दुनिया के नक्शे पर चमकेगा टॉडगढ़

दुनिया के नक्शे पर चमकेगा टॉडगढ़

5 वर्ष पहले
टॉडगढ़ का परिचय : टॉडगढ़पहाड़ों के बीच बसा एक सुंदर कस्बा है। टॉडगढ़ के प्रज्ञा शिखर पर खड़े होकर देखने से कई किलोमीटर दूर तक रावली का नजारा देखा जा सकता है। आज भी पर्वतीय ढलानों पर छोटे छोटे कच्चे लिपे पुते घर दिखाई दे जाते हैं। गांव की बसावट इस प्रकार से की गई है कि बारिश के दौरान यहां कीचड़ नहीं होता। ये राजस्थान का नया उपखंड है। प्राचीन बरसावाड़ा में राजस्थानी इतिहास पर शोध कर लिखने वाले पहले लेखक कर्नल जेम्स टॉड के नाम पर 1821 में टॉडगढ़ नाम दिया गया।

इतिहास: बरसावाड़ाकी स्थापना करीब 1 हजार साल पूर्व की गई थी। जब यहां घना जंगल था और यहां सिर्फ जंगली जानवर बसेरा करते थे। कहा जाता है कि बरसा गुजर नाम के एक पशुपालक द्वारा यहां पशु चराए जाते थे। इससे इस क्षेत्र को बरसावाड़ा कहा जाने लगा। बरसा गुजर की प|ी चैना गुजरी की ओर से यहांय पर बनाया गया देवजी का देवरा आज भी टॉडगढ़ में मौजूद है। बाद में मेर जाति के लोग भी यहां पर आए। परिस्थतिवश मेर जाति का मूल व्यवसाय डाका डालना और चोरी करना बन गया। बाहुबल और छदम युद्ध पद्वति के कारण इस क्षेत्र में मेर जाति का दबदबा हो गया और गुजर लोग यहां से पलायन कर गए। मेर जाति के आतंक के कारण उदयपुर और जोधपुर के तत्कालीन शासकों ने अंग्रेजों से समझौता कर लिया। जिस कारण इस क्षेत्र में मेर जाति के आंतक पर अंकुश लगाने के मकसद से ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से कर्नल जेम्स टॉड को 1821 में बरसावाड़ा आए और मेर जाति के आंतक से क्षेत्र को मुक्त करवाया। जिससे उदयपुर के तत्कालीन महाराणा भीमसिंह ने बरसावाड़ा को टॉडगढ़ नाम दिया।

ब्यावर। सर्पाकार कातर घाटी में 13 यू टर्न लोगों के आकर्षण का केंद्र है।

Comments

Popular posts from this blog

मेवाड़ में जातिगत सामाजिक ढ़ाँचा : एक विश्लेषण

सिसोदिया (राजपूत)

मेवाड़ की शासक वंशावली