मौर्य वंश ( कार्यकाल 5O7 वर्ष )

मौर्य वंश  

मौर्य राजवंश (322-185 ईसा पूर्व) प्राचीन भारत का एक राजवंश था। इसने 137 वर्ष भारत में राज्य किया। इसकी स्थापना का श्रेय चन्द्रगुप्त मौर्य और उसके मन्त्री आचार्य चाणक्य को दिया जाता है, जिन्होंने नंदवंश के सम्राट घनानन्द को पराजित किया। यह साम्राज्य पूर्व में मगधराज्य में गंगा नदी के मैदानों[1] से शुरू हुआ। इसकी राजधानी पाटलिपुत्र[2] थी।

स्थापना

चन्द्रगुप्त मौर्य ने 322 ईसा पूर्व में मौर्य साम्राज्य की स्थापना की और तेजी से पश्चिम की तरफ़ अपने साम्राज्य का विकास किया। उसने कई छोटे-छोटे क्षेत्रीय राज्यों के आपसी मतभेदों का फ़ायदा उठाया, जो सिकन्दर के आक्रमण के बाद पैदा हो गये थे। उसने यूनानियों को मार भगाया। चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा बुरी तरह पराजित होने के पश्चात् सिकन्दर के सेनापति सेल्यूकस को अपनी कन्या का विवाह चंद्रगुप्त से करना पड़ा। मेगस्थनीज इसी के दरबार में आया था। चंद्रगुप्त की माता का नाम 'मुरा' था। इसी से यह वंश 'मौर्य वंश' कहलाया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  आज का बिहार एवं बंगाल
  2.  आज के पटना शहर के पास
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           मौर्य काल (321–184 ई.पू) शासक
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चंद्रगुप्त मौर्य  

चंद्रगुप्त मौर्य
Chandragupt-Maurya-Stamp.jpg
पूरा नामचक्रवर्ती सम्राट चन्द्र गुप्त मौर्य
जन्म340 ई. पू.
जन्म भूमिमगधभारत
मृत्यु तिथि298 ई पू (42 वर्ष में)
मृत्यु स्थानश्रवण बेल्गोला, कर्नाटक
पिता/माता"मुरा या मोरा" (माता)
संतानबिन्दुसार
उपाधिसम्राट
राज्य सीमासम्पूर्ण भारत (लगभग)
शासन काल322 से 298 ई. पू.
शा. अवधि24 वर्ष (लगभग)
राज्याभिषेक322 ई.पू.
धार्मिक मान्यतावैदिक और जैन
प्रसिद्धिभारत का प्रथम 'ऐतिहासिक सम्राट'
राजधानीपाटलिपुत्र
पूर्वाधिकारीधनानंद
वंशमौर्य वंश
संबंधित लेखचाणक्य . अशोक
Disamb2.jpgचंद्रगुप्तएक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- चंद्रगुप्त (बहुविकल्पी)

चक्रवर्ती सम्राट चन्द्र गुप्त मौर्य (शासनकाल: 322 से 298 ई. पू.तक) की गणना भारत के महानतम शासकों में की जाती है। उसकी महानता की सूचक अनेक उपाधियाँ हैं और उसकी महानता कई बातों में अद्वितीय भी है। वह भारत के प्रथम ‘ऐतिहासिक’ सम्राट के रूप में हमारे सामने आता है, इस अर्थ में कि वह भारतीय इतिहास का पहला सम्राट है जिसकी ऐतिहासिकता प्रमाणित कालक्रम के ठोस आधार पर सिद्ध की जा सकती है।[1]

आरम्भिक जीवन

चंद्रगुप्त के प्रारम्भिक जीवन के बारे में जानकारी हमें बौद्धकथाओं से प्राप्त होती है। इन कथाओं का स्रोत मुख्यत: दो रचनाओं में मिलता है:

  1. महावंस टीका, जिसे वंसत्थप्पकासिनी भी कहते हैं (जिसकी रचना लगभग 10वीं शताब्दी ईसवी के मध्य हुई थी) और
  2. महाबोधिवंस, जिसके रचयिता उपतिस्स हैं (लगभग 10वीं शताब्दी ईसवी के उत्तरार्ध में)।

इन दोनों ही ग्रन्थों का आधार, सीहलट्ठकथा तथा उत्तरविहारट्ठकथा नामक प्राचीन ग्रन्थ हैं। सीहलट्ठकथा के बारे में कहा जाता है कि उसकी रचना थेर महिंद (अशोकका पुत्र) तथा उनके साथ मगध से आए हुए अन्य भिक्षुओं ने की थी, जिन्हें संघ के प्रधान ने धर्मप्रचार के लिए लंकाभेजा था।[2]

जन्म और वंश

इस संबंध में विभिन्न मत हैं:-

  • चंद्रगुप्त के वंश के सम्बन्ध में ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैनपरम्पराओं व अनुश्रुतियों के आधार पर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वह किसी कुलीन घराने से सम्बन्धित नहीं था। विदेशी वृत्तांतों एवं उल्लेखों से भी स्थिति कुछ अस्पष्ट ही बनी रहती है। चंद्रगुप्त के वंश के समान उसके आरम्भिक जीवन के पुनर्गठन का भी आधार किंवदंतियाँ एवं परम्पराएँ ही अधिक हैं और ठोस प्रमाण कम हैं। इस सम्बन्ध में चाणक्यचंद्रगुप्त कथा का सारांश उल्लेखनीय है। जिसके अनुसार नंद वंश द्वारा अपमानित किए जाने पर चाणक्य ने उसे समूल नष्ट करने का प्रण किया। संयोगवश उसकी भेंट चंद्रगुप्त से हो गई और वह उसे तक्षशिला ले गया।[3]
  • धुंढिराज[4] के मतानुसार चंद्रगुप्त का पिता मौर्य था और सर्वार्थसिद्धि ने अपना सेनापति अपने नंद पुत्रों को न बनाकर मौर्य को बनाया था, इस पर नंद बंधुओं ने छल से मौर्य तथा उसके सब पत्रों को मरवा दिया, केवल चंद्रगुप्त भाग निकला। नंदों का एक दूसरा शत्रु चाणक्य भी था। समान शत्रुता के कारण ये दोनों मित्र बन गए।
  • मौर्यवंश का संस्थापक। उसके माता-पिता के नाम ठीक-ठीक ज्ञात नहीं हैं। पुराणों के अनुसार वह मगध के राजा नन्द का उपपुत्र था, जिसका जन्म मुरा नामक शूद्रा दासी से हुआ था। बौद्ध और जैन सूत्रों से पता चलता है। कि चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म पिप्पलिवन के मोरिय क्षत्रिय कुल में हुआ था। जो भी हो चन्द्रगुप्त प्रारंभ से ही बहुत साहसी व्यक्ति था।[5]
  • विशाखदत्त के नाटक 'मुद्राराक्षस' में चंद्रगुप्त को नंदपुत्र न कहकर मौर्यपुत्र कहा गया है। फिर भी उसे ‘नंदवंश की सन्तान’ कहा गया है, क्योंकि वह सर्वार्थसिद्धि के पुत्र मौर्य का बेटा था और सर्वार्थसिद्धि नौ नंदों का पिता था और स्वंय नंदवंश की सन्तान था। इस बूढ़े राजा को भी नंद कहा गया है। नाटक में दिखाया गया है कि राक्षस के परामर्श से वह पाटलिपुत्र छोड़कर वन में भाग गया था क्योंकि चंद्रगुप्त तथा चाणक्य ने एक-एक करके उसके सभी पुत्रों (नौ नंदों को) मरवा डाला था। फिर भी चंद्रगुप्त को अपने पिता का हत्यारा नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसे कहीं नंदपुत्र नहीं कहा गया है। वह उन नौ नंदों में से किसी की भी सन्तान नहीं था। उसके लिए जिस दूसरे शब्द ‘मौर्यपुत्र’ का प्रयोग किया गया, उसके कारण वह इस जघन्य अपराध के दोष से मुक्त हो गया है[6][7]
  • वृत्तांतों के अनुसार चंद्रगुप्त का जन्म मोरिय नामक क्षत्रिय जाति में हुआ था जिनका शाक्यों के साथ सम्बन्ध था। अपनी जन्मभूमि छोड़कर चली आने वाली मोरिय जाति का मुखिया चंद्रगुप्त का पिता था। दुर्भाग्यवश वह सीमांत पर एक झगड़े में मारा गया और उसका परिवार अनाथ रह गया। उसकी अबला विधवा अपने भाइयों के साथ भागकर पुष्यपुर (कुसुमपुर पाटलिपुत्र) नामक नगर में पहुँची, जहाँ उसने चंद्रगुप्त को जन्म दिया। सुरक्षा के विचार से इस अनाथ बालक को उसके मामाओं ने एक गोशाला में छोड़ दिया, जहाँ एक गड़रिए ने अपने पुत्र की तरह उसका लालन-पालन किया और जब वह बड़ा हुआ तो उसे एक शिकारी के हाथ बेच दिया, जिसने उसे गाय-भैंस चराने के काम पर लगा दिया। कहा जाता है कि एक साधारण ग्रामीण बालक चंद्रगुप्त ने राजकीलम नामक एक खेल का आविष्कार करके जन्मजात नेता होने का परिचय दिया। इस खेल में वह राजा बनता था और अपने साथियों को अपना अनुचर बनाता था। वह राजसभा भी आयोजित करता था जिसमें बैठकर वह न्याय करता था। गाँव के बच्चों की एक ऐसी ही राजसभा में चाणक्य ने पहली बार चंद्रगुप्त को देखा था।[8]
  • कुछ लोग चंद्रगुप्त को मुरा नाम की शूद्र स्त्री के गर्भ से उत्पन्न नंद सम्राट की संतान बताते हैं पर बौद्ध और जैन साहित्य के अनुसार यह मौर्य (मोरिय) कुल में जन्मा था और नंद राजाओं का महत्त्वाकांक्षी सेनापति था। चंद्रगुप्त के वंश और जाति के सम्बन्ध में विद्वान् एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वानों ने ब्राह्मण ग्रंथोंमुद्राराक्षसविष्णुपुराण की मध्यकालीन टीका तथा 10वीं शताब्दी की धुण्डिराज द्वारा रचित मुद्राराक्षस की टीका के आधार पर चंद्रगुप्त को शूद्र माना है। चंद्रगुप्त के वंश के सम्बन्ध में ब्राह्मणबौद्धएवं जैन परम्पराओं व अनुश्रुतियों के आधार पर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वह किसी कुलीन घराने से सम्बन्धित नहीं था। विदेशी वृत्तांतों एवं उल्लेखों से भी स्थिति कुछ अस्पष्ट ही बनी रहती है।[9]
  • बौद्ध रचनाओं में कहा गया है कि ‘नंदिन’ के कुल का कोई पता नहीं चलता (अनात कुल) और चंद्रगुप्त को असंदिग्ध रूप से अभिजात कुल का बताया गया है। चंद्रगुप्त के बारे में कहा गया है कि वह मोरिय नामक क्षत्रिय जाति की संतान था; मोरिय जाति शाक्यों की उस उच्च तथा पवित्र जाति की एक शाखा थी, जिसमें महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था। कथा के अनुसार, जब अत्याचारी कोसल नरेश विडूडभ ने शाक्यों पर आक्रमण किया तब मोरिय अपनी मूल बिरादरी से अलग हो गए और उन्होंने हिमालय के एक सुरक्षित स्थान में जाकर शरण ली। यह प्रदेश मोरों के लिए प्रसिद्ध था, जिस कारण वहाँ आकर बस जाने वाले ये लोग मोरिय कहलाने लगे, जिनका अर्थ है मोरों के स्थान के निवासी। मोरिय शब्द ‘मोर’ से निकला है, जो संस्कृत के मयूर शब्द का पालि पर्याय है। 
    एक और कहानी भी है जिसमें मोरिय नगर नामक एक स्थान का उल्लेख मिलता है। इस शहर का नाम मोरिय नगर इसलिए रखा गया था कि वहाँ की इमारतें मोर की गर्दन के रंग की ईंटों की बनी हुई थीं। जिन लोगों ने इस नगर का निर्माण किया था, वे मोरिय कहलाए। महाबोधिवंस [10] में कहा गया है कि ‘कुमार’ चंद्रगुप्त, जिसका जन्म राजाओं के कुल में हुआ था (नरिंद-कुलसंभव), जो मोरिय नगर का निवासी था, जिसका निर्माण साक्यपुत्तों ने किया था, चाणक्य नामक ब्राह्मण (द्विज) की सहायता से पाटलिपुत्र का राजा बना। 
    महाबोधिवंस में यह भी कहा गया है कि ‘चंद्रगुप्त का जन्म क्षत्रियों के मोरिय नामक वंश में’ हुआ था (मोरियनं खत्तियनं वंसे जातं)। बौद्धों के दीघ निकाय नामक ग्रन्थ में[11] पिप्पलिवन में रहने वाले मोरिय नामक एक क्षत्रिय वंश का उल्लेख मिलता है। दिव्यावदान[12]में बिन्दुसार (चंद्रगुप्त के पुत्र) के बारे में कहा गया है कि उसका क्षत्रिय राजा के रूप में विधिवत अभिषेक हुआ था (क्षत्रिय-मूर्धाभिषिक्त) और अशोक (चंद्रगुप्त के पौत्र) को क्षत्रिय कहा गया है।[13]
  • एक मत कथासरित्सागर में उपलब्ध होता है। इसके अनुसार चंद्रगुप्त नन्द राजा का ही पुत्र था, और उसके अन्य कोई सन्तान नहीं थी।
  • चंद्रगुप्त के विषय में महावंश में पाये मतानुसार अनुसार चंद्रगुप्त पिप्पलिवन के मोरिय गण का कुमार था। नन्द के साथ उसका कोई सम्बन्ध नहीं था। मोरिय गण वज्जि-महाजनपद के पड़ोस में स्थित था। उत्तरी बिहार के सब गणराज्य कौशल और मगध के साम्राज्यवाद के शिकार हो गए थे, और मोरिय गण भी मगध की अधीनता में आ गया था। इस गण की एक राजमहिषी पाटलिपुत्र में छिपकर जीवन व्यतीत कर रही थी। वहीं पर उसने चंद्रगुप्त को जन्म दिया। चंद्रगुप्त कहीं मगध के राजकर्मचारियों के हाथों में न पड़ जाए, इसलिए उसने अपने नवजात शिशु को ग्वाले के सुपुर्द कर दिया। अपनी आयु के अन्य ग्वाल-बालकों के साथ मोरिय चंद्रगुप्त का भी पालन होने लगा।

चंद्रगुप्त और चाणक्य की भेंट

चाणक्य ने अपनी दिव्यदृष्टि से तुरन्त इस ग्रामीण अनाथ बालक में राजत्व की प्रतिभा तथा चिह्न देखे और वहीं पर 1,000 कार्षापण देकर उसे उसके पालक-पिता से ख़रीद लिया। उस समय चंद्रगुप्त आठ या नौ वर्ष का बालक रहा होगा। चाणक्य जिसे तक्षशिला नामक नगर का निवासी (तक्कसिलानगर-वासी) बताया गया है, बालक को लेकर अपने नगर लौटा और 7 या 8 वर्ष तक उस प्रख्यात विद्यापीठ में उसे शिक्षा दिलाई, जहाँ जातककथाओं के अनुसार, उस समय की समस्त ‘विधाएँ तथा कलाएँ’ सिखाई जाती थीं। वहाँ चाणक्य ने उसे अप्राविधिक विषयों और व्यावहारिक तथा प्राविधिक कलाओं की भी सर्वांगीण शिक्षा दिलाई[14][15]

पालि स्रोतों से प्राप्त चंद्रगुप्त के प्रारम्भिक जीवन के इस विवरण से जस्टिन के इस कथन की भी पुष्टि होती है कि उसका जन्म एक मामूली घराने में हुआ था।[16]

मगध के राजा जाति-नियमों को वैसे ही विशेष महत्त्व नहीं देते थे; मौर्य तो आदिवासी मूल अथवा मिश्रित वंश के थे, यद्यपि उनका आर्यीकरण हो चुका था। मौर्य (पालि: मोरिय) नाम मोर टोटेम का सूचक है, यह वैदिक-आर्य नाम नहीं हो सकता।[17]

जो भी हो चन्द्रगुप्त प्रारंभ से ही बहुत साहसी व्यक्ति था। जब वह किशोर ही था, उसने पंजाब में पड़ाव डाले हुए यवन (यूनानी) विजेता सिकंदर से भेंट की। उसने अपनी स्पष्टवादिता से सिकंदर को नाराज़ कर दिया। सिकंदर ने उसे बंदी बना लेने का आदेश दिया, लेकिन वह अपने शौर्य का प्रदर्शन करता हुआ सिकंदर के शिकंजे से भाग निकला और कहा जाता है। कि इसके बाद ही उसकी भेंट तक्षशिला के एक आचार्य चाणक्य या कौटिल्य-से हुई।[18]

चंद्रगुप्त की शिक्षा

जातककथाओं से हमें पता चलता है कि उस समय के राजा अपने राजकुमारों को विद्योपार्जन के लिए तक्षशिला भेजा करते थे, जहाँ विश्व-विख्यात अध्यापक थे। इन कथाओं में हम पढ़ते हैं : "सारे भारत से क्षत्रियों तथा ब्राह्मणों के पुत्र इन अध्यापकों से विभिन्न कलाएँ सीखने आते थे।" तक्षशिला प्राथमिक शिक्षा का ही नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा का केन्द्र भी था। इस बात का उल्लेख मिलता है कि वहाँ बालकों को 16 वर्ष की अवस्था में अर्थात् ‘किशोरावस्था में प्रवेश करने पर’ भरती किया जाता था। इससे बड़ी अवस्था के छात्र अथवा गृहस्थ लोग भी यहाँ शिक्षा प्राप्त करते थे। वे अपने रहने आदि का प्रबंध स्वंय करते थे। हमें तक्षशिला के एक ऐसे अध्यापक का भी उल्लेख मिलता है, जिसकी पाठशाला में केवल राजकुमार ही पढ़ते थे, "उस समय भारत में इन राजकुमारों की संख्या 101 थी।" वहीं जिन विषयों की शिक्षा दी जाती थी, उनमें तीन वेदों तथा 18 ‘सिप्पों’ अर्थात् शिल्पों का उल्लेख मिलता है, जिनमें धनुर्विद्या (इस्सत्थ-सिप्प), आखेट तथा हाथियों से सम्बन्धित ज्ञान (हत्थिसुत्त) का उल्लेख किया गया है, जिन्हें राजकुमारों के लिए उपयुक्त समझा जाता था। सिद्धान्त तथा व्यवहार दोनों ही की शिक्षा दी जाती थी।

तक्षशिला अपनी विधिशास्त्र, चिकित्सा विज्ञान तथा सैन्यविद्या की अलग-अलग पाठशालाओं के लिए प्रख्यात था। तक्षशिला की सैनिक अकादमी का भी उल्लेख मिलता है, जिसमें 103 राजकुमार शिक्षा पाते थे। एक जगह पर यह विवरण मिलता है कि किस प्रकार एक शिष्य को सैन्यविद्या की शिक्षा समाप्त कर लेने के बाद उसके गुरु ने प्रमाणपत्र के रूप में स्वंय अपनी "तलवार, एक धनुष और बाण, एक कवच तथा एक हीरा" दिया और उससे कहा कि वह उसके स्थान पर सैन्यविद्या की शिक्षा प्राप्त करने वाले 500 शिष्यों की पाठशाला के प्रधान का पद ग्रहण करे, क्योंकि वह वृद्ध हो गया है और अवकाश ग्रहण करना चाहता है[19]। चाणक्य अपने अल्पवयस्क शिष्य की शिक्षा का इससे अच्छा कोई दूसरा प्रबंध नहीं कर सकता था कि उसे विद्योपार्जन के लिए तक्षशिला में भरती करा दे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक:राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 13 |
  2.  चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक:राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 30 |
  3.  प्राचीन भारत का इतिहास |लेखक: द्विजेन्द्र नारायण झा, कृष्ण मोहन श्रीमाली |प्रकाशक: दिल्ली विश्वविद्यालय |पृष्ठ संख्या: 174-175 |
  4.  विशाखदत्त के प्रसिद्ध नाटक मुद्राराक्षस का टीकाकार
  5.  भारतीय इतिहास कोश |लेखक: सच्चिदानंद भट्टाचार्य |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 143-144 |
  6.  सी.डी. चटर्जी | इंडियन कल्चर में आब्ज़र्वेशंस ऑन दि बृहत्कथा | खंड 1- पृष्ठ 221
  7.  चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक:राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 26 |
  8.  चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक:राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 30 |
  9.  प्राचीन भारत का इतिहास |लेखक: द्विजेन्द्र नारायण झा, कृष्ण मोहन श्रीमाली |प्रकाशक: दिल्ली विश्वविद्यालय |पृष्ठ संख्या: 174 |
  10.  सम्पादक: स्ट्रांग, पृष्ठ 98
  11.  दीघ निकाय 2,167
  12.  सम्पादक: कावेल, पृष्ठ 370
  13.  चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक:राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 28 |
  14.  बहुसच्चाभावंच; उग्गहितसिप्पकंच
  15.  चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक:राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 30 |
  16.  चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक:राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 32 |
  17.  प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता |लेखक:दामोदर धर्मानंद कोसंबी |अनुवादक: गुणाकर मुले |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 174 |
  18.  भारतीय इतिहास कोश |लेखक: सच्चिदानंद भट्टाचार्य |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 143 |
  19.  विस्तृत विवरण के लिए राधाकुमुद मुखर्जी की "ऐन्शेंट इंडियन एजुकेशन", मैकमिलंस, लंदन, नामक रचना का 19वाँ अध्याय देखिए।
  20.  वुड्ढपटिपाटिया
  21.  मुद्राराक्षस में मलय का उल्लेख मिलता है
  22.  रज्जम वा देंतु युद्धं वा
  23.  सिंहली भाषा में महावंस टीका का मूलपाठ, जो श्री सी.डी. चटर्जी ने श्री राधाकुमुद मुखर्जी को पढ़कर बताया [भारतकोश टिप्पणी]
  24.  महावंस टीका
  25.  महावंस टीका
  26.  ऐय्यंगर कृत-बिगिनिंग्स ऑफ़ साउथ इंडियन हिस्ट्री, पृष्ठ 89
  27.  चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक:राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 36 |
  28.  चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक:राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 40 |
  29.  Plutarch: Life of Alexander (अंग्रेज़ी) (एच टी एम एल) penelope.uchicago.edu। अभिगमन तिथि: 18 अक्टूबर, 2011।
  30.  महावंश टीका, पृष्ठ.123, परिशिष्ट1
  31.  चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक:राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 51 |
  32.  VIII, 253-54
  33.  कैंब्रिज हिस्ट्री, पृ.435
  34.  चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक:राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 53 |
  35.  'एंड्रोकोट्टस' और 'सैंड्रोकोट्टस' दोनों चन्द्रगुप्त के ही नाम हैं जो यूनानी ग्रंथों में पाये जाते हैं।
  36.  लाइव्स, अध्याय 42
  37.  चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक:राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 54 |
  38.  चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक:राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 174 |
  39.  वारमिंगटन. कामर्स बिटविन रोमन एंपायर ऐंड इंडिया, पृष्ठ 151
  40.  चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक:राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 55 |
  41.  भारत का इतिहास |लेखक: रोमिला थापर |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 62 |
  42.  चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक:राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 174 |
  43.  भारत का इतिहास |लेखक: रोमिला थापर |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 62 |

बिन्दुसार  

बिन्दुसार
बिन्दुसार कालीन मुद्रा (कार्षापण)
पूरा नामसम्राट बिन्दुसार
जन्मलगभग 320 ई.पू.
मृत्यु तिथिलगभग 272 ई.पू. (52 वर्ष)
पिता/माताचंद्रगुप्त मौर्य और दुर्धरा
पति/पत्नीसुभद्रांगी
संतानअशोक
उपाधिसम्राट
राज्य सीमासम्पूर्ण भारत (लगभग)
शासन काल298 से 272 ई.पू.
शा. अवधि26 वर्ष (लगभग)
राज्याभिषेक298 ई.पू.
धार्मिक मान्यताआजीवक और जैन
पूर्वाधिकारीचन्द्रगुप्त मौर्य
उत्तराधिकारीअशोक
राजघरानामौर्य
वंशमौर्य वंश
संबंधित लेखचन्द्रगुप्त मौर्यचाणक्यअशोक आदि
अन्य जानकारीयूनानी लेखों के अनुसार बिन्दुसार का नाम 'अमित्रकेटे' था। विद्वानों के अनुसार अमित्रकेटे का संस्कृत रूप है अमित्रघात या अमित्रखाद[1]

बिन्दुसार मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य का पुत्र था, जो 297-98 ईसा पूर्व में शासक बना और उसने 272 ईसा पूर्व तक राजकाज किया। बिन्दुसार को 'अमित्रघात' भी कहा जाता है। यूनानी इतिहासकार उसे 'अमित्रोचेट्स' के नाम से पुकारते हैं। बिन्दुसार ने अपने पिता द्वारा जीते गए क्षेत्रों को पूर्ण रूप से अक्षुण्ण रखा था। बिन्दुसार की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अशोक सम्राट बना। बिन्दुसार को यूनानियों ने 'अमित्रोचेट्स' कहा, जो संभवत: संस्कृत शब्द 'अमित्रघट' से लिया गया है, जिसका अर्थ है, 'शत्रुनाशक'। यह उपाधि दक्षिण में उनके सफल सैनिक अभियानों के लिये दी गई होगी, क्योंकि उत्तर भारत पर तो उनके पिता चंद्रगुप्त मौर्यने पहले ही विजय प्राप्त कर ली थी। बिंदुसार का विजय अभियान कर्नाटक के आसपास जाकर रूका और वह भी संभवत: इसलिये कि दक्षिण के चोलपांड्य व चेर सरदारों और राजाओं के मौर्यो से अच्छे संबंध थे। इसका पुत्र अशोक महान था।


बिन्दुसार  

बिन्दुसार
बिन्दुसार कालीन मुद्रा (कार्षापण)
पूरा नामसम्राट बिन्दुसार
जन्मलगभग 320 ई.पू.
मृत्यु तिथिलगभग 272 ई.पू. (52 वर्ष)
पिता/माताचंद्रगुप्त मौर्य और दुर्धरा
पति/पत्नीसुभद्रांगी
संतानअशोक
उपाधिसम्राट
राज्य सीमासम्पूर्ण भारत (लगभग)
शासन काल298 से 272 ई.पू.
शा. अवधि26 वर्ष (लगभग)
राज्याभिषेक298 ई.पू.
धार्मिक मान्यताआजीवक और जैन
पूर्वाधिकारीचन्द्रगुप्त मौर्य
उत्तराधिकारीअशोक
राजघरानामौर्य
वंशमौर्य वंश
संबंधित लेखचन्द्रगुप्त मौर्यचाणक्यअशोक आदि
अन्य जानकारीयूनानी लेखों के अनुसार बिन्दुसार का नाम 'अमित्रकेटे' था। विद्वानों के अनुसार अमित्रकेटे का संस्कृत रूप है अमित्रघात या अमित्रखाद[1]

बिन्दुसार मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य का पुत्र था, जो 297-98 ईसा पूर्व में शासक बना और उसने 272 ईसा पूर्व तक राजकाज किया। बिन्दुसार को 'अमित्रघात' भी कहा जाता है। यूनानी इतिहासकार उसे 'अमित्रोचेट्स' के नाम से पुकारते हैं। बिन्दुसार ने अपने पिता द्वारा जीते गए क्षेत्रों को पूर्ण रूप से अक्षुण्ण रखा था। बिन्दुसार की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अशोक सम्राट बना। बिन्दुसार को यूनानियों ने 'अमित्रोचेट्स' कहा, जो संभवत: संस्कृत शब्द 'अमित्रघट' से लिया गया है, जिसका अर्थ है, 'शत्रुनाशक'। यह उपाधि दक्षिण में उनके सफल सैनिक अभियानों के लिये दी गई होगी, क्योंकि उत्तर भारत पर तो उनके पिता चंद्रगुप्त मौर्यने पहले ही विजय प्राप्त कर ली थी। बिंदुसार का विजय अभियान कर्नाटक के आसपास जाकर रूका और वह भी संभवत: इसलिये कि दक्षिण के चोलपांड्य व चेर सरदारों और राजाओं के मौर्यो से अच्छे संबंध थे। इसका पुत्र अशोक महान था।

जीवन परिचय

चंद्रगुप्त की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र बिन्दुसार सम्राट बना। यूनानी लेखों के अनुसार इसका नाम अमित्रकेटे था। विद्वानों के अनुसार अमित्रकेटे का संस्कृत रूप है अमित्रघात या अमित्रखाद (शत्रुओं का नाश करने वाला)। सम्भवतः यह बिन्दुसार का विरुद रहा होगा। तिब्बती लामा तारनाथ तथा जैन अनुश्रुति के अनुसार चाणक्य बिन्दुसार का भी मंत्री रहा। चाणक्य ने 16 राज्य के राजाओं और सामंतों का नाश किया और बिन्दुसार को पूर्वी समुद्र से पश्चिमी समुद्र पर्यन्त भू-भाग का अधीश बनाया। हो सकता है कि चंद्रगुप्त की मृत्यु के पश्चात् कुछ राज्यों ने मौर्य सत्ता के विरुद्ध विद्रोह किया हो। चाणक्य ने सफलतापूर्वक उनका दमन किया। दिव्यावदान में उत्तरापथ की राजधानी तक्षशिला में ऐसे ही विद्रोह का उल्लेख है। इस विद्रोह को शान्त करने के लिए बिन्दुसार ने अपने पुत्र अशोक को भेजा था। इसके पश्चात् अशोक खस देश गया। 'खस' सम्भवतः नेपाल के आस-पास के प्रदेश के खस रहे होंगे। तारनाथ के अनुसार खस्या और नेपाल के लोगों ने विद्रोह किया और अशोक ने इन प्रदेशों को जीता।

विदेशों के साथ अशोक ने शान्ति और मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखा। सेल्यूकस वंश के राजाओं तथा अन्य यूनानी शासकों के साथ चंद्रगुप्त के समय के सम्बन्ध बने रहे। स्टैवो के अनुसार सेल्यूकस के उत्तराधिकारी एण्टियोकस प्रथम ने अपना राजदूत डायमेकस बिन्दुसार के दरबार में भेजा। प्लिनी के अनुसार टोलमी द्वितीय फिलेडेल्फस ने डायोनियस को बिन्दुसार के दरबार में नियुक्त किया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  (शत्रुओं का नाश करने वाला)
  2.  चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक:राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 57 |

अशोक  

अशोक विषय सूची
अशोक
अशोक
पूरा नामराजा[1] प्रियदर्शी देवताओं का प्रिय अशोक मौर्य
अन्य नाम'देवानाम्प्रिय' एवं 'प्रियदर्शी'[2]
जन्म304 ईसा पूर्व (संभावित)
जन्म भूमिपाटलिपुत्र (पटना)
मृत्यु तिथि232 ईसा पूर्व
मृत्यु स्थानपाटलिपुत्र, पटना
पिता/माताबिन्दुसारसुभद्रांगी (उत्तरी परम्परा), रानी धर्मा (दक्षिणी परम्परा)
पति/पत्नी(1) देवी (वेदिस-महादेवी शाक्यकुमारी), (2) कारुवाकी (द्वितीय देवी तीवलमाता), (3) असंधिमित्रा-अग्रमहिषी, (4) पद्मावती, (5) तिष्यरक्षिता[3]
संतानदेवी से- पुत्र महेन्द्रपुत्री संघमित्रा और पुत्री चारुमती, कारुवाकी से- पुत्र तीवर, पद्मावती से- पुत्र कुणाल (धर्मविवर्धन) और भी कई पुत्रों का उल्लेख है।
उपाधिराजा[1], 'देवानाम्प्रिय' एवं 'प्रियदर्शी'
राज्य सीमासम्पूर्ण भारत
शासन कालईसापूर्व 274[3] - 232
शा. अवधि42 वर्ष लगभग
राज्याभिषेक272[4] और 270[3] ईसा पूर्व के मध्य
धार्मिक मान्यताहिन्दू धर्मबौद्ध धर्म
प्रसिद्धिअशोक महान, साम्राज्य विस्तारक, बौद्ध धर्म प्रचारक
युद्धसम्राट बनने के बाद एक ही युद्ध लड़ा 'कलिंग-युद्ध' (262-260 ई.पू. के बीच)
निर्माणभवन, स्तूप, मठ और स्तंभ
सुधार-परिवर्तनशिलालेखों द्वारा जनता में हितकारी आदेशों का प्रचार
राजधानीपाटलिपुत्र (पटना)
पूर्वाधिकारीबिन्दुसार (पिता)
वंशमौर्य
संबंधित लेखअशोक के शिलालेखमौर्य काल आदि

अशोक (अंग्रेज़ी:Ashok) अथवा 'असोक' (काल ईसा पूर्व 269 - 232) प्राचीन भारत में मौर्य राजवंश का राजा था। अशोक का देवानाम्प्रिय एवं प्रियदर्शी आदि नामों से भी उल्लेख किया जाता है। उसके समय मौर्य राज्य उत्तर में हिन्दुकुश की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी के दक्षिण तथा मैसूरकर्नाटक तक तथा पूर्व में बंगाल से पश्चिम में अफ़ग़ानिस्तान तक पहुँच गया था। यह उस समय तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य था। सम्राट अशोक को अपने विस्तृत साम्राज्य के बेहतर कुशल प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जाना जाता है। जीवन के उत्तरार्ध में अशोक गौतम बुद्ध का भक्त हो गया और उन्हीं[5] की स्मृति में उसने एक स्तम्भ खड़ा कर दिया जो आज भी नेपाल में उनके जन्मस्थल - लुम्बिनी में 'मायादेवी मन्दिर' के पास अशोक स्‍तम्‍भ के रूप में देखा जा सकता है। उसने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा श्रीलंकाअफ़ग़ानिस्तानपश्चिम एशियामिस्र तथा यूनान में भी करवाया। अशोक के अभिलेखों में प्रजा के प्रति कल्याणकारी दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति की गई है।

जीवन परिचय

जन्म

अशोक प्राचीन भारत के मौर्य सम्राट बिंदुसार का पुत्र था। जिसका जन्म लगभग 304 ई. पूर्व में माना जाता है। लंकाकी परम्परा में [6] बिंदुसार की सोलह पटरानियों और 101 पुत्रों का उल्लेख है। पुत्रों में केवल तीन के नामोल्लेख हैं, वे हैं - सुसीम [7] जो सबसे बड़ा था, अशोक और तिष्य। तिष्य अशोक का सहोदर भाई और सबसे छोटा था।[8]भाइयों के साथ गृह-युद्ध के बाद 272 ई. पूर्व अशोक को राजगद्दी मिली और 232 ई. पूर्व तक उसने शासन किया। इन्हें भी देखेंअशोक का परिवारबिंदुसार एवं चंद्रगुप्त मौर्य

देवानाम्प्रिय प्रियदर्शी के अर्थ

'देवानाम्प्रिय प्रियदर्शी' इस वाक्यांश में बी.ए. स्मिथ के मतानुसार 'देवानाम्प्रिय' आदरसूचक पद है और इसी अर्थ में हमने भी इसको लिया है किंतु देवानाम्प्रिय शब्द (देव-प्रिय नहीं) पाणिनी के एक सूत्र[9] के अनुसार अनादर का सूचक है। कात्यायन[10] इसे अपवाद में रखा है। पतंजलि[11] और यहाँ तक कि काशिका (650 ई.) भी इसे अपवाद ही मानते हैं। पर इन सबके उत्तरकालीन वैयाकरण भट्टोजिदीक्षितइसे अपवाद में नहीं रखते। वे इसका अनादरवाची अर्थ 'मूर्ख' ही करते हैं। उनके मत से 'देवानाम्प्रिय ब्रह्मज्ञान से रहित उस पुरुष को कहते हैं जो यज्ञ और पूजा से भगवान को प्रसन्न करने का यत्न करता है। जैसे- गाय दूध देकर मालिक को।[12] इस प्रकार एक उपाधि जो नंदोंमौर्यों और शुंगों के युग में आदरवाची थी। उस महान् राजा के प्रति ब्राह्मणों के दुराग्रह के कारण अनादर सूचक बन गई।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ↑ 1.0 1.1 यह ध्यान देने योग्य बात है कि यद्यपि अशोक सर्वोच्च शासक था पर वह अपने को सिर्फ 'राजा' शब्द से निर्दिष्ट करता है। 'महाराजा' और 'राजाधिराज' जैसी भारी-भरकम या आडम्बर-पूर्ण उपाधियाँ, जो अलग-अलग या मिलाकर प्रयुक्त की जाती हैं, अशोक के समय में प्रचलित नहीं हुई थीं। 'अशोक' | लेखक: डी.आर. भंडारकर | प्रकाशक: एस. चन्द एन्ड कम्पनी | पृष्ठ संख्या:6
  2.  'अशोक' | लेखक: डी.आर. भंडारकर | प्रकाशक: एस. चन्द एन्ड कम्पनी | पृष्ठ संख्या:5
  3. ↑ 3.0 3.1 3.2 'अशोक' | लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी | प्रकाशक: मोतीलाल बनारसीदास | पृष्ठ संख्या: 8-9
  4.  द्विजेन्द्र नारायण झा, कृष्ण मोहन श्रीमाली “मौर्यकाल”, प्राचीन भारत का इतिहास, द्वितीय संस्करण (हिंदी), दिल्ली: हिंदी माध्यम कार्यांवय निदेशालय, 178।
  5.  महात्मा बुद्ध
  6.  जिसका आख्यान 'दीपवंश' और 'महावंश' में हुआ है
  7.  उत्तरी परम्पराओं का सुसीम
  8.  मुखर्जी, राधाकुमुद अशोक (हिंदी)। नई दिल्ली: मोतीलाल बनारसीदास, 2।
  9.  पाणिनी 6,3,21
  10.  ई.पू. 350 सर आर. जी. भंडाकर
  11.  ई. पू. 150
  12.  तत्त्वबोधिनी और बालमनोरमा
  13.  भट्टाचार्य, सचिदानंद भारतीय इतिहास कोश(हिंदी)। लखनऊ: उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान, 28।
  • 'अशोक' | लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी | प्रकाशक: मोतीलाल बनारसीदास
  • 'अशोक' | लेखक: डी.आर. भंडारकर | प्रकाशक: एस. चन्द एन्ड कम्पनी
  • 'प्राचीन भारत का इतिहास' | लेखक: द्विजेन्द्र नारायण झा, कृष्ण मोहन श्रीमाली | प्रकाशक: दिल्ली विश्वविद्यालय
  • 'मौर्य साम्राज्य का इतिहास' | लेखक: सत्यकेतु विद्यालंकार | प्रकाशक: श्री सरस्वती सदन
  • 'भारत का इतिहास' | लेखिका: रोमिला थापर | प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन

कुणाल  

कुणाल सम्राट अशोक के एक पुत्र का नाम था। हिमालयकी तराइयों में कुणाल एक पक्षी पाया जाता है जिसकी आँखें बहुत ही सुन्दर होती हैं। दिव्यावदान के अनुसार अशोक ने अपनी रानी पद्मावती से उत्पन्न अपने नवजात पुत्र को धर्मविवर्धन नाम दिया था। पर जैसा उसके साथ गये मंत्रियों ने कहा था शिशु की आँखें हिमालय के कुणाल पक्षी की तरह थीं। इसलिए अशोक ने उसे कुणाल कहना शुरू कर दिया था। [1] यही 'धर्मविवर्धन' आगे कुणाल नाम से विख्यात हुआ।

  • फाहियान [2] ने धर्मविवर्धन नाम के अशोक के एक पुत्रका भी उल्लेख किया है, जो गंधार का वाइसराय था। इस बालक के नयन कुणाल पक्षी के सदृश थे। बौद्धग्रंथों में कुणाल की कहानी मिलती है।
  • ‘कुणाल अवदाना’ के अनुसार पाटलिपुत्र के सम्राट अशोक की अनेकों रानियाँ थीं। उनमे से एक पद्मावती (जैन मतावलंबी) थी, जिसके पुत्र का नाम कुणाल था। उसे वीर कुणाल और ‘धर्म विवर्धना’ कह कर संबोधित किया गया है।
  • कुणाल की आँखें बहुत सुंदर थी और उसमें लोगों को सम्मोहित करने की भी विशेषता थी। वह ऊर्जा से भरपूर था और गठीला बदन उसके पौरुष की पहचान थी। उसकी अनेकों विमाताओं में एक का नाम तिश्यरक्षा था।

कुणाल के अंधत्व के विषय में प्रचलित कथा

सम्राट अशोक की युवा रानी तिश्यरक्षा, बहुत ही सुन्दर थी। उसके सामने अप्सराएँ भी शर्माती थीं। तिश्यरक्षा कुणाल की आँखों के सम्मोहन से मोहित हो गयी और उसके प्रेम के लिए इतनी आतुर हो गयी कि उसने एक दिन कुणाल को अपने कक्ष में बुलाकर अपने बाहुपाश में जकड लिया और प्रणय निवेदन करने लगी। कुणाल ने किसी तरह अपने आप को अलग किया और अपनी विमाता को धिक्कारते हुए चला गया। इस प्रकार तिरस्कृत होना तिश्यरक्षा को असहनीय हो गया। वह क्रोध से काँपने लगी। कुछ देर बाद सहज होकर उसने दृढ़ निश्चय किया कि वह उन आँखों से बदला लेगी जिसने उसे आसक्त किया था। कुछ दिन व्यतीत होने पर तक्षशिला से समाचार मिला कि वहाँ का राज्यपाल (संभवतः तिश्यरक्षा  के कहने पर) बग़ावत पर उतारू है। उसे नियंत्रित करने के लिए सम्राट अशोक ने अपने पुत्र कुणाल को तक्षशिला भेजा। कुणाल अपनी पत्नी कंचनमाला को साथ लेकर (जिसके प्रति वह पूर्ण निष्‍ठावान था) एक सैनिक टुकड़ी के साथ तक्षशिला की ओर कूच कर गया। इधर सम्राट अशोक अपने प्रिय पुत्र कुणाल के विरह में बुरी तरह बीमार पड़ गया। तिश्यरक्षा की देखभाल और दिन रात की सेवा से सम्राट अशोक पुनः स्वस्थ हो गया। सम्राट ने प्रतिफल स्वरूप तिश्यरक्षा को एक सप्ताह तक साम्राज्ञी के रूप में साम्राज्य के  एकल संचालन के लिए अधिकृत कर दिया।

विमाता का प्रतिशोध

तिश्यरक्षा ने इस अवसर का फ़ायदा उठाया और तक्षशिला के राज्यपाल को निर्देशित किया कि वह कुणाल की आँखें निकाल दे। वह पत्र धोखे से कुणाल के हाथ में पड़ गया और अपनी विमाता की इच्छा पूर्ति के लिए उसने स्वयं अपने ही हाथों से अपनी आँखें फोड़ लीं। कंचनमाला अंधे कुणाल को साथ लेकर वापस पाटलिपुत्र पहुँची। सम्राट अशोक को तिश्यरक्षा के षड्यंत्र की कोई जानकारी नहीं थी वह तो केवल यही जानता था कि उसका प्रिय पुत्र अब अँधा हो गया है। अपने पुत्र की दयनीय अवस्था को देखकर सम्राट की आँखों से अनवरत अश्रु धारा बहने लगी। कुणाल को अपनी विमाता से कोई द्वेष भावना नहीं थी और उसके मन में अपनी विमाता के प्रति आदर भाव भी यथावत था। कुणाल की निश्चलता के कारण कालांतर में उसे उसकी दृष्टि वापस मिल गयी थी।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  दिव्यावदान, अध्याय 27
  2.  लेग्गे का अनुवाद, पृ. 31
  3.  कुणाल (हिंदी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 25 July, 2018।

दशरथ मौर्य  

दशरथ मौर्य (232 ई.पू. से 224 ई.पू.) भारतीय इतिहासमें प्रसिद्ध मौर्य वंश के सम्राट अशोक का पौत्र था। यह लगभग 232 ई.पू. गद्दी पर बैठा। अपने पितामह अशोक के समान ही उसने भी अनेकों गुहाओं का निर्माण करवाया था।

भारतीय इतिहास कोश |लेखक: सच्चिदानन्द भट्टाचार्य |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 199 |

अमित्रकेटे  

अमित्रकेटे मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र बिन्दुसार को कहा जाता था। चन्द्रगुप्त की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र बिन्दुसार सम्राट बना था। यूनानी लेखों के अनुसार इसका नाम 'अमित्रकेटे' था। विद्वानों के अनुसार अमित्रकेटे का संस्कृत रूप है- 'अमित्रघात' या 'अमित्रखाद' अर्थात् "शत्रुओं का नाश करने वाला"। सम्भवतः यह बिन्दुसार का विरुद रहा होगा।

  • यूनानी इतिहासकारों ने अमित्रकेटे को 'अमित्रोचेट्स' के नाम से भी सम्बोधित किया है।
  • 'अमित्रोचेट्स' जो संभवत: संस्कृत भाषा के शब्द 'अमित्रघट' से लिया गया है, का अर्थ है- 'शत्रुनाशक'।
  • 'अमित्रघट' की उपाधि सम्भवत: बिन्दुसार को दक्षिण में उसके सफल सैनिक अभियानों के लिये दी गई होगी, क्योंकि उत्तर भारत पर उनके पिता चंद्रगुप्त मौर्य ने पहले ही विजय प्राप्त कर ली थी।
  • बिन्दुसार का विजय अभियान कर्नाटक के आस-पास जाकर रुका और वह भी संभवत: इसलिये कि दक्षिण के चोलपांड्य व चेर सरदारों और राजाओं के मौर्यों से अच्छे संबंध थे।
  • बिन्दुसार ने अपने पिता चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा जीते गए क्षेत्रों को पूर्ण रूप से अक्षुण्ण रखा था। बाद में उसका पुत्र अशोक राजा बना, जिसने भारतवर्ष के इतिहास में ऐसा नाम कमाया, जिससे शायद ही कोई परिचित न हो।

अग्निमित्र  

अग्निमित्र (149-141 ई. पू.) शुंग वंश का दूसरा सम्राट था। वह शुंग वंश के संस्थापक सेनापति पुष्यमित्र शुंग का पुत्र था। पुष्यमित्र के पश्चात् 149 ई. पू. में अग्निमित्र शुंग राजसिंहासन पर बैठा। पुष्यमित्र के राजत्वकाल में ही वह विदिशा का 'गोप्ता' बनाया गया था और वहाँ के शासन का सारा कार्य यहीं से देखता था। आधुनिक समय में विदिशा को भिलसा कहा जाता है।

ऐतिहासिक तथ्य

अग्निमित्र के विषय में जो कुछ ऐतिहासिक तथ्य सामने आये हैं, उनका आधार पुराण तथा कालीदास की सुप्रसिद्ध रचना 'मालविकाग्निमित्र' और उत्तरी पंचाल (रुहेलखंड) तथा उत्तर कौशल आदि से प्राप्त मुद्राएँ हैं। 'मालविकाग्निमित्र' से पता चलता है कि, विदर्भ की राजकुमारी 'मालविका' से अग्निमित्र ने विवाह किया था। यह उसकी तीसरी पत्नी थी। उसकी पहली दो पत्नियाँ 'धारिणी' और 'इरावती' थीं। इस नाटक से यवन शासकों के साथ एक युद्ध का भी पता चलता है, जिसका नायकत्व अग्निमित्र के पुत्र वसुमित्र ने किया था।

देवभूति  

देवभूति मगध के शुंग वंश (लगभग 185 ई. पू से 73 ई. पू.) का अन्तिम राजा था। वह चरित्रहीन और दुराचारी प्रवृत्ति का व्यक्ति था, इस कारण से उसके ब्राह्मण मंत्री वासुदेव ने लगभग 73 ई. पू. में उसे मारकर कण्व वंश का शासन स्थापित किया।

शुंग  

शुंग कालीन मृण्मूर्ति 
Shunga Terracottas

शुंग वंश भारत का एक शासकीय वंश था जिसने मौर्य राजवंश के बाद उत्तर भारत में 187 ई.पू. से 75 ई.पू. तक 112 वर्षों तक शासन किया। मौर्य साम्राज्य के पतन के उपरान्त इसके मध्य भाग में सत्ता शुंग वंश के हाथ में आ गई। इस वंश की उत्पत्ति के बारे में कोई निश्चित जानकारी नहीं है। शुंग उज्जैन प्रदेश के थे, जहाँ इनके पूर्वज मौर्यों की सेवा में थे। शुंगवंशीय पुष्यमित्र अन्तिम मौर्य सम्राट बृहद्रथका सेनापति था। उसने अपने स्वामी की हत्या करके सत्ता प्राप्त की थी। इस नवोदित राज्य में मध्य गंगा की घाटी एवं चम्बल नदी तक का प्रदेश सम्मिलित था। पाटलिपुत्रअयोध्याविदिशा आदि इसके महत्त्वपूर्ण नगर थे। दिव्यावदान एवं तारनाथ के अनुसार जलंधर और साकल नगर भी इसमें सम्मिलित थे। पुष्यमित्र शुंग को यवनआक्रमणों का भी सामना करना पड़ा।

समकालीन पतंजलि के महाभाष्य से हमें दो बातों का पता चलता है -

  1. पतंजलि ने स्वयं पुष्यमित्र शुंग के लिए अश्वमेध यज्ञकराए।
  2. उस समय एक आक्रमण में यवनों ने चित्तौड़ के निकट माध्यमिका नगरी और अवध में साकेत का घेरा डाला, किन्तु पुष्यमित्र ने उन्हें पराजित किया।
  • गार्गी संहिता के युग पुराण में भी लिखा है कि दुष्ट पराक्रमी यवनों ने साकेतपंचाल और मथुरा को जीत लिया।
  • कालिदास के 'मालविकाग्निमित्र' नाटक में उल्लेख आया है कि यवन आक्रमण के दौरान एक युद्ध सिंधु नदी के तट पर हुआ और पुष्यमित्र के पोते और अग्निमित्र के पुत्र वसुमित्र ने इस युद्ध में विजय प्राप्त की।
  • इतिहासकार सिंधु नदी की पहचान के सवाल पर एकमत नहीं हैं - इसे राजपूताना की काली सिंधु (जो चम्बल की सहायक नदी है), दोआब की सिंधु (जो यमुना की सहायक नदी है) या पंजाब की सिंधु आदि कहा गया है, किन्तु इस नदी को पंजाब की ही सिंधु माना जाना चाहिए, क्योंकि मालविकाग्निमित्र के अनुसार विदिशा में यह नदी बहुत दूर थी। शायद इस युद्ध का कारण यवनों द्वारा अश्वमेध के घोड़े को पकड़ लिया जाना था। इसमें यवनों को पराजित करके पुष्यमित्र ने यवनों को मगध में प्रविष्ट नहीं होने दिया। अशोक के समय से निषिद्ध यज्ञादि क्रियाएँ, जिनमें पशुबलि दी जाती थी, अब पुष्यमित्र के समय में पुनर्जीवित हो उठी।
  • बौद्ध रचनाएँ पुष्यमित्र के प्रति उदार नहीं हैं। वे उसे बौद्ध धर्म का उत्पीड़क बताती हैं और उनमें ऐसा वर्णन है कि पुष्यमित्र ने बौद्ध विहारों का विनाश करवाया और बौद्ध भिक्षुओं की हत्या करवाई। सम्भव है कुछ बौद्धों ने पुष्यमित्र का विरोध किया हो और राजनीतिक कारणों से पुष्यमित्र ने उनके साथ सख्ती का वर्णन किया हो। यद्यपि शुंगवंशीय राजा ब्राह्मण धर्म के अनुयायी थे, फिर भी उनके राज्य में भरहुत स्तूप का निर्माण और साँची स्तूप की वेदिकाएँ (रेलिंग) बनवाई गईं।
  • पुष्यमित्र शुंग ने लगभग 36 वर्ष तक राज्य किया। उसके बाद उसके उत्तराधिकारियों ने ईसा पूरृव 75 तक राज्य किया। किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि शुंगों का राज्य संकुचित होकर मगध की सीमाओं तक ही रह गया। उनके उत्तराधिकारियों (काण्व) भी ब्राह्मण वंश के थे।

शुंग वंश के शासक

मौर्य वंश का अंतिम शासक वृहद्रय था। वृहद्रय को उसके ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने ई. पूर्व 185 में मार दिया और इस प्रकार मौर्य वंश का अंत हो गया। पुष्यमित्र ने अश्वमेध यज्ञ किया था। पुष्यमित्र ने सिंहासन पर बैठकर मगध पर शुंग वंश के शासन का आरम्भ किया। शुंग वंश का शासन सम्भवतः ई. पू. 185 ई. से पू. 100 तक दृढ़ बना रहा। पुष्यमित्र इस वंश का प्रथम शासक था, उसके पश्चात् उसका पुत्र अग्निमित्र, उसका पुत्र वसुमित्र राजा बना। वसुमित्र के पश्चात् जो शुंग सम्राट् हुए, उसमें कौत्सीपुत्र भागमद्र, भद्रघोष, भागवत और देवभूति के नाम उल्लेखनीय है। शुंग वंश का अंतिम सम्राट देवहूति था, उसके साथ ही शुंग साम्राज्य समाप्त हो गया था। शुग-वंश के शासक वैदिक धर्म के मानने वाले थे। इनके समय में भागवत धर्म की विशेष उन्नति हुई। शुंग वंश के शासकों की सूची इस प्रकार है -

ओद्रक  

ओद्रक प्रसिद्ध शुंगवंश का पाँचवाँ राजा। इसका दूसरा नाम पुराणों में आद्रक भी मिलता है। उसके अनुसार उसने केवल दो वर्ष राज किया। संभवत: इसका एक और नाम काशीपुत्र भागभद्र भी था। इस नाम के साथ ओद्रक का एकीकरण संदेह से खाली नहीं है। तक्षशिला के ग्रीक राजा अंतलिकिद ने दियपुत्र हेलियोदोरस को अपना राजदूत बनाकर मगध भेजा था। वह दूत वैष्णव था और उसने विष्णु के नाम पर बेसनगर (मध्य प्रदेश) में एक स्तंभ खड़ा कराया। उसपर उत्कीर्ण लेख में मगधराज काशीपुत्र भागभद्र का उल्लेख है, जो ओद्रक अथवा भागवत दोनों में से कोई हो सकता है। संभवत: ओद्रक ने 123 ई.पू. के लगभग राज किया।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 2 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 298 |
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महापद्मनन्द  

महापद्मनन्द मगध का वीर और प्रतापी राजा था। उसने मगध के नन्द वंश की स्थापना की थी। महापद्मनन्द को 'उग्रसेन' नाम से भी जाना जाता है। उसका जन्म शिशुनाग वंश के अंतिम राजा महानंदी की दासी के गर्भ से हुआ था और उसने महानंदी की हत्या करके मगध की राजगद्दी पर अधिकार कर लिया था।

  • एक विस्तृत राज्य की महत्त्वाकांक्षा के कारण राजा महापद्मनन्द ने समकालीन अनेक छोटे-बडे़ स्वतन्त्र राज्यों को विजित कर अपने शासन में शामिल किया था।
  • इन सभी विजयों के कारण राजा महापद्मनन्द को पुराणों में 'अखिलक्षत्रांतक' और 'एकच्छत्र' के रूप में वर्णित किया गया है।
  • महापद्मनन्द ने मिथिलाकलिंगकाशीपांचालचेदिकुरु, आदि विभिन्न राज्यों को अपने शासन के अंतर्गत कर शूरसेन राज्य को भी जीत कर अपने विशाल राज्य में सम्मिलित कर लिया था।
  • संभवत: ईसवी पूर्व 400 के लगभग महापद्मनन्द का शासन रहा था।
  • महापद्मनन्द के पश्चात् उसके विभिन्न पुत्रों ने मगधराज्य पर शासन किया।
  • उत्तरी-पश्चिमी भारत पर संभवतः ईसवी पूर्व 327 में सिकन्दर ने आक्रमण किया, परन्तु सिकन्दर की सेना पंजाब से आगे न बढ़ सकी।
  • जब सिकन्दर की सेना को यह पता चल गया कि आगे मगध शासक की विस्तृत सेना है, तो सिकन्दर के सैनिकों ने व्यास नदी को पार कर आगे बढ़ने से मना कर दिया।

नंदवंश  

नंद वंश मगधबिहार का लगभग 344 ई.पू. से 322 ई.पू. के बीच का शासक वंश था, जिसका आरंभ महापद्मनंद से हुआ था।

  • नंद शासक मौर्य वंश के पूर्ववर्ती राजा थे। मौर्य वंश से पहले के वंशों के विषय में जानकारी उपलब्ध नहीं है और जो है वो तथ्य और किंवदंतियों का मिश्रण है।
  • स्थानीय और जैन परम्परावादियों से पता चलता है कि इस वंश के संस्थापक महापद्म, जिन्हें महापद्मपति या उग्रसेन भी कहा जाता है, समाज के निम्न वर्ग के थे।
  • यूनानी लेखकों ने भी इस की पुष्टि की है।
  • महापद्म ने अपने पूर्ववर्ती शिशुनाग राजाओं से मगध की बाग़डोर और सुव्यवस्थित विस्तार की नीति भी जानी। उनके साहस पूर्ण प्रारम्भिक कार्य ने उन्हें निर्मम विजयों के माध्यम से साम्राज्य को संगठित करने की शक्ति दी।
  • पुराणों में उन्हें सभी क्षत्रियों का संहारक बतलाया गया है। उन्होंने उत्तरी, पूर्वी और मध्य भारत स्थित इक्ष्वाकुपांचालकाशी, हैहय, कलिंगअश्मककौरव, मैथिल, शूरसेन और वितिहोत्र जैसे शासकों को हराया। इसका उल्लेख स्वतंत्र अभिलेखों में भी प्राप्त होता है, जो नन्द वंश के द्वारा गोदावरी घाटी- आंध्र प्रदेश, कलिंग- उड़ीसा तथा कर्नाटक के कुछ भाग पर कब्ज़ा करने की ओर संकेत करते हैं।
  • महापद्म के बाद पुराणों में नंद वंश का उल्लेख नाममात्र का है, जिसमें सिर्फ सुकल्प (सहल्प, सुमाल्य) का ज़िक्र है, जबकि बौद्ध महाबोधिवंश में आठ नामों का उल्लेख है। इस सूची में अंतिम शासक धनानंद का उल्लेख संभवत: अग्रामी या जेन्ड्रामी के रूप में है और इन्हें यूनानी स्त्रोतों में सिकंदर महान का शक्तिशाली समकालीन बताया गया है।
  • इस वंश के शासकों की राज्य-सीमा व्यास नदी तक फैली थी। उनकी सैनिक शक्ति के भय से ही सिकंदरके सैनिकों ने व्यास नदी से आगे बढ़ना अस्वीकार कर दिया था।
  • कौटिल्य की सहायता से चंद्रगुप्त मौर्य ने 322 ई. पूर्व में नंदवंश को समाप्त करके मौर्य वंश की नींव डाली।
  • इस वंश में कुल नौ शासक हुए - महापद्मनंद और बारी-बारी से राज्य करने वाले उसके आठ पुत्र।
  • इन दो पीढ़ियों ने 40 वर्ष तक राज्य किया।
  • इन शासकों को शूद्र माना जाता है।
  • नंद वंश का संक्षिप्त शासनकाल मौर्य वंश के लंबे शासन के साथ प्रारंभिक भारतीय इतिहास में महत्त्वपूर्ण संक्रमण काल को दर्शाता है।
  • गंगा नदी में (छठी से पांचवी शताब्दी ई.पू.) भौतिक संस्कृति में बदलाव आया, जिसका विशेष लक्षण कृषि में गहनाता और लौह तकनीक का बढता इस्तेमाल था। इससे कृषि उत्पादन में उपयोग से अधिक वृद्धि हुई और वाणिज्यिक और शहरी केंद्रों के विकास को बढ़ावा मिला।
  • इस परिप्रेक्ष्य में यह बात महत्त्वपूर्ण है कि कई स्थानीय और विदेशी स्त्रोतों में नंद राजाओं को बहुत समृद्ध और विभिन्न प्रकार के करों की वसूली में निर्दयी के रूप में चित्रित किया गया है।
  • सिकंदर के काल में नंद की सेना में लगभग 20,000 घुड़सवार, 2,00,000 पैदल सैनिक, 2000 रथ और 3000 हाथी। प्रशासन में नंद राज्य द्वारा उठाए गए क़दम कलिंग (उड़ीसा) में सिचाई परियोजनाओं के निर्माण और एक मंत्रिमंडलीय परिषद के गठन से स्पष्ट होते हैं।

धनानंद  

धनानंद अथवा धननंद मगध देश का एक राजा था। इसकी राज्य-सीमा व्यास नदी तक फैली थी। मगध की सैनिक शक्ति के भय से ही सिकंदर के सैनिकों ने व्यास नदीसे आगे बढ़ना अस्वीकार कर दिया था। पालि ग्रन्थों में मगध के तत्कालीन शासक का नाम[1] धननंद बताया गया है। इसके अतिरिक्त पालि ग्रन्थों में नौ नंदों के नाम तथा उनके जीवन से सम्बन्धित कुछ बातें भी बताई गई हैं। इन ग्रन्थों से हमें पता चलता है कि नंदवंश के नौ राजा, जो सब भाई थे, बारी-बारी से अपनी आयु के क्रम से (वुड्ढपटिपाटिया) गद्दी पर बैठे। धननंद उनमें सबसे छोटा था। सबसे बड़े भाई का नाम उग्रसेन नंद बताया गया है; वही नंदवंश का संस्थापक था।[2]

जीवन परिचय

चंद्रगुप्त की तरह ही उसका प्रारम्भिक जीवन भी अत्यन्त रोमांचपूर्ण था। वह मूलत: सीमांत प्रदेश का निवासी था।[3]एक बार डाकुओं ने उसे पकड़ लिया और उसे मलय नामक एक सीमांत प्रदेश में ले गए [4]और उसे इस मत का समर्थक बना लिया कि लूटमार करना ज़मीन जोतने से अच्छा व्यवसाय है। वह अपने भाइयों तथा सगे-सम्बन्धियों सहित डाकुओं के एक गिरोह में भरती हो गया और शीघ्र ही उनका नेता बन बैठा। वे आसपास के राज्यों पर धावे मारने लगे[5] और सीमांत के नगरों पर चढ़ाई करके यह चुनौती दी : ‘या तो अपना राज्य हमारे हवाले कर दो या युद्ध करो[6]’ धीरे-धीरे वे सार्वभौम सत्ता पर अधिकार करने के स्वप्न देखने लगे।[7] इस प्रकार एक डाकू राजा राजाओं का राजा बन बैठा।[2]

चाणक्य का अपमान

कुछ भी हो इतना तो निश्चित है कि जिस समय चाणक्यपाटलिपुत्र आया था, उस समय धननंद वहाँ का राजा था। वह अपने धन के लोभ के लिए बदनाम था। वह ’80 करोड़ (कोटि) की सम्पत्ति’ का मालिक था और "खालों, गोंद, वृक्षों तथा पत्थरों तक पर कर वसूल" करता था। तिरस्कार में उसका नाम धननंद रख दिया गया था, क्योंकि वह ‘धन के भण्डार भरने का आदी’ था।[8] कथासरित्सागर में नंद की ’99 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं’ का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि उसने गंगा नदी की तली में एक चट्टान खुदवाकर उसमें अपना सारा ख़ज़ाना गाड़ दिया था।[9]उसकी धन सम्पदा की ख्याति दक्षिण तक पहुँची। तमिल भाषा की एक कविता में उसकी सम्पदा का उल्लेख इस रूप में किया गया है कि "पहले वह पाटलि में संचित हुई और फिर गंगा की बाढ़ में छिप गई।"[10] परन्तु चाणक्य ने उसे बिल्कुल ही दूसरे रूप में देखा। अब वह धन बटोरने के बजाए, उसे दान-पुण्य में व्यय कर रहा था; यह काम दानशाला नामक एक संस्था द्वारा संगठित किया जाता था। जिसकी व्यवस्था का संचालन एक संघ के हाथों में था, जिसका अध्यक्ष कोई ब्राह्मण होता था। नियम यह था कि अध्यक्ष एक करोड़ मुद्राओं तक का दान दे सकता था और संघ का सबसे छोटा सदस्य एक लाख मुद्राओं तक का। चाणक्य को इस संघ का अध्यक्ष चुना गया। परन्तु, होनी की बात, राजा को उसकी कुरूपता तथा उसका धृष्ट स्वभाव अच्छा न लगा और उसने उसे पदच्युत कर दिया। इस अपमान पर क्रुद्ध होकर चाणक्य ने राजा को शाप दिया, उसके वंश को निर्मूल कर देने की धमकी दी और एक नग्न आजीविक साधु के भेष में उसके चंगुल से बच निकला।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  (जिसका उल्लेख संस्कृत ग्रन्थों में केवल नंद के नाम से किया गया है,)
  2. ↑ 2.0 2.1 चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक:राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 34-36 |
  3.  (पच्चंत-वासिक)
  4.  (मुद्राराक्षस में मलय का उल्लेख मिलता है)
  5.  (रट्ठं विलुमपमानो विचरंतो)
  6.  (रज्जम वा देंतु युद्धं वा)।
  7.  (सिंहली भाषा में महावंस टीका का मूलपाठ)
  8.  (महावंस टीका)
  9.  (महावंस टीका)
  10.  (ऐय्यंगर कृत-बिगिनिंग्स ऑफ़ साउथ इंडियन हिस्ट्री, पृष्ठ 89)
  11.  मौर्य साम्राज्य का इतिहास |लेखक: सत्यकेतु विद्यालंकार |प्रकाशक: श्री सरस्वती सदन नई दिल्ली |पृष्ठ संख्या: 147 |
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मौर्य काल  

मौर्य काल
अशोक के साम्राज्य की सीमा का मानचित्र
विवरण'मौर्य काल' प्राचीन भारत के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। चंद्रगुप्त मौर्यचाणक्यबिन्दुसार तथा सम्राट अशोकआदि जैसे प्रसिद्ध व्यक्ति इसी काल में हुए।
मौर्य काल322-185 ईसा पूर्व
प्रमुख शासकचंद्रगुप्त मौर्यबिन्दुसारअशोककुणाल
शासनइस काल में केंद्रीय शासन का प्रचलन था और राजा को दैवीय अधिकार प्राप्त थे।
प्रसिद्ध नगरपालि एवं संस्कृत ग्रंथों में उल्लेखित मगधपाटलिपुत्रतक्षशिलाकौशांबीश्रावस्तीअयोध्याकपिलवस्तुवाराणसीवैशालीराजगीरकंधार आदि नगर मौर्य काल में काफ़ी समृद्ध थे।
संबंधित लेखअशोक के शिलालेखमौर्ययुगीन पुरातात्विक संस्कृतिमौर्यकाल में दास प्रथामौर्य काल का शासन प्रबंधमौर्यकालीन कलाबौद्ध धर्ममौर्य साम्राज्य का पतन
अन्य जानकारीमौर्ययुगीन पुरातात्विक संस्कृति में उत्तरी काली पॉलिश के मृदभांडों की जिस संस्कृति का प्रादुर्भाव महात्मा बुद्ध के काल में हुआ था, वह मौर्य युग में अपनी चरम सीमा पर दृष्टिगोचर होती है। इस संस्कृति का विवरण उत्तर, उत्तर पश्चिम, पूर्व एवं दक्कन के विहंगम क्षेत्र में प्रसार हो चुका था।

मौर्य राजवंश (322-185 ईसा पूर्व) प्राचीन भारत का एक राजवंश था। ईसा पूर्व 326 में सिकन्दर की सेनाएँ पंजाबके विभिन्न राज्यों में विध्वंसक युद्धों में व्यस्त थीं। मध्य प्रदेश और बिहार में नंद वंश का राजा धननंद शासन कर रहा था। सिकन्दर के आक्रमण से देश के लिए संकट पैदा हो गया था। धननंद का सौभाग्य था कि वह इस आक्रमण से बच गया। यह कहना कठिन है कि देश की रक्षा का मौक़ा पड़ने पर नंद सम्राट यूनानियों को पीछे हटाने में समर्थ होता या नहीं। मगध के शासक के पास विशाल सेना अवश्य थी, किन्तु जनता का सहयोग उसे प्राप्त नहीं था। प्रजा उसके अत्याचारों से पीड़ित थी। असह्य कर-भार के कारण राज्य के लोग उससे असंतुष्ट थे। देश को इस समय एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी, जो मगध साम्राज्य की रक्षा तथा वृद्धि कर सके। विदेशी आक्रमण से उत्पन्न संकट को दूर करे और देश के विभिन्न भागों को एक शासन-सूत्र में बाँधकर चक्रवर्ती सम्राट के आदर्श को चरितार्थ करे। शीघ्र ही राजनीतिक मंच पर एक ऐसा व्यक्ति प्रकट भी हुआ। इस व्यक्ति का नाम था- 'चंद्रगुप्त'। जस्टिन आदि यूनानीविद्वानों ने इसे 'सेन्ड्रोकोट्टस' कहा है। विलियम जॉन्स पहले विद्वान् थे, जिन्होंने सेन्ड्रोकोट्टस' की पहचान भारतीय ग्रंथों के 'चंद्रगुप्त' से की है। यह पहचान भारतीय इतिहास के तिथिक्रम की आधारशिला बन गई है।


मौर्य काल  

मौर्य काल
अशोक के साम्राज्य की सीमा का मानचित्र
विवरण'मौर्य काल' प्राचीन भारत के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। चंद्रगुप्त मौर्यचाणक्यबिन्दुसार तथा सम्राट अशोकआदि जैसे प्रसिद्ध व्यक्ति इसी काल में हुए।
मौर्य काल322-185 ईसा पूर्व
प्रमुख शासकचंद्रगुप्त मौर्यबिन्दुसारअशोककुणाल
शासनइस काल में केंद्रीय शासन का प्रचलन था और राजा को दैवीय अधिकार प्राप्त थे।
प्रसिद्ध नगरपालि एवं संस्कृत ग्रंथों में उल्लेखित मगधपाटलिपुत्रतक्षशिलाकौशांबीश्रावस्तीअयोध्याकपिलवस्तुवाराणसीवैशालीराजगीरकंधार आदि नगर मौर्य काल में काफ़ी समृद्ध थे।
संबंधित लेखअशोक के शिलालेखमौर्ययुगीन पुरातात्विक संस्कृतिमौर्यकाल में दास प्रथामौर्य काल का शासन प्रबंधमौर्यकालीन कलाबौद्ध धर्ममौर्य साम्राज्य का पतन
अन्य जानकारीमौर्ययुगीन पुरातात्विक संस्कृति में उत्तरी काली पॉलिश के मृदभांडों की जिस संस्कृति का प्रादुर्भाव महात्मा बुद्ध के काल में हुआ था, वह मौर्य युग में अपनी चरम सीमा पर दृष्टिगोचर होती है। इस संस्कृति का विवरण उत्तर, उत्तर पश्चिम, पूर्व एवं दक्कन के विहंगम क्षेत्र में प्रसार हो चुका था।

मौर्य राजवंश (322-185 ईसा पूर्व) प्राचीन भारत का एक राजवंश था। ईसा पूर्व 326 में सिकन्दर की सेनाएँ पंजाबके विभिन्न राज्यों में विध्वंसक युद्धों में व्यस्त थीं। मध्य प्रदेश और बिहार में नंद वंश का राजा धननंद शासन कर रहा था। सिकन्दर के आक्रमण से देश के लिए संकट पैदा हो गया था। धननंद का सौभाग्य था कि वह इस आक्रमण से बच गया। यह कहना कठिन है कि देश की रक्षा का मौक़ा पड़ने पर नंद सम्राट यूनानियों को पीछे हटाने में समर्थ होता या नहीं। मगध के शासक के पास विशाल सेना अवश्य थी, किन्तु जनता का सहयोग उसे प्राप्त नहीं था। प्रजा उसके अत्याचारों से पीड़ित थी। असह्य कर-भार के कारण राज्य के लोग उससे असंतुष्ट थे। देश को इस समय एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी, जो मगध साम्राज्य की रक्षा तथा वृद्धि कर सके। विदेशी आक्रमण से उत्पन्न संकट को दूर करे और देश के विभिन्न भागों को एक शासन-सूत्र में बाँधकर चक्रवर्ती सम्राट के आदर्श को चरितार्थ करे। शीघ्र ही राजनीतिक मंच पर एक ऐसा व्यक्ति प्रकट भी हुआ। इस व्यक्ति का नाम था- 'चंद्रगुप्त'। जस्टिन आदि यूनानीविद्वानों ने इसे 'सेन्ड्रोकोट्टस' कहा है। विलियम जॉन्स पहले विद्वान् थे, जिन्होंने सेन्ड्रोकोट्टस' की पहचान भारतीय ग्रंथों के 'चंद्रगुप्त' से की है। यह पहचान भारतीय इतिहास के तिथिक्रम की आधारशिला बन गई है।

चंद्रगुप्त मौर्य

चंद्रगुप्त के वंश और जाति के सम्बन्ध में विद्वान् एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वानों ने ब्राह्मण ग्रंथोंमुद्राराक्षसविष्णुपुराण की मध्यकालीन टीका तथा 10वीं शताब्दी की धुण्डिराज द्वारा रचित 'मुद्राराक्षस' की टीका के आधार पर चंद्रगुप्त को 'शूद्र' माना है। चंद्रगुप्त के वंश के सम्बन्ध में ब्राह्मणबौद्ध एवं जैन परम्पराओं व अनुश्रुतियों के आधार पर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वह किसी कुलीन घराने से सम्बन्धित नहीं था। विदेशी वृत्तांतों एवं उल्लेखों से भी स्थिति कुछ अस्पष्ट ही बनी रहती है।

राजनीतिक परिस्थितियाँ

जिस समय चंद्रगुप्त मौर्य साम्राज्य के निर्माण में तत्पर था, सिकन्दर का सेनापति सेल्यूकस अपनी महानता की नींव डाल रहा था। सिकन्दर की मृत्यु के बाद उसके सेनानियों में यूनानी साम्राज्य की सत्ता के लिए संघर्ष हुआ, जिसके परिणामस्वरूप सेल्यूकस, पश्चिम एशिया में प्रभुत्व के मामले में, ऐन्टिगोनस का प्रतिद्वन्द्वी बना। ई. पू. 312 में उसने बेबिलोन पर अपना अधिकार स्थापित किया। इसके बाद उसने ईरान के विभिन्न राज्यों को जीतकर बैक्ट्रिया पर अधिकार किया। अपने पूर्वी अभियान के दौरान वह भारतकी ओर बढ़ा। ई. पू. 305-4 में काबुल के मार्ग से होते हुए वह सिंधु नदी की ओर बढ़ा। उसने सिंधु नदी पार की और चंद्रगुप्त की सेना से उसका सामना हुआ। सेल्यूकस पंजाबऔर सिंधु पर अपना प्रभुत्व पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से आया था। किन्तु इस समय की राजनीतिक स्थिति सिकन्दर के आक्रमण के समय से काफ़ी भिन्न थी। पंजाब और सिंधु अब परस्पर युद्ध करने वाले छोटे-छोटे राज्यों में विभिक्त नहीं थे, बल्कि एक साम्राज्य का अंग थे। आश्चर्य की बात है कि यूनानी तथा रोमी लेखक, सेल्यूकस और चंद्रगुप्त के बीच हुए युद्ध का कोई विस्तृत ब्यौरा नहीं देते।

  • केवल एप्पियानस ने लिखा है कि- "सेल्यूकस ने सिंधु नदी पार की और भारत के सम्राट चंद्रगुप्त से युद्ध छेड़ा। अंत में उनमें संधि हो गई और वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हो गया।"
  • जस्टिन के अनुसार चंद्रगुप्त से संधि करके और अपने पूर्वी राज्य को शान्त करके सेल्यूकस एण्टीगोनस से युद्ध करने चला गया। एप्पियानस के कथन से स्पष्ट है कि सेल्यूकस चंद्रगुप्त के विरुद्ध सफलता प्राप्त नहीं कर सका। अपने पूर्वी राज्य की सुरक्षा के लिए सेल्यूकस ने चंद्रगुप्त से संधि करना ही उचित समझा और उस संधि को उसने वैवाहिक सम्बन्ध से और अधिक पुष्ट कर लिया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  गिरनार का बारहवाँ शिलालेख "अशोक के धर्म लेख" से पृष्ठ सं- 31, भारत का प्राचीन इतिहास
  2.  गिरनार का षष्ठ शिलालेख "अशोक के धर्म लेख" से पृष्ठ सं- 28, भारत का प्राचीन इतिहास

मौर्य साम्राज्य  

ईसा पूर्व 326 में सिकन्दर की सेनाएँ पंजाब के विभिन्न राज्यों में विध्वंसक युद्धों में व्यस्त थीं। मध्यप्रदेश और बिहार में नंद वंश का राजा धननंद शासन कर रहा था। सिकन्दर के आक्रमण से देश के लिए संकट पैदा हो गया था। धननंद का सौभाग्य था कि वह इस आक्रमण से बच गया। यह कहना कठिन है कि देश की रक्षा का मौक़ा पड़ने पर नंद सम्राट यूनानियों को पीछे हटाने में समर्थ होता या नहीं। मगध के शासक के पास विशाल सेना अवश्य थी किन्तु जनता का सहयोग उसे प्राप्त नहीं था। प्रजा उसके अत्याचारों से पीड़ित थी। असह्य कर-भार के कारण राज्य के लोग उससे असंतुष्ट थे। देश को इस समय एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो मगध साम्राज्य की रक्षा तथा वृद्धि कर सके। विदेशी आक्रमण से उत्पन्न संकट को दूर करे और देश के विभिन्न भागों को एक शासन-सूत्र में बाँधकर चक्रवर्ती सम्राट के आदर्श को चरितार्थ करे। शीघ्र ही राजनीतिक मंच पर एक ऐसा व्यक्ति प्रकट भी हुआ। इस व्यक्ति का नाम था 'चंद्रगुप्त'। जस्टिन आदि यूनानी विद्वानों ने इसे 'सेन्ड्रोकोट्टस' कहा है। विलियम जोंस पहले विद्वान् थे जिन्होंने सेन्ड्रोकोट्टस' की पहचान भारतीय ग्रंथों के 'चंद्रगुप्त' से की है। यह पहचान भारतीय इतिहास के तिथिक्रम की आधारशिला बन गई है।

शासकों की सूची

मौर्य वंश  

मौर्य राजवंश (322-185 ईसा पूर्व) प्राचीन भारत का एक राजवंश था। इसने 137 वर्ष भारत में राज्य किया। इसकी स्थापना का श्रेय चन्द्रगुप्त मौर्य और उसके मन्त्री आचार्य चाणक्य को दिया जाता है, जिन्होंने नंदवंश के सम्राट घनानन्द को पराजित किया। यह साम्राज्य पूर्व में मगधराज्य में गंगा नदी के मैदानों[1] से शुरू हुआ। इसकी राजधानी पाटलिपुत्र[2] थी।

स्थापना

चन्द्रगुप्त मौर्य ने 322 ईसा पूर्व में मौर्य साम्राज्य की स्थापना की और तेजी से पश्चिम की तरफ़ अपने साम्राज्य का विकास किया। उसने कई छोटे-छोटे क्षेत्रीय राज्यों के आपसी मतभेदों का फ़ायदा उठाया, जो सिकन्दर के आक्रमण के बाद पैदा हो गये थे। उसने यूनानियों को मार भगाया। चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा बुरी तरह पराजित होने के पश्चात् सिकन्दर के सेनापति सेल्यूकस को अपनी कन्या का विवाह चंद्रगुप्त से करना पड़ा। मेगस्थनीज इसी के दरबार में आया था। चंद्रगुप्त की माता का नाम 'मुरा' था। इसी से यह वंश 'मौर्य वंश' कहलाया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  आज का बिहार एवं बंगाल
  2.  आज के पटना शहर के पास

मौर्यकालीन भारत  

मौर्य साम्राज्य की सामाजिक आर्थिक, शासन प्रबंन्ध तथा धर्म और कला सम्बन्धी जानकारी के लिए कौटिल्य का 'अर्थशास्त्र', मैगस्थनीज़ कृत 'इंडिका' तथा अशोक के अभिलेखों का ठीक से अर्थ लगाया जाए तो पता चलेगा कि वे एक-दूसरे के पूरक हैं। रुद्रदामन के जूनागढ़ शिलालेख से भी प्रान्तीय शासन के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। मौर्य काल की जानकारी के लिए 'अर्थशास्त्र' की प्रामाणिकता के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद हैं। परम्परागत धारणा के आधार पर इसे चंद्रगुप्त मौर्य के मंत्री चाणक्य (विष्णुगुप्त) द्वारा रचित मानकर ई. पू. चौथी शताब्दी का बताया जाता है। किन्तु वैज्ञानिक ढंग से किए गए आधुनिक शोध ने इस मत के प्रति आशंका व्यक्त की है। इस संदर्भ में ट्रांटमैन के शोधकार्य का उल्लेख अनुचित न होगा। 'अर्थशास्त्र' की शैली के सांख्यकीय विश्लेषण द्वारा उन्होंने स्पष्ट किया है कि इसकी रचना एक युग विशेष में नहीं अपितु विभिन्न शताब्दियों में हुई और इसीलिए यह किसी व्यक्ति विशेष की रचना न होकर विभिन्न हाथों की कृति है। जहाँ कुछ अध्याय मौर्य काल के हैं, वहाँ अधिकांश अध्याय ऐसे भी हैं, जो तीसरी, चौथी शताब्दी ईस्वी में रचे गए।

मौर्यकालीन समाज

पूर्ववर्ती धर्मशास्त्रों की भाँति कौटिल्य ने भी वर्णाश्रम व्यवस्था को सामाजिक संगठन का आधार माना है। उसके अनुसार वर्णाश्रम व्यवस्था की रक्षा करना राजा का कर्तव्य है। धर्मशास्त्रों के अनुसार कौटिल्य ने भी चारों वर्णों के व्यवसाय निर्धारित किए। किन्तु शूद्र को शिल्पकला और सेवावृत्ति के अतिरिक्त कृषि, पशुपालन और वाणिज्य से आजीविका चलाने की अनुमति दी है। इन्हें सम्मिलित रूप में "वार्ता" कहा गया है। निश्चित है कि इस व्यवस्था से शूद्र के आर्थिक सुधार का प्रभाव उसकी सामाजिक स्थिति पर भी पड़ा होगा। कौटिल्य द्वारा निर्धारित शूद्रों के व्यवसाय वास्तविकता के अधिक निकट है। वैश्यों के सहायक के रूप में अथवा स्वतंत्र रूप से शूद्र भी कृषि, पशुपालन तथा व्यापार किया करते थे। अर्थशास्त्र में एक और परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है और वह यह कि शूद्र को आर्य कहा गया है तथा उसे म्लेच्छ से भिन्न माना गया है। कहा गया है कि आर्य शूद्र को दास नहीं बनाया जा सकता, यद्यपि म्लेच्छों में संतान को दास रूप में बेचना या ख़रीदना दोष नहीं है।

समाज में ब्राह्मणों का विशिष्ट स्थान था, किन्तु मनु तथा पूर्वगामी धर्मसूत्रों की भाँति इस तथ्य को बार बार दुहराने का प्रयास अर्थशास्त्र में नहीं किया गया है। यह बात अस्वीकार नहीं की जा सकती कि ब्राह्मण, समाज का बौद्धिक और धार्मिक नेतृत्व करते थे, वे ही शिक्षक तथा पुरोहित होते थे। ब्राह्मणों द्वारा यज्ञ करवाए जाने का उल्लेख मेगस्थनीज़ ने भी किया है। राजा के पुरोहित और क़ानून मंत्री अधिकांश इसी वर्ग से नियुक्त किए जाते थे। उन्हें आर्थिक और क़ानून सम्बन्धी विशेष अधिकार प्राप्त थे। राजा के शिक्षकों, यज्ञ कराने वाले पुरोहित (आचार्य) तथा वेदपाठी ब्राह्मणों को भूमि दान में दी जाती थी। यह भूमि 'ब्रह्मदेय' कहलाती थी और यह पूर्णतः कर मुक्त थी। ब्राह्मणों की समाज में प्रधानता बहुत पहले से चली आ रही थी और इस व्यवस्था में भी इसका प्रचलन विरोध नहीं किया गया।

ब्राह्मणादि चार वर्णों के अतिरिक्त कौटिल्य ने अनेक वर्णसंकर जातियों का भी उल्लेख किया है। इनकी उत्पत्ति धर्मशास्त्रों की भाँति विभिन्न वर्णों के अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों में बताई गई है। जिन वर्णसंकर जातियों का उल्लेख है वे हैं - अम्बष्ठ निषाद, पारशव, रथकार, क्षत्ता, वेदेहक, मागध, सूत, पुल्लकस, वेण, चंडाल, श्वपाक इत्यादि। इनमें से कुछ आदिवासी जातियाँ थीं। जो निश्चित व्यवसाय से आजीविका चलाती थीं। कौटिल्य ने चांडालों के अतिरिक्त अन्य सभी वर्णसंकर जातियों को शूद्र माना है। इनके अतिरिक्त तंतुवाय (जुलाहे), रजक (धोबी), दर्जी, सुनार, लुहार, बढ़ई आदि व्यवसाय पर आधारित वर्ग, जाति का रूप धारण कर चुके थे। अर्थशास्त्र में इन सबका समावेश शूद्र वर्ण के अंतर्गत किया गया है। अशोक के शिलालेखों में दास और कर्मकर का उल्लेख है। जो शूद्र वर्ग के अंदर ही समाविष्ट किए जाते हैं।

जातिप्रथा की कुछ विशेषताओं की पुष्टि मेगस्थनीज़ की इंडिका से होती है। मेगस्थनीज़ ने लिखा है कि कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के बाहर विवाह नहीं कर सकता, न वह अपने व्यवसाय को दूसरी जाति के व्यवसाय में बदल ही सकता है। केवल ब्राह्मणों को ही अपनी विशेष स्थिति के कारण यह अधिकार प्राप्त था। धर्मशास्त्रों में भी ब्राह्मणों को आपातकाल में क्षत्रीय तथा वैश्य का व्यवसाय अपनाने की अनुमति दी गई है।

मेगस्थनीज़ द्वारा भारतीय समाज का वर्गीकरण, भारतीय ग्रंथों में वर्णित वर्गीकरण से भिन्न है। मेगस्थनीज़ ने भारतीय समाज को सात जातियों में विभक्त किया है -

  1. दार्शनिक
  2. किसान
  3. अहीर
  4. कारीगर या शिल्पी
  5. सैनिक
  6. निरीक्षक
  7. सभासद तथा अन्य शासक वर्ग।

मेगस्थनीज़ का यह वर्णन भारतीय वर्णव्यवस्था या जाति व्यवस्था से मेल नहीं खाता। दार्शनिकों की जाति को मेगस्थनीज़ दो श्रेणियों में विभक्त करता है -

  1. ब्राह्मण
  2. श्रमण।

ब्राह्मण 37 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते थे। ब्राह्मणों की वृत्ति के सम्बन्ध में मेगस्थनीज़ लिखता है कि यज्ञ, अत्येष्टि क्रिया तथा अन्य धार्मिक कृत्य करवाने के बदले में उन्हें बहुमूल्य दक्षिणा मिलती है। श्रमणों को भी दो श्रेणियों में बाँटा गया है। जो वनों में रहते थे और कंद-मूल-फलों पर आजीविका चलाते थे इन्हें वैखानस या वानप्रस्थ आश्रम से सम्बद्ध माना जा सकता है। दूसरी श्रेणी के श्रमण वे थे जो आयुर्वेद में कुशल होते थे और समाज में सम्मानित थे। मेगस्थनीज़ के श्रमण तथा ब्राह्मण, वानप्रस्थाश्रम अथवा सन्न्यासियों से अधिक मेल खाते हैं, जैन और बौद्ध धर्मों से नहीं। मौर्यकालीन भारतीय समाज का जो सप्तवर्गीय चित्रण मेगस्थनीज ने प्रस्तुत किया है, उसमें जाति, वर्ण और व्यवसाय के अंतर को भुला दिया गया है। सम्भवतः एक विदेशी होने के कारण मेगस्थनीज भारतीय समाज की जटिलताओं को समझने में असमर्थ था।

परिवार में स्त्रियों की स्थिति स्मृतिकाल की अपेक्षा अब अधिक सुरक्षित थी। उन्हें पुनर्विवाह तथा नियोग की अनुमति थी। किन्तु फिर भी मौर्य काल में स्त्रियों की स्थिति को अधिक उन्नत नहीं कहा जा सकता। उन्हें बाहर जाने की स्वतंत्रता नहीं थी और पति की इच्छा के विरुद्ध वे कोई कार्य नहीं कर सकती थीं। संभ्रांत घर कि स्त्रियाँ प्रायः घर के अंदर ही रहती थी। कौटिल्य ने ऐसी स्त्रियों को 'अनिष्कासिनी' कहा है। राजघराने के अंतःपुर का उल्लेख अर्थशास्त्र तथा अशोक के अभिलेखों में है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र से सती प्रथा के प्रचलित होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। इस समय के धर्मशास्त्र इस प्रथा के विरुद्ध थे। बौद्ध तथा जैन अनुश्रुतियों में भी इसका उल्लेख नहीं है। किन्तु यूनानी लेखकों ने उत्तर पश्चिम में सैनिकों की स्त्रियों के सती होने का उल्लेख किया है। योद्धा वर्ग की स्त्रियों में सती की यह प्रथा प्रचलित रही होगी।

मौर्य युग में भी बहुत सी स्त्रियाँ ऐसी थीं जो विवाह द्वारा पारिवारिक जीवन न बिताकर 'गणिका' या 'वेश्या' के रूप में जीवन यापन करती थीं। वे अनेक प्रकार से राजा का मनोरंजन करती थीं। स्वतंत्र रूप से वेश्यावृत्ति करने वाली स्त्रियाँ 'रूपाजीवा' कहलाती थीं। इनसे राज्य को आय होती थी। इनके कार्यों का निरीक्षण गणिकाध्यक्ष तथा एक राजपुरुष करता था। बहुत सी गणिकाएँ गुप्तचर विभाग में भी काम करती थीं।

नगरों का जीवन चहल पहल का था। नट, नर्तक, गायक, वादक, तमाशा दिखाने वाले, रस्सी पर नाचने वाले तथा मदारी गाँवों और नगरों में अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। इन कलाकारों के गाँवों में प्रवेश पर निषेध था किन्तु नगरों में ऐसा प्रतिबंध नहीं था। नगरों में प्रेक्षाएँ लोकप्रिय थीं। स्त्री और पुरुष कलाकार दोनों प्रेक्षाओं में भाग लेते थे। इन्हें रंगोपजीवी तथा रंगोपजीविनी कहते थे।

विहार, यात्रा, समाज, प्रवहण अन्य माध्यम से जिनके द्वारा जनता सामूहिक रूप से अपना मनोरंजन करती थी। एक प्रकार से समाज के वे जिनमें लोग सुरापान, माँस भक्षण तथा मल्लयुज़ को देखकर मनोरंजन करते थे। अशोक को ये समाज पसंद नहीं थे। अतः उसने नए समाजों का प्रारम्भ किया जिनमें हस्ति, अग्निस्तंभ तथा विमानों की झाकियाँ दिखाई जाती थीं, ताकि लोगों में धर्माचरण को प्रोत्साहन मिले। कुछ ऐसे समाज भी थे जो सरस्वती के भवन में आयोजित होते थे और इनमें साहित्यिक नाटकों का अभिनय तथा गोष्ठियों का आयोजन होता था। विहार यात्राओं में मृगया और सुरापान की प्रधानता रहती थी। अशोक ने इन यात्राओं को बंद करवा दिया और धम्म यात्राओं का प्रारम्भ किया। प्रवहण भी एक प्रकार के सामूहिक समारोह थे जिनमें भोज्य और पेय पदार्थों का प्रचुरता से उपयोग किया जाता था।

मौर्य साम्राज्य का पतन  

अशोक के बाद ही मौर्य साम्राज्य का पतन आरम्भ हो गया था और लगभग 50 वर्ष के अन्दर इस साम्राज्य का अंत हो गया। इतने अल्प समय में इतने बड़े साम्राज्य का नष्ट हो जाना एक ऐसी घटना है कि इतिहासकारों में साम्राज्य विनाश के कारणों की जिज्ञासा स्वाभाविक ही है।

महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने अशोक की धार्मिक नीति को साम्राज्य के पतन का मुख्य कारण माना है। उसके अनुसार अशोक की धार्मिक नीति बौद्धों के पक्ष में थी और ब्राह्मणों के विशेषाधिकारों व उनकी सामाजिक श्रेष्ठता की स्थिति पर कुठाराघात करती थी। अतः ब्राह्मणों में प्रतिक्रिया हुई, जिसकी चरमसीमा पुष्यमित्र के विद्रोह में दृष्टिगोचर होती है। इस मत का सफलतापूर्वक विरोध करते हुए प्रसिद्ध इतिहासकार 'हेमचंद्र रायचौधरी' का कहना है कि एक तो अशोक ने पशुबलि पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया नहीं था और फिर स्वयं ब्राह्मण ग्रंथों में भी यज्ञादि अवसरों पर पशु-बलि के विरोध के स्वर स्पष्ट सुनाई दे रहे थे। अतः अशोक के तथाकथित प्रतिबंध को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया गया है। धम्ममहामात्रों के दायित्वों में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है, जिसे ब्राह्मण विरोधी कहा जाए। वे तो ब्राह्मण, श्रमण आदि सभी के कल्याण के लिए थे। राजुकों जैसे न्यायाधिकारियों को जो अधिकार दिए गए वे भी ब्राह्मणों के अधिकारो पर आघात करने के उद्देश्य से नहीं अपितु दंड विधान को लोकहित एवं अधिक मानवीय बनाने के उद्देश्य से प्रेरित थे और न ही सेनानी पुष्यमित्र शुंग के विद्रोह को ब्राह्मणों द्वारा संगठित क्रान्ति कहना उचित होगा। यह तो सैनिक क्रान्ति थी, जिसमें धर्म का पुट नहीं था। ऐसे कोई प्रमाण नहीं हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सके कि पुष्यमित्र की राज्यक्रान्ति का कारण सेना पर पूर्ण अधिकार रखने वाले सेनापति की महत्त्वाकांक्षा थी, असंतुष्ट ब्राह्मणों के एक समुदाय का नेतृत्व नहीं।


मौर्य साम्राज्य का पतन  

अशोक के बाद ही मौर्य साम्राज्य का पतन आरम्भ हो गया था और लगभग 50 वर्ष के अन्दर इस साम्राज्य का अंत हो गया। इतने अल्प समय में इतने बड़े साम्राज्य का नष्ट हो जाना एक ऐसी घटना है कि इतिहासकारों में साम्राज्य विनाश के कारणों की जिज्ञासा स्वाभाविक ही है।

महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने अशोक की धार्मिक नीति को साम्राज्य के पतन का मुख्य कारण माना है। उसके अनुसार अशोक की धार्मिक नीति बौद्धों के पक्ष में थी और ब्राह्मणों के विशेषाधिकारों व उनकी सामाजिक श्रेष्ठता की स्थिति पर कुठाराघात करती थी। अतः ब्राह्मणों में प्रतिक्रिया हुई, जिसकी चरमसीमा पुष्यमित्र के विद्रोह में दृष्टिगोचर होती है। इस मत का सफलतापूर्वक विरोध करते हुए प्रसिद्ध इतिहासकार 'हेमचंद्र रायचौधरी' का कहना है कि एक तो अशोक ने पशुबलि पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया नहीं था और फिर स्वयं ब्राह्मण ग्रंथों में भी यज्ञादि अवसरों पर पशु-बलि के विरोध के स्वर स्पष्ट सुनाई दे रहे थे। अतः अशोक के तथाकथित प्रतिबंध को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया गया है। धम्ममहामात्रों के दायित्वों में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है, जिसे ब्राह्मण विरोधी कहा जाए। वे तो ब्राह्मण, श्रमण आदि सभी के कल्याण के लिए थे। राजुकों जैसे न्यायाधिकारियों को जो अधिकार दिए गए वे भी ब्राह्मणों के अधिकारो पर आघात करने के उद्देश्य से नहीं अपितु दंड विधान को लोकहित एवं अधिक मानवीय बनाने के उद्देश्य से प्रेरित थे और न ही सेनानी पुष्यमित्र शुंग के विद्रोह को ब्राह्मणों द्वारा संगठित क्रान्ति कहना उचित होगा। यह तो सैनिक क्रान्ति थी, जिसमें धर्म का पुट नहीं था। ऐसे कोई प्रमाण नहीं हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सके कि पुष्यमित्र की राज्यक्रान्ति का कारण सेना पर पूर्ण अधिकार रखने वाले सेनापति की महत्त्वाकांक्षा थी, असंतुष्ट ब्राह्मणों के एक समुदाय का नेतृत्व नहीं।

दुर्बल उत्तराधिकारी

मौर्य साम्राज्य के पतन के कारणों में अशोक के दुर्बल उत्तराधिकारियों का भी कुछ उत्तरदायित्व था। वंशानुगत साम्राज्य तभी तक बने रह सकते हैं जब तक योग्य शासकों की शृंखला बनी रहे। चंद्रगुप्त और अशोक पराक्रमी योद्धा और कुशल शासक थे, अतः वे इतने विशाल साम्राज्य की एकता बनाए रखने में सफल रहे। परन्तु अशोक के उत्तराधिकारी इस कार्य के लिए सर्वथा अयोग्य थे। जिनके परिणामस्वरूप साम्राज्य के विभिन्न भाग धीरे-धीरे अलग होने लगे। ये दुर्बल शासक इस विघटन को रोकने में असफल रहे। सम्राट अशोक का साम्राज्य उसके उत्तराधिकारियों में विभाजित हो गया। इससे विघटन प्रक्रिया की गति और बढ़ी और साम्राज्य की सुरक्षा को भारी क्षति पहुँची।

हेमचंद्र रायचौधरी के अनुसार मौर्यों के दूरस्थ प्रान्तों के शासक अत्याचारी थे। दिव्यावदान में बिन्दुसार और अशोक के समय तक्षशिला में विद्रोह होने का उल्लेख है। दोनों बार उन्होंने राजकुमार अशोक और कुणाल से दुष्टामात्यों के विरुद्ध शिकायतें कीं। दिव्यावदन में उल्लिखित अमात्यों (उच्चाधिकारियों) की दुष्टता की पुष्टि अशोक के कलिंगअभिलेख से भी होती है। कलिंग के उच्च अधिकारियों को सम्बोधित करते हुए अशोक ने कहा है कि नागरिकों की नज़रबंदी या उनको दी जाने वाली यातना अकारण नहीं होनी चाहिए। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सम्राट अशोक ने प्रति पाँचवें वर्ष केन्द्र से निरीक्षाटन के लिए उच्चाधिकारियों को भेजने की व्यवस्था की। इसमें कोई संदेह नहीं है कि अशोक ने इन उच्च अधिकारियों की कार्यविधियों पर नियंत्रण रखा, किन्तु उसके उत्तराधिकारियों के राज्यकाल में ये कर्मचारी अधिक स्वतंत्र हो गए और प्रजा पर अत्याचार करने लगे।

अत्याचार के कारण दूरस्थ प्रान्त अवसर पाते ही स्वतंत्र हो गए। कलिंग और उत्तरापथ और सम्भवतः दक्षिणापथ ने सबसे पहले मौर्य साम्राज्य से सम्बन्ध विच्छेद कर लिया। चंद्रगुप्त की विजयों, कौटिल्य की कूटनीति तथा चक्रवर्ती सम्राट के आदर्श के बावजूद मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत कई अर्धस्वतंत्र राज्य थे जैसे यवन, काम्बोज, भोज, आटविक राज्य आदि। केन्द्रीय सत्ता के दुर्बल होते ही ये प्रदेश स्वतंत्र हो गए। स्थानीय स्वतंत्रता की भावना को चंद्रगुप्त ने अपने सुसंगठित शासन से तथा अशोक ने अपने नैतिकता पर आधारित धम्म से कम करने का प्रयास किया। किन्तु अयोग्य उत्तराधिकारियों के शासनकाल में यह भावना और भी अधिक बढ़ी और साम्राज्य के विघटन में सहायक सिद्ध हुई।

कुछ विद्वानों ने आर्थिक कारणों को भी मौर्य साम्राज्य के पतन का कारण माना है। अशोक की दानशीलता ने मौर्य अर्थव्यवस्था को अस्त व्यस्त कर दिया था। बौद्ध मठों और भिक्षुकों को प्रभूत धनराशि दान में दी जाने लगी। दिव्यावदान में अशोक के दान की जो कथाएँ दी गई हैं उनकी पुष्टि अन्य बौद्ध अनुश्रुतियों से भी होती है। शासन और सेना का संगठन, संचार साधन तथा जनता के कल्याण के बजाय जब यह धनराशि सम्प्रदायों को दी जाने लगी तो शासन व्यवस्था और विशेषकर सैन्य संगठन की अवहेलना होने लगी। इसके परिणाम अत्यन्त घातक सिद्ध हुए।

मौर्य काल का शासन प्रबंध  

मौर्यों के शासनकाल में भारत ने पहली बार राजनीतिक एकता प्राप्त की। 'चक्रवर्ती सम्राट' का आदर्श चरितार्थ हुआ। कौटिल्य ने चक्रवर्ती क्षेत्र को साकार रूप दिया। उसके अनुसार चक्रवर्ती क्षेत्र के अंतर्गत हिमालय से हिन्द महासागर तक सारा भारतवर्ष है। 'मौर्य युग' में राजतंत्र के सिद्धांत की विजय है। इस युग में गण राज्यों का ह्रास होने लगा और शासन सत्ता अत्यधिक केन्द्रित हो गई। साम्राज्य की सीमा पर तथा साम्राज्य के अंदर कुछ अर्ध-स्वतंत्र राज्य थे, जैसे- काम्बोज, भोज, पैत्तनिक तथा आटविक राज्य।

राजशासन की वैधता

'मौर्य काल' में प्रजा की शक्ति में अत्यधिक वृद्धि हुई। परम्परागत राजशास्त्र सिद्धांत के अनुसार राजा धर्म का रक्षक है, धर्म का प्रतिपादक नहीं। राजशासन की वैधता इस बात पर निर्भर थी कि वह धर्म के अनुकूल हो। किन्तु कौटिल्य ने इस दिशा में एक नया प्रतिमान प्रस्तुत किया। कौटिल्य के अनुसार- 'राजशासन धर्म, व्यवहार और चरित्र (लोकाचार) से ऊपर था'। इस प्रकार राजाज्ञा को प्रमुखता दी गई। इस बढ़ती हुई प्रभुसत्ता के कारण ही मौर्य सम्राट अशोक के समय राजतंत्र ने पैतृक निरंकुशता का रूप धारण किया। अशोक सारी प्रजा को समान मानता था। उनके ऐहिक और पारलौकिक सुख के लिए स्वंय को उत्तरदायी समझता था और प्रजा को उचित कार्य करने का उपदेश देता था।

शासन का केन्द्र बिन्दु

चूँकि शासन का केन्द्र बिन्दु राजा था, अतः इतने बड़े साम्राज्य के शासन संचालन के लिए यह आवश्यक था कि राजा उत्साही, स्फूर्तिवान और प्रजा हित के कार्यों के लिए सदा तत्पर हो। चंद्रगुप्त मौर्य एवं अशोक दोनों मौर्य सम्राटों में ये गुण प्रचुर मात्रा में विद्यमान थे। चंद्रगुप्त की कार्य तत्परता के सम्बन्ध में मेगस्थनीज़ ने लिखा है कि- "राजा दरबार में बिना व्यवधान के कार्यरत रहता था"। कौटिल्य ने कहा है कि- "जब राजा दरबार में ही बैठा हो तो उसे प्रजा से बाहर प्रतीक्षा नहीं करवानी चाहिए, क्योंकि जब राजा प्रजा के लिए दुर्लभ हो जाता है और काम अपने मातहत अधिकारियों के भरोसे छोड़ देता है, तो वह प्रजा में विद्रोह की भावना पैदा करता है और राजा के शत्रुओं के षड़यंत्र का शिकार हो जाने की आशंका पैदा हो जाती है।" अपने छठे शिलालेख में अशोक ने यह विज्ञप्ति जारी की थी कि- "वह प्रजा के कार्य के लिए प्रतिक्षण और प्रत्येक स्थान पर मिल सकता है और प्रजा की भलाई के लिए कार्य करने में उसे बड़ा संतोष मिलता है"।

मौर्यकाल में दास प्रथा  

  • मेंगस्थनीज़ ने लिखा है कि सभी भारतवासी समान हैं और उनमें कोई दास नहीं है।
  • डायोडोरस ने लिखा है, "क़ानून के अनुसार उनमें से कोई भी किसी भी परिस्थिति में दास नहीं हो सकता।"
  • मेगस्थनीज़ को ही उद्धृत करते हुए स्ट्राबों का कहना है, "भारतीयों में किसी ने अपनी सेवा में दास नहीं रखे।"
  • एक अन्य स्थल पर स्ट्राबो ने कहा, "चूँकि उनके पास दास नहीं हैं, अतः उन्हें बच्चों की अधिक आवश्यकता होती है।

विदेशी शक्तियों के वक्तव्यों का शब्दशः स्वीकार नहीं किया जा सकता। क्योकि कम से कम बुद्ध के काल से ही दासों को उत्पादन के काम में लगाया जाता था और पालि त्रिपिटक में इसके असंख्य उल्लेख हैं। अतः उपर्युक्त विवरणों की व्याख्या विभिन्न प्रकार से की जा सकती है। हो सकता है कि मेगस्थनीज़ को भारत में दासों के प्रति स्वामियों के द्वारा व्यवहार निर्मल और सदभावनापूर्ण लगा हो अथवा यह भी सम्भव है कि उसने किसी विशेष क्षेत्र का ही उल्लेख किया हो। एक स्थान पर तो कौटिल्य ने लिखा है कि न त्वेवार्यस्य दासावः, अर्थात किसी भी परिस्थिति में आर्य के लिए दासता नहीं होगी। इस संदर्भ में मेगस्थनीज़ के कथन का यह अर्थ हो सकता है कि स्वतंत्र लोगों को आजीवन दासता में परिणत करने की सीमाएँ थीं।


मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था में दासों का महत्त्वपूर्ण योगदान था। त्रिपिटक की तुलना में कौटिल्य ने कहीं अधिक विस्तार से दासों का वर्गीकरण किया है। जहाँ त्रिपिटक में दासों के चार प्रकार बताए गए हैं, कौटिल्य ने नौ का उल्लेख किया है।[1] और फिर 'दास कल्प' नामक खण्ड में दिए गए नियम उस तीसरे अध्याय के अंग हैं, जिसमें क़ानूनी मामलों की चर्चा है। इसका अर्थ हुआ कि कौटिल्य ने दास प्रथा की क़ानूनी वैधता को स्वीकार किया था। बौद्ध ग्रंथों एवं कौटिल्य अर्थशास्त्र में उत्पत्ति एवं कार्यों के आधार पर किए गए दासों के वर्गीकरण से स्पष्ट है कि वे सम्पत्ति का एक रूप थे। यह एक रोचक तथ्य है कि इन कृतियों में पाई जाने वाली दास सम्बन्धी परिभाषाएँ एवं व्याख्याएँ उस अंतर की ओर इंगित नहीं करती जो वैदिक काल में दास एवं आर्य में था। सांस्कृतिक एवं नृजातीय विभिन्नताओं को आधार नहीं माना गया है। अब दास प्रथा केवल आर्थिक कारणों से सम्बन्धित थी।

केन्द्रीय राजतांत्रिक व्यवस्था पर आधारित मौर्य साम्राज्य की स्थापना से दास प्रथा में अन्य रूपांतरण भी हुए। अभियान करके ज़बरदस्ती लोगों का अपहरण करने की नीति पर कौटिल्य द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का निर्वचन इसी प्रकार किया जा सकता है। देश की राजनीतिक एकता के पश्चात् इस प्रकार के अभियानों का अर्थ गौण हो गया। किन्तु दूसरी ओर इस राजनीतिक एकीकरण ने एक ऐसी प्रक्रिया को जन्म दिया, जो देश के आर्थिक एकीकरण तथा साम्राज्य के कोने कोने में व्यापार के विकास को न केवल बना रही थी अपितु प्रोत्साहित भी कर रही थी। इस प्रक्रिया के फलस्वरूप नगरों का उदय हुआ और व्यापारियों का प्रभाव बढ़ा। सेट्ठियों के स्वार्थ हित न केवल नगरों में थे अपितु ग्रामीण क्षेत्रों से भी जुड़े थे। वे भू स्वामी थे और कभी कभी तो सम्पूर्ण गाँव उनके अधीन होते थे। इन भूमियों पर उनके दास काम करते थे अथवा उन्हें किराए पर उठा लिया जाता था। यह काफ़ी तर्कसंगत लगता है कि दास श्रम के द्वारा भूमि कर्षण का यह तरीक़ा पर्याप्त सामान्य बात हो गयी थी। मौर्यों ने इसको समाप्त करने का प्रयास नहीं किया। अशोक के काल में कलिंग के युद्ध के पश्चात् सहस्रों बंदियों की प्राप्ति हुई और यह असम्भव नहीं लगता कि उनमें से कुछ तो मगध के बाज़ारों तक पहुँचे हों और कुछ को उन उत्पादक गतिविधियों में लगाया गया हो, जिनके माध्यम से मध्य गंगा घाटी की संस्कृति के तत्वों का प्रसार दूरस्थ कबायली क्षेत्रों में किया गया। कौटिल्य के विवरणों से यह भी स्पष्ट है कि राज्य की भूमि पर कृषि कार्य में, ख़ादानों में, कारखानों में, सुरक्षा प्रबंधों में भी दासों एवं दासियों का प्रयोग किया जाता था।

मौर्य साम्राज्य में जिस विस्तृत नौकरशाही के प्रमाण उपलब्ध हैं, उसको बनाए रखने के लिए राज्य को पर्याप्त धन की आवश्यकता होती होगी। चूँकि यह भी स्पष्ट है कि अधिकारियों को वेतन नक़द दिया जाता था, अतः यह अत्यन्त आवश्यक था कि राज्य प्रत्येक सम्भव स्रोत से धनार्जन करें। एक ओर जहाँ विकासशील कृषि एवं व्यापार के क्षेत्र से राज्य की आय बढ़ाना स्वाभाविक था, वहाँ दूसरी ओर हम यह भी देखते हैं कि जुआघरों, मद्यपान की दुकानों, वेश्याघरों, आदि को भी आय का स्रोत बनाने में हिचक महसूस नहीं की गयी। वेश्याघरों के पनपने में तो राज्यों ने पूँजी निवेश भी किया। गणिकाओं के प्रशिक्षण ओर उन्हें ललित कलाओं में निपुण बनाने में राज्य का जो व्यय होता था, उसके कारण वे गणिकाएँ पूर्ण रूप से राज्य के नियंत्रण में थी। उनकी आमदनी एवं सम्पत्ति पर राज्य का अधिकार था। उनकी मुक्ति तभी सम्भव थी, जब कि उन पर किए खर्च का 24 गुना धन दिया जाए। इस प्रावधान की पूर्ति लगभग असम्भव ही थी। अतः वे गणिकाएँ दासी तुल्य ही थीं। हालाँकि उनको सभी प्रकार के कामों में नहीं लगाया जा सकता था। उच्च सामाजिक वर्ग की सेवा करने वाली गणिका के अतिरिक्त, राज्य के पास वेश्याओं का ऐसा समूह भी था जो बंधकी—पोषकों के अधीन था और जिनके माध्यम से राज्य को काफ़ी आय होती थी। घरों में भी दास अनेक कार्य करते थे।

दास प्रथा से सम्बन्धित कौटिल्य के विवरण का एक महत्त्वपूर्ण अंग आहितकों का वर्णन है। कौटिल्य ने आजीवन दासों एवं किसी काल विशेष के लिए समझौते द्वारा उत्पन्न दासों में अंतर रखा है। दास प्रथा पर आधारित अन्य पुरातन समाजों की भाँति भारत में भी दासों के व्यक्तित्व एवं उसके श्रम का निपटारा करने में स्वामी को असीमित अधिकार प्राप्त थे। एक दास के रूप में जो व्यक्ति किसी अन्य की सम्पत्ति था, वह सभ्य समाज का सदस्य नहीं हो सकता था। उपर्युक्त अभिधारणा तो पूर्ण दासों के लिए ही सही उतरती है, किन्तु दूसरी ओर ऐसे लोग थे, जो अस्थायी रूप से बंधक एवं आश्रित थे। इनको कौटिल्य ने 'आहितक' कहा है। ये लोग एक निश्चित काल के लिए ही सेवा करने के उत्तरदायी होते थे और यह अवधि बीत जाने के बाद एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के अधिकारी थे। कर्मकांडीय अशौच कृत्यों को करने के लिए उन पर कोई दबाव डालने पर प्रतिबंध था। उसे बेचा नहीं जा सकता था और न उसे धारक बनाया जा सकता था। स्वामी की इच्छा के बिना समय पर आने पर वह स्वतंत्र हो जाता था। अर्थशास्त्र के अनुसार सही अर्थों में तो केवल बर्बर, म्लेच्छा ही, जो वर्ण से बाहर थे, तथा अनार्य (यहाँ पर आर्यों में शूद्र सम्मिलत हैं) समाज के सदस्य स्थायी रूप से दास बनाए जा सकते थे। यह निर्धारित करना कठिन है कि इस नियम का पालन वास्तविकता में कितना होता था, किन्तु बंधक रखने की सीमाओं को सीमित करने के प्रयास तथा समुदाय में स्वतंत्र सदस्यों को दास रूप में परिणत करने की सम्भावनाओं को कम करना प्राचीन युग के अनेक समाजों की विशेषता है। कुल मिलाकर अर्थशास्त्र के विवेचन से स्पष्ट होता है कि राज्य किसी प्रकार से दासों के स्तर को नियंत्रित और दास प्रथा की समस्याओं का स्पष्टीकरण करने के लिए इच्छुक था।

मौर्ययुगीन पुरातात्विक संस्कृति 

मौर्ययुगीन पुरातात्विक संस्कृति में उत्तरी काली पॉलिश के मृदभांडों की जिस संस्कृति का प्रादुर्भाव महात्मा बुद्ध के काल में हुआ था, वह मौर्य युग में अपनी चरम सीमा पर दृष्टिगोचर होती है। इस संस्कृति का प्रसार उत्तर, उत्तर-पश्चिम, पूर्व एवं दक्कन के विहंगम क्षेत्र में हो चुका था। उत्तर-पश्चिम में कंधारतक्षशिला, उदेग्राम आदि स्थलों से लेकर पूर्व में चंद्रकेतुगढ़ तक, उत्तर में रोपड़हस्तिनापुरतिलौराकोट एवं श्रावस्ती से लेकर दक्षिण में ब्रह्मपुरी, छब्रोली आदि तक इस संस्कृति के अवशेष मिलते हैं।


मौर्ययुगीन पुरातात्विक संस्कृति 

मौर्ययुगीन पुरातात्विक संस्कृति में उत्तरी काली पॉलिश के मृदभांडों की जिस संस्कृति का प्रादुर्भाव महात्मा बुद्ध के काल में हुआ था, वह मौर्य युग में अपनी चरम सीमा पर दृष्टिगोचर होती है। इस संस्कृति का प्रसार उत्तर, उत्तर-पश्चिम, पूर्व एवं दक्कन के विहंगम क्षेत्र में हो चुका था। उत्तर-पश्चिम में कंधारतक्षशिला, उदेग्राम आदि स्थलों से लेकर पूर्व में चंद्रकेतुगढ़ तक, उत्तर में रोपड़हस्तिनापुरतिलौराकोट एवं श्रावस्ती से लेकर दक्षिण में ब्रह्मपुरी, छब्रोली आदि तक इस संस्कृति के अवशेष मिलते हैं।

शहरीकरण का युग

पालि एवं संस्कृत ग्रंथों में कौशांबीश्रावस्तीअयोध्याकपिलवस्तुवाराणसीवैशालीराजगीरपाटलिपुत्र आदि जिन नगरों का उल्लेख मिलता है, वे सभी मौर्य युग में पर्याप्त पल्लवित अवस्था में थे। अनेक शहर तो प्रशासन के केन्द्र थे। किन्तु इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि ऐसे अनेक नगर थे, जो प्रसिद्ध व्यापार मार्गों पर स्थित थे। भारतीय इतिहास में शहरीकरण का जो दूसरा चरण बुद्ध युग से आरम्भ हुआ, उसके पल्लवीकरण में मौर्ययुगीन व्यापारियों एवं शिल्पियों ने विशेष योगदान दिया। यद्यपि उत्तरी काली पॉलिश के मृदभांडों की संस्कृति से सम्बन्धित बहुत से ग्रामीण स्थलों का उत्खनन नहीं हो पाया है, किन्तु मध्य गंगा की घाटी में विभिन्न शिल्प विधाओं, व्यापार एवं शहरीकरण एक सुदृढ़ ग्रामीण आधार के बिना अकल्पनीय है।

तुषास्प  

तुषास्प मौर्य सम्राट अशोक के राज्य काल में गुजरात और काठियावाड़ का महामात्य था। उसे राजा की उपाधि प्राप्त थी। गिरनार के पास 'सुदर्शन' नामक झील का तुषास्प ने पुनर्निर्माण करवाया था। तुषास्प ने झील का पुनर्निर्माण इतनी मजबूती से कराया था कि फिर 400 वर्ष तक उसकी मरम्मत की आवश्यकता नहीं हुई। 150 ई. में क्षत्रपरुद्रदामा ने झील का जीर्णोद्धार करवाया।

  • स्कन्दगुप्त के समय में सौराष्ट्र (काठियावाड़) का प्रान्तीय शासक 'पर्णदत्त' था। उसने गिरिनार की प्राचीन सुदर्शन झील की फिर से मरम्मत कराई थी।
  • सुदर्शन झील का निर्माण सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के समय में हुआ था। तब सुराष्ट्र का शासक वैश्य 'पुष्यगुप्त' था।
  • पुष्यगुप्त ही झील का निर्माता था। बाद में अशोक के समय में प्रान्तीय शासक यवन 'तुषास्प' ने और फिर क्षत्रप रुद्रदामा ने इस झील का पुनरुद्धार किया।
  • गुप्त काल में यह झील फिर ख़राब हो गई थी। अब स्कन्दगुप्त के आदेश से 'पर्णदत्त' ने इस झील का फिर जीर्णोद्वार किया। उसके शासन के पहले ही साल में इस झील का बाँध टूट गया था, जिससे प्रजा को बड़ा कष्ट हो गया था।
  • स्कन्दगुप्त ने उदारता के साथ इस बाँध पर खर्च किया। पर्णदत्त का पुत्र 'चक्रपालित' भी इस प्रदेश में राज्य सेवा में नियुक्त था। उसने झील के तट पर विष्णु भगवान के मन्दिर का निर्माण कराया।
  • माना जाता है कि तुषास्प सम्भवत: ईरानी था और सम्राट अशोक की सेवा में नियुक्त था।

मौर्यकालीन धर्म  

मौर्यकालीन भारत में वैदिक धर्म और गृह कृत्य प्रधान थे। वैदिक धर्म के अतिरिक्त इस समय एक अन्य प्रकार के धार्मिक जीवन का चित्र भी मिलता है, जिसकी मुख्य विशेषता विभिन्न देवताओं की पूजा थी। हिन्दुओं के ब्रह्माइन्द्रयमवरुणकुबेरशिवकार्तिकेयसंकर्षणजयंतअपराजित, इत्यादि देवताओं का भी उल्लेख हुआ है।

समाज में धार्मिक कर्म

मेगस्थनीज़ के अनुसार ब्राह्मणों का समाज में प्रधान स्थान था। दार्शनिक यद्यपि संख्या में कम थे, किन्तु वे सबसे श्रेष्ठ समझे जाते थे और यज्ञ आदि के कार्य में लगाए जाते थे। कौटिल्य के अनुसार 'त्रयी' अर्थात् तीन वेदों, के अनुसार आचरण करते हुए संसार सुखी रहेगा और अवसाद को प्राप्त नहीं होगा। तदनुसार राजकुमार के लिए 'चोलकर्म', 'उपनयन', 'गोदान', इत्यादि वैदिक संस्कार निर्दिष्ट किए गए थे। ऋत्विक, आचार्य और पुरोहित को राज्य से नियत वार्षिक वेतन मिलता था। वैदिक ग्रंथों और कर्मकाण्ड का उल्लेख प्रायः तत्कालीन बौद्ध ग्रंथों में मिलता है। कुछ ब्राह्मणों को जो वेदों में निष्णात थे, वेदों की शिक्षा देते थे तथा बड़े-बड़े यज्ञ करते थे। पालि ग्रंथों में 'ब्राह्मणनिस्साल' कहा गया है। वे अश्वमेधवाजपेय इत्यादि यज्ञ करते थे। ऐसे ब्राह्मणों को राज्य से कर मुक्त भूमि दान में मिलती थी। 'अर्थशास्त्र' में ऐसी भूमि को 'ब्रह्मदेय' कहा गया है और इन यज्ञों की इसलिए निंदा की गई है कि इनमें गौ और बैल का वध होता था, जो कृषि की दृष्टि से उपयोगी थे।


विष्णुगुप्त  

चाणक्य (काल्पनिक चित्र)

विष्णुगुप्त भारतीय इतिहास में मौर्य काल के प्रसिद्ध आचार्य चाणक्य का ही एक अन्य नाम है। चाणक्य को इतिहास में कौटिल्य के नाम से भी जाना जाता है।

  • कौटिल्य के और भी कई नामों का उल्लेख किया गया है, जिसमें 'चाणक्य' नाम प्रसिद्ध है।
  • कौटिल्य को चाणक्य के नाम से पुकारने वाले कई विद्वानों का मत है कि चणक निषाद का पुत्र होने के कारण यह चाणक्य कहलाया।
  • दूसरी ओर कुछ विद्वानों के कथानानुसार- उसका जन्म पंजाब के चणक क्षेत्र के निषाद बस्ती में हुआ था, जो वर्तमान समय में चंडीगढ़ के मल्लाह नामक स्थान से सूचित किया जाता है, इसलिए उसे चाणक्य कहा गया है, यद्यपि इस संबंध में कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता है। किंतु एक बात स्पष्ट है कि 'कौटिल्य' और 'चाणक्य' एक ही व्यक्ति है।
  • उपर्युक्त नामों के अलावा उसके और भी कई नामों का उल्लेख मिलता है, जैसे 'विष्णुगुप्त'। कहा जाता है कि उसका मूल नाम 'विष्णुगुप्त' ही था। उसके पिता ने उसका नाम विष्णुगुप्त ही रखा था। कौटिल्य, चाणक्य और विष्णुगुप्त तीनों नामों से संबंधित कई सन्दर्भ मिलते हैं, किंतु इन तीनों नामों के अलावा उसके और भी कई नामों का उल्लेख किया गया है, जैसे- वात्स्यायन, मलंग, द्रविमल, अंगुल, वारानक्, कात्यान इत्यादि; इन भिन्न-भिन्न नामों में कौन सा सही नाम है और कौन-सा गलत नाम है, यह विवाद का विषय है। परन्तु अधिकांश पाश्चात्य और भारतीय विद्वानों ने 'अर्थशास्त्र' के लेखक के रूप में कौटिल्य नाम का ही प्रयोग किया है।

राधागुप्त  

राधागुप्त आचार्य चाणक्य का शिष्य तथा मौर्य सम्राट बिन्दुसार का प्रधानमंत्री था। अशोक को मौर्य साम्राज्य का राजसिंहासन दिलाने में राधागुप्त का पर्याप्त समर्थन प्राप्त हुआ था।

  • राजसिंहासन को लेकर अशोक का अपने भाई सुसीम से बैर था।
  • तक्षशिला में सुसीम के समय में ही दूसरा विद्रोह उस समय हुआ, जब पाटलिपुत्र का सिंहासन रिक्त हुआ। सुसीम इस विद्रोह को शांत ना कर सका। अशोक ने अवसर का लाभ उठाकर मंत्री राधागुप्त की सहायता से सिंहासन पर अधिकार कर लिया।
  • चाणक्य की मृत्यु बुढ़ापे में 283 ई. पू. के करीब हुई और उनका दाह संस्कार उनके शिष्य राधागुप्त ने किया।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  ईमानदार चाणक्य (हिन्दी) ग्लॉस। अभिगमन तिथि: 28 फरवरी, 2015।

दुर्धरा  

दुर्धरा (अंग्रेज़ीDurdharaभारतीय इतिहास में प्रसिद्ध मौर्य वंश की स्थापना करने वाले चंद्रगुप्त मौर्य की प्रथम पत्नी थीं। इन्हीं के गर्भ से बिन्दुसार का जन्म हुआ था।

  • जैन ग्रन्थों से ज्ञात होता है कि बिन्दुसार की माता का नाम दुर्धरा था।
  • 'परिशिष्टपर्वन' नामक जैन ग्रन्थ में बिन्दुसार के जन्म के विष्य में एक रोचक प्रसंग आया है। चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को विष का अभ्यास डालने के उद्देश्य से उनको भोजन में अल्प मात्रा में विष देना आरम्भ किया था। इसका उद्देश्य यह था कि यदि कोई शत्रु विष अथवा विषकन्या द्वारा चंद्रगुप्त की हत्या करने का प्रयास करे तो वह सफल न हो सके।
  • एक दिन चंद्रगुप्त मौर्य की पत्नी दुर्धरा ने भी उनके साथ भोजन किया, किन्तु विष के प्रभाव से उनकी मृत्यु हो गई। उस समय रानी दुर्धरा गर्भवती थीं। चाणक्य ने शीध्र ही उनके उदर को चिरवाकर बच्चे को निकलवा लिया। इस बालक के मस्तक पर विष की एक बूंद लगी थी, अतः उसका नाम बिन्दुसाररखा गया।

मौर्यकालीन कला  

कला की दृष्टि से हड़प्पा की सभ्यता और मौर्य काल के बीच लगभग 1500 वर्ष का अंतराल है। इस बीच की कला के भौतिक अवशेष उपलब्ध नहीं है। महाकाव्यों और बौद्ध ग्रंथों में हाथीदाँत, मिट्टी और धातुओं के काम का उल्लेख है। किन्तु मौर्य काल से पूर्व वास्तुकला और मूर्तिकला के मूर्त उदाहरण कम ही मिलते हैं। मौर्य काल में ही पहले-पहल कलात्मक गतिविधियों का इतिहास निश्चित रूप से प्रारम्भ होता है। राज्य की समृद्धि और मौर्य शासकों की प्रेरणा से कलाकृतियों को प्रोत्साहन मिला।

इस युग में कला के दो रूप मिलते हैं। एक तो राजरक्षकों के द्वारा निर्मित कला, जो कि मौर्य प्रासाद और अशोक स्तंभों में पाई जाती है। दूसरा वह रूप जो परखम के यक्ष दीदारगंज की चामर ग्राहिणी और वेसनगर की यक्षिणी में देखने को मिलता है। राज्य सभा से सम्बन्धित कला की प्रेरणा का स्रोत स्वयं सम्राट था। यक्ष-यक्षिणियों में हमें लोककला का रूप मिलता है। लोककला के रूपों की परम्परा पूर्व युगों से काष्ठ और मिट्टी में चली आई है। अब उसे पाषाण के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया।


मौर्यकालीन कला  

कला की दृष्टि से हड़प्पा की सभ्यता और मौर्य काल के बीच लगभग 1500 वर्ष का अंतराल है। इस बीच की कला के भौतिक अवशेष उपलब्ध नहीं है। महाकाव्यों और बौद्ध ग्रंथों में हाथीदाँत, मिट्टी और धातुओं के काम का उल्लेख है। किन्तु मौर्य काल से पूर्व वास्तुकला और मूर्तिकला के मूर्त उदाहरण कम ही मिलते हैं। मौर्य काल में ही पहले-पहल कलात्मक गतिविधियों का इतिहास निश्चित रूप से प्रारम्भ होता है। राज्य की समृद्धि और मौर्य शासकों की प्रेरणा से कलाकृतियों को प्रोत्साहन मिला।

इस युग में कला के दो रूप मिलते हैं। एक तो राजरक्षकों के द्वारा निर्मित कला, जो कि मौर्य प्रासाद और अशोक स्तंभों में पाई जाती है। दूसरा वह रूप जो परखम के यक्ष दीदारगंज की चामर ग्राहिणी और वेसनगर की यक्षिणी में देखने को मिलता है। राज्य सभा से सम्बन्धित कला की प्रेरणा का स्रोत स्वयं सम्राट था। यक्ष-यक्षिणियों में हमें लोककला का रूप मिलता है। लोककला के रूपों की परम्परा पूर्व युगों से काष्ठ और मिट्टी में चली आई है। अब उसे पाषाण के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया।

राजकीय कला

राजकीय कला का सबसे पहला उदाहरण चंद्रगुप्त का प्रासाद है, जिसका विशद वर्णन एरियन ने किया है। उसके अनुसार राजप्रासाद की शान-शौक़त का मुक़ाबला न तो सूसा और न एकबेतना ही कर सकते हैं। यह प्रासाद सम्भवतः वर्तमान पटना के निकट कुम्रहार गाँव के समीप था। कुम्रहार की खुदाई में प्रासाद के सभा-भवन के जो अवशेष प्राप्त हुए हैं उससे प्रासाद की विशालता का अनुमान लगाया जा सकता है। यह सभा-भवन खम्भों वाला हाल था। सन् 1914-15 की खुदाई तथा 1951 की खुदाई में कुल मिलाकर 40 पाषाण स्तंभ मिले हैं, जो इस समय भन्न दशा में हैं। इस सभा-भवन का फ़र्श और छत लकड़ी के थे। भवन की लम्बाई 140 फुट और चौड़ाई 120 फुट है। भवन के स्तंभ बलुआ पत्थर के बने हुए हैं और उनमें चमकदार पालिश की गई थी। फ़ाह्यान ने अत्यन्त भाव-प्रवण शब्दों में इस प्रासाद की प्रशंसा की है। उसके अनुसार, "यह प्रासाद मानव कृति नहीं है वरन् देवों द्वारा निर्मित है। प्रासाद के स्तंभ पत्थरों से बने हुए हैं और उन पर सुन्दर उकेरन और उभरे चित्र बने हैं।" फ़ाह्यान के वृत्तान्त से पता चलता है कि अशोक के समय इस भवन का विस्तार हुआ।

मेगस्थनीज़ के अनुसार पाटलिपुत्रसोन और गंगा के संगम पर बसा हुआ था। नगर की लम्बाई 9-1/2 मील और चौड़ाई 1-1/2 मील थी। नगर के चारों ओर लकड़ी की दीवार बनी हुई थी जिसके बीच-बीच में तीर चलाने के लिए छेद बने हुए थे। दीवार के चारों ओर एक ख़ाई थी जो 60 फुट गहरी और 600 फुट चौड़ी थी। नगर में आने-जाने के लिए 64 द्वार थे। दीवारों पर बहुत से बुर्ज़ थे जिनकी संख्या 570 थी। पटना में गत वर्षों में जो खुदाई हुई उससे काष्ठ निर्मित दीवार के अवशेष प्राप्त हुए हैं। 1920 में बुलंदीबाग़ की खुदाई में प्राचीर का एक अंश उपलब्ध हुआ है, जो लम्बाई में 150 फुट है। लकड़ी के खम्बों की दो पंक्तियाँ पाई गई हैं। जिनके बीच 14-1/2 फुट का अंतर है। यह अंतर लकड़ी के स्लीपरों से ढका गया है। खम्भों के ऊपर शहतीर जुड़े हुए हैं। खम्भों की ऊँचाई ज़मीन की सतह से 12-1/2 फुट है और ये ज़मीन के अन्दर 5 फुट गहरे गाड़े गए थे। यूनानी लेखकों ने लिखा है कि नदी-तट पर स्थित नगरों में प्रायः काष्ठशिल्प का उपयोग होता था। पाटलिपुत्र की भी यही स्थिति थी। सभा-मंडप में शिला-स्तंभों का प्रयोग एक नई प्रथा थी।

मौर्य काल के सर्वोत्कृष्ट नमूने, अशोक के एकाश्मक स्तंभ हैं जोकि उसने धम्म प्रचार के लिए देश के विभिन्न भागों में स्थापित किए थे। इनकी संख्या लगभग 20 है और ये चुनार (बनारस के निकट) के बलुआ पत्थर के बने हुए हैं। लाट की ऊँचाई 40 से 50 फुट है। चुनार की खानों से पत्थरों को काटकर निकालना, शिल्पकला में इन एकाश्मक खम्भों को काट-तराशकर वर्तमान रूप देना, इन स्तंभों को देश के विभिन्न भागों में पहुँचाना, शिल्पकला तथा इंजीनियरी कौशल का अनोखा उदाहरण है। इन स्तंभों के दो मुख्य भाग उल्लेखनीय हैं-(1) स्तंभ यष्टि या गावदुम लाट (tapering shaft) और शीर्ष भाग। शीर्ष भाग के मुख्य अंश हैं घंटा, जोकि अखमीनी स्तंभों के आधार के घंटों से मिलते-जुलते हैं। भारतीय विद्वान् इसे अवांगमुखी कमल कहते हैं। इसके ऊपर गोल अंड या चौकी है। कुछ चौकियों पर चार पशु और चार छोटे चक्र अंकित हैं (जैसे सारनाथ स्तंभ शीर्ष की चौकी पर) तथा कुछ पर हंसपक्ति अंकित है। चौकी पर सिंह, अश्व, हाथी तथा बैल आसीन हैं। रामपुर में नटुवा बैल ललित मुद्रा में खड़ा है। सारनाथ के शीर्ष स्तंभ पर चार सिंह पीठ सटाए बैठे हैं। ये चार सिंह एक चक्र धारण किए हुए हैं। यह चक्र बुद्ध द्वारा धर्म-चक्र-प्रवर्तन का प्रतीक है। अशोक के एकाश्मक स्तंभों का सर्वोत्कृष्ट नमूना सारनाथ के सिहंस्तंभ का शीर्षक है। मौर्य शिल्पियों के रूपविधान का इससे अच्छा दूसरा नमूना और कोई नहीं है। ऊपरी सिंहों में जैसी शक्ति का प्रदर्शन है, उनकी फूली नसों में जैसी स्वाभाविकता है और उनके नीचे उकेरी आकृतियों में जो प्राणवान वास्तविकता है, उसमें कहीं भी आरम्भिक कला की छाया नहीं है। शिल्पों ने सिंहों के रूप को प्राकृतिक सच्चाई से प्रकट किया है।

स्तंभों की-विशेषतः सारनाथ स्तंभ की-चमकीली पालिश, घंटाकृति तथा शीर्ष भाग में पशु आकृति के कारण पाश्चात्य विद्वानों ने यह मत व्यक्त किया है कि कला को प्रेरणा अखमीनी ईरान से मिली है। चौकी पर हंसों की उकेरी गई आकृतियों और अन्य सज्जाओं में यूनानी प्रभाव भी दिखाई देता है।

भारतीय विद्वानों के अनुसार अशोक के स्तंभ की कला का स्रोत भारतीय है। मौर्य स्तंभ-शीर्षों की पशु-मूर्तियाँ, सारनाथ का सिंहस्तंभ, रामपुरवा का बैल प्राचीन सिंधु घाटी से प्रवाहमान परम्परा के अनुकूल है। किन्तु वासुदेव शरण अग्रवाल ने महाभारत और आपस्तम्ब सूत्र से प्रमाण प्रस्तुत किए हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि चमकीली पालिश उत्पन्न करने की कला ईरान से कहीं पहले भारत में ज्ञात थी। मौर्य काल से पूर्व और एक हद तक मौर्य कालीन स्थानों पर जो काली पालिश वाले मृदभांड पाए गए हैं उनसे प्रतीत होता है कि देश के इतिहास में एक युग ऐसा था जब ओपदार चमक में रुचि ली जाती थी। यह भी सिद्ध होता है कि पालिश का रहस्य केवल राजशिल्पियों तक सीमित नहीं था। पिंपरहवा स्तूप से मिली स्फटिक मंजूषा, पाटलिपुत्र के दो यक्ष और दीदारगंज की यक्षी में भी यह पालिश पाई जाती है। सारनाथ के धर्मचक्र की कल्पना नितांत भारतीय है।

ईरानी स्तंभों और मौर्य स्तंभों में स्पष्ट भेद हैं। स्वतंत्र स्तंभों की कल्पना भारतीय है। ईरानी स्तंभ नालीदार हैं जबकि भारतीय स्तंभ सपाट हैं। ईरानी स्तंभ अलग-अलग पाषाण-खंडों के बने हुए हैं किन्तु अशोक स्तंभ एक ही पत्थर के हैं। स्तंभ के शीर्ष भाग को घंटा कहा गया है। किन्तु भारतीय विद्वानों के अनुसार यह आवांगमुख कमल अथवा पूर्णघट है जो बाहर की ओर लहराती हुई कमल की पंखुड़ियों से ढका हुआ है। यदि कुछ समय के लिए इसे घंटा मान भी लिया जाए तो यह ईरानी घंटे से भिन्न है। तथाकथित मौर्य घंटा घटपल्लव या पूर्णघट के अभिप्राय के सदृश बनाया गया है। इसके अलावा ईरानी और मौर्य स्तंभ शीर्षकों के अलंकरणों में भी अंतर है। मौर्य कालीन शिल्पियों ने चिरपरिचित परम्परा को अपनाया और अपनी प्रतिभा से उसे नवीन आकार प्रदान किया।

यदि ईरानी प्रभाव को मान भी लिया जाए, तो भी अशोक स्तंभों की संगत राशी मूर्तिकला तथा अलंकरण को अखमीनी, ईरानी या यूनान की मूलाकृतियों की नक़ल मात्र नहीं माना जा सकता। विदेशी कला-लक्षणों का सम्यक् अध्ययन करके भारतीय कलाकारों ने अपनी प्रतिभा से रूपातंरण किया है और उन्हें अपने ढंग से कलाकृतियों में अभिव्यक्त किया है।

अशोक ने स्तूप निर्माण की परम्परा को भी प्रोत्साहन दिया। बौद्ध अनुश्रुति के अनुसार अशोक ने 8,400 स्तूप बनवाए। साँची तथा भरहुत के स्तूपों का निर्माण मूल रूप में अशोक ने ही करवाया था। शुंगों में साँची स्तूप का विस्तार हुआ।

अशोक ने वास्तुकला के इतिहास में एक नई शैली का प्रारम्भ किया, अर्थात चट्टानों को काटकर कंदराओं का निर्माण किया। गया के निकट बाराबर की पहाड़ियों में अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 12वें वर्ष में सुदामा गुहा आजीवक भिक्षुओं को दान में दी। इस गुफा में दो कोष्ठ हैं। एक गोल व्यास है जिसकी छत-अर्धवृत्त या ख़रबूज़िया आकार की है। उसके बाहर का मुखमंडप आयताकार है किन्तु छत गोलाकार है। दोनों कोष्ठों की भित्तियों और छतों पर शीशे जैसी चमकती हुई पालिश है। इससे ज्ञात होता है कि चैत्य गृह का मौलिक विकास अशोक के समय में ही प्रारम्भ हो गया था और इस शैली का पूर्ण विकास महाराष्ट्र के भाजा, कन्हेरी और कार्ले चैत्यगृहों में परिलक्षित होता है। अशोक के पुत्र दशरथ ने नागार्जुनी पहाड़ियों में आजाविकों को 3 गुफाएँ प्रदान कीं। इनमें से एक प्रसिद्ध गुफा गोपी गुफा है। इनका विन्यास सुरंग जैसा है। इसके मध्य में ढोलाकार छत और दोनों शिरों पर दो गोल मंडप हैं, जिनमें से एक को गर्भगृह और दूसरे को मुखमंडप समझना चाहिए। इसमें अशोककालीन गृहशिल्प की पूर्णतः रक्षा हुई है।

मौर्योत्तर काल  

मौर्य साम्राज्य की लड़खड़ाती हुई दीवार ई. पू. 187 में ढह गई और मौर्य साम्राज्य के अंत के साथ ही भारतीय इतिहास की राजनीतिक एकता कुछ समय के लिए खंडित हो गई। अब हिन्दुकुश से लेकर कर्नाटक एवं बंगाल तक एक ही राजवंश का आधिपत्य नहीं रहा। देश के उत्तर पश्चिमी मार्गों से कई विदेशी आक्रांताओं ने आकर अनेक भागों में अपने अपने राज्य स्थापित कर लिए। दक्षिण में स्थानीय शासक वंश स्वतंत्र हो उठे। कुछ समय के लिए मध्य प्रदेश का सिंधु घाटी एवं गोदावरी क्षेत्र से सम्बन्ध टूट गया और मगध के वैभव का स्थान साकल, विदिशा, प्रतिष्ठान, आदि कई नगरों ने ले लिया।

ऐतिहासिक स्रोत

भारतीय धार्मिक एवं धर्मेतर साहित्य, विदेशी साहित्यक ग्रंथों, अभिलेखों, सिक्कों एवं अन्य पुरातात्विक खोजों के आधार पर इस काल के इतिहास की पुनर्रचना में सहायता मिलती है। पुराण एवं स्मृति ग्रंथ इस काल के विषय में जानकारी के स्रोत हैं। इसके अतिरिक्त बौद्ध धार्मिक ग्रंथों से भी तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक स्थिति का पता चलता है। बौद्ध जातक ग्रंथों का रचनाकाल ईसा पूर्व प्रथम शती से लेकर ईस्वी सन् दूसरी या तीसरी शती तक माना जाता है। दिव्यावदानललितविस्तर, मंजूश्रीमूलकल्प नामक बौद्ध ग्रंथ भी इस काल के इतिहास पर प्रकाश डालते हैं। 'मिलिन्दपञ्ह' नामक पुस्तक से हमें मिनांडर नामक यूनानी शासक के विषय में जानकारी मिलती है। धर्मेतर साहित्य में पतंजलि के महाभाष्य से हमें पुष्यमित्र शुंग के राज्यकाल की कुछ घटनाओं का पता चलता है। गार्गी संहिता में यवनों के आक्रमण का उल्लेख है। कालिदास कृत "मालविकाग्निमित्र" से भी पुष्यमित्र कालीन यवन आक्रमण के कुछ विवरण मिलते हैं।

सन 80 के लगभग किसी यूनानी नाविक ने "पेरिप्लस आफ़ दि एरिथियन सी" नामक पुस्तक में भारतीय समुद्रों का हाल लिखा था। इस पुस्तक से ईस्वी सन् की पहली शती में भारत की व्यापारिक गतिविधि का पता चलता है। स्ट्राबो के 'भूगोल' एवं प्लिनी कृत 'नेचुरल हिस्ट्री' में उन देशों के विविध पक्षों का वर्णन मिलता है जिनके साथ उस समय भूमध्यसागरीय देशों का व्यापारिक सम्बन्ध था। ये दोनों कृतियाँ ईस्वी सन् की आरम्भिक दो शताब्दियों की हैं। चीनके राजवंशों के प्रारम्भिक इतिहास ग्रंथ भी इस काल के सम्बन्ध में उपयोगी सामग्री प्रदान करने में सहायक हुए हैं।

राजाओं के अभिलेखों में प्रशस्तियाँ और राजाज्ञाएँ प्रमुख हैं। प्रशस्तियों में सबसे अधिक प्रसिद्ध है गौतमी वलश्री का नासिक अभिलेख, जिसमें गौतमीपुत्र शातकर्णी का वर्णन है। रुद्रदामा का गिरनार शिलालेख भी उस समय का प्रसिद्ध अभिलेख है। इस समय का इतिहास लिखने में सिक्के बहुत उपयोगी सिद्ध हुए हैं। भारतीय सिक्कों पर पहले केवल देवताओं के चित्र ही अंकित रहते थे, उनका नाम या तिथि उत्कीर्ण नहीं की जाती थी। जब से उत्तर पश्चिमी भारत पर बैक्ट्रिया के यूनानी राजाओं का शासन प्रारम्भ हुआ, सिक्कों पर राजाओं के नाम व तिथियाँ उत्कीर्ण की जाने लगीं। शकपल्लव और कुषाण राजाओं ने भी यूनानी राजाओं के अनुरूप ही सिक्के चलाए। भारतीय शक राजाओं और मालव यौधेय आदि गण राज्यों के इतिहास पर उनके सिक्के पर्याप्त प्रकाश डालते हैं। वास्तव में सिक्कों के इतिहास की दृष्टि से यह काल अभूतपूर्व है। सिक्कों की मात्रा से ही नहीं अपितु विविध धातुओं तथा विविध इकाइयों में मिलने वाले सिक्कों से यह संकेत मिलता है कि मुद्रा - प्रणाली किस प्रकार जनजीवन का एक अभिन्न अंग बन गई थी।

मौर्योत्तरकालीन विदेशी आक्रमण  

पश्चिमोत्तर भारत में विदेशियों का आक्रमण सम्भवतः मौर्योत्तर काल में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटना थी। विदेशी आक्रमणकारियों की इस शृंखला में सबसे पहले 'बैक्ट्रिन ग्रीक' शासकों का नाम आता है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में इन्हें 'यवन' के नाम से जाना जाता है। इतिहास के इस काल की जानकारी बौद्ध ग्रंथों, जैसे- बौद्ध जातक, दिव्यावदानललितविस्तर, मंजूश्रीमूलकल्प, मिलिन्दपन्ह, गार्गी संहिता, मालविकाग्निमित्रम् एवं कुछ अभिलेखों, सिक्कों तथा पुरातात्विक खोजों द्वारा प्राप्त होती हैं।

बैक्ट्रिया साम्राज्य

हिन्दुकुश पर्वत एवं 'ऑक्सस' के मध्य में स्थित 'बैक्ट्रिया' अत्यन्त ही उपजाऊ प्रदेश था। इसके उपजाऊपन के कारण ही 'स्ट्रैबो' ने इसे 'अरियाना गौरव' कहा। बैक्ट्रिया में यूनानी बस्तियों का प्रारम्भ 'एकेमेनिड काल' (लगभग 5 वीं शताब्दी ई.पू.) में हुआ। सिकन्दर की मृत्यु के पश्चात् बैक्ट्रिया पर सेल्युकस का अधिपत्य रहा, किन्तु आन्तियोकस द्वितीय के शासन काल में पार्थिया 'अर्सेक्स' के नेतृत्व में और बैक्ट्रिया 'डायोडोटस' के नेतृत्व में स्वतंत्र हो गया । डायोडोटस की मृत्यु के पश्चात् उसके अवयस्क पुत्र की हत्या कर 'यूथीडेमस' नामक एक महत्वकांशी व्यक्ति ने बैक्ट्रिया की सत्ता हथिया ली। सेल्यूकस वंश के 'आन्तियोकस तृतीय' ने 'यूथीडेमस' को बैक्ट्रिया का राजा मान लिया और 206 ई. पू. में भारत के विरुद्ध एक अभियान का नेतृत्व किया। यह अभियान हिन्दुकुश पर्वत को पार कर काबुल घाटी के एक शासक सुभगसेन के ख़िलाफ़ किया गया था। सुभगसेन को पॉलिबियस ने 'भारतीयों का राजा' कहा। सम्भवतः सुभगसेन द्वारा सांकेतिक समर्पण के बाद एण्ट्योकस ढेर सारे हाथी एवं हरजाने की बड़ी धनराशि लेकर वापिस चला गया। इस प्रकार भारत पर जिन प्रमुख यवन राजाओं ने आक्रमण किया, उनका विवरण इस प्रकार से है-

विदेशी आक्रमणकारी और उनके भारतीय नाम
विदेशी नामभारतीय नाम
बैक्ट्रियनयवन
पार्थियनपहलव
सीथियनशक
यू-चीकुषाण

डेमेट्रियस

यूथीडेमस की मृत्यु के बाद उसका पुत्र डेमेट्रियस राजा हुआ। सम्भवतः सिकन्दर के बाद डेमेट्रियस ही पहला यूनानी शासक था, जिसकी सेना भारतीय सीमा में प्रवेश कर सकी। उसने एक बड़ी सेना के साथ लगभग 183 ई.पू. में हिन्दुकुश पर्वत को पार कर सिंध और पंजाब पर अधिकार कर लिया। डेमेट्रियस के भारतीय अभियान की पुष्टि पतंजलि के 'महाभाष्य', 'गार्गी संहिता' एवं 'मालविकाग्निमित्रम्' से होती है। इस प्रकार डेमेट्रियास ने पश्चिमोत्तर भारत में 'इंडो-यूनानी' सत्ता की स्थापना की।

मीनेंडर

मीनेंडर प्रथम पश्चिमी राजा था, जिसने बौद्ध धर्म अपनाया और मथुरा पर शासन किया। उसके राज्य की सीमा- बैक्ट्रियापंजाबहिमाचल, तथा जम्मू से मथुरा तक थी। डेमेट्रियस के समान मीनेंडर नामक यवन राजा के भी अनेक सिक्के उत्तर - पश्चिमी भारत में उपलब्ध हुए हैं। मीनेंडर की राजधानी शाकल (सियालकोट) थी। भारत में राज्य करते हुए वह बौद्ध श्रमणों के सम्पर्क में आया और आचार्य नागसेन से उसने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। बौद्ध ग्रंथों में उसका नाम 'मिलिन्द' आया है। 'मिलिन्द पञ्हो' नाम के पालि ग्रंथ में उसके बौद्ध धर्म को स्वीकृत करने का विवरण दिया गया है।

तिवर  

तिवर या 'तिवल' मौर्य सम्राट अशोक की दूसरी रानी कारुवाकी के गर्भ से उत्पन्न राजकुमार था।[1]

  • तिवर का उल्लेख अशोक के रानी वाले अभिलेख में हुआ है।
  • राजकुमार तिवर के विषय में अधिक जानकारी का अभाव है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  भारतीय इतिहास कोश |लेखक: सच्चिदानन्द भट्टाचार्य |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 191 |

मुखिया  

मुखिया वैदिक काल में गाँव का मुखिया ग्रामणी कहलाता था। ऋग्वेद में उसकी तुलना साक्षात्‌ राजा से की गई है।[1]महावग्ग, कुलावक जातक, खरसर जातक और उभतोभट्ट आदि बौद्ध ग्रंथों में ग्रामणी या ग्रामभोजक का उल्लेख है, जिसे ग्राम की देखरेख करनी पड़ती थी और मालगुज़ारी भी वही वसूल करता था। मनु, शुक्र, विष्णु आदि स्मृतियों में ग्रामिक के कर्तव्य बतलाए गये हैं। 'ग्रामस्याधिपतिं कुर्याद्दश ग्रामपतिं तथा[2], 'ग्राम दोषान्‌ समुत्पन्नांग्रामिक: शनकै: स्वयम्‌। शंसेद् ग्राम दशैशाय दशैशो विशंतीशिने।[3]

'अर्थशास्त्र' और चंद्रगुप्त मौर्य का ग्रामिक संभवत: चुना हुआ कर्मचारी था। गुप्तकाल में भी ग्राम के प्रमुख को ग्रामिक कहते थे। इसके अस्तित्व को मुस्लिम काल में भी माना गया है। बहमनी राज्य में कर वसूल करने के लिए इसकी सहायता ली जाती थी। मुर्शिद कुली ने करवसूली के लिए गाँव पटेल नियुक्त किए थे। अंग्रेजी राज्य में भी मुखिया का अस्तित्व बना रहा। उसकी नियुक्ति आदि के लिए नियम बनाए गए थे। जिलाधीश या उसके द्वारा अधिकृत परगनाधीश प्रत्येक ग्राम या ग्राम समूह के लिए एक या एकाधिक व्यक्तियों को मुखिया नियुक्त करता था, जो अच्छे चालचलन वाला और प्रभावशाली व्यक्ति होता था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  ऋग्वेद 10।105
  2.  मनु. 7।115
  3.  मनु. 7।116
  4.  मुखिया (हिंदी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 17 सितम्बर, 2015।


गुहा वास्तु  

  • गुहा वास्तु भारतीय प्राचीन वास्तुकला का एक बहुत ही सुन्दर नमूना है।
  • अशोक के शासनकाल से गुहाओं का उपयोग आवास के रूप में होने लगा था।
  • गया के निकट बराबर पहाड़ी पर ऐसी अनेक गुफ़ाएँ विद्यमान हैं, जिन्हें सम्राट अशोक ने आवास योग्य बनवाकर आजीवकों को दे दिया था।
  • अशोककालीन गुहायें सादे कमरों के रूप में होती थीं, लेकिन बाद में उन्हें आवास एवं उपासनागृह के रूप में स्तम्भों एवं मूर्तियों से अलंकृत किया जाने लगा। यह कार्य विशेष रूप से बौद्धों द्वारा किया गया।
  • भारत के विभिन्न भागों में सैकड़ों गुहायें बिखरी पड़ी हैं।
  • इनमें से जो गुहायें बौद्ध विहारों के रूप में प्रयुक्त होती थीं, वे सादी होती थीं। उनके बीचों-बीच एक विशाल मंडप तथा किनारे-किनारे छोटी-छोटी कोठरियाँ होती थीं।
  • पूजा के लिए प्रयुक्त गुहाएँ 'चैत्य गृह' कहलाती थीं। जो सुन्दर कला-कृतियाँ होती थीं। चैत्य में एक लम्बा आयताकार मंडप होता था, जिसका अन्तिम भाग गजपृष्ठाकार होता था। स्तम्भों की दो लम्बी पंक्तियाँ इस मंडप को मुख्यकक्षा और दो पार्श्ववीथिकाओं में विभक्त कर देती थीं। गजपृष्ठ में एक स्तूप होता था। द्वारमुख ख़ूब अलंकृत होता था। उसमें तीन दरवाज़े होते थे। बीच का द्वार मध्यवर्ती कक्ष में प्रवेश के लिए तथा अन्य दो द्वार पार्श्वथियों के लिए होते थे। चैत्य के ठीक सामने द्वारमुख के ऊपर अश्वपादत्र (घोड़े की नाल) के आकार का चैत्यवाक्ष होता था।
  • ऐसी अनेक गुहायें महाराष्ट्र के नासिकभाजाभिलसा, कार्ले और अन्य स्थानों पर पाई गई हैं। कार्ले की गुफ़ायें सर्वोत्कृष्ट मानी जाती हैं। इनका निर्माण ईसा पूर्व 200 से ईसा बाद 320 की अवधि में हुआ था।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  पुस्तक 'भारतीय इतिहास कोश' पृष्ठ संख्या-132

सुसीम  

सुसीम अथवा 'सुशीम' मौर्य शासक बिन्दुसार का ज्येष्ठ पुत्र तथा अशोक का सौतेला भाई था। वह सम्राट बिन्दुसार के उत्तराधिकारियों में से एक था। उत्तराधिकार के युद्ध में 274-270 ईसा पूर्व के आसपास सुसीम का वध अशोक द्वारा हुआ।

  1. 'सुमन'[1]
  2. अशोक
  3. तिष्य
  • तिष्य, अशोक का सहोदर भाई और सबसे छोटा था। मौर्य काल की परिपाटी के अनुसार साम्राज्य के एक दूर के प्रांत में अशोक को वाइसराय के रूप में नियुक्त किया गया था। यह प्रांत पश्चिमी भारत में था, जिसका नाम 'अवंतिरट्टम्‌'[2] था। लंका की परम्परा के अनुसार इसकी राजधानी 'उज्जैन' थी, पर भारतीय परम्परा के अनुसार वह उत्तरापथ[3]में 'स्वशों'[4] के राज्य में वाइसराय था, जिसकी राजधानी तक्षशिला थी।
  • अशोक को अस्थायी रूप में वहाँ तब भेजा गया था, जब सुसीम तक्षशिला में विद्रोह का दमन न कर पाया। यह विद्रोह सुसीम के कुप्रबंध के कारण हुआ था। तक्षशिला में सुसीम के समय में ही एक दूसरा विद्रोह उस समय हुआ, जब पाटलिपुत्र का सिंहासन रिक्त हुआ। सुसीम इस विद्रोह को भी शांत ना कर सका। तब अशोक ने अवसर का लाभ उठा कर मंत्री राधागुप्त की सहायता से सिंहासन पर अधिकार कर लिया। *सिंहासन को लेकर सुसीम से अशोक का युद्ध हुआ, जिसमें सुसीम मारा गया।[5]
  • दिव्यावदान[6] पर सिंहल की कथाओं में उत्तराधिकार की घटना एक दूसरे ही रूप में वर्णित है। इसमें अशोक ने उज्जैन से सिंहासन प्राप्त किया। उसकी नियुक्ति वहीं थी। काफ़ी समय से वह उज्जैन में ही वाइसराय था। अशोक ने उत्तराधिकार के इस युद्ध में तिष्य को छोड़कर सभी भाइयों का वध कर दिया।
  • श्रीलंकाई स्रोतों के अनुसार उत्तराधिकार की लड़ाई में सिर्फ़ अशोक का छोटा भाई तिष्य बचा था। लेकिन तारानाथ के अनुसार अशोक ने सिर्फ़ छ: भाइयों की हत्या की थी। स्पष्टत: 98 की अपेक्षा छ: अधिक सत्य प्रतीत होता है। इसके अतिरिक्त वृहत शिलालेख पाँच में अशोक उन अधिकारियों का उल्लेख करता है, जिन्हें अध्यक्षता के कार्यों के अतिरिक्त उसके भाइयों, बहनों तथा अन्य सम्बंधियों के परिवारों के कल्याण का कार्य देखना था।
  • उत्तराधिकार की यह लड़ाई चार वर्षों तक चली तथा अपनी स्थिति मजबूत करके ही अशोक ने 286 ई.पू. में अपना राज्याभिषेक करवाया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  उत्तरी परम्पराओं का सुसीम, जो सबसे बड़ा था।
  2.  अर्थात अवंति राष्ट्र या अवंति का प्रांत। महाबोधिवंश, पृ. 98
  3.  दिव्यावदान
  4.  सम्भवत: मनु, 10, 22 और एपि. इंडिया i, 132 में उल्लिखित खसों से तात्पर्य है
  5.  दिव्यावदान के अनुसार उत्तराधिकार की लड़ाई दो भाइयों के बीच ही हुई थी, जबकि 'महाबोधिवंश' में इस युद्ध में एक ओर अशोक था और दूसरी ओर 98 भाई थे, जिन्होंने अपने सबसे बड़े भाई सुसीम का साथ दिया था, जो उस समय 'युवराज' और दरअसल सिंहासन का वास्तविक अधिकारी था। 'दिव्यावदान' अशोक के दावे के समर्थन में कहता है कि- "जब बिंदुसार जीवित था तो उसने एक बार आजीविक साधु 'पिंगलवत्स' को बुलाया था। पिंगलवत्स ने फैसला किया था कि सभी राजकुमारों में अशोक सिंहासन के सबसे उपयुक्त है। इस ग्रंथ के अनुसार अशोक के समर्थन में बिंदुसार के सभी मंत्री खल्लाटक (प्रधानमंत्री) और 500 अन्य मंत्री थे। ध्यान देने की बात यह भी है कि चीनी यात्री इत्सिंगने एक जनश्रुति का उल्लेख किया है, जिसमें स्वयं बुद्ध ने अशोक के 'चक्रवर्त्तित्व' की भविष्यवाणी की थी। जनश्रुति है कि कपड़े का एक टुकड़ा और सोने की छड़ी दोनों अट्ठारह भागों में विभक्त हो गये थे। इसका भाष्य करते हुए भगवान बुद्ध कह रहे हैं कि "उनके निर्वाण के सौ से अधिक साल बीतने पर उनके उपदेश 18 भागों में विभक्त हो जाएँगे। जब अशोक नाम का एक राजा पैदा होगा जो सकल जंबूद्वीप पर शासन करेगा।" तक्कुस का इ-त्सिंग, पृ. 14
  6.  दिव्यावदान, 26, पृ. 368 में भी अशोक के बारे में बुद्ध की एक भविष्यवाणी का उल्लेख है, जिसमें भगवान ने कहा था कि- "यह धर्मात्मा राजा उनकी धातुओं पर 84000 'धर्म्राजिक' बनवायेगा। दिव्यावदान, अध्याय, 26

सुदामा गुहा  

सुदामा गुहा गया के निकट बराबर की पहाड़ियों में स्थित है। मौर्य सम्राट अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 12वें वर्ष में 'सुदामा गुहा' आजीवक भिक्षुओं को दान में दी थी।

  • अशोक ने वास्तुकला के इतिहास में एक नई शैली का प्रारम्भ किया था, अर्थात चट्टानों को काटकर कंदराओं का निर्माण करना।
  • गया के निकट बाराबर की पहाड़ियों में अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 12वें वर्ष में सुदामा गुहा आजीवक भिक्षुओं को दान कर दी थी।
  • इस गुफा में दो कोष्ठ हैं। एक गोल व्यास है, जिसकी छत अर्धवृत्त या ख़रबूज़िया आकार की है। उसके बाहर का मुखमंडप आयताकार है, किन्तु छत गोलाकार है।
  • सुदामा गुहा की दोनों कोष्ठों की भित्तियों और छतों पर शीशे जैसी चमकती हुई पालिश है। इससे ज्ञात होता है कि चैत्य गृह का मौलिक विकास अशोक के समय में ही प्रारम्भ हो गया था और इस शैली का पूर्ण विकास महाराष्ट्र के भाजाकन्हेरी और कार्ले चैत्यगृह में परिलक्षित होता है।

अग्रोनोमोई  

यूनानी लेखक स्त्रावो के अनुसार, चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में अग्रोनोमोई नामक अधिकारी नदियों की देखभाल, भूमि की नापजोख, जलाशयों का निरीक्षण और नहरों की देखभाल करते थे, ताकि सभी लोगों को पानी ठीक से मिल सके।[1]

  • यह अधिकारी शिकारियों पर भी नियंत्रण रखता था और उसको लोगों को पुरस्कृत और दंड देने का अधिकार था।
  • वह कर वसूलता था और भूमि के स्वामित्व सम्बन्धी मामलों का भी निरीक्षण करता था।
  • सार्वजनिक सड़कों का निर्माण और दस-दस स्टेडिया की दूरी पर स्तम्भ लगाने के काम का निरीक्षण भी यही अधिकारी करता था।
  • इसकी पहचान कौटिल्य अर्थशास्त्र में वर्णित 'अध्यक्ष' और अशोक के शिलालेख में वर्णित 'राजुक' से की जाती है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  भारतीय इतिहास कोश |लेखक: सच्चिदानन्द भट्टाचार्य |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 06 |

आम्भि  

  • आम्भि ई. पू. 327-26 में भारत पर सिकन्दर महान् के आक्रमण के समय तक्षशिला का राजा था।
  • उसका राज्य सिंधु नदी और झेलम नदी के बीच विस्तृत था।
  • वह पुरु अथवा पोरस का प्रतिद्वन्द्वी राजा था, जिसका राज्य झेलम के पूर्व में था।
  • कुछ तो पोरस से ईर्ष्या के कारण और कुछ अपनी कायरता के कारण उसने स्वेच्छा से सिकन्दर की अधीनता स्वीकार कर ली और पोरस के विरुद्ध युद्ध में सिकन्दर का साथ दिया।
  • सिकन्दर ने उसको पुरस्कार स्वरूप पहले तो तक्षशिला के राजा के रूप में मान्यता प्रदान कर दी और बाद में सिंधु के चिनाब संगम क्षेत्र तक का शासन उसे सौंप दिया।
  • सम्भवत: चन्द्रगुप्त मौर्य ने उससे सारा प्रदेश छीन लिया और पूरे पंजाब से यवनों (यूनानियों) को निकाल बाहर किया।
  • जब सिकन्दर के सेनापति एवं उसके पूर्वी साम्राज्य के उत्तराधिकारी सेल्युकस ने भारत पर आक्रमण किया तो उस समय भी पंजाब चन्द्रगुप्त मौर्य के अधिकार में था।
  • आम्भि का अन्त कैसे हुआ, इसकी जानकारी नहीं है।

सतियपुत्र  

सतियपुत्र अथवा 'सत्य पुत्रों' के राज्य का उल्लेख मौर्यसम्राट अशोक के द्वितीय शिलालेख में उसके साम्राज्य की दक्षिणी सीमाओं पर हुआ है। इसकी निश्चित पहचान नहीं हो सकी है, किंतु यह निश्चित ही केरल अथवा चेर राज्य के निकट स्थित था।

  • अशोक के 13वें शिलालेख में सतियपुत्रों के 'सतियषुत्रदेश' का उल्लेख हुआ है, जो अशोक के साम्राज्य के बाहर, किंतु उसके प्रत्यंत या पड़ोस में स्थित था। यह वर्तमान केरल के उत्तर में था। इसका एक नाम 'कूषक' भी था।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 931 |

चाणक्य  

चाणक्य
चाणक्य
पूरा नामचाणक्य
अन्य नामकौटिल्य, विष्णुगुप्त
जन्मअनुमानत: ईसा पूर्व 370
जन्म भूमिपंजाब
मृत्युअनुमानत: ईसा पूर्व 283
मृत्यु स्थानपाटलिपुत्र
पति/पत्नी'बृहत्कथाकोश' के अनुसार चाणक्य की पत्नी का नाम 'यशोमती' था।
कर्म भूमिभारत
कर्म-क्षेत्रशिक्षक
मुख्य रचनाएँअर्थशास्त्र
प्रसिद्धिराजनीतिज्ञ और चंद्रगुप्त मौर्य के महामंत्री
विशेष योगदानचाणक्य की सहायता और उनके कुशल निर्देशन से ही चंद्रगुप्त मौर्य ने भारत में मौर्य वंश की स्थापना की थी।
नागरिकताभारतीय
संबंधित लेखचंद्रगुप्त मौर्यधननंदतक्षशिला
मुख्य प्रसंग'मुद्राराक्षस' में कहा गया है कि राजा नन्द ने भरे दरबार में चाणक्य को उसके उस पद से हटा दिया, जो उसे दरबार में दिया गया था। इस पर चाणक्य ने शपथ ली कि "वह उसके परिवार तथा वंश को निर्मूल करके नन्द से बदला लेगा।"
अन्य जानकारीचाणक्य ने 'अर्थशास्त्र' नामक एक ग्रन्थकी रचना की, जो तत्कालीन राजनीति, अर्थनीति, इतिहास, आचरण शास्त्र, धर्मआदि पर भली-भाँति प्रकाश डालता है। 'अर्थशास्त्र' मौर्य काल के समाज का दर्पण है, जिसमें समाज के स्वरूप का सर्वागं देखा जा सकता है।

कौटिल्य अथवा 'चाणक्य' अथवा 'विष्णुगुप्त' (जन्म- अनुमानत: ईसा पूर्व 370, पंजाब; मृत्यु- अनुमानत: ईसा पूर्व 283, पाटलिपुत्र) सम्पूर्ण विश्व में एक महान् राजनीतिज्ञ और मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के महामंत्री के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनका व्यक्तिवाचक नाम 'विष्णुगुप्त', स्थानीय नाम 'चाणक्य' (चाणक्यवासी) और गोत्र नाम 'कौटिल्य' (कुटिल से) था। ये चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रधानमन्त्री थे। चाणक्य का नाम संभवत उनके गोत्र का नाम 'चणक', पिता के नाम 'चणक' अथवा स्थान का नाम 'चणक' का परिवर्तित रूप रहा होगा। चाणक्य नाम से प्रसिद्ध एक नीतिग्रन्थ 'चाणक्यनीति' भी प्रचलित है। तक्षशिला की प्रसिद्धि महान् अर्थशास्त्री चाणक्य के कारण भी है, जो यहाँ प्राध्यापक था और जिसने चन्द्रगुप्त के साथ मिलकर मौर्य साम्राज्य की नींव डाली। 'मुद्राराक्षस' में कहा गया है कि राजा नन्द ने भरे दरबार में चाणक्य को उसके उस पद से हटा दिया, जो उसे दरबार में दिया गया था। इस पर चाणक्य ने शपथ ली कि "वह उसके परिवार तथा वंश को निर्मूल करके नन्द से बदला लेगा।" 'बृहत्कथाकोश' के अनुसार चाणक्य की पत्नी का नाम 'यशोमती' था।[1]

जन्म तथा शिक्षा

माना जाता है कि चाणक्य ने ईसा से 370 वर्ष पूर्व ऋषि चणक के पुत्र के रूप में जन्म लिया था। वही उनके आरंभिक काल के गुरु थे। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि चणक केवल उनके गुरु थे। चणक के ही शिष्य होने के नाते उनका नाम 'चाणक्य' पड़ा। उस समय का कोई प्रामाणिक इतिहास उपलब्ध नहीं है। इतिहासकारों ने प्राप्त सूचनाओं के आधार पर अपनी-अपनी धारणाएं बनाई। परंतु यह सर्वसम्मत है कि चाणक्य की आरंभिक शिक्षा गुरु चणक द्वारा ही दी गई। संस्कृत ज्ञान तथा वेद-पुराण आदि धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन चाणक्य ने उन्हीं के निर्देशन में किया। चाणक्य मेधावी छात्र थे। गुरु उनकी शिक्षा ग्रहण करने की तीव्र क्षमता से अत्यंत प्रसन्न थे। तत्कालीन समय में सभी सूचनाएं व विधाएं धर्मग्रंथों के माध्यम से ही प्राप्त होती थीं। अत: धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन शिक्षा प्राप्त का एकमात्र साधन था। चाणक्य ने किशोरावस्था में ही उन ग्रंथों का सारा ज्ञान ग्रहण कर लिया था।[2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

पाण्डेय, प्रो. संगमलाल विश्व के प्रमुख दार्शनिक (हिन्दी)। भारतडिस्कवरी पुस्तकालय: वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, नई दिल्ली, 158।

  1.  कौटिल्य (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 16 जुलाई, 2013।
  2.  चाणक्य जीवन गाथा (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 14 फ़रवरी, 2014।
  3.  'कौटिल्य' और 'अर्थशास्त्र'
  4.  ऐसे हुई थी आचार्य चाणक्य की मौत? (हिंदी)। । अभिगमन तिथि: 13 फरवरी, 2020।

धनानंद  

धनानंद अथवा धननंद मगध देश का एक राजा था। इसकी राज्य-सीमा व्यास नदी तक फैली थी। मगध की सैनिक शक्ति के भय से ही सिकंदर के सैनिकों ने व्यास नदीसे आगे बढ़ना अस्वीकार कर दिया था। पालि ग्रन्थों में मगध के तत्कालीन शासक का नाम[1] धननंद बताया गया है। इसके अतिरिक्त पालि ग्रन्थों में नौ नंदों के नाम तथा उनके जीवन से सम्बन्धित कुछ बातें भी बताई गई हैं। इन ग्रन्थों से हमें पता चलता है कि नंदवंश के नौ राजा, जो सब भाई थे, बारी-बारी से अपनी आयु के क्रम से (वुड्ढपटिपाटिया) गद्दी पर बैठे। धननंद उनमें सबसे छोटा था। सबसे बड़े भाई का नाम उग्रसेन नंद बताया गया है; वही नंदवंश का संस्थापक था।[2]


धनानंद  

धनानंद अथवा धननंद मगध देश का एक राजा था। इसकी राज्य-सीमा व्यास नदी तक फैली थी। मगध की सैनिक शक्ति के भय से ही सिकंदर के सैनिकों ने व्यास नदीसे आगे बढ़ना अस्वीकार कर दिया था। पालि ग्रन्थों में मगध के तत्कालीन शासक का नाम[1] धननंद बताया गया है। इसके अतिरिक्त पालि ग्रन्थों में नौ नंदों के नाम तथा उनके जीवन से सम्बन्धित कुछ बातें भी बताई गई हैं। इन ग्रन्थों से हमें पता चलता है कि नंदवंश के नौ राजा, जो सब भाई थे, बारी-बारी से अपनी आयु के क्रम से (वुड्ढपटिपाटिया) गद्दी पर बैठे। धननंद उनमें सबसे छोटा था। सबसे बड़े भाई का नाम उग्रसेन नंद बताया गया है; वही नंदवंश का संस्थापक था।[2]

जीवन परिचय

चंद्रगुप्त की तरह ही उसका प्रारम्भिक जीवन भी अत्यन्त रोमांचपूर्ण था। वह मूलत: सीमांत प्रदेश का निवासी था।[3]एक बार डाकुओं ने उसे पकड़ लिया और उसे मलय नामक एक सीमांत प्रदेश में ले गए [4]और उसे इस मत का समर्थक बना लिया कि लूटमार करना ज़मीन जोतने से अच्छा व्यवसाय है। वह अपने भाइयों तथा सगे-सम्बन्धियों सहित डाकुओं के एक गिरोह में भरती हो गया और शीघ्र ही उनका नेता बन बैठा। वे आसपास के राज्यों पर धावे मारने लगे[5] और सीमांत के नगरों पर चढ़ाई करके यह चुनौती दी : ‘या तो अपना राज्य हमारे हवाले कर दो या युद्ध करो[6]’ धीरे-धीरे वे सार्वभौम सत्ता पर अधिकार करने के स्वप्न देखने लगे।[7] इस प्रकार एक डाकू राजा राजाओं का राजा बन बैठा।[2]

चाणक्य का अपमान

कुछ भी हो इतना तो निश्चित है कि जिस समय चाणक्यपाटलिपुत्र आया था, उस समय धननंद वहाँ का राजा था। वह अपने धन के लोभ के लिए बदनाम था। वह ’80 करोड़ (कोटि) की सम्पत्ति’ का मालिक था और "खालों, गोंद, वृक्षों तथा पत्थरों तक पर कर वसूल" करता था। तिरस्कार में उसका नाम धननंद रख दिया गया था, क्योंकि वह ‘धन के भण्डार भरने का आदी’ था।[8] कथासरित्सागर में नंद की ’99 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं’ का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि उसने गंगा नदी की तली में एक चट्टान खुदवाकर उसमें अपना सारा ख़ज़ाना गाड़ दिया था।[9]उसकी धन सम्पदा की ख्याति दक्षिण तक पहुँची। तमिल भाषा की एक कविता में उसकी सम्पदा का उल्लेख इस रूप में किया गया है कि "पहले वह पाटलि में संचित हुई और फिर गंगा की बाढ़ में छिप गई।"[10] परन्तु चाणक्य ने उसे बिल्कुल ही दूसरे रूप में देखा। अब वह धन बटोरने के बजाए, उसे दान-पुण्य में व्यय कर रहा था; यह काम दानशाला नामक एक संस्था द्वारा संगठित किया जाता था। जिसकी व्यवस्था का संचालन एक संघ के हाथों में था, जिसका अध्यक्ष कोई ब्राह्मण होता था। नियम यह था कि अध्यक्ष एक करोड़ मुद्राओं तक का दान दे सकता था और संघ का सबसे छोटा सदस्य एक लाख मुद्राओं तक का। चाणक्य को इस संघ का अध्यक्ष चुना गया। परन्तु, होनी की बात, राजा को उसकी कुरूपता तथा उसका धृष्ट स्वभाव अच्छा न लगा और उसने उसे पदच्युत कर दिया। इस अपमान पर क्रुद्ध होकर चाणक्य ने राजा को शाप दिया, उसके वंश को निर्मूल कर देने की धमकी दी और एक नग्न आजीविक साधु के भेष में उसके चंगुल से बच निकला।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  (जिसका उल्लेख संस्कृत ग्रन्थों में केवल नंद के नाम से किया गया है,)
  2. ↑ 2.0 2.1 चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक:राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 34-36 |
  3.  (पच्चंत-वासिक)
  4.  (मुद्राराक्षस में मलय का उल्लेख मिलता है)
  5.  (रट्ठं विलुमपमानो विचरंतो)
  6.  (रज्जम वा देंतु युद्धं वा)।
  7.  (सिंहली भाषा में महावंस टीका का मूलपाठ)
  8.  (महावंस टीका)
  9.  (महावंस टीका)
  10.  (ऐय्यंगर कृत-बिगिनिंग्स ऑफ़ साउथ इंडियन हिस्ट्री, पृष्ठ 89)
  11.  मौर्य साम्राज्य का इतिहास |लेखक: सत्यकेतु विद्यालंकार |प्रकाशक: श्री सरस्वती सदन नई दिल्ली |पृष्ठ संख्या: 147 |

मैगस्थनीज़  

मैगस्थनीज़ ने 'इण्डिका' में भारतीय जीवन, परम्पराओं, रीति-रिवाजों का वर्णन किया है। मैगस्थनीज़ को अपने समय का एक बेहतरीन विदेशी यात्री और यूनानीभूगोलविद माना जाता था।

  • चंद्रगुप्त मौर्य एवं सेल्युकस के मध्य हुई संधि के अंतर्गत, जहां सेल्यूकस ने अनेक क्षेत्र 'एरिया', 'अराकोसिया', 'जेड्रोशिया', 'पेरापनिसदाई' आदि चन्द्रगुप्त को प्रदान किये, वहीं उसने मैगस्थनीज़नामक यूनानी राजदूत भी मौर्य दरबार में भेजा।
  • भारत में राजदूत नियुक्त होने से पूर्व मैगस्थनीज़ 'एराक्रोशिया' के क्षत्रप 'सिबाइर्टिओस' के यहां महत्त्वपूर्ण अधिकारी के पद पर कार्यरत था।
  • 'शानबैक' ने 1846 में इस ग्रंथ के बिखरे हुए अंशों को 'मैगस्थनीज़ इण्डिका' नामक शीर्षक ग्रंथ में संग्रहित किया।
  • उसने भारत की आकृति को अनियमित सम चतुर्भुज के समान बताया, जिसका पूर्व से पश्चिम की ओर विस्तार 28,000 स्टेडिया एवं उत्तर से दक्षिण की ओर विस्तार 32,000 स्टेडिया था।
  • मैगस्थनीज़ ने गंगा नदी एवं सिंधु नदी का ज़िक्र अपने ग्रंथ में किया है और साथ ही कुल भारतीय नदियों की संख्या 58 बतायी है।
  • उसने 'सिलास' नामक एक ऐसी नदी का उल्लेख किया है, जिसमें कुछ भी तैर नहीं सकता था।
  • मैगस्थनीज़ ने भारत से प्राप्त होने वाली खनिज सम्पदा में सोनाचांदीताँबा एवं टिन की प्रशंसा की है।
  • मैगस्थनीज़ के अनुसार भारत में चीटियां सोने का संग्रह करती थीं।
  • पशुओं में मैगस्थनीज़ भारतीय हाथी से काफ़ी प्रभावित था।
  • पक्षियों में तोते के बारे में मैगस्थनीज़ का कहना है कि, ये बच्चों की तरह बातें करते थे।
  • उसने भारतीय समाज को सात वर्गों में बांटा है-
  1. ब्राह्मण एवं दार्शनिक- इनकी संख्या अल्प थी।
  2. कृषक- इनकी संख्या सर्वाधिक थी।
  3. पशुपालक एवं आखेटक- इनका जीवन भ्रमणशील था।
  4. व्यापारी, मज़दूर एवं कारीगर
  5. योद्धा व सैनिक- संख्या की दृष्टि से कृषकों के बाद दूसरे स्थान पर।
  6. निरीक्षक एवं गुप्तचर
  7. मंत्री एवं परामर्शदाता- ये संख्या में सबसे अल्प थे, पर अधिकार में सबसे आगे थे।
  • मैगस्थनीज़ के अनुसार मौर्य काल में बहुविवाह प्रथा का प्रचलन था। शिक्षा व्यवस्था ब्राह्मण करते थे।
  • दास प्रथा का प्रचलन नहीं था। मैगस्थनीज़ ने भारतीय लोगों की ईमानदारी की प्रशंसा करते हुए कहा कि चोरी प्रायः नहीं होती थी।
  • मेगस्थनीच ने भारतवासियों की धार्मिक भावना पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि, "यहाँ के लोग 'डायोनियस' (शिव) एवं 'हेराक्लीज' (कृष्ण) की उपासना करते थे"।
  • उसने अपनी यात्रा के विवरण में पाटलिपुत्र का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया है। उसने पाटलिपुत्र को 'पालिब्रोथा' नाम से सम्बोधित किया है।
  • अपने वर्णन में उसने पाटलिपुत्र को सोन नदी एवं गंगा नदी के संगम पर स्थित तत्कालीन भारतकासबसे बड़ा नगर बताया है।
  • यह नगर 80 स्टेडिया लम्बा एवं 15 स्टेडिया चौड़ा था। यह नगर चारों ओर से लगभग 184 मीटर चौड़ी एवं 30 क्युबिक गहरी खाई से घिरा था।
  • यही पर चन्द्रगुप्त मौर्य का अनोखा राजप्रसाद स्थित था।
  • मैगस्थनीज़ के अनुसार- यहां का शासन कुल 30 सदस्यों द्वारा 5-5 सदस्यों की 6 समितियां करती थीं।

यवन  

यवन एक जाति, जो गांधार देश की सीमा पर रहती थी। प्राचीन काल में यूनान में रहने वाले लोगों के लिए भी 'यवन' शब्द का प्रयोग होता था। ग्रीक लोगों को फ़ारसी में 'यौन' कहा जाता था। मान्यता है कि 'यवन' शब्द इसी 'यौन' का रूपांतर है।

टीका टिप्पणी

  1.  भट्ट, जनार्दन अशोक के धर्मलेख (हिंदी)। नई दिल्ली: प्रकाशन विभाग, 120।

संघमित्रा  

संघमित्रा, राजकुमार महेन्द्र की भगिनी (बहिन) थी। उत्तर भारत की बुद्ध अनुश्रुतियों के आधार पर महेन्द्र को मौर्यसम्राट अशोक का भाई माना गया है। यद्यपि सिंहली ग्रन्थों और अनुश्रुतियों में संघमित्रा और महेन्द्र भाई-बहिन तथा अशोक की शाक्य रानी विदिशा देवी से उत्पन्न कहे गये हैं।[1]

बौद्ध दीक्षा

कलिंग विजय के बाद अशोक पूर्णत: बौद्ध धर्म को समर्पित हो गया था। उसकी दोनों सन्तानें बड़ी प्रतिभाशाली और तेजस्वी थीं। जिस समय महेन्द्र की आयु 20 वर्ष और संघमित्रा की 18 वर्ष थी, सम्राट अशोक ने महेन्द्र को युवराज घोषित कर दिया। इस अवसर पर बौद्धाचार्य ने कहा कि, "बौद्ध धर्म का वास्तविक मित्र तो वह है, जो धर्मकार्य के लिए अपने पुत्र और पुत्री को समर्पित कर दे।" यह सुनकर सम्राट अशोक ने अपने पुत्र और पुत्री की इच्छा पूछी। पिता के प्रभाव से वे दोनों पहले ही बौद्ध धर्म की ओर आकृष्ट थे। दोनों ने इसे अपना अहोभाग्य समझा और भाई-बहिन दोनों बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गए। महेन्द्र का नाम 'धर्मपाल' पड़ा और संघमित्रा 'आयुपाली' कहलाई। महेन्द्र ने 32 वर्ष की आयु में धर्म प्रचार करने के लिए सिंहल द्वीप (श्रीलंका) की यात्रा की। उसके प्रभाव से राजा 'तिष्य' सहित बड़ी संख्या में लोगों ने बौद्ध धर्म को ग्रहण किया।[2]

ऐतिहासिक तथ्य

महावंश से पता चलता है कि अशोक के सबसे बड़े पुत्र महेंद्र और उसकी पुत्री संघमित्रा ने अशोक के अभिषेक के छ्ठे वर्ष में 'प्रवज्या' ली थी। उस समय उनकी उम्र क्रमश: 20 और 18 वर्ष थी। अब यदि अशोक के अभिषेक के तिथि ई.पू. 270 हो तो महेंद्र का जन्म ई.पू. 284 और संघमित्रा का जन्म ई.पू. 282 में हुआ होगा। यह भी उल्लेखनीय है कि अशोक के दामाद अग्निब्रह्मा ने उसके अभिषेक के चौथे वर्ष अर्थात ई.पू. 266 में 'प्रवज्या' ली थी। उस समय वह एक बेटे का बाप बन चुका था। इस प्रकार संघमित्रा से उसका विवाह ई.पू. 268 में अवश्य हो गया होगा, जब संघमित्रा की उम्र चौदह वर्ष रही होगी।[3]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |पृष्ठ संख्या: 458 |
  2.  भारतीय चरित कोश पृ-878
  3.  मुखर्जी, राधाकुमुद अशोक (हिंदी)। नई दिल्ली: मोतीलाल बनारसीदास, 7-8।

महेंद्र (अशोक का पुत्र)  

  • देवी से अशोक को एक पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्राहुई।
  • महावंश से पता चलता है कि अशोक के सबसे बड़े पुत्र महेंद्र और उसकी पुत्री संघमित्रा ने अशोक के अभिषेक के छ्ठे वर्ष में 'प्रवज्या' ली थी।
  • उस समय उनकी उम्र क्रमश: 20 वर्ष थी। अब यदि अशोक के अभिषेक के तिथि ई.पू. 270 हो तो महेंद्र का जन्म ई.पू. 284 में हुआ होगा।
मुखर्जी, राधाकुमुद अशोक (हिंदी)। नई दिल्ली: मोतीलाल बनारसीदास, 8-9।

देवी (अशोक की पत्नी)  

  • सिंहली अनुश्रुतियों के अनुसार उसकी पहली पत्नी का नाम देवी था, जो वेदिसगिरि के एक धनी श्रेष्ठी की पुत्री थी।
  • अशोक ने उसके साथ तब विवाह किया, जब वह उज्जैन में वाइसराय था।
  • महाबोधिवंश [1] में उसे वेदिस-महादेवी और शाक्यानी[2] या शाक्यकुमारी [3] कहा गया है।
  • प्रसेनजित के पुत्र विडूडभ ने जब अपनी ननिहाल वालों को तंग करना शुरू किया तो ये शाक्य उसके भय से अपना वतन छोड़कर वेदिसा [4] चले गये थे।[5] इस प्रकार अशोक की पहली पत्नी बुद्ध के कुल से सम्बद्ध थी।
  • इसके बारे में यह भी कहा गया है कि उसने वेदिसगिरि के महाविहार का निर्माण कराया था।[6]साँची और भिलसा का सम्भवत: यह पहला निर्माण था। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि अपने निर्माणों के लिए अशोक ने सांची और उसके उपांत के मनोहर वातावरण को क्योंचुना।
  • इससे भी प्राचीन साहित्य में विदिशा का उल्लेख एक प्रसिद्ध बौद्ध स्थान के रूप में आया है।[7] देवी से अशोक को एक पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा हुई।
  • महावंश के अनुसार देवी अशोक के साथ पाटलिपुत्रनहीं गयी, क्योंकि वहाँ अशोक की अग्रमहिषीअसंधिमित्रा रहती थी। [8]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  महाबोधिवंश,पृ. 116
  2.  महाबोधिवंश,पृ. 116
  3.  महाबोधिवंश,पृ. 98
  4.  वेदिसं नगरं
  5.  विडूडभभयागतानं साकियानं आवासं वेदिसं
  6.  ताय कारापितं वेदिसगिरिमहाविहारं
  7.  सुत्तनिपात
  8.  महावंश,85, xx

अगलस्सोई  

अगलस्सोई की पहचान पाणिनि के व्याकरण में उल्लिखित अग्रश्रेणय: से की जाती है।

  • अगलस्सोई सिकन्दर के आक्रमण के समय सिन्धु नदी की घाटी के निचले भाग में शिविगण के पड़ोस में रहने वाला एक गण था।
  • शिवि गण जंगली जानवरों की खाल के वस्त्र पहनते थे और विभिन्न प्रकार के "गदा" और "मुगदर" जैसे हथियारों का प्रयोग करते थे।
  • सिकन्दर जब सिन्धु नदी के मार्ग से भारत से वापस लौट रहा था, तो इस गण के लोगों से उसका मुक़ाबला हुआ।
  • अगलस्सोई गण की सेना में 40 हज़ार पैदल और तीन हज़ार घुड़सवार सैनिक थे। उन्होंने सिकन्दर के छक्के छुड़ा दिए, लेकिन अन्त में वे पराजित हो गए।
  • यूनानी इतिहासकारों के अनुसार अगलस्सोई गण के 20 हज़ार आबादी वाले एक नगर के लोगों ने स्वयं अपने नगर में आग लगा दी और अपनी स्त्रियों और बच्चों के साथ जलकर मर गए, ताकि उन्हें यूनानियों की दासता न भोगनी पड़े। यह कृत्य राजपूतों में प्रचलित जौहर प्रथा से मिलता प्रतीत होता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  • भारतीय इतिहास कोश पृष्ठ संख्या-05

बाहरी कड़ियाँ

अस्सपेसिओई गण  

  • अस्सपेसिओई गण भारत पर सिकन्दर महान् के आक्रमण के समय पश्चिमोत्तर सीमा पर कुनड़ अथवा त्रिचाल नदी की घाटी में रहता था।
  • इन गण ने यवन आक्रमणकारियों से डट कर मोर्चा लिया था।
  • सिकन्दर को इन लोगों से दो लड़ाइयाँ लड़नी पड़ी और उसके बाद ही वह उनका दमन कर सका।

अस्सकेनोई गण  

  • अस्सकेनोई गण भारत पर सिकन्दर महान् के आक्रमण के समय मलकंद दर्रे के निकट स्वात घाटी के एक हिस्से में रहता था।
  • उसके पास एक बड़ी सेना थी और मस्सग दुर्ग उनकी राजधानी थी।
  • यह दुर्ग प्राकृतिक दृष्टि से दुर्भेद्य था और उसकी रक्षा के लिए एक ऊँची प्राचीर और गहरी परिखा का निर्माण किया गया था।
  • अस्सकेनोई लोगों ने सिकन्दर से जमकर लोहा लिया और उनके एक तीर से सिकन्दर घायल भी हो गया।
  • लेकिन अन्त में विजय सिकन्दर की ही हुई।
  • उसने मस्सग दुर्ग पर अधिकार कर लिया और भंयकर नरसंहार के बाद अस्सकेनोई लोगों का दमन कर दिया।
  • संस्कृत में इस गण का नाम आश्वकायन अथवा अश्वक है।

अंतपाल  

अंतपाल प्राचीन समय में मौर्य साम्राज्य की सीमाओं की रक्षा करने वाले राजकर्मचारियों को कहा जाता था। कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' से भी अंतपालों के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। 'अंतपाल' शब्द साधारणत: सीमांत प्रदेश के शासक या गवर्नर को निर्दिष्ट करता है। यह शासक सैनिक, असैनिक दोनों ही प्रकार का होता था।[1]

  • अंतपालों का वेतन कुमार, पौर, व्यावहारिक मंत्री तथा राष्ट्रपाल के बराबर होता था।
  • मौर्य सम्राट अशोक के समय अंतपाल ही 'अंतमहामात्र' कहलाने लगे थे।
  • गुप्त काल में अंतपाल को 'गोप्ता' नाम से सम्बोधित किया जाने लगा था।
  • 'मालविकाग्निमित्र' नामक नाटक में वीरसेन तथा एक अन्य अंतपाल का भी उल्लेख हुआ है।
  • वीरसेन नर्मदा के किनारे स्थित अंतपाल दुर्ग का अधिपति था।
  • अंतपालों का कार्य अति महत्वपूर्ण हुआ करता था। ग्रीक कर्मचारी 'स्त्रातेगस' से इन पदाधिकारियों की तुलना करना सहज है।
  • अशोक के शिलालेखों से यह स्पष्ट है कि समय-समय पर केन्द्र से सम्राट प्रान्तों की राजधानियों में महामात्रों को निरीक्षण करने के लिए भेजता था। साम्राज्य के अंतर्गत कुछ-कुछ अर्धस्वशासित प्रदेश थे। यहाँ स्थानीय राजाओं को मान्यता दी जाती थी, किन्तु अंतपापालों द्वारा उनकी गतिविधि पर पूरा नियंत्रण रहता था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  अंतपाल (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 19 फ़रवरी, 2014।

तिस्स  

  • तिस्स (तिष्य) लगभग 250 ई. पू. से 211 ई. पू. तक 'सिंहलद्वीप' (श्रीलंका) का राजा था।
  • सम्राट अशोक के पुत्र राजकुमार महेन्द्र और राजकुमारी संघमित्रा तिस्स के आमंत्रण पर ही श्रीलंका गए थे।
  • इन दोनों ने श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया था।
  • तिस्स अपने नाम के साथ "देवनांप्रिय" (देवताओं का प्रिय) जोड़ता था।
  • क्योंकि सम्राट अशोक भी अपने नाम के साथ देवनांप्रिय जोड़ता थे, इसी कारण से तिस्स ने भी इस नाम को धारण किया था।
  • तिस्स और मौर्य सम्राट अशोक में अत्यन्त सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध थे, तथा श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रसार में उसने बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान किया।
  • तिस्स ने 'अनुराधपुर' की नींव डाली थी, जहाँ बोधगयासे ले जाकर पवित्र बोधिवृक्ष आरोपित किया गया।
  • यह बोधिवृक्ष आज भी विद्यमान है।
भट्टाचार्य, सच्चिदानन्द भारतीय इतिहास कोश, द्वितीय संस्करण-1989 (हिन्दी), भारत डिस्कवरी पुस्तकालय: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, 191।

पुरु  

पुरु चौथी शताब्दी ई.पू. में भारत के एक महान् राजा थे। पुरु का नाम यूनानी इतिहासकारों ने 'पोरस' लिखा है। उनके वर्णनानुसार मकदूनिया के राजा सिकन्दर ने 326 ई. पू. में जब पंजाब पर आक्रमण किया, उस समय पुरु का राज्य झेलम और चिनाब नदियों के बीच में स्थित था। पुरु इस बात का उदाहरण प्रस्तुत करता है कि भारतीय क्षत्रिय राजा शूरवीर और स्वाभिमानी होते थे। यद्यपि पुरु की सिकन्दर द्वारा पराजय हो चुकी थी, फिर भी पुरु का युद्ध कौशल, उसकी वीरता तथा उत्साह ने सिकन्दर को बहुत प्रभावित किया और उसने पुरु से मित्रता कर ली।

पुरु की भूल

पुरु के पड़ोसी, तक्षशिला के राजा आम्भि ने, जिसका राज्य झेलम नदी के पश्चिम में था, सिकन्दर की अधीनता स्वीकार कर ली। किन्तु पुरु ने सिकन्दर के आगे झुकने से इंकार कर दिया और उससे युद्ध भूमि में भेंट करने का निश्चय किया। सिकन्दर ने इस बात का पता लगा लिया था कि उसके शत्रु का मुख्य बल हाथी है और उसने अपनी सेना को बता दिया था कि उनका सामना किस रीति से करना चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि पुरु ने इस बात का पता लगाने की कोशिश नहीं की कि यवन सेना की शक्ति का रहस्य क्या है। यवन सेना का मुख्य बल उसके द्रुतगामी अश्वारोही तथा घोड़ों पर सवार फ़ुर्तीले तीरंदाज़ थे। पुरु को अपनी वीरता और हस्तिसेना का विश्वास था और उसने सिकन्दर को झेलम नदी को पार करने से रोकने की चेष्टा भी नहीं की। पुरु की यही भूल उसकी सबसे बड़ी पराजय का कारण बन गई।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

भारतीय इतिहास कोश |लेखक: सच्चिदानन्द भट्टाचार्य |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 243 |

कर्षापण  

कर्षापण
मगध राज्य का कर्षापण
विवरण'कर्षापण' प्राचीन भारत के विभिन्न राज्यों में प्रचलित सिक्का था। जातकपाणिनि के व्याकरण, तथा चाणक्य के अर्थशास्त्र में रजत और ताम्र के सिक्कों को कर्षापण कहा गया है।
समयप्राचीन भारत
निर्माण धातुसोनाचाँदी, रजत, ताँबा
संबंधित लेखमौर्य कालमौर्य साम्राज्यजातक कथाबिम्बिसारअशोकअजातशत्रु
अन्य जानकारीजातकों के अध्ययन से सिद्ध होता है कि बुद्ध के समय सिक्कों का प्रचलन हो चुका था। इन सिक्कों को 'निक्ख' (निष्क), 'कहापण' (कर्षापण), 'सुवण्ण' (सुवर्ण), 'कंस', 'पाद', 'मास-मासक' और 'काकणिक' कहा जाता था

कर्षापण प्राचीन समय में प्रयुक्त होने वाला स्वर्ण का सिक्का था। जातकों से यह सिद्ध होता है कि बुद्ध के समय में सिक्कों का प्रचलन हो चुका था। इन सिक्कों को निष्क, कर्षापण तथा सुवर्ण, कंस, पाद, मास-मासक और काकणिक कहा जाता था। सम्राट नहपान के समय में स्वर्ण कर्षापण का विनिमय दर 1:35 था।

जातक ग्रंथों में उल्लेख

जातक ग्रन्थों के अनुसार बुद्ध के समय का सर्वाधिक प्रचलित सिक्का 'कर्षापण' अथवा 'कहापण' कहलता था। कर्षापण चाँदी या ताॅंबे का सिक्का था, यह निश्चित बताना कठिन है। जातक अटठ्कथा के अनुसार एक कहापण (कर्षापण) 20 मासे का होता था। बुुद्धघोष का कहना है कि कर्षापण चाँदी का सिक्का होता था।

‘रजत वुच्चति कहापणो’

जातकों से यह प्रतीत होता है कि कर्षापण चाँदी या ताँबे का सिक्का रहा होगा तथा कर्षापणों से प्रायः अनेक वस्तुओं की कीमत तय होती थी। उदाहरणार्थ ‘गामणीचण्ड’ जातक से पता चलता है कि एक जोड़ी बैल की कीमत 24 कर्षापण थी तथा एक गघे का मूल्य प्रायः 8 कर्षापण होता था। 'कुण्डक कुच्छि' जातक में वर्णन मिलता है कि अच्छी जाति के घोड़े की कीमत प्रायः एक हज़ार के 6 हज़ार कर्षापण तक होती थी। 'महावेस्सन्तर' जातक में काशी के बहुमूल्य वस्त्रों की कीमत एक लाख कर्षापण बतायी गई है। अच्छी नस्ल के कुत्ते का मूल्य एक कर्षापण था। 'कण्ह' जातक में काशी के व्यापारी ने 500 गाड़ियों का मरूस्थल पार करने के लिए प्रति बैल दो कर्षापण दिये तथा अर्घमासक या मासक एक दैनिक मजदूर की मजदूरी होती थी।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  जातक ग्रन्थों में वर्णित महात्माबुद्ध कालीन भारत में विनिमय के साधन एवं मुद्रायें (हिन्दी)shriprbhu.blogspot.in। अभिगमन तिथि: 23 अगस्त, 2016।

शकटार  

शकटार मगध के नरेश महानंद का मंत्री था। वह शूद्र था।

महानंद द्वारा दण्ड

मगध के एक नरेश महानंद के दो मंत्रियों में राक्षस ब्राह्मण था और शकटार शूद्र। महानंद ने एक बार क्रुद्ध होकर शकटार को बंदीगृह में डाल दिया और उसके परिवार को एक एक करके भूखा मार डाला। लेकिन बाद में उसे राक्षस के अधीन फिर मंत्री पद पर भी रखा लिया।

शकटार का बदला

शकटार और उसके कुटुम्ब के साथ राजा ने जो व्यवहार किया था, उसे भूलना संभव नहीं था। वह जैसे भी हो महानंद से बदला लेना चाहता था। एक दिन उसने एक ब्राह्मण को देखा जो कुष से पांव कट जाने के कारण उसमें मट्ठा डालकर उसे नष्ट करने में जुटा था। शकटार को अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए वांछित व्यक्ति मिल गया था। वह ब्राह्मण को आदरपूर्वक राजमहल में ले गया और श्राद्ध के आसन पर बैठा दिया।

महानंद ने जब अपरिचित व्यक्ति को पुरोहित के आसन पर बैठा हुआ देखा तो क्रोध में आकर उसे बाल पकड़वाकर बाहर निकलवा दिया। ब्राह्मण इस अपराध को कहाँ सहता। वही बाद में विष्णुगुप्त चाणक्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ और नंद वंश को नष्ट करने में उसने महान् भूमिका निभाई।

द्रव्यवन  

द्रव्यवन मौर्यकालीन भारत में वन का एक प्रकार था, जहाँ से अनेक प्रकार की लकड़ी, लोहा तथा ताँबा इत्यादि धातुएँप्राप्त होती थीं।

  1. हस्तिवन
  2. द्रव्यवन


  • जंगलों पर मौर्य राज्य का अधिकार था। इन वनों की उपज राज्य के कोष्ठागारों में पहुँचाई जाती थी और वहाँ से कारखानों में, जहाँ लकड़ी, मिट्टी तथा धातु की अनेक उपयोगी वस्तुएँ तथा युद्ध के लिए अस्त्र-शस्त्र बनाए जाते थे।

हस्तिवन  

हस्तिवन मौर्यकालीन भारत में वन का एक प्रकार था, जहाँ हाथी रहते थे।

  1. हस्तिवन
  2. द्रव्यवन


  • हस्तिवन में हाथी रहते थे, जो राज्य की सम्पत्ति थे। इन हाथियों को युद्ध आदि के समय प्रयोग में लाया जाता था।

पण्याध्यक्ष  

पण्याध्यक्ष मौर्य साम्राज्य की शासन व्यवस्था में एक अधिकारी का पद था।

  • मौर्य काल में जंगलों पर मौर्य प्रशासन का अधिकार था। इन वनों की उपज राज्य के कोष्ठागारों में पहुँचाई जाती थी और वहाँ से कारखानों में, जहाँ लकड़ी, मिट्टी तथा धातु की अनेक उपयोगी वस्तुएँ तथा युद्ध के लिए अस्त्र शस्त्र बनाए जाते थे। कारखानों में बनी वस्तुएँ पण्याध्यक्ष के नियंत्रण में बाज़ारों में बेची जाती थीं।

उपधा परीक्षण  

उपधा परीक्षण मौर्यकालीन शासन प्रबंध में चलने वाली एक क्रिया थी, जिसके द्वारा मुख्यमंत्री तथा पुरोहित आदि का चुनाव किया जाता था।

  • राजा द्वारा मुख्यमंत्री तथा पुरोहित का चुनाव उनके चरित्र की भली-भाँति जाँच के बाद किया जाता था। इस क्रिया को 'उपधा परीक्षण' कहा गया है (उपधा शुद्धम्)। ये मंत्री एक प्रकार से अंतरंग मंत्रिमंडल के सदस्य थे। राज्य के सभी कार्यों पर इस अंतरंग मंत्रिमंडल में विचार-विमर्श होता था और उनके निर्णय के पश्चात् ही कार्यारम्भ होता था।

परिषा  

परिषा मौर्य काल के शासन प्रबन्ध में राज्य की मंत्रिपरिषद को कहा जाता था। सम्राट अशोक के शिलालेखों में भी 'परिषा' का उल्लेख है।

  • राजा बहुमत के निर्णय के अनुसार कार्य करता था। जहाँ तक मंत्रियों तथा मंत्रिपरिषद के अधिकार का सवाल है, उनका मुख्य कार्य राजा को परामर्श देना था। वे राजा की निरंकुशता पर नियंत्रण रखते थे, किन्तु मंत्रियों का प्रभाव बहुत कुछ उनकी योग्यता तथा कर्सठता पर निर्भर करता था।
  • अशोक के छठे शिलालेख से अनुमान लगता है कि परिषद राज्य की नीतियों अथवा राजाज्ञाओं पर विचार-विमर्श करती थी और यदि आवश्यक समझती थी तो उनमें संशोधन का सुझाव भी देती थी।
  • यह राजा के हित में था कि वह मंत्री या परिषद के सदस्यों के परामर्श से लाभ उठाए। किन्तु किसी नीति या कार्य के विषय में अन्तिम निर्णय राजा के ही हाथ में होता था।

कंटकशोधन न्यायालय  

कंटकशोधन न्यायालय मौर्य कालीन शासन व्यवस्था का एक अंग था। मौर्य काल में ग्रामसंघ और राजा के न्यायलय के अतिरिक्त अन्य सभी न्यायलय दो प्रकार के थे-

  1. कंटकशोधन
  2. धर्मस्थीय
  • धर्मस्थीय न्यायालयों का न्याय-निर्णय, धर्मशास्त्र में निपुण तीन धर्मस्थ या व्यावहारिक तथा तीन अमात्यकरते थे। इन्हें एक प्रकार से दीवानी अदालतें कह सकते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार ये वे न्यायालय थे, जो व्यक्तियों के पारस्परिक विवाद के सम्बन्ध में निर्णय देते थे।
  • कंटकशोधन न्यायालय के न्यायधीश तीन प्रदेष्ट्रि तथा तीन अमात्य होते थे और राज्य तथा व्यक्ति के बीच विवाद इनके न्याय के विषय थे। इन्हें हम एक तरह से फ़ौज़दारी अदालत कह सकते हैं।
  • धर्मस्थीय तथा कंटकशोधन न्यायालयों के बीच भेद इतना स्पष्ट नहीं था। अवश्य ही धर्मस्थीय अदालतों में अधिकांश वाद-विषय विवाह, स्त्रीधन, तलाक़, दाय, घर, खेत, सेतुबंध, जलाशय-सम्बन्धी, ऋण-सम्बन्धी विवाद भृत्य, कर्मकर और स्वामी के बीच विवाद, क्रय-विक्रय सम्बन्धी झगड़े से सम्बन्धित थे। किन्तु चौरी, डाके और लूट के मामले भी धर्मस्थीय अदालत के सामने पेश किए जाते थे।
  • समाज विरोधी तत्वों को समुचित दंड देने का कार्य मुख्यतः कंटकशोधन न्यायालयों का था। नीलकंठ शास्त्री के अनुसार कंटकशोधन न्यायालय एक नए प्रकार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बनाए गए थे ताकि एक अत्यन्त संगठित शासन तंत्र के विविध विषयों से सम्बद्ध निर्णयों को कार्यान्वित किया जा सके। वे एक प्रकार के विशेष न्यायालय थे, जहाँ अभियोगों पर तुरन्त विचार किया जाता था।

धर्मस्थीय न्यायालय  

धर्मस्थीय न्यायालय मौर्य कालीन शासन व्यवस्था का एक अंग था। मौर्य काल में ग्रामसंघ और राजा के न्यायलय के अतिरिक्त अन्य सभी न्यायलय दो प्रकार के थे-

  1. कंटकशोधन
  2. धर्मस्थीय
  • धर्मस्थीय न्यायालयों का न्याय-निर्णय, धर्मशास्त्र में निपुण तीन धर्मस्थ या व्यावहारिक तथा तीन अमात्यकरते थे। इन्हें एक प्रकार से दीवानी अदालतें कह सकते हैं।
  • कुछ विद्वानों के अनुसार धर्मस्थीय न्यायालय वे न्यायालय थे, जो व्यक्तियों के पारस्परिक विवाद के सम्बन्ध में निर्णय देते थे।
  • धर्मस्थीय अदालतों में अधिकांश वाद-विषय विवाह, स्त्रीधन, तलाक़, दाय, घर, खेत, सेतुबंध, जलाशय-सम्बन्धी, ऋण-सम्बन्धी विवाद भृत्य, कर्मकर और स्वामी के बीच विवाद, क्रय-विक्रय सम्बन्धी झगड़े से सम्बन्धित थे। किन्तु चौरी, डाके और लूट के मामले भी धर्मस्थीय अदालत के सामने पेश किए जाते थे।
  • इसी प्रकार कुवचन बोलना, मानहानि और मारपीट के मामले भी धर्मस्थीय अदालत के सामने प्रस्तुत किए जाते थे।

महामात्र  

महामात्र मौर्य साम्राज्य की शासन व्यवस्था में राजकर्मचारियों का एक उच्च पद था।

  • सम्राट अशोक के शिलालेखों से भी यह स्पष्ट है कि समय-समय पर केन्द्र से सम्राट प्रान्तों की राजधानियों में महामात्रों को निरीक्षण करने के लिए भेजता था।

गूढ़पुरुष  

गूढ़पुरुष मौर्य कालीन शासन व्यवस्था में गुप्तचरों को कहा जाता था। मौर्य शासन प्रबन्ध में गूढ़पुरुषों काफ़ी महत्त्वपूर्ण स्थान था।

  • विशाल मौर्य साम्राज्य के सुशासन के लिए यह आवश्यक था कि उनके अमात्यों, मंत्रियों, राजकर्मचारियों और पौरजनपदों पर दृष्टि रखी जाए, उनकी गतिविधियों और मनोभावनाओं का ज्ञान प्राप्त किया जाए और पड़ोसी राज्यों के विषय में भी सारी जानकारी प्राप्त होती रहे।
  • मौर्य साम्राज्य में दो प्रकार के गुप्तचर थे-
  1. संस्था
  2. संचार
  • संस्था वे गुप्तचर थे, जो एक ही स्थान पर संस्थाओं में संगठित होकर कापटिकक्षात्र, उदास्थित, गृहपतिक, वैदेहक (व्यापारी) तापस (सिर मुंडाय या जटाधारी साधु) के वेश में काम करते थे। इन संस्थाओं में संगठित होकर ये राजकर्मचारियों के शौक़ या भ्रष्टाचार का पता लगाते थे।
  • संचार ऐसे गुप्तचर थे, जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते थे। ये अनेक वेशों में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर सूचना एकत्रित कर राजाओं तक पहुँचाते थे।

धम्म महामात्र  

धम्म महामात्र या 'धर्म महामात्र' सम्राट अशोक के वे उच्च अधिकारी थे, जो अशोक द्वारा प्रचारित धर्म सम्बंधी मामलों और कार्यों की देखभाल करते थे।[1]

  • अपने कार्य की दृष्टि से धम्म महामात्र एक नवीन प्रकार का कर्मचारी था। इन कर्मचारियों का मुख्य कार्य जनता को धम्म की बातें समझाना, उनमें धम्म के प्रति रुचि पैदा करना था।
  • धम्म महामात्र समाज के सभी वर्गों- ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य, दास, निर्धन, वृद्ध के कल्याण तथा सुख के लिए कार्य करते थे। वे सीमांत देशों तथा विदेशों में भी काम करते थे।
  • मौर्य साम्राज्य में सभी प्रकार के लोगों तक धम्म महामात्र की पहुँच थी। उनका कार्य था धर्म के मामले में लोगों में सहमति बढ़ाना। ब्राह्मण, श्रमण तथा राजघराने के लोगों को दानशील कार्यों के लिए प्रोत्साहित करना, कारावास से क़ैदियों को मुक्त कराना या उनका दंड कम करवाना तथा लोगों की अन्याय से रक्षा करना।
  • धम्म महामात्रों की नियुक्ति से एक वर्ष पूर्व ही अशोक ने साम्राज्य के विभिन्न स्थानों पर धम्म की शिक्षाओं को शिलालेखों में उत्कीर्ण करवाया। [2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  भट्ट, जनार्दन अशोक के धर्मलेख (हिंदी)। नई दिल्ली: प्रकाशन विभाग, 118।
  2.  अशोक (हिंदी)। । अभिगमन तिथि: 24 सितम्बर, 2011।

विषयपति  

विषयपति मौर्य काल की शासन प्रणाली में राजकर्मचारी का एक उच्च पद था।

  • मौर्य साम्राज्य में प्रान्त ज़िलों में विभक्त थे, जिन्हें 'आहार' या 'विषय' कहते थे और जो सम्भवतः विषयपति के अधीन था।

स्थानिक  

स्थानिक मौर्य साम्राज्य की शासन व्यवस्था में राजकर्मचारी का एक उच्च पद था।

  • मौर्य काल के शासन प्रबंध में प्रान्त ज़िलों में विभक्त थे, जिन्हें 'आहार' या 'विषय' कहते थे और जो सम्भवतः विषयपति के अधीन था।
  • ज़िले का शासक 'स्थानिक' होता था और स्थानिक के अधीन गोप होते थे, जो पूरे 10 गाँवों के ऊपर शासन करते थे।
  • स्थानिक एक और अधिकारी, जिसे 'समाहर्ता' कहा जाता था, के अधीन कार्य करते थे।

अंतमहामात्र  

अंतमहामात्र मौर्य साम्राज्य की सीमाओं की रक्षा करने वाले राजकर्मचारियों को कहा जाता था।

  • कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' से अंतपालों के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। 'अंतपाल' शब्द साधारणत: सीमांत प्रदेश के शासक या गवर्नर को निर्दिष्ट करता है। यह शासक सैनिक, असैनिक दोनों ही प्रकार का होता था।[1]
  • अंतपालों का वेतन कुमार, पौर, व्यावहारिक मंत्री तथा राष्ट्रपाल के बराबर होता था।
  • मौर्य सम्राट अशोक के समय में अंतपाल ही 'अंतमहामात्र' कहलाने लगे थे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  अंतपाल (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 19 फ़रवरी, 2014।

पुष्यगुप्त वैश्य  

पुष्यगुप्त वैश्य चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल में सौराष्ट्र(वर्तमान गुजरात) का प्रांतपति था। गुजरात स्थित सुदर्शन झील का निर्माण उसने कराया था।

  • बौद्ध साहित्य एवं अशोक के अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि मौर्य साम्राज्य अनेक प्रान्तों में विभक्त था और राजकुल के राजकुमार ही प्रायः उनके राज्यपाल हुआ करते थे।
  • रुद्रदामन (150 ई.) के जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है कि चंद्रगुप्त मौर्य ने सौराष्ट्र (गुजरात) को अपने साम्राज्य का एक प्रांत बनाया था और वहाँ एक प्रान्तपति नियुक्त किया था, जो कि वैश्य वंशका था, जिसका नाम पुष्यगुप्त था; जो कि चंद्रगुप्त का बहनोई था। उसने वहाँ जनता के हित के लिए विशाल सुदर्शन झील का निर्माण कराया था।
  • कालांतर में सुदर्शन झील जीर्ण अवस्था को प्राप्त होती रही। बाद के समय में तुषास्प, जो कि मौर्य सम्राट अशोक का महामात्य था, उसने झील का पुनर्निर्माण करवाया।

पर्णदत्त  

पर्णदत्त गुप्त शासक स्कंदगुप्त का राजकर्मचारी था, जिसने प्रसिद्ध सुदर्शन झील का जीर्णोद्वार करवाया था।

  • सुदर्शन झील का निर्माण चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल में सौराष्ट्र के प्रांतपति पुष्यगुप्त वैश्य द्वारा कराया गया था। बाद में जब यह झील जीर्ण अवस्था को प्राप्त हो गई, तब अशोक के महामात्य तुषास्प ने इस झील का पुनर्निर्माण कराया। तुषास्प ने झील का पुनर्निर्माण इतनी मजबूती से कराया था कि फिर 400 वर्ष तक उसकी मरम्मत की आवश्यकता नहीं हुई।
  • गुप्त काल में झील फिर ख़राब हो गई। अब स्कन्दगुप्त के आदेश से पर्णदत्त ने इस झील का जीर्णोद्वार करवाया। स्कंदगुप्त के शासन के पहले ही साल में इस झील का बाँध टूट गया था, जिससे प्रजा को बड़ा कष्ट हुआ। स्कन्दगुप्त ने उदारता के साथ इस बाँध पर खर्च किया।

प्रदेष्ट्र  

प्रदेष्ट्र मौर्य साम्राज्य के शासन प्रबंध में राजकर्मचारी का एक उच्च पद था। प्रदेष्ट्र मौर्य शासन व्यवस्था के महत्त्वपूर्ण अंग थे और जिन्हें कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे।

  • मौर्य काल में प्रान्त ज़िलों में विभक्त थे, जिन्हें 'आहार' या 'विषय' कहते थे और जो सम्भवतः विषयपति के अधीन था।
  • ज़िले का शासक स्थानिक होता था और स्थानिक के अधीन गोप होते थे, जो पूरे 10 गाँवो के ऊपर शासन करते थे।
  • स्थानिक समाहर्ता के अधीन थे। समाहर्ता के अधीन एक और अधिकारी शासन कार्य चलाता था, जिसे 'प्रदेष्ट्र' कहा गया है।
  • प्रदेष्ट्र स्थानिक, गोप और ग्राम अधिकारियों के कार्यों की जाँच करता था। इन प्रदेष्ट्रियों को अशोक के प्रादेशिकों के समरूप माना गया है।

निष्क  

शब्द संदर्भ
हिन्दी(प्राचीन काल का) एक सोने का सिक्का, उक्त सिक्के के बराबर की तौल 1 कर्ष या 16 माशा, सुवर्ण, सोना, सोने का बना हार।
-व्याकरण  पुल्लिंग, धातु
-उदाहरण  निष्क का अर्थ होता है-स्वर्ण मुद्रा। स्वर्ण मुद्राएँ आपत्ति काल में मनुष्य को बहुत सहयोग देती है।
-विशेष   प्राचीन गणितज्ञ भास्कराचार्य ने अपनी कृति 'लीलावती' में निष्क में 16 द्रम्य, 1 द्रम्य 16 पण, 1 पण में 4 काकिणी और 1 काकिणी में 20 कौड़ी बतायी हैं। इस प्रकार 1 निष्क=20480 कौड़ियाँ तथा न निष्क=256 पण। पहले कौड़ियाँ सबसे छोटे सिक्के की तरह प्रयुक्त होती थीं। निष्क के मान में समय-समय पर अंतर भी रहा है।
-विलोम   
-पर्यायवाची  
संस्कृतनिष्क्+अच्
अन्य ग्रंथ
संबंधित शब्दनिष्कण्टक
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अन्य शब्दों के अर्थ के लिए देखें शब्द संदर्भ कोश

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सतमान  

सतमान प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था में प्रारम्भिक सिक्कों का प्रकार था। यह उस समय का सबसे बड़ा सिक्का था, जो 180 ग्रेन वजन का चाँदी का बना होता था।[1]


इन्हें भी देखेंकर्षापण एवं निष्क

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  यूजीसी इतिहास, पृ. सं. 145

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