राष्ट्रकूट वंश (736 ई. से 973 ई.)
राष्ट्रकूट वंश
राष्ट्रकूट वंश का आरम्भ 'दन्तिदुर्ग' से लगभग 736 ई. में हुआ था। उसने नासिक को अपनी राजधानी बनाया। इसके उपरान्त इन शासकों ने मान्यखेत, (आधुनिक मालखंड) को अपनी राजधानी बनाया। राष्ट्रकूटों ने 736 ई. से 973 ई. तक राज्य किया।
| शासकों के नाम | शासन काल |
|---|---|
| दन्तिदुर्ग | (736-756 ई.) |
| कृष्ण प्रथम | (756-772 ई.) |
| गोविन्द द्वितीय | (773-780 ई.) |
| ध्रुव धारावर्ष | (780-793 ई.) |
| गोविन्द तृतीय | (793-814 ई.) |
| अमोघवर्ष प्रथम | (814-878 ई.) |
| कृष्ण द्वितीय | (878-915 ई.) |
| इन्द्र तृतीय | (915-917 ई.) |
| अमोघवर्ष द्वितीय | (917-918 ई.) |
| गोविन्द चतुर्थ | (918-934 ई.) |
| अमोघवर्ष तृतीय | (934-939 ई.) |
| कृष्ण तृतीय | (939-967 ई.) |
| खोट्टिग अमोघवर्ष | (967-972 ई.) |
| कर्क द्वितीय | (972-973 ई.) |
शासन तन्त्र
राष्ट्रकूटों ने एक सुव्यवस्थित शासन प्रणाली को जन्म दिया था। प्रशासन राजतन्त्रात्मक था। राजा सर्वोच्च शक्तिमान था। राजपद आनुवंशिक होता था। शासन संचालन के लिए सम्पूर्ण राज्य को राष्ट्रों, विषयों, भूक्तियों तथा ग्रामों में विभाजित किया गया था। राष्ट्र, जिसे 'मण्डल' कहा जाता था, प्रशासन की सबसे बड़ी इकाई थी। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई 'ग्राम' थी। राष्ट्र के प्रधान को 'राष्ट्रपति' या 'राष्ट्रकूट' कहा जाता था। एक राष्ट्र चार या पाँच ज़िलों के बराबर होता था। राष्ट्र कई विषयों एवं ज़िलों में विभाजित था। एक विषय में 2000 गाँव होते थे। विषय का प्रधान 'विषयपति' कहलाता था। विषयपति की सहायता के लिए 'विषय महत्तर' होते थे। विषय को ग्रामों या भुक्तियों में विभाजित किया गया था। प्रत्येक भुक्ति में लगभग 100 से 500 गाँव होते थे। ये आधुनिक तहसील की तरह थे। भुक्ति के प्रधान को 'भोगपति' या 'भोगिक' कहा जाता था। इसका पद आनुवांशिक होता था। वेतन के बदले इन्हें करमुक्त भूमि प्रदान की जाती थी। भुक्ति छोटे-छोटे गाँव में बाँट दिया गया था, जिनमें 10 से 30 गाँव होते थे। नगर का अधिकारी 'नगरपति' कहलाता था।
प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी। ग्राम के अधिकारी को 'ग्रामकूट', 'ग्रामपति', 'गावुण्ड' आदि नामों से पुकारा जाता था। इसकी एक ग्राम सभा भी थी, जिसमें ग्राम के प्रत्येक परिवार का सदस्य होता था। गाँव के झगड़े का निपटारा करना इसका प्रमुख कार्य था।
दन्तिदुर्ग
- राष्ट्रकूट वंश की स्थापना 736 ई. में दंतिदुर्ग ने की थी। राष्ट्रकूट वंश के उत्कर्ष का प्रारम्भ दन्तिदुर्ग द्वारा हुआ।
- किंतु उससे पहले भी इस वंश के राज्य की सत्ता थी, यद्यपि उस समय इसका राज्य स्वतंत्र नहीं था।
- सम्भवतः वह चालुक्य साम्राज्य के अंतर्गत था।
- उसने माल्यखेत या मालखंड को अपनी राजधानी बनाया। उसने कांची, कलिंग, कोशल, श्रीशैल, मालवा, लाट एवं टंक पर विजय प्राप्त कर राष्ट्रकूट साम्राज्य को विस्तृत बनाया।
- उसके विषय में कहा जाता है कि उसने उज्जयिनी में हरिण्यगर्भ (महादान) यज्ञ किया था।
- उसने चालुक्य नरेश कीर्तिवर्मन द्वितीय को एक युद्ध में पराजित किया था।
- उसने महाराजधिराज परमेश्वर, परमभट्टारक आदि उपाधियां धारण की थी।
- चालुक्य शासक विक्रमादित्य ने उसे पृथ्वी वल्लभ या खड़वालोक की उपाधि दी थी।
- दन्तिदुर्ग ने न केवल अपने राज्य को चालुक्यों की अधीनता से मुक्त ही किया, अपितु अपनी राजधानी मान्यखेट (मानखेट) से अन्यत्र जाकर दूर-दूर तक के प्रदेशों की विजय भी की।
- उत्कीर्ण लेखों में दन्तिदुर्ग द्वारा विजित प्रदेशों में काञ्जी, मालवा और लाट को अंतर्गत किया गया है।
- कोशल का अभिप्राय सम्भवतः 'महाकोशल' है। महाकोशल, मालवा और लाट (गुजरात) को जीतकर वह निःसन्देह दक्षिणापथपति बन गया था, क्योंकि महाराष्ट्र में तो उसका शासन था ही।
- काञ्जी की विजय के कारण दक्षिणी भारत का पल्लव राज्य भी उसकी अधीनता में आ गया था। जो प्रदेश वातापी चालुक्यों सम्राटों की अधीनता में थे, प्रायः वे सब अब दन्तिदुर्ग के आधिपत्य में आ गए थे।
- दक्षिणापथ के क्षेत्र में राष्ट्रकूट वंश चालुक्यों का उत्तराधिकारी बन गया था।
कृष्ण प्रथम
कृष्ण प्रथम राष्ट्रकूट वंश के सबसे योग्य शासकों में गिना जाता था। इसे 'कृष्णराज' भी कहा जाता था। चालुक्यों की शक्ति को अविकल रूप से नष्ट करके राष्ट्रकूट राजा कृष्णराज ने कोंकण और वेंगि की भी विजय की थी। कृष्णराज की ख्याति उसकी विजय यात्राओं के कारण उतनी नहीं है, जितनी कि उस 'कैलाश मन्दिर' के कारण है, जिसका निर्माण उसने एलोरा में पहाड़ काटकर कराया था। कृष्ण प्रथम ने 'राजाधिराज परमेश्वर' की उपाधि ग्रहण की थी।
- राष्ट्रकूट शासक दन्तिदुर्ग के कोई पुत्र नहीं था। अतः उसकी मृत्यु के बाद उसका चाचा 'कृष्णराज' मान्यखेट के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ।
- राष्ट्रकूटों के द्वारा परास्त होने के बाद भी चालुक्यों की शक्ति का पूर्णरूप से अन्त नहीं हुआ था। उन्होंने एक बार फिर अपने उत्कर्ष का प्रयत्न किया, पर उन्हें सफलता नहीं मिली।
- दंतिदुर्ग के चाचा एवं उत्तराधिकारी कृष्णराज (कृष्ण प्रथम) ने बादामी के चालुक्यों के अस्तित्व को पूर्णतः समाप्त कर दिया।
- कृष्ण प्रथम ने मैसूर के गंगो की राजधानी मान्यपुर एवं लगभग 772 ई. में हैदराबाद को अपने अधिकार क्षेत्र में कर लिया। उसने सम्भवतः दक्षिण कोंकण के कुछ भाग को भी जीता था। इसके प्रतिहार राजा ने द्वारपाल का कार्य किया।
- चालुक्यों की शक्ति को अविकल रूप से नष्ट करके राष्ट्रकूट राजा कृष्णराज ने कोंकण और वेंगि की भी विजय की।
- पर कृष्णराज की ख्याति उसकी विजय यात्राओं के कारण उतनी नहीं है, जितनी कि उस 'कैलाश मन्दिर' के कारण है, जिसका निर्माण उसने एलोरा में पहाड़ काटकर कराया था।
- एलोरा के गुहा मन्दिरों में कृष्णराज द्वारा निर्मित कैलाश मन्दिर बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, और उसकी कीर्ति को चिरस्थायी रखने के लिए पर्याप्त है। उसने ऐलोरा में सुप्रसिद्ध गुहा मंदिर (कैलाशनाथ मंदिर) का एक ही चट्टान काटकर निर्माण करवाया। यह एक आयताकार प्रांगण के बीच स्थित है तथा द्रविड़ कला का अनुपम उदाहरण है।
- कृष्णराज का भाई गोविन्द अत्यन्त कमज़ोर शासक होने के कारण अधिक दिन तक शासन नहीं कर सका।
गोविन्द द्वितीय
- 772 ई. में कृष्णराज की मृत्यु होने पर उसका पुत्र गोविन्द राजा बना।
- वह भोग-विलास में मस्त रहता था, और राज्य-कार्य की उपेक्षा करता था।
- आठवीं सदी में कोई ऐसा व्यक्ति सफलतापूर्वक राजपद नहीं सम्भाल सकता था, जो 'उद्यतदण्ड' न हो। अतः उसके शासन काल में भी राज्य का वास्तविक संचालन उसके भाई ध्रुव के हाथों में था।
- अवसर पाकर ध्रुव स्वयं राजसिंहासन पर आरूढ़ हो गया। उसका शासन काल 779 ई. में शुरू हुआ था। इस युग में उत्तरी भारत में दो राजशक्तियाँ प्रधान थीं, गुर्जर प्रतिहार राजा और मगध के पालवंशी राजा।
ध्रुव धारावर्ष
- 772 ई. में कृष्णराज की मृत्यु होने पर उसका पुत्र गोविन्द राजा बना।
- वह भोग-विलास में मस्त रहता था, और राज्य-कार्य की उपेक्षा करता था।
- आठवीं सदी में कोई ऐसा व्यक्ति सफलतापूर्वक राजपद नहीं सम्भाल सकता था, जो 'उद्यतदण्ड' न हो। अतः उसके शासन काल में भी राज्य का वास्तविक संचालन उसके भाई ध्रुव के हाथों में था।
- अवसर पाकर ध्रुव स्वयं राजसिंहासन पर आरूढ़ हो गया। उसका शासन काल 779 ई. में शुरू हुआ था। इस युग में उत्तरी भारत में दो राजशक्तियाँ प्रधान थीं, गुर्जर प्रतिहार राजा और मगध के पालवंशी राजा।
- गुर्जर प्रतिहार राजा वत्सराज और पाल राजा धर्मपाल राष्ट्रकूट राजा ध्रुव के समकालीन थे।
- ध्रुव ने सिंहासन पर बैठने के उपरान्त वेंगी के चालुक्य नरेश विष्णु वर्धन, पल्लव नरेश दंति वर्मन एवं मैसूर के गंगो को पराजित किया।
- उत्तर भारत के ये दोनों राजा प्रतापी और महत्त्वाकांक्षी थे, और उनके राज्यों की दक्षिणी सीमाएँ राष्ट्रकूट राज्य के साथ लगती थीं। अतः यह स्वाभाविक था, कि इनका राष्ट्रकूटों के साथ संघर्ष हो। यह संघर्ष ध्रुव के समय में ही शुरू हो गया था, पर उसके उत्तराधिकारियों के शासन काल में इसने बहुत उग्र रूप धारण कर लिया।
- शुरू में ध्रुव की शक्ति अपने भाई गोविन्द के साथ संघर्ष में व्यतीत हुई। अनेक सामन्त राजा और ज़ागीरदार ध्रुव के विरोधी थे और गोविन्द का पक्ष लेकर युद्ध के लिए तत्पर थे। ध्रुव ने उन सबको परास्त किया, और अपने राज्य में सुव्यवस्था स्थापित कर दक्षिण की ओर आक्रमण किया।
- मैसूर के गंग वंश को परास्त कर उसने काञ्जी पर हमला किया, और पल्लवराज को एक बार फिर राष्ट्रकूटों की अधीनता स्वीकृत करने के लिए विवश किया।
- दक्षिण की विजय के बाद वह उत्तर की ओर बढ़ा। सबसे पूर्व भिन्नमाल के गुर्जर प्रतिहार राजा वत्सराज के साथ उसकी मुठभेड़ हुई। वत्सराज परास्त हो गया।
- अब ध्रुव ने कन्नौज पर आक्रमण किया। इस समय कन्नौज का राजा इन्द्रायुध था। वह ध्रुव का सामना नहीं कर सका, और राष्ट्रकूट विजेता की अधीनता को स्वीकृत करने के लिए विवश हुआ।
- ध्रुव राष्ट्रकूट वंश का पहला शासक था जिसने कन्नौज पर अधिकार करने हेतु 'त्रिपक्षीय संघर्ष' में भाग लेकर प्रतिहार नरेश वत्सराज एवं पाल नरेश धर्मपाल को पराजित किया।
- उसने गंगा-यमुना दोआब तक अधिकार कर लिया था।
- कन्नौज के राज्य को अपना वशवर्ती बनाने के उपलक्ष्य में ध्रुव ने गंगा और यमुना को भी अपने राजचिह्न्नों में शामिल कर लिया। इस प्रकार अनेक राज्यों की विजय कर 794 ई. में ध्रुव की मृत्यु हुई।
- ध्रुव को 'धारावर्ष' भी कहा जाता था।
- इसके अतिरिक्त उसकी अन्य उपाधि 'निरुपम', 'कालीवल्लभ' तथा 'श्री वल्लभ' था।
गोविन्द तृतीय
गोविन्द तृतीय ध्रुव का पुत्र एवं राष्ट्रकूट वंश का उत्तराधिकारी था। वह ध्रुव का ज्येष्ठ पुत्र नहीं था, किंतु उसकी योग्यता को दृष्टि में रखकर ही उसके पिता ने उसे ही अपना उत्तराधिकारी नियत किया था। ध्रुव का ज्येष्ठ पुत्र 'स्तम्भ' था, जो गंगवाड़ी (यह प्रदेश पहले गंग वंश के शासन में था, पर अब राष्ट्रकूटों के अधीन हो गया था) में अपने पिता के प्रतिनिधि के रूप में शासन कर रहा था। उसने अपने छोटे भाई के विरुद्ध विद्रोह कर दिया, लेकिन वह सफल नहीं हो सका। शीघ्र ही गोविन्द तृतीय उसे परास्त करने में सफल हुआ। अपने भाई के विरुद्ध आक्रमण करने के अवसर पर ही गोविन्द तृतीय ने वेंगिऔर कांची पर पुनः हमले किए, और इनके राजाओं को वशवर्ती होने के लिए विवश किया। सम्भवतः ये राजा गोविन्द और स्तम्भ के गृहयुद्ध के कारण उत्पन्न परिस्थिति से लाभ उठाकर स्वतंत्र हो गए थे।
विजय अभियान
दक्षिण भारत में अपने विशाल शासन को भली-भाँति स्थापित कर गोविन्द तृतीय ने उत्तरी भारत की ओर रुख़ किया। गोविन्द तृतीय के पिता ध्रुव ने भिन्नमाल के राजा वत्सराज को परास्त कर अपने अधीन कर लिया था। दक्कन में अपनी स्थिति मज़बूत करने के उपरान्त उसने कन्नौज पर अधिपत्य हेतु 'त्रिपक्षीय संघर्ष' में भाग लेकर चक्रायुध एवं उसके संरक्षक धर्मपाल तथा प्रतिहार वंश के नागभट्ट द्वितीय को परास्त कर कन्नौज पर अधिकार कर लिया। जिस समय गोविन्द तृतीय उत्तर भारत के अभियान में व्यस्त था, उस समय उसकी अनुपस्थिति का फ़ायदा उठा कर उसके विरुद्ध पल्लव, पाण्ड्य, चेर एवं गंग शासकों ने एक संघ बनाया, पर 802 ई. के आसपास गोविन्द ने इस संघ को पूर्णतः नष्ट कर दिया।
राष्ट्रकूटों का उत्कर्ष
ध्रुव की मृत्यु के बाद राष्ट्रकूट राज्य में जो अव्यवस्था उत्पन्न हो गई थी, उससे लाभ उठाकर भिन्नमाल के गुर्जर प्रतिहारराजा अपनी शक्ति की पुनः स्थापना के लिए तत्पर हो गए थे। वत्सराज के बाद गुर्जर प्रतिहार वंश का राजा इस समय नागभट्ट था। गोविन्द तृतीय ने उसके साथ युद्ध किया, और 807 ई. में उसे परास्त किया। गुर्जर प्रतिहारों को अपना वशवर्ती बनाकर राष्ट्रकूट राजा ने कन्नौज पर आक्रमण किया। इस समय कन्नौज के राजसिंहासन पर राजा चक्रायुध आरूढ़ था। यह पाल वंशी राजा धर्मपाल की सहायता से इन्द्रायुध के स्थान पर कन्नौज का अधिपति बना था। उसकी स्थिति पाल सम्राट के महासामन्त के जैसी थी, और उसकी अधीनता में अन्य बहुत से राजा सामन्त के रूप में शासन करते थे। चक्रायुध गोविन्द तृतीय के द्वारा परास्त हुआ, और इस विजय यात्रा में राष्ट्रकूट राजा ने हिमालयतक के प्रदेश पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। पालवंशी राजा धर्मपाल भी गोविन्द तृतीय के सम्मुख असहाय था। कन्नौज के राजा चक्रायुध द्वारा शासित प्रदेश पाल साम्राज्य के अंतर्गत थे, पर धर्मपाल में यह शक्ति नहीं थी, कि वह राष्ट्रकूट आक्रमण से उनकी रक्षा कर सकता। राष्ट्रकूटों के उत्कर्ष के कारण पाल वंश का शासन केवल मगध और बंगाल तक ही सीमित रह गया।
अमोघवर्ष प्रथम
अमोघवर्ष एक राष्ट्रकूट राजा था जो स. 814 ई. मेंगोविन्द तृतीय की मृत्यु हो जाने पर मान्यखेट के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ और इसने सम्भवतः 64 साल तक राज किया। यह गोविंद तृतीय का पुत्र था। अमोघवर्ष के किशोर होने के कारण पिता ने मृत्यु के समय करकराज को शासन का कार्य सँभालने के लिये सहायक नियुक्त किया किंतु मंत्री और सामंत धीरे-धीरे विद्रोही और असहिष्णु होते गए। साम्राज्य का गंगवाडी प्रांत स्वतंत्र हो गया और वेंगी के चालुक्यराज विजयादित्य द्वितीय ने आक्रमण कर अमोघवर्ष को गद्दी से उतार तक दिया। परंतु अमोघवर्ष भी साहस छोड़नेवाला व्यक्ति न था और करकराज की सहायता से उसने राष्ट्रकूटों का सिंहासन फिर स्वायत्त कर लिया किंतु इससे राष्ट्रकूटों की शक्ति फिर भी लौटी नहीं और उन्हें बार-बार चोट खानी पड़ी।
- अमोघवर्ष को पूर्वी चालुक्यों एवं गंगो से लम्बी लड़ाई लड़नी पड़ी।
- वह योग्य शासक होने के साथ-साथ जिनसेन 'आदिपुराण' के रचनाकार, महावीरचार्य 'गणितसार-संग्रह' के रचनाकार एवं सक्तायाना के रचनाकार जैसे विद्धानों का 'अमोघवर्ष' आश्रयदाता भी था।
- अमोघवर्ष धार्मिक और विद्याव्यसनी था उसने स्वयं ही कन्नड़ के प्रसिद्ध ग्रंथ '"कविराज मार्ग"' और '"प्रश्नोत्तरमालिका'" की रचना की।
- अमोघवर्ष ने ही 'मान्यखेट' को राष्ट्रकूट की राजधानी बनाया।
- तत्कालीन अरब यात्री सुलेमान ने अमोघवर्ष की गणना विश्व के तत्कालीन चार महान शासकों में की थी।
- वह जैन मतावलम्बी होते हुए भी हिन्दू देवी देवताओं का सम्मान करता था, जैनाचार्य के उपदेश से उसकी प्रवृत्ति जैन हो गई थी।
- अमोघवर्ष महालक्ष्मी का अनन्त भक्त था।
- उसके संजन ताम्रपत्र से समकालीन भारतीय राजनीति पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है, यद्यपि उसमें स्वयं उसकी विजयों का वर्णन अतिरंजित है। वास्तव में अमोघवर्ष के युद्ध प्राय: उसके विपरीत ही गए थे। तथा उसके इस अभिलेख से यह भी पता चलता है कि उसने एक अवसर पर देवी को अपने बाएं हाथ की उंगली चढ़ा दी थी। उसकी तुलना शिव, दधीचिजैसे पौराणिक व्यक्तियों से की जाती है।
- राष्ट्रकूट साम्राज्य में उसके विरोधियों की भी कमी नहीं थी। इस स्थिति से लाभ उठाकर न केवल अनेक अधीनस्थ राजाओं ने स्वतंत्र होने का प्रयत्न किया, अपितु विविध राष्ट्रकूट सामन्तों और राजपुरुषों ने भी उसके विरुद्ध षड़यंत्र आरम्भ कर दिए।
- अमोघवर्ष का मंत्री करकराज था। अपने सामन्तों के षड़यंत्रों के कारण कुछ समय के लिए अमोघवर्ष को राजसिंहासन से भी हाथ धोना पड़ा। पर करकराज की सहायता से उसने राजपद पुनः प्राप्त किया।
- आंतरिक अव्यवस्था के कारण अमोघवर्ष राष्ट्रकूट साम्राज्य को अक्षुण्ण रख सकने में असमर्थ रहा, और चालुक्यों ने राष्ट्रकूटों की निर्बलता से लाभ उठाकर एक बार फिर अपने उत्कर्ष के लिए प्रयत्न किया। इसमें उन्हें सफलता भी मिली।
- अमोघवर्ष के शासन काल में ही कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार राजा मिहिरभोज ने अपने विशाल साम्राज्य का निर्माण किया, और उत्तरी भारत से राष्ट्रकूटों के शासन का अन्त कर दिया।
- गुर्जर प्रतिहार लोग किस प्रकार कन्नौज के स्वामी बने, और उन्होंने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की।
- यह सर्वथा स्पष्ट है, कि अमोघवर्ष के समय में राष्ट्रकूट साम्राज्य का अपकर्ष प्रारम्भ हो गया था।
- अमोघवर्ष ने 814 से 878 ई. तक शासन किया।
- अपने अंतिम दिनों में राजकार्य मंत्रियों और युवराज पर छोड़ वह विरक्त रहने लगा था तथा संभवतः उसकी मृत्यु 878 ई. में हुई।[1]
टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 208 |
कृष्ण द्वितीय
कृष्ण द्वितीय राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष का पुत्र था। पिता की मृत्यु के बाद वह 878 ई. में राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ। उसने लगभग 915 ई. तक शासन किया। अमोघवर्ष के इस उत्तराधिकारी को प्रतिहार एवं चोल शासकों से परास्त होना पड़ा।
- कृष्ण द्वितीय एक कमज़ोर शासक था।
- उसका शासन काल मुख्यत: चालुक्यों के साथ संघर्ष में व्यतीत हुआ।
- वेंगि और अन्हिलवाड़ा में चालुक्यों के जो दो राजवंश इस समय स्थापित हो गए थे, उन दोनों के साथ ही उसके युद्ध हुए।
- अब राष्ट्रकूटों में इतनी शक्ति नहीं रह गई थी कि वे अपने प्रतिस्पर्धी चालुक्यों को पराभूत कर सकते।
- कन्नौज के गुर्जर प्रतिहारों के साथ भी कृष्ण द्वितीय के अनेक युद्ध हुए, पर न गुर्जर प्रतिहार दक्षिणापथ को अपनी अधीनता में ला सके और न ही गोविन्द तृतीय के समान कृष्ण द्वितीय ही हिमालय तक विजय यात्रा कर सका।
इन्द्र तृतीय
इन्द्र तृतीय (915-917 ई.) कृष्ण द्वितीय के बाद राष्ट्रकूट राज्य का स्वामी बना था। यह कृष्ण द्वितीय का पौत्र था। यद्यपि शासन की बागडोर उसके हाथों में सिर्फ़ चार वर्ष तक ही रही थी, किन्तु इतने कम समय में ही इन्द्र तृतीय ने विलक्षण पराक्रम का परिचय दे दिया था।
साम्राज्य विस्तार
इन्द्र तृतीय ने पाल वंश के देवपाल प्रथम को परास्त करके कन्नौज पर अधिकार कर लिया। उसने अपने अल्प शासन काल में ही साम्राज्य को काफ़ी विस्तार प्रदान कर दिया था। उसके समय में ही अल मसूदी अरब से भारत आया था। अल मसूदी ने तत्कालीन राष्ट्रकूट शासकों को 'भारत का सर्वश्रेष्ठ शासक' कहा। इन्द्र तृतीय का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य था- गुर्जर प्रतिहार तथा राजा महीपाल को परास्त करना। कन्नौज के प्रतापी सम्राट मिहिरभोज की मृत्यु 890 ई. में हो चुकी थी और उसके बाद निर्भयराज महेन्द्र (890-907 ई.) ने गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य को बहुत कुछ सम्भाले रखा था, लेकिन महेन्द्र के उत्तराधिकारी महीपाल के समय में कन्नौज की शक्ति घटना प्रारम्भ हो गई थी। इसीलिए राष्ट्रकूट राजा कृष्ण ने भी उस पर अनेक आक्रमण किए थे।
कन्नौज की विजय
इन्द्र तृतीय ने तो कन्नौज की शक्ति को जड़ से ही हिला दिया। उसने एक बहुत बड़ी सेना लेकर उत्तरी भारत पर आक्रमण किया और कन्नौज पर चढ़ाई कर इस प्राचीन नगरी का बुरी तरह से सत्यानाश किया। राजा महीपाल उसके सम्मुख असहाय था। इन्द्र ने प्रयाग तक उसका पीछा किया और राष्ट्रकूट सेनाओं के घोड़ों ने गंगा के जल द्वारा अपनी प्यास को शान्त किया।
अमोघवर्ष द्वितीय
अमोघवर्ष द्वितीय राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष प्रथम का पौत्र था। उसने केवल एक वर्ष (917-918 ई.) राज्य किया।
- गोविन्द चतुर्थ जो कि अमोघवर्ष द्वितीय का भाई था, उसने उसे गद्दी से हटा दिया और स्वयं राजा बन गया।
- 918 से 934 तक गोविन्द चतुर्थ ने राज्य किया।[1]
टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ भारतीय इतिहास कोश |लेखक: सच्चिदानन्द भट्टाचार्य |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 15 |
कृष्ण तृतीय
कृष्ण तृतीय (939-967 ई.) राष्ट्रकूट वंश के सबसे प्रतापी राजाओं में से एक था। राष्ट्रकूट राजा गोविन्द चतुर्थ (918-934 ई.) के बाद अमोघवर्ष तृतीय (934-939) राष्ट्रकूट राज्य का स्वामी बना था। उसके शासन काल की कोई भी घटना उल्लेखनीय नहीं है। उसका उत्तराधिकारी कृष्ण तृतीय बड़ा प्रतापी था। उसने एक बार फिर राष्ट्रकूटों के गौरव को स्थापित किया और दक्षिण व उत्तर दोनों दिशाओं में अपनी शक्ति का विस्तार किया।
साम्राज्य विस्तार एवं उपाधि
उत्तरी भारत पर आक्रमण कर कृष्ण तृतीय ने वहाँ के गुर्जर प्रतिहारों से कालिंजर और चित्रकूट जीत लिए। पर उसकी विजय यात्राओं का प्रधानतया क्षेत्र दक्षिणी भारत था। इस योग्य शासक ने सिंहासनारूढ़ होकर गंगों की सहायता से चोलों को परास्त कर कांची एवं तंजावुर पर अधिकार कर लिया एवं यहाँ पर विजय के उपलक्ष्य में एक स्तम्भ एवं एक मंदिर का निर्माण करवाया। 'कांचीयुम तंजेयमगकोड' (कांची-तन्जौर का विजेता) की उपाधि धारण की। चोलों को परास्त करने के बाद कृष्ण तृतीय रामेश्वर तक पहुँच गया था। राज्यारोहण के समय कृष्ण तृतीय ने 'अकालवर्ष' की उपाधि धारण की।
काञ्जी पर कृष्ण तृतीय ने अपना आधिपत्य स्थापित कर तंजौर की विजय की। तंजौर की विजय को इतना महत्त्वपूर्ण माना गया, कि कृष्ण तृतीय ने 'तंजजयुकोण्ड' (तंजौर विजेता) का विरुद धारण किया। चोल, पांड्य और केरल की विजयों के कारण कन्याकुमारी तक उसका साम्राज्य विस्तृत हो गया, और सिंहल द्वीप (लंका) के राजा ने भी उसे प्रसन्न रखने का प्रयत्न किया। इसमें सन्देह नहीं कि कृष्ण तृतीय एक महान् विजेता था, और उसने एक बार फिर राष्ट्रकूट शक्ति को उत्कर्ष की चरम सीमा पर पहुँचा दिया था।
खोट्टिग अमोघवर्ष
खोट्टिग अमोघवर्ष (967-972 ई.) राष्ट्रकूट शासक कृष्ण तृतीय का छोटा भाई था, जो उसके मरने के बाद 967 ई. में मान्यखेट के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ।
- कृष्ण तृतीय तथा खोट्टिग दोनों ही अमोघवर्ष तृतीयके पुत्र थे, किन्तु उनकी माताएँ संभवत: भिन्न थीं। खोट्टिग की माता का नाम 'कंदक देवी' था।
- खोट्टिग के समय से राष्ट्रकूट साम्राज्य का पतन प्रारंभ हो गया। उसके उत्तर में स्थित मालवा के परमारों ने राष्ट्रकूटों के क्षेत्रों पर आक्रमण करने शुरू कर दिए थे।
- उदयपुर प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि परमार राजा हर्षदेव (सियक द्वितीय) ने खोट्टिग की राज्यलक्ष्मी को युद्ध में बंदी बना लिया था। परमारों के इस आक्रमण के समय खोट्टिग काफ़ी वृद्ध हो चुका था और वह उसका सफलतापूर्वक सामना नहीं कर सका।
- परमार सेनाओं ने नर्मदा नदी को पार कर राष्ट्रकूट राजधानी मान्यखेट को 972 ई. में घेर लिया। मान्यखेट नगर को लूटा गया और उस पर अधिकार कर लिया गया।
- वापस जाते हुए परमार सैनिकों ने सचिवालय में रखी हुई राष्ट्रकूट दानपत्रों की प्रतिलिपियों तक को ले लिया। निश्चय ही राष्ट्रकूट शक्ति का यह भारी अपमान था और खोट्टिग उसके दु:ख से सँभल नहीं सका। सितम्बर 972 ई. में दु:खी जीवन में ही उसका निधन हो गया।
कर्क द्वितीय
कर्क द्वितीय 972-973 ई. तक राष्ट्रकूट वंश का शासक रहा। इस अन्तिम राष्ट्रकूट राजा को चोल शासक तैलप द्वितीय ने परास्त किया।
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