उसका घात कर अपनी पुरानी पराजयों का प्रतिशोध लिया।
- इस प्रकार अपने कुल के गौरव का पुनरुद्धार कर 24 वर्ष के शासन के बाद 967 ई. में तैलप की मृत्यु हो गई।
तैलप तृतीय
तैलप तृतीय (1151-1156 ई.) चालुक्य सम्राट जगदेकमल्ल द्वितीय की मृत्यु के बाद राजा बना था।
- सोमेश्वर तृतीय के बाद कल्याणी के चालुक्य वंश का क्षय शुरू हो गया।
- 1138 ई. में 'सोमेश्वर की मृत्यु' हो जाने पर उसका पुत्र जगदेकमल्ल द्वितीय राजा बना।
- जगदेकमल्ल द्वितीय के शासन काल में चालुक्य साम्राज्य की शक्ति में निर्बलता आनी प्रारम्भ हो गई।
- अन्हिलवाड़ कुमारपाल (1143-1172 ई.) के जगदेकमल्ल के साथ अनेक युद्ध हुए, जिनमें कुमारपाल विजयी हुआ।
- 1151 ई. में जगदेकमल्ल की मृत्यु के बाद तैलप तृतीय ने कल्याणी का राजसिंहासन प्राप्त किया। उसका मंत्री व सेनापति विज्जल था, जो कलचुरी वंश का था।
- विज्जल इतना शक्तिशाली व्यक्ति था, कि उसने राजा तैलप को अपने हाथों में कठपुतली के समान बनाकर रखा था। बहुत से सामन्त उसके हाथों में थे। उनकी सहायता से 1156 ई. के लगभग विज्जल ने तैलप को राज्यच्युत कर स्वयं कल्याणी की राजगद्दी पर अपना अधिकार कर लिया, और वासव का अपना मंत्री नियुक्त किया।
विल्हण
विल्हण कल्याणी के चालुक्य वंशीय शासक विक्रमादित्य षष्ठ (1070-1126) की राजसभा में एक कश्मीरी राजकवि और विद्वान थे। उनकी सुप्रसिद्ध रचना 'विक्रमांकदेवचरित' है।
- विल्हण ने 'विक्रमांकदेवचरित' में अपने आश्रयदाता सम्राट का जीवन चरित अत्यंत सरस ढंग से प्रस्तुत किया है। उनका विवरण पूर्णत: इतिहास संगत है।
- 'विक्रमांकदेवचरित' की भाषा प्राञ्जल तथा स्पष्ट है एवं शैली वैदर्भी है।
- उच्च कोटि की विलक्षण कल्पना शक्ति विल्हण में थी तथा उसी के अनुरूप उन्होंनें वर्णन प्रस्तुत किया है।
- विक्रमादित्य षष्ठ के राजकवि विल्हण ने अपने 'विक्रमांकदेवचरित' में कल्याणी की प्रशंसा के गीत गाए हैं और उसे संसार की सर्वश्रेष्ठ नगरी बताया है।
- कुलोत्तुंग प्रथम के द्वारा विक्रमादित्य षष्ठ को पराजय का सामना करना पड़ा था, इसका उल्लेख भी विल्हण के 'विक्रमांकदेवचरित' से मिलता है।
कुब्ज विष्णुवर्धन
कुब्ज विष्णुवर्धन वातापी के चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय का छोटा भाई था। जिस समय पुलकेशी द्वितीय ने दक्षिणापथ में अपने विशाल साम्राज्य की स्थापना, उसने छोटे भाई कुब्ज विष्णुवर्धन को वेंगी का शासन करने के लिए नियुक्त कर दिया था।
- कुब्ज विष्णुवर्धन की स्थिति एक प्रान्तीय शासक के समान थी और वह पुलकेशी द्वितीय की ओर से ही कृष्णा नदी और गोदावरी नदी के मध्यवर्ती प्रदेश का शासन करता था।
- 'पृथ्वीवल्लभ', 'युवराज' और 'विषमविद्धि' आदि की उपाधियाँ कुब्ज विष्णुवर्धन ने धारण की थीं।
- पुलकेशी द्वितीय ने कुब्ज विष्णुवर्धन को विशाखापत्तनम से लेकर नेल्लोर के उत्तरी भाग तक का शासक नियुक्त किया था। इस वंश के अभिलेखोंके अनुसार उनका शासन संपूर्ण वेंगीमंडल पर था।
- कुब्ज विष्णुवर्धन के पुत्र जयसिंह प्रथम ने अपने को पुलकेशी द्वितीय से स्वतंत्र कर लिया और इस प्रकार पूर्वी चालुक्य वंश का प्रादुर्भाव हुआ। इस वंश के स्वतंत्र राज्य का प्रारम्भ काल सातवीं सदी के मध्य भाग में था।
विक्रमादित्य प्रथम
विक्रमादित्य प्रथम पुलकेशी द्वितीय का पुत्र था, तथा पिता की मृत्यु के बाद राज्य का वास्तविक उत्तराधिकारी था। पुलकेशी द्वितीय की मृत्यु के बाद बादामी सहित कुछ अन्य दक्षिणी प्रान्तों की कमान पल्लवों के हाथों में रही। इस दौरान 642 से 655 ई. तक चालुक्यों की राजगद्दी ख़ाली रही। 655 में विक्रमादित्य प्रथम राजगद्दी पर विराजित होने में कामयाब हुआ। उसने बादामी को पुन: हासिल किया और शत्रुओं द्वारा विजित कई अन्य क्षेत्रों को भी पुन: अपने साम्राज्य में जोड़ा। उसने 681 ई. तक शासन किया था।
- पल्लवराज नरसिंह वर्मन प्रथम से युद्ध करते हुए पुलकेशी द्वितीय की मृत्यु हो गई थी और वातापी पर भी पल्लवों का अधिकार हो गया था।
- संकट के इस समय में भी चालुक्यों की शक्ति का पूरी तरह से अन्त नहीं हुआ था।
- विक्रमादित्य प्रथम अपने पिता के समान ही वीर और महात्वाकांक्षी था।
- उसने लगभग 655 से 681 ई. में चालुक्य राजगद्दी प्राप्त की थी।
- उसके सिंहासनारूढ़ होने के समय चोलों, पाण्ड्योंएवं केरलों ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया था।
- विक्रमादित्य प्रथम ने न केवल वातापी को पल्लवोंकी अधीनता से मुक्त किया, अपितु तेरह वर्षों तक निरन्तर युद्ध करने के बाद पल्लवराज की शक्ति को बुरी तरह कुचलकर 654 ई. में कांची की भी विजय कर ली।
- उसने पल्लवों के राज्य कांची पर अधिकार कर अपने पिता की पराजय का बदला लिया था।
- उसने 'श्रीपृथ्वीवल्लभ', 'भट्टारक', 'महाराजाधिराज', 'परमेश्वर', 'रण रसिक' आदि उपाधियाँ धारण की।
- विक्रमादित्य प्रथम सम्भवतः अपने शासन काल के अन्तिम दिनों में पल्लव नरेश परमेश्वर वर्मन प्रथम से पराजित हो गया था।
- यह विजय संदिग्ध है, क्योंकि पल्लवकालीन अभिलेख परमेश्वर वर्मन की विजय तथा चालुक्यों के अभिलेख में विक्रमादित्य प्रथम की विजय का उल्लेख मिलता है।
- वैसे निष्कर्षतः यही अनुमान लगाया जाता है कि, अन्तिम रूप से पल्लव ही विजयी रहे थे।
विक्रमादित्य द्वितीय
विक्रमादित्य द्वितीय (733 से 745 ई.), विजयादित्य का पुत्र और राजसिंहासन का उत्तराधिकारी था। विक्रमादित्य द्वितीय ने भी अपने समय में चालुक्य साम्राज्य की शक्ति को अक्षुण्ण बनाये रखा।
- 'नरवण', 'केन्दूर', 'वक्रकलेरि' एवं 'विक्रमादित्य' की रानी 'लोक महादेवी' के 'पट्टदकल' अभिलेख से यह प्रमाणित होता है कि, विक्रमादित्य द्वितीय ने पल्लवनरेश नंदि वर्मन द्वितीय को पराजित किया।
- उसने कांची को भी विजित किया था और कांची को बिना क्षति पहुंचाये, वहां के 'राजसिंहेश्वर मंदिर' को अधिक आकर्षक बनाने के लिए रत्नादि भेंट किया।
- इसने इस मंदिर की दीवार पर एक अभिलेख उत्कीर्ण करवाया और साथ ही पल्लवों की 'वातापीकोड' की तरह 'कांचिनकोड' की उपाधि धारण की थी।
- सम्भवतः पल्लवों के राज्य कांची को विक्रमादित्य द्वितीय ने तीन बार विजित किया था।
- विक्रमादित्य द्वितीय के शासनकाल में ही दक्कन पर अरबों ने आक्रमण किया था।
- 712 ई. में अरबों ने सिन्ध को जीतकर अपने अधीन कर लिया था, और स्वाभाविक रूप से उनकी यह इच्छा थी, कि भारत में और आगे अपनी शक्ति का विस्तार करें।
- अरबों ने लाट देश (दक्षिणी गुजरात) पर आक्रमण किया, जो इस समय चालुक्य साम्राज्य के अंतर्गत था।
- विक्रमादित्य द्वितीय के शौर्य के कारण अरबों को अपने प्रयत्न में सफलता नहीं मिली और यह प्रतापी चालुक्य राजा अरब आक्रमण से अपने साम्राज्य की रक्षा करने में समर्थ रहा।
- सम्भवतः विक्रमादित्य ने पाण्ड्यों, चोलों, केरलों, एवं कलभ्रों को भी परास्त किया था।
- प्रथम पत्नी 'लोक महादेवी' ने 'पट्टलक' में विशाल शिव मंदिर (विरुपाक्षमहादेव मंदिर) का निर्माण करवाया था, जो अब 'विरुपाक्ष महादेव मंदिर' के नाम से प्रसिद्ध है।
- इस विशाल मंदिर के प्रभान शिल्पी 'आचार्य गुण्ड' थे, जिन्हें 'त्रिभुवनाचारि', 'आनिवारितचारि' तथा 'तेन्कणदिशासूत्रधारी' आदि उपाधियों से विभूषित किया गया था।
- विक्रमादित्य द्वितीय के रचनात्मक व्यक्तित्व का विवरण 'लक्ष्मेश्वर' एवं 'ऐहोल' अभिलेखों से प्राप्त होता है।
- विक्रमादित्य द्वितीय ने 'वल्लभदुर्येज', 'कांचियनकोंडु', 'महाराधिराज', 'श्रीपृथ्वीवल्लभ', 'परमेश्वर' आदि उपाधियां धारण की थीं।
- विक्रमादित्य ने लगभग 745 ई. तक शासन किया।
विक्रमादित्य पंचम
विक्रमादित्य पंचम, सत्याश्रय के बाद कल्याणी के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ।
- इसने लगभग 1008 ई. में चालुक्य साम्राज्य की गद्दी को सम्भाला था।
- उसके समय में मालवा के परमारों के साथ चालुक्यों का पुनः संघर्ष हुआ, और वाकपतिराज मुञ्ज की पराजय व हत्या का प्रतिशोध करने के लिए परमारराजा भोज ने चालुक्य राज्य पर आक्रमण कर उसे परास्त किया।
- पर बाद में राजा भोज ने भी विक्रमादित्य पंचम से पराजय का मुँह देखा था।
- विक्रमादित्य पंचम ने अपने पूर्वजों की नीतियों का अनुसरण करते हुए कई यु़द्ध लड़े, जिसमें उसे सफलता मिली।
- इसकी और किसी उपलब्धियों के बारे में जानकारी नहीं मिली है।
- अभिलेखों में इसके 'वल्लभवनरेन्द्र' तथा 'त्रिभुवनमल्ल' आदि विरुद्वों का उल्लेख मिलता है।
- एक अभिलेख में उसकी बहन अनुष्कादेवी का उल्लेख मिलता है, जो 'किसकाड' राज्य की शासिका थी।
- इसे 'लक्ष्मी का अवतार', 'दान देने वाली', 'बुद्धिमती', 'सत्य और सच्चरिता' कहा गया है।
विक्रमादित्य षष्ठ
विक्रमादित्य षष्ठ (1076 से 1126 ई.) कल्याणी के चालुक्य शाखा का अन्तिम महान् शासक था। उसने 'विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की थी। अपने पितासोमेश्वर प्रथम के शासन काल में वह उसका सहयोगी रहा था, और उसकी विजय यात्राओं में उसने अदभुत शौर्य प्रदर्शित किया था। विक्रमादित्य षष्ठ ने राजा बनकर पूरी आधी सदी (1076-1126) तक योग्यतापूर्वक चालुक्य साम्राज्य का शासन किया। इसमें सन्देह नहीं, कि विक्रमादित्य[1] बहुत ही योग्य व्यक्ति था।
विजय यात्राएँ
पिता सोमेश्वर प्रथम के समान विक्रमादित्य षष्ठ ने भी दूर-दूर तक विजय यात्राएँ कीं, और कलिंग, बंग, मरु (राजस्थान), मालवा, चेर (केरल) और चोल राज्यों को परास्त किया। उसके शासन काल में चालुक्य साम्राज्यदक्षिण में कन्याकुमारी से लेकर उत्तर में बंगाल तक विस्तृत था। उसने चोल राजा वीर राजेन्द्र तथा कदम्ब शासक की सहायता से चालुक्य राज्य के दक्षिणी भाग पर अधिकार कर लिया। अपने इसी राज्यारोहण के सम्बन्ध में उसने नवीन संवत 'चालुक्य-विक्रम-संवत' का प्रचलन किया था।
चोल-चालुक्य संघर्ष
विक्रमादित्य षष्ठ को आरम्भ में अपने भाई 'जगकेशी' के विद्रोह का सामना करना पड़ा, परन्तु इसे दबाने में वह सफल रहा। उसके समय में भी चोल-चालुक्य संघर्ष चलता रहा। उसने कांची पर आक्रमण कर वीर राजेन्द्र से आंध्र प्रदेश का कुछ भाग छीन लिया। इसी के परिणामस्वरूप उसका संघर्ष चोल शासक कुलोत्तुंग प्रथम से भी हुआ।
टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ यदि वातापी के चालुक्य वंश के राजाओं को भी दृष्टि में रखें, तो इसे 'विक्रमादित्य षष्ठ' कहना चाहिए
अक्का देवी
अक्का देवी चालुक्य वंश के राजा जयसिंह द्वितीय(1015-1045 ई.) की बहन थी।
आहवमल्ल
आहवमल्ल एक प्रसिद्ध उपाधि, जिसे कल्याणी के चालुक्यवंशी राजा सोमेश्वर प्रथम (1053-1068 ई.) ने धारण किया था। उसने चोल राजा राजाधिराज को कोप्पम के युद्ध में पराजित करके चालुक्यों की शक्ति का पुनरुद्धार किया था।
- सोमेश्वर प्रथम ने मालवा की धारा नगरी और सुदुर दक्षिण की कांची नगरी पर भी विजय प्राप्त की थीं।
- गुर्जर-प्रतिहार राजा मिहिर भोज भी सोमेश्वर प्रथम के हाथों पराजित हुआ।
- अपने जीवन के अंतिम दिनों में सोमेश्वर प्रथम अत्यधिक बीमार हो गया था।
- एक असाध्य ज्वर से पीड़ित होने पर उसने शिवमंत्र का जाप करते हुए तुंगभद्रा नदी में छलांग लगाकर अपने प्राण त्याग दिये।
सत्याश्रय
सत्याश्रय (977 से 1008 ई.), तैलप द्वितीय की मृत्यु के बाद उसका उत्तराधिकारी बना। उसे 'सत्तिग' अथवा 'सत्तिम' नाम से भी सम्बोधित किया गया है।
- सत्याश्रय का पहला सैनिक अभियान उत्तरी कोंकण प्रदेश के विरुद्ध था, इसमें वह सफल हुआ।
- उसके शासन काल की मुख्य घटना चोल राज्य के अधिपति राजराज प्रथम की दिग्विजय है।
- उसने गुर्जर देश के शासक चामुण्डराज को भी पराजित किया था।
- सत्याश्रय के काल का सबसे भीषण युद्ध चोल शासक अरुमोलिवर्मन अथवा राजा रामप्रथम के साथ हुआ। इस युद्ध में सत्याश्रय पराजित हुआ।
- उसने 'आकर्लक चरित्र', 'इरिवेंडंग' एवं 'आहवमल्ल' आदि अनेक विरुद्वों को धारण किया था।
- सत्याश्रय व्यक्तिगत रूप से जैन धर्म का अनुयायी था।
- इसका गुरु विमलचन्द्र जैन दर्शन का महान् विद्धान था।
- सत्याश्रय विद्धानों का संरक्षक भी था। कन्नड़ कवि गदायुद्ध को इसका संरक्षण प्राप्त था।
सोमेश्वर प्रथम आहवमल्ल
सोमेश्वर प्रथम (1043 से 1068 ई.) ने अपने शासनकाल में चालुक्य राजधानी मान्यखेट में स्थानान्तरित कर कल्याणी में शासन किया। यह कल्याणी के चालुक्य वंशका सबसे प्रतापी व शक्तिशाली राजा था। अपने विरुद 'आहवमल्ल' को सार्थक कर उसने दूर-दूर तक विजय यात्राएँ कीं, और चालुक्यों के राज्य को एक विशाल साम्राज्य के रूप में परिवर्तित कर दिया।
सोमेश्वर प्रथम आहवमल्ल
सोमेश्वर प्रथम (1043 से 1068 ई.) ने अपने शासनकाल में चालुक्य राजधानी मान्यखेट में स्थानान्तरित कर कल्याणी में शासन किया। यह कल्याणी के चालुक्य वंशका सबसे प्रतापी व शक्तिशाली राजा था। अपने विरुद 'आहवमल्ल' को सार्थक कर उसने दूर-दूर तक विजय यात्राएँ कीं, और चालुक्यों के राज्य को एक विशाल साम्राज्य के रूप में परिवर्तित कर दिया।
विभिन्न वंशों के साथ युद्ध
- इस समय चालुक्यों के मुख्य प्रतिस्पर्धी मालवा के परमार और सुदूर दक्षिण के चोल राजा थे। सोमेश्वर ने इन दोनों शत्रुओं के साथ घनघोर युद्ध किए।
- परमार राजा भोज को परास्त कर उसने परमार राज्य की राजधानी 'धार' पर अधिकार कर लिया, और भोज को उज्जयिनी में आश्रय लेने के लिए विवश कर दिया। पर चालुक्यों का मालवा पर यह *आधिपत्य देर तक स्थिर नहीं रह सका। कुछ समय बाद भोज ने एक बड़ी सेना को साथ लेकर धारा पर चढ़ाई की, और चालुक्यों के शासन का अन्त कर अपनी राजधानी में पुनः प्रवेश किया।
- सुदूर दक्षिण के चोल राजा से भी सोमेश्वर के अनेक युद्ध हुए, और कुछ समय के लिए कांची पर भी चालुक्यों का आधिपत्य हो गया। केवल परमारों और चोलों के साथ हुए युद्धों में ही सोमेश्वर ने अपनी 'आहवमल्लता' का परिचय नहीं दिया। चोलों को परास्त कर उसने उत्तरी भारत की दिग्विजय के लिए प्रस्थान किया।
- पल्लव वंश की यह पुरानी राजधानी इस समय चोल शक्ति की महत्त्वपूर्ण केन्द्र थी।
- एक शक्तिशाली सेना को साथ लेकर उसने पहले जेजाकभुक्ति के चन्देल राजा को परास्त किया।
- महमूद गज़नवी इस राज्य को भी जीतने में समर्थ हुआ था, पर उसके उत्तराधिकारी के शासन काल में ग्यारहवीं सदी के उत्तरार्ध में कीर्तिवर्मा नामक वीर चन्देल ने अपने पूर्वजों के स्वतंत्र राज्य का पुनरुद्धार कर लिया था।
- सोमेश्वर के आक्रमण के समय सम्भवतः कीर्तिवर्मा ही चन्देल राज्य का स्वामी था। चन्देल राज्य को जीतकर सोमेश्वर ने कच्छपघातों को विजय किया, और फिर गंगा - यमुना के उन प्रदेशों पर आक्रमण किया, जो कन्नौज के राज्य के अंतर्गत थे।
- अभी कन्नौज पर गहड़वाल वंश के प्रतापी राजाओं का आधिपत्य नहीं हुआ था, और वहाँ गुर्जर प्रतिहार वंश का ही शासन क़ायम था। जो कि इस समय तक बहुत निर्बल हो चुका था। कन्नौज का अधिपति चालुक्य राज सोमेश्वर के सम्मुख नहीं टिक सका, और उसने भागकर उत्तरी पर्वतों की शरण ली।
- चेदि के कलचुरी राजा कर्णदेव (1063-1093) ने चालुक्य आक्रमण का मुक़ाबला करने में अधिक साहस दिखाया, पर उसे भी सोमेश्वर के सम्मुख परास्त होना पड़ा। जिस समय सोमेश्वर स्वयं उत्तरी भारत की विजय यात्रा में तत्पर था, उसका पुत्र विक्रमादित्य पूर्वी भारत में अंग, बंग, मगध और मिथिला के प्रदेशों की विजय कर रहा था।
- विक्रमादित्य ने पूर्व में और आगे बढ़कर कामरूप (असम) पर भी आक्रमण किया, पर उसे जीतने में उसे सफलता प्राप्त नहीं हुई।
- पर यह ध्यान में रखना चाहिए कि सोमेश्वर और विक्रमादित्य की विजय यात्राओं ने किसी स्थायी साम्राज्य की नींव नहीं डाली। वे आँधी की तरह सम्पूर्ण उत्तरी भारत पर छा गए, और वहाँ तहस-नहस मचाकर आँधी की तरह ही दक्षिणापथ लौट गए।
- इन दिग्विजयों ने केवल देश में उथल-पुथल, अव्यवस्था और अराजकता ही उत्पन्न की। कोई स्थायी परिणाम उनका नहीं हुआ। उसमें सन्देह नहीं कि सोमेश्वर एक महान् विजेता था, और अनेक युद्धों में उसने अपने अनुपम शौर्य का प्रदर्शन किया था।
सोमेश्वर द्वितीय भुवनैकमल्ल
- अपने पिता सोमेश्वर प्रथम आहवमल्ल की मृत्यु (1068 ई.) के बाद सोमेश्वर द्वितीय विशाल चालुक्य राज्य का स्वामी बना।
- उत्तरी भारत की यात्राओं में जिस विक्रमादित्य ने अंग, बंग, मगध आदि की विजय कर अदभुत पराक्रम प्रदर्शित किया था, वह सोमेश्वर प्रथम का कनिष्क पुत्र था।
- पिता की मृत्यु के समय वह सुदूर दक्षिण में चोल राज्य के साथ संघर्ष में व्याप्त था।
- सोमेश्वर प्रथम की इच्छा थी कि, उसके बाद उसका सुयोग्य पुत्र विक्रमादित्य ही चालुक्य राज का स्वामी बने।
- विक्रमादित्य की अनुपस्थिति से लाभ उठाकर सोमेश्वर द्वितीय ने कल्याणी की राजगद्दी पर क़ब्ज़ा कर लिया, और विक्रमादित्य ने भी उसे चालुक्य राज्य के न्याय्य राजा के रूप में स्वीकृत किया।
- सोमेश्वर द्वितीय सर्वथा अयोग्य शासक था।
- उसके असद्व्यवहार से जनता दुखी हो गई, और चालुक्यों की राजशक्ति क्षीण होने लगी।
- इस स्थिति में 1076 ई. में विक्रमादित्य ने उसे राजगद्दी से उतारकर स्वयं कल्याणी के राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया।
सोमेश्वर तृतीय
सोमेश्वर तृतीय (1126 से 1138 ई.) कल्याणी के विक्रमादित्य षष्ठ का पुत्र तथा उत्तराधिकरी था। वह एक शान्तिप्रिय शासक था। उसका राज्यारोहण 1126 ई. में हुआ था। इसके उपलक्ष्य में उसने 'भूलोकमल्ल वर्ष' नामक एकनवीन वर्ष का प्रचलन किया तथा 'भूलोकमल्ल' विरुद धारण किया।
- सोमेश्वर तृतीय ने अपने कुल की शक्ति को बढ़ाकर नेपाल तक भी आक्रमण किए।
- उसने उत्तरी भारत में विजय यात्राएँ कर मगध और नेपाल को अपना वशवर्त्ती बनाया। अंग, बंग, कलिंगपहले ही चालुक्य साम्राज्य की अधीनता को स्वीकार कर चुके थे। मगध भी पूर्ववर्त्ती चालुक्य विजेताओं के द्वारा आक्रान्त हो चुका था।
- सोमेश्वर प्रथम के समय से ही उत्तरी भारत पर और विशेषतया अंग, बंग तथा कलिंग पर दक्षिणापथ की सेनाओं के जो निरन्तर आक्रमण होते रहे, उन्हीं के कारण बहुत से सैनिक व उनके सरदार उन प्रदेशों में स्थिर रूप से बस गए, और उन्हीं से बंगाल में सेन वंश एवं मिथिला में नान्यदेव वंश के राज्य स्थापित हुए। इसीलिए इन्हें 'कर्णाट' कहा गया है।
- यह एक उच्चकोटि का विद्धान एवं शिल्पशास्त्र ग्रन्थ था।
- वह राजशास्त्र, न्याय व्यवस्था, वैद्यक, ज्योतिष, रसायन तथा पिंगल सदृश विषयों पर अनेक ग्रंथों का रचयिता बताया जाता है।
- उसने 'मानसोल्लास' नामक ग्रंथ की रचना की, जो एक शिल्पशास्त्र ग्रन्थ है।
- अपनी विद्धता के कारण सोमेश्वर तृतीय 'सर्वज्ञभूप' के रूप में प्रसिद्ध था।
- किन्तु उसकी बहुमुखी प्रतिभा एवं विद्वत्ता उसकी सैन्य संगठन शक्ति में सहायक न हो सकी।
- उसके शासन काल में अधीनस्थ सामंतों ने चालुक्य साम्राज्य की प्रभुत्ता त्यागकर स्वतंत्र शासन करना आरम्भ कर दिया, फलस्वरूप चालुक्य शक्ति का ह्रास होने लगा।
सोमेश्वर चतुर्थ
- भारत के धार्मिक इतिहास में वासव का बहुत अधिक महत्त्व है। वह लिंगायत सम्प्रदाय का प्रवर्तक था। जिसका दक्षिणी भारत में बहुत प्रचार हुआ।
- विज्जल स्वयं जैन था, अतः राजा और मंत्री में विरोध उत्पन्न हो गया। इसके परिणामस्वरूप वासव ने विज्जल की हत्या कर दी।
- विज्जल के बाद उसके पुत्र सोविदेव ने राज्य प्राप्त किया, और वासव की शक्ति को अपने क़ाबू में लाने में सफलता प्राप्त की।
- धार्मिक विरोध के कारण विज्जल और सोविदेव के समय में जो अव्यवस्था उत्पन्न हो गई थी, चालुक्य राजा तैल के पुत्र 'सोमेश्वर चतुर्थ' ने उससे लाभ उठाया और 1183 ई. में सोविदेव को परास्त कर चालुक्य कुल के गौरव को फिर से स्थापित किया।
- पर चालुक्यों की यह शक्ति देर तक स्थिर नहीं रह सकी।
- विज्जल और सोविदेव के समय में कल्याणी के राज्य में जो अव्यवस्था उत्पन्न हो गई थी, उसके कारण बहुत से सामन्त व अधीनस्थ राजा स्वतंत्र हो गए, और अन्य अनेक राजवंशों के प्रतापी व महत्त्वकांक्षी राजाओं ने विजय यात्राएँ कर अपनी शक्ति का उत्कर्ष शुरू कर दिया।
- 1187 ई. में भिल्लम ने चालुक्य राजा सोमेश्वर चतुर्थ को परास्त कर कल्याणी पर अधिकार कर लिया, और इस प्रकार प्रतापी चालुक्य वंश का अन्त हुआ।
जयसिंह चालुक्य
जयसिंह को चालुक्य साम्राज्य का प्रथम शासक माना जाता है। कैरा ताम्रपत्र अभिलेखीय साक्ष्य से यह प्रमाणित होता है कि, जयसिंह, चालुक्य राजवंश का प्रथम ऐतिहासिक शासक था।
अच्चण द्वितीय
अच्चण द्वितीय, विक्रमादित्य पंचम के बाद राजगद्दी पर बैठा। अच्चरण, विक्रमादित्य पंचम का भाई था। 1015 ई. में उसके भाई जयसिंह द्वितीय ने उसे पदच्युत कर दिया।
जगदेकमल्ल द्वितीय
- जगदेकमल्ल द्वितीय (1138-1151 ई.), सोमेश्वर तृतीय के बाद अगला चालुक्य राजा था।
सोमेश्वर प्रथम
सोमेश्वर प्रथम का उपनाम आहवमल्ल था, वह कल्याणी के चालुक्य वंश का पाँचवाँ शासक था।
- इसने 1041 से 1072 ई. तक राज्य किया।
- इसने कल्याणी की नींव डाली और उसे ही अपनी राजधानी बनाया था। उसे चोल सम्राट राजेन्द्र प्रथमसे संघर्ष करना पड़ा, जिसने उसे कोप्पल युद्ध में पराजित किया।
- राजेन्द्र प्रथम के उत्तराधिकारी वीर राजेन्द्र ने भी उसे कूडल संगम के युद्ध में हराया।
- इन पराजयों के बावज़ूद उसने चालुक्य वंश की शक्ति को सुरक्षित रखा।
सोमेश्वर द्वितीय
सोमेश्वर द्वितीय कल्याणी के चालुक्य सम्राट सोमेश्वर प्रथम का पुत्र और उत्तराधिकारी था। वह चालुक्य वंश का शासक था। उसने केवल चार वर्ष (1072-76 ई.) तक राज्य किया और तदुपरान्त उसके भाई विक्रमादित्य षष्ठ ने उसको अपदस्थ कर दिया।
मूलराज प्रथम
मूलराज प्रथम (942-995 ई.) गुजरात में अन्हिलवाड़ के सोलंकी (चालुक्य) राज्यवंश का प्रवर्तक था। सर्वप्रथम अपने राज्य को स्वतंत्र राजसत्ता मूलराज ने ही प्रदान की थी।
- मूलराज ने अन्हिलवाड़ को अपनी राजधानी बनाया और उसका समुचित विकास किया।
- सम्भवत: मूलराज कन्नौज के शासक महिपाल(910-940 ई.) का पुत्र था।
- अजमेर के चौहान शासक विग्रहराज द्वितीय के साथ हुए युद्ध में मूलराज वीरगति को प्राप्त हुआ।
- मूलराज के बाद उसका पुत्र चामुण्डराय (995-1008 ई.) अन्हिलवाड़ का शासक रहा।
चामुण्डराय चालुक्य
![]() | एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- चामुण्डराय (बहुविकल्पी) |
चामुण्डराय (995-1008 ई.) गुजरात में अन्हिलवाड़ के चालुक्य वंश के प्रवर्तक मूलराज प्रथम का पुत्र था। वह अपने पिता के बाद अन्हिलवाड़ का शासक बना था।
हर्नहल्ली
हर्नहल्ली चालुक्य नरेशों के समय में चालुक्य वास्तुशैली के अनुसार निर्मित मंदिर है जो यहाँ का उल्लेखनीय स्मारक है।
- चालुक्य शैली की मुख्य विशेषता मंदिर का ताराकृति आधार है।
कुमारपाल
कुमारपाल चालुक्य वंश के राजा सिद्धराज का पुत्र था। उसने अन्हिलवाड़ को राजधानी बनाकर 1143 ई. से 1172 ई. तक राज्य किया। वह पक्का जैन धर्म का मानने वाला तथा प्रसिद्ध जैन आचार्य हेमचन्द्र का संरक्षक था। अहिंसा का प्रचार करने के उद्देश्य से कुमारपाल ने राजाज्ञा की अवहेलना करके जीव-हिंसा करने वाले बहुत-से लोगों को सूली पर चढ़ा दिया। उसने अनेक जैन मंदिरों का निर्माण भी करवाया।[1]
- पाल वंश के राजा भारतीय संस्कृति, साहित्य और कला के विकास के लिए जाने जाते हैं। इस परंपरा का पालन करते हुए कुमारपाल ने भी शास्त्रों के उद्धार के लिये अनेक पुस्तक भंडारों की स्थापना की, हजारों मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया और नये मंदिर बनवाकर भूमि को अलंकृत किया।
- कुमारपाल को वीरावल के प्रसिद्ध 'सोमनाथ मंदिर' का जीर्णोद्धारकर्ता भी माना गया है।
- हथकरघा तथा अन्य हस्तकलाओं का भी कुमारपाल ने बहुत सम्मान और विकास किया। उसके प्रयत्नों से ही पाटण 'पटोला'[2] का सबसे बड़ा केन्द्र बना और यह कपड़ा विश्वभर में अपनी रंगीन सुंदरता के कारण जाना गया।
- पशुवध इत्यादि बंद करवाकर कुमारपाल ने गुजरातको अहिंसक राज्य घोषित किया। उसकी धर्म परायणता की गाथाएँ आज भी अनेक जैन-मंदिरों की आरती और मंगलदीवों में आदर के साथ गाई जाती हैं।
- कुमारपाल की आज्ञा उत्तर में तुर्कस्थान, पूर्व में गंगा नदी, दक्षिण में विन्ध्यांचल और पर्श्विम में समुद्र पर्यंत के देशों तक थी। 'राजस्थान इतिहास' के लेखक कर्नल टॉड ने लिखा है कि "महाराजा की आज्ञा पृथ्वी के सब राजाओं ने अपने मस्तक पर चढाई।"[3
टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ भारतीय इतिहास कोश |लेखक: सच्चिदानन्द भट्टाचार्य |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 96 |
- ↑ रेशम से बुना हुआ विशेष कपड़ा तथा साड़ियाँ
- ↑ वेस्टर्न इण्डिया-टॉड
अधिराजेंद्र चोड
अधिराजेंद्र चोड यह चोड राजा वीरराजेंद्र चोड का पुत्र था, जो लगभग 1017 ई. में उसके मरने पर चोडमंडल का राजा हुआ। तीन वर्ष वह युवराज के पद पर रहा था और युवराज का पद चोडों में बड़ी कार्यशीलता का था। वह राजा का निजी सचिव भी होता था और सर्वत्र उसका प्रतिनिधान करता था। अधिराजेंद्र चोड का शासनकाल बहुत थोड़ा रहा। राज्य में काफी उथल-पुथल थी और अपने संबंधी (बहनोई) विक्रमादित्य षष्ठ की सहायता के बावजूद वह राज्य की स्थिति न सँभाल सका और मारा गया।[1]
टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 101 |

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