गंग वंश ( पश्चिम वंश कार्यकाल 754 वर्ष)( पुर्ववंश कार्यकाल -406 वर्ष)
गंग वंश
भारत में गंग वंश नाम के दो अलग-अलग, लेकिन दूर के संबंधी राजवंश थे।
- पश्चिमी गंग वंश (250 से लगभग 1004 ई)
- पूर्वी गंग वंश (1028 से 1434-35 ई.)
इतिहास
पश्चिमी गंग वंश का 250 से लगभग 1004 ई. तक मैसूरराज्य (गंगवाड़ी) पर शासन था। पूर्वी गंग वंश ने 1028 से 1434-35 ई. तक कलिंग पर शासन किया।
इस नाम के भारत में दो अलग-अलग, लेकिन दूर के संबंधी राजवंश थे।
पश्चिमी गंग वंश के प्रथम शासक, कोंगानिवर्मन, ने अपने विजय अभिमानों से राज्य की स्थापना की, लेकिन उनके उत्तराधिकारियों माधव और हरिवर्मन ने पल्लवों, चालुक्यों और कंदबों के साथ वैवाहिक और सैनिक समझौतों से अपने प्रभाव क्षेत्रों में वृद्धि की।
आठवीं शताब्दी के अंत में एक पारिवारिक विवाद ने गंग वंश को कमज़ोर कर दिया, लेकिन बूतुंग द्वितीय (लगभग 937-960) ने तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों के बीच व्यापक क्षेत्र पर राज्य क़ायम किया। उनका राज्य तलकाड़ (राजधानी) से वातापी तक फैला हुआ था। चोलों के बार- बार आक्रमण ने गंगवाड़ी और उनकी राजधानी के बीच संबंध विच्छेद कर दिया और लगभग 1004 ई. में चोल राजा विष्णुवर्द्धन के क़ब्ज़े में चला गया।
धर्म और कला
पूर्वी गंग वंश धर्म और कला का महान् संरक्षक था और उसके शासनकाल में निर्मित मंदिर हिन्दू वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। पश्चिमी गंग वंश के अधिकांश लोग जैन धर्म के अनुयायी थे, लेकिन कुछ लोगों ने ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म को भी प्रश्रय दिया था। उन्होंने कन्नड़ भाषा में विद्वत्तापूर्ण शैक्षिक कार्यो को बढ़ाया दिया, कुछ उल्लेखनीय मंदिर बनवाए, जंगल साफ़ कर खेती योग्य ज़मीन तैयार करवाई और सिंचाई तथा अंतर्प्रायद्वीपीय व्यापार को बढ़ावा दिया।
गंगवाड़ी
गंगवाड़ी भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध मैसूर का प्राचीन नाम था। यह नाम गंग वंश के नरेशों का मैसूर प्रदेश में राज्य होने के कारण पड़ा था।
- मैसूर में गंगों का शासन काल 5वीं शती ई. से 10वीं शती तक रहा था।
- गंग नरेशों का राज्य उड़ीसा तक विस्तृत था। इनके समय के अनेक अभिलेख इस क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं।[1]
टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |पृष्ठ संख्या: 261 |
कोंगानिवर्मन
- कोंगानिवर्मन 'पश्चिमी गंग वंश' का प्रथम शासक था।
- इसका शासनकाल लगभग 350 से 370 ई. तक माना जाता है।
- उसने अपने बृहद विजय अभियानों से एक बड़े राज्य की स्थापना की थी।
- कोंगानिवर्मन के उत्तराधिकारियों माधव और हरिवर्मनने भी गंग वंश की शक्ति को बनाये रखा।
- इन्होंने पल्लवों, चालुक्यों और कंदबों के साथ वैवाहिक और सैनिक समझौतों से अपने प्रभाव क्षेत्रों में वृद्धि की।
माधव (गंग वंश)
- माधव एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें: माधव
पश्चिमी गंग वंश के प्रथम शासक, कोंगानिवर्मन, ने अपने विजय अभिमानों से राज्य की स्थापना की, लेकिन उनके उत्तराधिकारियों माधव और हरिवर्मन ने पल्लवों, चालुक्योंऔर कंदबों के साथ वैवाहिक और सैनिक समझौतों से अपने प्रभाव क्षेत्रों में वृद्धि की।
हरिवर्मन
- हरिवर्मन पश्चिमी गंग वंश के माधव के बाद राज्य का उत्तराधिकारी था।
- इसका शासनकाल लगभग 390 से 410 ई. तक माना जाता है।
- हरिवर्मन ने पल्लवों, चालुक्यों और कदम्बों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया था।
- उसके इन सम्बन्धों के फलस्वरूप गंग वंश की शक्ति काफ़ी बढ़ गई थी।
तुंगभद्रा नदी
तुंगभद्रा नदी दक्षिण भारत की प्रसिद्ध नदी है। यह पश्चिम घाट से निकलती है और रायपुर के निकट कृष्णा नदी में मिलती है। कर्नाटक (मैसूर) राज्य में स्थित तुंग और भद्रनामक दो पर्वतों से निस्सृत दो श्रोतों से मिलकर तुंगभद्रा नदी की धारा बनती है। उद्गम का स्थान गंगामूल कहलाता है। तुंग और भद्र श्रृंगेरी, श्रृंगगिरी या वराहपर्वत के अंतर्गत हैं और ये ही तुंगभद्रा के नाम के कारण हैं।
ग्रन्थों में उल्लेख
श्रीमदभागवत्[1] में तुंगभद्रा का उल्लेख है '-चंद्रवसा ताम्रपर्णी अवटोदा कृतमाला वैहायसी कावेरी वेणी पयस्विनी शर्करावर्ता तुंगभद्रा कृष्णा-' महाभारत में सम्भवतः इसे तुंगवेणा कहा गया है। पद्म पुराण[2] में हरिहरपुर को तुंगभद्रा के तट पर स्थित बताया गया है। रामायण में तुंगभद्रा को पंपा के नाम जाना जाता था।
टीका टिप्पणी और संदर्भ
कृष्णा नदी
![]() | एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- कृष्णा (बहुविकल्पी) |
कृष्णा नदी | |
| अन्य नाम | कृष्णवेणा |
| देश | दक्षिण भारत |
| राज्य | महाराष्ट्र |
| उद्गम स्थल | पश्चिमी घाट शृंखला, महाबलेश्वर, महाराष्ट्र |
| लम्बाई | 1,400 कि.मी. |
| सहायक नदियाँ | भीमा, तुंगभद्रा, गोदावरी, कावेरी |
| पौराणिक उल्लेख | पुराणों में कृष्णा को विष्णु के अंश से संभूत माना गया है। महाभारत सभा पर्व[1]में कृष्णा को कृष्णवेणा कहा गया है और गोदावरी और कावेरी के बीच में इसका उल्लेख है जिससे इसकी वास्तविक स्थिति का बोध होता है- 'गोदावरी कृष्णवेणा कावेरी च सरिद्वारा'। |
| प्रवाहित क्षेत्र | सांगली, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश |
कृष्णा नदी दक्षिण भारत की एक महत्त्वपूर्ण नदी है, इसका उद्गम महाराष्ट्र राज्य में महाबलेश्वर के समीप पश्चिमी घाट शृंखला से होता है, जो भारत के पश्चिमी समुद्रतट से अधिक दूर नहीं है। यह पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और फिर सामान्यत: दक्षिण-पूर्वी दिशा में सांगली से होते हुए कर्नाटक राज्य सीमा की ओर बहती है। यहाँ पहुँचकर यह नदी पूर्व की ओर मुड़ जाती है और अनियमित गति से कर्नाटक और आंध्र प्रदेश राज्य से होकर बहती है। अब यह दक्षिण-पूर्व व फिर पूर्वोत्तर दिशा में घूम जाती है और इसके बाद पूर्व में विजयवाड़ा में अपने डेल्टा शीर्ष की ओर बहती है। यहाँ से लगभग 1,290 किमी की दूरी तय करके यह बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। कृष्णा के पास बड़ा और बहुत उपजाऊ डेल्टा है, जो पूर्वोत्तर में गोदावरी नदी क्षेत्र की ओर आगे बढ़ता जाता है। कृष्णा नदी की लम्बाई लगभग 1400 कि.मी. है।
यह नौकाचालान योग्य नहीं है, लेकिन कृष्णा से सिंचाई के लिए पानी तो मिलता ही है; विजयवाड़ा स्थित एक बांध डेल्टा में एक नहर प्रणाली की सहायता से पानी के बहाव को नियंत्रित करता है। मॉनसूनी वर्षा के द्वारा पानी मिलने के कारण नदी के जलस्तर में वर्ष भर काफ़ी उतार-चढ़ाव आता रहता है, जिससे सिंचाई के लिए इसकी उपयोगिता सीमित ही है।
कृष्णा नदी घाटी परियोजना (महाराष्ट्र) से यह आशा की जाती है कि इससे राज्य को सिंचाई के लिए अधिक पानी मिल सकेगा। कृष्णा नदी को दो सबसे बड़ी सहायक नदियां, भीमा (उत्तर) और तुंगभद्रा (दक्षिण) हैं। भीमा नदी (महाराष्ट्र) पर उजैनी बांध और तुंगभद्रा नदी पर हौसपेट में बने एक अन्य बांध से सिंचाई के पानी में वृद्धि हुई है। हौसपेट से विद्युत ऊर्जा की आपूर्ति भी होती है।
श्रीमद्भागवत के अनुसार
श्रीमद्भागवत[2]में इसका उल्लेख है—'…कावेरी वेणी पयस्विनी शर्करावती तुंगभद्रा कृष्णा वेण्या भीमरथी…' कृष्णा बंगाल की खाड़ी में मसुलीपट्म के निकट गिरती है। कृष्णा और वेणी के संगम पर माहुली नामक प्राचीन तीर्थ है। पुराणों में कृष्णा को विष्णु के अंश से संभूत माना गया है।
टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ सभा पर्व महाभारत 9,20
- ↑ श्रीमद्भागवत, 5,19,18
- ↑ सभा पर्व महाभारत 9,20
तालकड़
तालकड़ अथवा 'तलकाड़' मैसूर का एक प्राचीन नगर था। गंग वंश के राजा बूतुंग द्वितीय (लगभग 937-960) ने तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों के बीच अपना व्यापक राज्य क़ायम किया था। इस समय तालकड़ उसकी राजधानी थी। बाद के समय में चोल शासकों ने इस पर शासन किया।
- प्राचीन नगर तालकड़ शिवसमुद्र से 15 मील दूर कावेरी के तट पर बसा हुआ था।
- अब नदी के द्वारा लाई हुई बालू में यह पूरी तरह अंट गया है।
- इस नगर के अनेक ध्वंसावशेष आज भी बालू के नीचे दबे पड़े हैं।
- 1717 ई. में बने हुए कीर्तिनारायण के मंदिर को बालू में से खोद निकाला गया गया है।
वातापी कर्नाटक
![]() | एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- वातापि बहुविकल्पी |
वातापी ज़िला बीजापुर, कर्नाटक राज्य भारत में स्थित है। शोलापुर से 141 मील दूर स्थित वर्तमान बादामी ही प्राचीन 'वातापी' है। यह शोलापुर-गदग रेल मार्ग पर स्थित है। बादामी की बस्ती दो पहाड़ियों के बीच में है। वातापी का नाम पुराणों में उल्लिखित है, जहाँ इसका सम्बन्ध वातापिनामक दैत्य से बताया जाता है, जिसे अगस्त्य ऋषि ने मारा था।[1]
पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में यह नगर वातापि नामक असुर के अधीन था, जो ब्राह्मणों का परम शत्रु था। बाद के दिनों में अगत्स्य ऋषि ने इसका वध किया था।
दर्शनीय स्थल
- यहा एक दुर्ग है, उसमें बायीं ओर हनुमान जी का मन्दिर, ऊपर जाने पर शिव का मन्दिर, उससे आगे दो तीन और मन्दिर मिलते हैं।
- दक्षिण की पहाड़ी पर पश्चिम की ओर 'गुहामन्दिर' हैं, तीन गुहाएँ स्मार्त धर्म की और एक जैन धर्म की है।
- पहली गुहा में 18 भुजाओं वाली शिवमूर्ति, गणेशमूर्ति तथ गणों की मूर्तियाँ हैं।
- आगे विष्णु, लक्ष्मी तथा शिव-पार्वती की मूर्तियाँ हैं।
- पिछली दीवार में महिषासुरमर्दिनी, गणेश तथा स्कन्दकी मूर्तियाँ हैं।
- दूसरी गुहा में वामन अवतार, वराह अवतार, गरुड़ारूढ़ नारायण, शेषशायी नारायण की मूर्तियाँ तथा कुछ अन्य मूर्तियाँ भी हैं।
- तीसरी गुहा में अर्द्धनारीश्वर शिव, पार्वती, नृसिंह अवतार, नारायण, वराह आदि की मूर्तियाँ हैं।
- जैन गुहा में जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ हैं।
इन्हें भी देखें: बादामी

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