मौखरि वंश

मौखरि वंश  

मौखरि वंश की स्थापना उत्तर गुप्तकाल के पतन के बाद हुई थी। गया ज़िले के निवासी मौखरि लोग चक्रवर्ती गुप्त राजवंश के समय में उत्तर गुप्तवंश के लोगों की तरह ही सामन्त थे। इस वंश के लोग जो अधिकतर उत्तर प्रदेश के कन्‍नौज में और राजस्थान के बड़वा क्षेत्र में फैले हुए थे, तीसरी सदी में इनका प्रमाण मिलता है।

  • मौखरि वंश के राजाओं का उत्तर गुप्तवंश के चौथे शासक कुमारगुप्त के साथ युद्ध हुआ था, इस युद्ध में ईशानवर्मा ने मौखरि वंश के शासकों से मगध प्रदेश को छीन लिया था।
  • मौखरि वंश के शासकों ने अपनी राजधानी कन्‍नौज बनाई और शासन किया।
  • कन्‍नौज का प्रथम मौखरि वंश का शासक हरिवर्मा था। हरिवर्मा ने 510 ई. में शासन किया था। उसका वैवाहिक सम्बन्ध उत्तरवंशीय राजकुमारी हर्ष गुप्त के साथ हुआ था।
  • ईश्वरवर्मा का विवाह भी उत्तर गुप्तवंशीय राजकुमारी उपगुप्त के साथ हुआ था। इनका शासन कन्‍नौज तक ही सीमित रहा, ये उसका विस्तार नहीं कर पाये।
  • यह राजवंश तीन पीढ़ियों तक शासक रहा।
  • हरदा से प्राप्त लेख से यह स्पष्ट होता है कि सूर्यवर्मा ईशानवर्मा का छोटा भाई था।
  • अवंतिवर्मा इस वंश का सबसे शक्‍तिशाली तथा प्रतापी राजा था और इसके बाद ही मौखरि वंश का अन्त हो गया।




गुप्त साम्राज्य  

गुप्त साम्राज्य का उदय तीसरी सदी के अन्त में प्रयाग के निकट कौशाम्बी में हुआ। गुप्त कुषाणों के सामन्त थे। इस वंश का आरंभिक राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार में था। लगता है कि गुप्त शासकों के लिए बिहार की उपेक्षा उत्तर प्रदेश अधिक महत्त्व वाला प्रान्त था, क्योंकि आरम्भिक अभिलेख मुख्यतः इसी राज्य में पाए गए हैं। यही से गुप्त शासक कार्य संचालन करते रहे। और अनेक दिशाओं में बढ़ते गए। गुप्त शासकों ने अपना अधिपत्य अनुगंगा (मध्य गंगा मैदान), प्रयाग (इलाहाबाद), साकेत (आधुनिक अयोध्या) और मगध पर स्थापित किया।

गुप्तों की उत्पत्ति

गुप्त राजवंशों का इतिहास साहित्यिक तथा पुरातात्विक दोनों प्रमाणों से प्राप्त है। इसके अतिरिक्त विदेशी यात्रियों के विवरण से भी गुप्त राजवंशों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।

  • साहित्यिक साधनों में पुराण सर्वप्रथम है जिसमें मत्स्य पुराणवायु पुराण, तथा विष्णु पुराण द्वारा प्रारम्भिक शासकों के बारे में जानकारी मिलती है।
  • बौद्ध ग्रंथों में 'आर्य मंजूश्रीमूलकल्प' महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। इसके अतिरिक्त 'वसुबन्धु चरित' तथा 'चन्द्रगर्भ परिपृच्छ' से गुप्त वंशीय इतिहास की महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है।
  • जैन ग्रंथों में 'हरिवंश' और 'कुवलयमाला' महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है।
  • स्मृतियों में नारद, पराशर और बृहस्पति स्मृतियों से गुप्तकाल की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक इतिहास की जानकारी मिलती है।
  • लौकिक साहित्य के अन्तर्गत विशाखदत्त कृत 'देवीचन्द्रगुप्तम्' (नाटक) से गुप्त नरेश रामगुप्त तथा चन्द्रगुप्त के बारे में जानकारी मिलती है। अन्य साहित्यिक स्रोतों में - अभिज्ञान शाकुन्तलम्रघुवंश महाकाव्यमुद्राराक्षसमृच्छकटिकमहर्षचरित, वात्सायनन के कामसूत्र आदि से गुप्तकालीन शासन व्यवस्था एवं नगर जीवन के विषय में जानकारी प्राप्त होती है।
  • अभिलेखीय साक्ष्य के अन्तर्गत समुद्रगुप्त का प्रयाग प्रशस्ति लेख सर्वप्रमुख है, जिसमें समुद्रगुप्त के राज्यभिषेक उसके दिग्विजय तथा व्यक्तित्व पर प्रकाश पड़ता है। अन्य अभिलेखों में चन्द्रगुप्त द्वितीय के उदयगिरि से प्राप्त गुहा लेख, कुमार गुप्तका विलसड़ स्तम्भ लेख स्कंद गुप्त का भीतरी स्तम्भ लेख, जूनागढ़ अभिलेख महत्पूर्ण हैं।
  • विदेशी यात्रियों के विवरण में फ़ाह्यान जो चन्द्रगुप्त द्वितीय के काल में भारत आया था। उसने मध्य देश के जनता का वर्णन किया है। 7वी. शताब्दी ई. में चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण से भी गुप्त इतिहास के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। उसने बुद्धगुप्त, कुमार गुप्त प्रथम, शकादित्य तथा बालदित्य आदि गुप्त शासकों का उल्लेख किया है। उसके विवरण से यह ज्ञात होता है कि कुमार गुप्त ने ही नालन्दा विहार की स्थापना की थी।

गया  

गया
महाबोधि मंदिर, बोधगया
विवरणझारखंड और बिहार की सीमा और फल्गु नदीके तट पर बसा गया बिहार का एक प्रमुख नगर है।
राज्यबिहार
ज़िलागया
भौगोलिक स्थितिउत्तर- 24°45′; पूर्व- 85°01′
मार्ग स्थितिगया बोधगया से 17 किलोमीटर, नालंदा से 101 किलोमीटर, राजगीर से 78 किलोमीटर, पटना से 135 किलोमीटर, वाराणसी से 252 किलोमीटर, कलकत्ता से 495 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।
कैसे पहुँचेंहवाई जहाज, रेल, बस, टैक्सी
हवाई अड्डागया हवाई अड्डा
रेलवे स्टेशनगया रेलवे स्टेशन
बस अड्डागया बस अड्डा
यातायातटैक्सी, ऑटो-रिक्शा, साइकिल रिक्शा
कहाँ ठहरेंहोटल, अतिथि ग्रह, धर्मशाला
एस.टी.डी. कोड0-631
ए.टी.एमलगभग सभी
Map-icon.gifगूगल मानचित्र
संबंधित लेखबोधगयामहाबोधि मंदिरश्राद्ध
भाषाहिंदी और भोजपुरी
अन्य जानकारीकहा जाता है कि श्राद्ध के समय में यहाँ फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने से मृत व्यक्ति को बैकुंठ की प्राप्ति होती है।
बाहरी कड़ियाँआधिकारिक वेबसाइट

गया (अंग्रेज़ीGayaझारखंड और बिहार की सीमा और फल्गु नदी के तट पर बसा बिहार का एक प्रमुख नगर है। वाराणसी की तरह गया की प्रसिद्धि मुख्य रूप से एक धार्मिक नगरी के रूप में है। पितृपक्ष के अवसर पर यहाँ हज़ारों श्रद्धालु पिंडदान के लिये जुटते हैं। गया सड़क, रेल और वायु मार्ग द्वारा पूरे भारत से अच्छी तरह जुड़ा है। नवनिर्मित 'गया अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा' द्वारा यह थाइलैंड से भी सीधे जुड़ा हुआ है। गया से 17 किलोमीटर की दूरी पर बोधगया स्थित है जो बौद्ध तीर्थ स्थल है और यहीं 'बोधिवृक्ष' के नीचे भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

मान्यता

गया बिहार के महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थानों में से एक है। यह शहर ख़ासकर हिन्दू तीर्थ यात्रियों के लिए काफ़ी मशहूर है। यहाँ का 'विष्णुपद मंदिर' पर्यटकों के बीच लोकप्रिय है। दंतकथाओं के अनुसार भगवान विष्णु के पांव के निशान पर इस मंदिर का निर्माण कराया गया है। हिन्दू धर्म में इस मंदिर को अहम स्थान प्राप्त है। गया पितृदान के लिए भी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यहाँ फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने से मृत व्यक्ति को बैकुंठ की प्राप्ति होती है। आधुनिक काल में भी सभी धार्मिक हिन्दुओं की दृष्टि में गया का विलक्षण महत्त्व है। इसके इतिहास प्राचीनता, पुरातत्त्व-सम्बन्धी अवशेषों, इसके चतुर्दिक पवित्र स्थलों, इसमें किये जाने वाले श्राद्ध-कर्मों तथा गया वालों के विषय में बहुत-से मतों का उद्घोष किया गया है। गया के विषय में सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है 'गयामाहात्मय'।[1] विद्वानों ने गयामाहात्मय के अध्यायों की प्राचीनता पर सन्देह प्रकट किया है। राजेन्द्रलाल मित्र ने इसे तीसरी या चौथी शताब्दी में प्रणीत माना है। ओ' मैली ने 'गयासुर की गाथा' का आविष्कार 14वीं या 15वीं शताब्दी का माना है, क्योंकि उनके मत से गयावाल वैष्णव हैं, जो मध्वाचार्य द्वारा स्थापित सम्प्रदाय के समर्थक हैं और हरि नरसिंहपुर के महन्त को अपना गुरु मानते हैं किन्तु यह मत असंगत है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  वायुपुराण, अध्याय 105-112
  2.  ऋग्वेद 10।63।17 एवं 10।64।17
  3.  दैवी पुरोहित गय द्वारा प्रशंसित हुए
  4.  अथर्ववेद, 1।14।4
  5.  ऋग्वेद 7।99।4, 7।104।24—25 एवं अथर्ववेद4।23।5
  6.  निरूक्त 12।19
  7.  ऋग्वेद 1।22।17
  8.  विष्णु
  9.  त्रेधा निधत्ते पदम्। पृथिव्यामन्तरिक्षे दिवीति शाकपूणि:। समारोहणे गयाशिरसि-इति और्णवाभ:। निरूक्त (12।19)।
  10.  अधिकांश संस्कृत-विद्वान् निरूक्त को कम-से-कम ई.पू. पाँचवीं शताब्दी का मानते हैं। और्णवाभ निरूक्त के पूर्वकालीन हैं। विंटरनित्ज का हिस्ट्री ऑफ संस्कृत लिटरेचर, भाग 1, पृ0 69, अंग्रेज़ी संस्करण। गयाशीर्ष के वास्तविक स्थल एवं विस्तार के विषय में विद्वान् एकमत नहीं हैं। डॉ. राजेन्द्रलाल मित्र कृत 'बुद्ध-गया' (पृ. 19), डॉ. बरूआ (भाग 1,पृ. 246) एवं सैकेड बुक ऑफ दि ईस्ट, जिल्द 13, पृ. 134, जहाँ कनिंघम ने 'गयासीस' को बह्मयोनि माना है
  11.  महाभारत, वनपर्व 87।11 एवं 95।9
  12.  विष्णुधर्मसूत्र 85।4, यहाँ 'गयाशीर्ष' शब्द आया है
  13.  विष्णु पुराण 22।20, जहाँ इसे ब्रह्मा की पूर्व वेदी कहा गया है
  14.  महावग्ग 1।21।1, जहाँ यह आया है कि उरवेला में रहकर बुद्ध सहस्त्रों भिक्षुओं के साथ गयासीस अर्थात् गयाशीर्ष में गये
  15.  भविष्य के बुद्ध
  16.  विष्णुधर्मसूत्र 85।40
  17.  महरौली देहली से 9 मील उत्तर, के लौह-स्तम्भ के लेख का अन्तिम श्लोक यों है- 'तेनायं प्रणिधाय भूमिपतिना.... प्रांशुर्विष्णुपदे गिरौ भगवतो विष्णोर्ध्वज: स्थापित:' (गुप्ताभिलेख, सं. 32, पृ. 149)। यह स्तम्भाभिलेख किसी चन्द्र नामक राजा का है। इससे प्रकट होता है कि 'विष्णुपद' नामक कोई पर्वत था। किन्तु यह नहीं प्रकट होता कि इसके पास कोई 'गयाशिरस्' नामक स्थल था। अत: 'विष्णुपद' एवं 'गयशिर' साथ-साथ गया की ओर संकेत करते हैं। अभिलेख में कोई तिथि नहीं है, किन्तु इसके अक्षरों से प्रकट होता है कि यह समुद्रगुप्त के काल के आस-पास का है। अत: विष्णुपद चौथी शताब्दी में देहली के पास के किसी पर्वत पर रहा होगा। उसी समय या उसके पूर्व में यह वर्णन आया है कि विपाशा नदी के दक्षिण में एक विष्णुपद था।
  18.  पक्षियों के स्वर से गंजित
  19.  महाभारत, वनपर्व 84।82-103 एवं 95।9-21
  20.  महाभारत, वनपर्व अध्याय 82
  21.  श्लोक 20-40
  22.  स्थाणुतीर्थ
  23.  महाभारत, वनपर्व (84।1।89)
  24.  पद्म पुराण (आदि, 38।2-19)
  25.  यथा 84।59-64 एवं 87।6-7
  26.  यथा 85।82-103 एवं 87।8-12
  27.  महाभारत (अनुशासन पर्व 25।42)
  28.  वायु पुराण (109।15)
  29.  महाभारत, वनपर्व अध्याय 84 एवं 95
  30.  अग्नि पुराण अध्याय 114-116
  31.  वायु पुराण अध्याय 105-111
  32.  पद्म पुराण आदि, 38।2-21
  33.  गरुड़ पुराण 1, अध्याय 82-86
  34.  नारद पुराण उत्तर, अध्याय 44-47
  35.  महाभारत वन 82।81
  36.  पद्म. आदि, 38।13
  37.  लगभग-13 मील
  38.  मौनादित्यसहस्त्रलिंगकमलार्धागींणनारायण,-- द्विसोमेश्वरफल्गुनाथविजयादित्याह्वयानां कृती। स प्रासादमचीकरद् दिविषदां केदारदेवस्य च, ख्यातस्योत्तरमानसस्य खननं सत्रं तथा चाक्षये॥ इण्डियन ऐण्टीक्वेरी, जिल्द 16, पृ. 63
  39.  (मानस सरोवर)
  40.  वायु पुराण 77।108, और यह श्लोक कल्पतरू द्वारा 1110 ई. में उद्धृत किया गया है, पुन: वायु पुराण (82।21) एवं अग्नि पुराण (115।10)
  41.  वायु पुराण, अध्याय 105-112
  42.  उत्तर, अध्याय 44-47
  43.  वायु पुराण 82।20-24
  44.  (भोजन, आहार)
  45.  एष्टव्या बहव: पुत्रा यधेकोपि गयां व्रजेत्। यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सुजेत्॥ महानदी च तत्रैव तथा गयशिरो नृप। यत्रासौ कोर्त्यते विप्रैरक्षय्यकरणो वट:॥ यत्र दत्तं पितृभ्योन्नमक्षय्यं भवति प्रभो। सा च पुच्यजला तत्र फल्गुनामा महानदी॥ महाभारत, वनपर्व (87।10-12); राजर्षिणा पुण्यकृता गयेनानुपमद्युते। नगो गयशिरो यत्र पुण्या चैव महानदी॥...ऋषियज्ञेन महता यत्राक्षयवटो महान। अक्षये देवयजने अक्षयं यत्र वै फलम्॥ वनपर्व और एष्टव्या... नामक श्लोक के लिए विष्णुधर्मसूत्र (85। अन्तिम श्लोक), मत्स्य पुराण (22।6), वायु पुराण(105।10), कूर्म पुराण (2।35।12), पद्म पुराणपद्म पुराण (1।38।17 एवं 5।11।62) तथा नारदीय पुराण (उत्तर 44।5-6) (वनपर्व 87।10-12)
  46.  वनपर्व (अध्याय 87)
  47.  वनपर्व अध्याय 95
  48.  यह ज्ञातव्य है कि रामायण (1।32।7) के अनुसार धर्मारण्य की संस्थापना ब्रह्मा के पौत्र, कुश के पुत्र असूर्तरय (या अमूर्तरय) द्वारा हुई थी।
  49.  वसिष्ठधर्मसूत्र (111।42)
  50.  विष्णुधर्मसूत्र (85।65-67)
  51.  शंख 14।27-28
  52.  यह कुछ आश्चर्यजनक है कि डॉ. बरूआ (गया एवं बुद्धगया, जिल्द 1, पृ. 66) ने शंख के श्लोक 'तीर्थे वामरकण्टके ' में 'वामरकण्टक' तीर्थ पढ़ा है न कि 'वा' को पृथक् कर 'अमरकण्टक'!
  53.  अग्नि पुराण 115।46-47
  54.  मत्स्य पुराण 22।4-6
  55.  वायुपुराण, अध्याय 105-112
  56.  वायु. (105।7-8) एवं अग्न. (114।41)-- 'गयोपि चाकरोद्यार्ग बह्वन्नं बहुदक्षिणम्। गयापुरी तेन नाम्ना, त्रिस्थलीसेतु (पृ. 340-341) में यह पद्य उद्धृत है।
  57.  यहीं पर "एष्टव्या बहव: पुत्रा यद्येकोपि गयां व्रजेत्।... उत्सृजेत्" (वायु पुराण 105।10) नामक श्लोक आया है। त्रिस्थली (पृ. 319) में एक श्लोक उद्धृत किया है जिसमें योग्य पुत्र की परिभाषा दी हुई है-- 'जीवतो वाक्यकरणात्..... त्रिभि: पुत्रस्य पुत्रता॥'
  58.  आत्मजोवान्यजो वापि गयाभूमौ यदा यदा। यन्नाम्ना पातयेत्पिण्डं तन्नयेद् ब्रह्म शाश्वतम्॥ नामगोत्रे समुच्चार्य पिण्डपातनभिष्यते। (वायु. 105।14-15); आधा पाद 'यन्नाम्ना... शाश्वतम्' अग्नि पुराण (116।21) में भी आया है।
  59.  ब्रह्मज्ञानं गयाश्राद्धं गोग्रहे मरणं तथा। वास: पुसां कुरुक्षेत्रे मुक्तिरेषा चतुर्विधा॥ ब्रह्मज्ञानेन किं कार्य... यदि पुत्रो गयां ब्रजेत॥ गयायां सर्वकालेषु पिण्डं वद्याद्विचक्षण:। वायु पुराण (105।16-18)। अग्नि पुराण (115।8) 'न कालादि गयातीर्थे दद्यात्पिण्डांश्च नित्यश:।' नारदीय पुराण (उत्तर, 44।20), अग्नि पुराण (115।3-4 एवं 5-6) एवं वामन पुराण (33।8)
  60.  मुण्डनं चोपवासश्च... विरजां गयाम्॥ वायु पुराण105।25
  61.  दण्डं प्रदर्शयेद् भिक्षुर्गयां गत्वा न पिण्डद:। दण्डं न्यस्य विष्णुपदे पितृभि: सहमुच्यते॥ वायु पुराण105।26, नारदीय पुराण एवं तीर्थप्रकाश (पृ. 390)
  62.  पंचकोशं गयाक्षेत्रं कोशमेकं गयाशिर:। तन्मध्ये सर्वातीर्थानि त्रैलोक्ये यानि सन्ति वै॥ वायु पुराण(105।29-30 एवं 106।653; त्रिस्थली.,पृ. 335; तीर्थप्र.,पृ. 391)। और अग्नि पुराण (115।42) एवं नारदीय पुराण (उत्तर, 44।16)। प्रसिद्ध तीर्थों के लिए पाँच कोसों का विस्तार मानना एक नियम-सा हो गया है।
  63.  पिण्डसनं पिण्डदानं पुन: प्रत्यवनेजनम्। दक्षिणा चान्नसंकल्पस्तीर्थश्राद्धेष्वयं विधि:॥ नावाहनं न दिग्बन्धो न दोषो दृष्टिसम्भव:।... अन्यत्रावाहिता: काले पितरो यान्त्यमुं प्रति। तीर्थे सदा वसन्त्येते तस्मादावहनं न हि॥ वायु पुराण (105।37-39)।'नावाहनं...विधि:' फिर से दुहराया गया है (वायु पुराण 110।28-29)
  64.  गयायां न हि तत्स्थानं यत्र तीर्थ न विद्यते। वायु पुराण 105।46, अग्नि पुराण 116।28
  65.  अग्नि पुराण (114।8-22) में भी शिला की गाथा संक्षेप में कही गयी है। बहुत-से शब्द वे ही हैं जो वायु पुराण में पाये जाते हैं।
  66.  बोधगया, पृ. 15-16
  67.  शिव का भक्त
  68.  जो श्रेष्ठ राजा एवं विष्णु-भक्त था
  69.  कूर्म पुराण 1।16।59-60 एवं 91-92
  70.  पद्म पुराण भूमिखण्ड, 1।8
  71.  इस पुराण ने उसे महाभागवत कहा है
  72.  वामन पुराण अध्याय 7-8
  73.  अंगुत्तरनिकाय, भाग 4, पृ. 197-204
  74.  असुरेन्द्र

गुप्त राजवंश  

गुप्त वंश 275 ई. के आसपास अस्तित्व में आया। इसकी स्थापना श्रीगुप्त ने की थी। लगभग 510 ई. तक यह वंश शासन में रहा। आरम्भ में इनका शासन केवल मगध पर था, पर बाद में गुप्त वंश के राजाओं ने संपूर्ण उत्तर भारत को अपने अधीन करके दक्षिण में कांजीवरम के राजा से भी अपनी अधीनता स्वीकार कराई। इस वंश में अनेक प्रतापी राजा हुए। कालिदास के संरक्षक सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय(380-415 ई.) इसी वंश के थे। यही 'विक्रमादित्य' और 'शकारि' नाम से भी प्रसिद्ध हैं। नृसिंहगुप्त बालादित्य (463-473 ई.) को छोड़कर सभी गुप्तवंशी राजा वैदिक धर्मावलंबी थे। बालादित्य ने बौद्ध धर्म अपना लिया था।

गुप्त राजवंशों का इतिहास साहित्यिक तथा पुरातात्विक दोनों प्रमाणों से प्राप्त होता है। गुप्त राजवंश या गुप्त वंश प्राचीन भारत के प्रमुख राजवंशों में से एक था। इसे भारतका 'स्वर्ण युग' माना जाता है। गुप्त काल भारत के प्राचीन राजकुलों में से एक था। मौर्य चंद्रगुप्त ने गिरनार के प्रदेश में शासक के रूप में जिस 'राष्ट्रीय' (प्रान्तीय शासक) की नियुक्ति की थी, उसका नाम 'वैश्य पुष्यगुप्त' था। शुंग कालके प्रसिद्ध 'बरहुत स्तम्भ लेख' में एक राजा 'विसदेव' का उल्लेख है, जो 'गाप्तिपुत्र' (गुप्त काल की स्त्री का पुत्र) था। अन्य अनेक शिलालेखों में भी 'गोप्तिपुत्र' व्यक्तियों का उल्लेख है, जो राज्य में विविध उच्च पदों पर नियुक्त थे। इसी गुप्त कुल के एक वीर पुरुष श्रीगुप्त ने उस वंश का प्रारम्भ किया, जिसने आगे चलकर भारत के बहुत बड़े भाग में मगध साम्राज्य का फिर से विस्तार किया।

कुमारगुप्त प्रथम महेन्द्रादित्य  

कुमारगुप्त प्रथम (414-455 ई.) गुप्तवंशीय सम्राट था। पिता चंद्रगुप्त द्वितीय की मृत्यु के बाद वह राजगद्दी पर बैठा था। वह पट्टमहादेवी ध्रुवदेवी का पुत्र था। उसके शासन काल में विशाल गुप्त साम्राज्य अक्षुण रूप से क़ायम रहा। बल्ख से बंगाल की खाड़ी तक उसका अबाधित शासन था। सब राजा, सामन्त, गणराज्य और प्रत्यंतवर्ती जनपद कुमारगुप्त के वशवर्ती थे। गुप्त वंश की शक्ति उसके शासन काल में अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई थी। कुमारगुप्त को विद्रोही राजाओं को वश में लाने के लिए कोई युद्ध नहीं करने पड़े।

अभिलेख

कुमारगुप्त प्रथम के समय के लगभग 16 अभिलेख और बड़ी मात्रा में स्वर्ण के सिक्के प्राप्त हुए हैं। उनसे उसके अनेक विरुदों, यथा- 'परमदैवत', 'परमभट्टारक', 'महाराजाधिराज', 'अश्वमेघमहेंद्र', 'महेंद्रादित्य', 'श्रीमहेंद्र', 'महेंद्रसिंह' आदि की जानकारी मिलती है। इसमें से कुछ तो वंश के परंपरागत विरुद्ध हैं, जो उनके सम्राट पद के बोधक हैं। कुछ उसकी नई विजयों के द्योतक जान पड़ते हैं। सिक्कों से ज्ञात होता है कि कुमारगुप्त प्रथम ने दो अश्वमेघ यज्ञ किए थे। उसके अभिलेखों और सिक्कों के प्राप्ति स्थानों से उसके विस्तृत साम्राज्य का ज्ञान होता है। वे पूर्व में उत्तर-पश्चिम बंगाल से लेकर पश्चिम में भावनगर, अहमदाबादउत्तर प्रदेश और बिहार में उनकी संख्या अधिक है। उसके अभिलेखों से साम्राज्य के प्रशासन और प्रांतीय उपरिकों[1] का भी ज्ञान होता है।[2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  गवर्नरों
  2.  कुमारगुप्त प्रथम (हिन्दी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 13 फरवरी, 2015।
  3.  म्लेच्छों को

हर्ष गुप्त  

  • कृष्ण गुप्त का उत्तराधिकारी उसका पुत्र हर्ष गुप्त था।
  • इसका शासनकाल लगभग 500 ईस्वी से 520 ईस्वी तक था।
  • अफ़सढ़ अभिलेख में कहा गया है कि इसने अनेक दुधर्ष युद्धों में विजय प्राप्त की था। इसका शासन काल भी हूणों के आक्रमण के कारण उथल-पुथल का काल था। यह हूण आक्रान्ता तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल दोनों का समकालीन था। इस समय गुप्तसम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य हूणों के साथ संघर्ष में उलझा हुआ था।
  • कुछ विद्वानों का यह मानना है कि नरसिंह गुप्त का शासन मगध क्षेत्र में ही सीमित था, जबकि बंगाल के क्षेत्र में कदाचित वैन्य गुप्त ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था तथा मालवा क्षेत्र में सम्भवतः भानु गुप्त हूणों के विरुद्ध संघर्षरत था।
  • अफ़सढ़ अभिलेख में हर्ष गुप्त के लिए स्वतंत्र शासक के लिए प्रयुक्त होने वाली किसी उपाधि का प्रयोग नहीं है। अतः उसकी स्थिति एक सामन्त की ही प्रतीत होती है। यह कहना कठिन है कि वह तत्कालीन गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य अथवा भानु गुप्त के अधीन शासन कर रहा था या उसने हूणों की अधिसत्ता स्वीकार कर ली थी। यह भी सम्भावना व्यक्त की गयी है कि वह मालवा के यशोवर्मन का भी समकालीन था। किंतु दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है।
  • हर्ष गुप्त की बहन का विवाह मौखरी नरेश आदित्यवर्मा के साथ हुआ था। इस प्रकार हर्ष गुप्त के शासनकाल में उत्तर गुप्त एवं मौखरी राजकुलों के पारस्परिक सम्बन्ध मित्रतापूर्ण दिखाई देते हैं।
  • वस्तुतः ये दोनों ही राजकुल विकासोन्मुख थे। अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ये परस्पर सहयोगी बनें और मैत्री सम्बन्ध को सु़दृढ़ करने के लिए वैवाहिक सम्बन्ध का आश्रय लिया।

ईश्वर वर्मा  

ईश्वर वर्मा कन्नौज के मौखरि वंश का तीसरा राजा था। वह छठी शताब्दी ई. के द्वितीय चतुर्थांश में राज्य करता था। ईश्वर वर्मा का शासन केवल कन्‍नौज तक ही सीमित रहा। वह अपने राज्य का अधिक विस्तार नहीं कर सका।[1]

  • अपने राज्य काल के दौरान ईश्वर वर्मा को महाराज की पदवी प्राप्त थी।
  • सम्भवत: गुप्त राजकुमारी उपगुप्ता के साथ उसने विवाह किया था।
  • ईशान वर्मा उसका पुत्र था, जो बाद में ईश्वर वर्मा का उत्तराधिकारी हुआ।

ईशानवर्मा  

ईशानवर्मा कन्नौज के मौखरि राजवंश का चौथा राजा था। उसके पहले के तीन राजा अधिकतर उत्तर युगीन मागध गुप्तों के सामंत नृपति रहे थे।

  • ईशानवर्मा 554 ई. के आसपास राज्य करता था।
  • ईशानवर्मन ने उत्तर गुप्तों का आधिपत्य कन्नौज से हटाकर अपनी स्वतंत्रता घोषित कर ली थी।
  • उसकी प्रशस्ति में लिखा है कि- "उसने आन्ध्रों को परास्त किया और गौड़ों को अपनी सीमा के भीतर रहने के लिए मजबूर कर दिया। इसमें संदेह नहीं कि यह प्रशस्ति मात्र प्रशस्ति है, क्योंकि ईशानवर्मन् के आन्ध्रों अथवा गौड़ राजा के संपर्क में आने की संभावना अत्यंत कम थी।
  • गौड़ों और मौखरियों के बीच तो स्वयं उत्तर कालीन गुप्त ही थे, जिनके राजा कुमारगुप्त ने, जैसा कि उसके अभिलेख से विदित होता है, ईशानवर्मन को परास्त कर उसके राज्य का कुछ भाग छीन लिया था।[1]
  • महाराजाधिराज की पदवी धारण करने वाला यह मौखरि राजा था।[2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  औंकारनाथ उपाध्याय, हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 2, पृष्ठ संख्या 38
  2.  हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 2 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 39 |

अवन्ति वर्मन  

अवन्ति वर्मन अथवा 'अवन्तिवर्मा' कश्मीर के उत्पल वंशका संस्थापक था। उसका शासन काल 855 से 883 ई. तक माना जाता है।

  • अवन्ति वर्मन ने शासन काल का अधिकांश समय लोकोपकारी कार्यो में व्यतीत किया था।
  • उसने कृषि के विकास हेतु अभियन्ता 'सुय्य' निरीक्षण में कई नहरों का निर्माण करवाया।
  • नगरों एवं कस्बों के निर्माण के अन्तर्गत अवन्ति वर्मन ने अविन्तपुर नामक नगर एवं 'सुय्यापुरा' (आधुनिक सोपारा) नामक कस्बे का निर्माण करवाया।
  • उसके संरक्षण में दो कवि रत्नाकर एवं 'आनन्द वर्धन' उसके दरबार की शोभा बढ़ाते थे।
  • अवन्ति वर्मन ने अपने सुयोग्य मंत्री सूर के साथ सफल शासन किया।

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