पल्लव वंश (575-897)

पल्लव वंश  

गुप्त वंश के बाद हर्षवर्धन के अतिरिक्त कोई ऐसी शक्ति नहीं थी, जो उत्तर भारत की राजनीतिक स्थिति को स्थिरता प्रदान कर सकती थी। इस समय दक्षिण भारत में दो महत्त्वपूर्ण वंश-कांची के पल्लव वंश एवं बादामी या वातापि के चालुक्य वंश शासन कर रहे थे।

उत्पत्ति मतभेद

पल्लव वंशीय शासक
शासकशासनकाल
शिवस्कन्द वर्मन-
विष्णुगोप-
सिंह विष्णु(575-600 ई.)
महेन्द्र वर्मन प्रथम(600-630 ई.)
नरसिंह वर्मन प्रथम(630-668 ई.)
महेन्द्र वर्मन द्वितीय(668-670 ई.)
परमेश्वर वर्मन प्रथम(670-695 ई.)
नरसिंह वर्मन द्वितीय(695-720 ई.)
परमेश्वर वर्मन द्वितीय(720-731 ई.)
नंदि वर्मन द्वितीय(731-795 ई.)
दंति वर्मन(796-847 ई.)
नंदि वर्मन तृतीय(847-869 ई.)
नृपत्तुंग वर्मन(870-879 ई.)
अपराजित(879-897 ई.)

कांची के पल्लव वंश के विषय में प्राथमिक जानकारी हरिषेण की 'प्रयाग प्रशस्ति' एवं ह्वेनसांग के यात्रा विवरण से मिलती है। संभवतः पल्लव लोग स्वतंत्र राज्य स्थापित करने के पूर्व सातवाहनों के सामन्त थे। इनके प्रारम्भिक अभिलेख प्राकृत भाषा में एवं बाद में संस्कृत में मिले है। पल्लवों की उत्पत्ति के संदर्भ में अन्तिम पंक्ति लेखक प्रो. राव भी यह मानने पर विवश हो गए हैं कि, “पल्लवों की उत्पत्ति का प्रश्न विवादग्रस्त एवं अन्धकार में निमग्न है।” पल्लव वंश के राजाओं का मूल कहाँ से हुआ, इस सवाल को लेकर ऐतिहासिकों ने बहुत तर्क-वितर्क किया है। एक मत यह है, कि पल्लव लोग पल्हव या पार्थियन थे, जिन्होंने शकों के कुछ समय बाद भारत में प्रवेश कर उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित किए थे। शक राजा रुद्रदामा का एक अमात्य सौराष्ट्र पर शासन करने के लिए नियुक्त था, जिसका नाम सुविशाख था। वह जाति से पल्हव या पार्थियन था। सम्भवतः इसी प्रकार के पल्हव अमात्य सातवाहन सम्राटों की ओर से भी नियत किये जाते थे, और उन्हीं में से किसी ने दक्षिण के पल्लव राज्य की स्थापना की थी। अब प्रायः ऐतिहासिक लोग पल्लवों का पल्हवों या पार्थियनों से कोई सम्बन्ध नहीं मानते। काशी प्रसाद जायसवाल के अनुसार पल्लव लोग ब्राह्मण थे, क्योंकि वे अपने को द्रोणाचार्य और अश्वत्थामा का वंशज मानते थे।

वंश मान्यता

पल्लव अभिलेखों में भी पल्लवों को भारद्वाजगोत्रीयतथा अश्वात्थामा का वंशज कहा गया है। तालगुण्डअभिलेख उन्हें क्षत्रिय कहता है। प्रो. आर. सत्यनमैय्यर मानते है कि पल्लव अशोक के साम्राज्य के एक प्रांत टोण्डमण्डलम से ही उत्पन्न हुए थे। पल्लवों की उत्पत्ति का यही विचार अब तक सर्वश्रेष्ठ माना गया है। ऐसा लगता है कि, पल्लवों में उत्तरी भारत के भारद्वाजगोत्रीय ब्राह्मणों तथा कांची के आस-पास के राजवंशों के रक्त का मिश्रण था। यद्यपि पल्लवों के राजनीतिक तथा सांस्कृतिक उत्कर्ष का केन्द्र कांची थी, किन्तु उनका मूल निवास तोण्डमण्डलम् था। कालान्तर में उनका साम्राज्य उत्तर में पेन्नार नदी से दक्षिण में कावेरी नदी की घाटी तक विस्तृत हो गया।

गुप्त राजवंश  

गुप्त वंश 275 ई. के आसपास अस्तित्व में आया। इसकी स्थापना श्रीगुप्त ने की थी। लगभग 510 ई. तक यह वंश शासन में रहा। आरम्भ में इनका शासन केवल मगध पर था, पर बाद में गुप्त वंश के राजाओं ने संपूर्ण उत्तर भारत को अपने अधीन करके दक्षिण में कांजीवरम के राजा से भी अपनी अधीनता स्वीकार कराई। इस वंश में अनेक प्रतापी राजा हुए। कालिदास के संरक्षक सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय(380-415 ई.) इसी वंश के थे। यही 'विक्रमादित्य' और 'शकारि' नाम से भी प्रसिद्ध हैं। नृसिंहगुप्त बालादित्य (463-473 ई.) को छोड़कर सभी गुप्तवंशी राजा वैदिक धर्मावलंबी थे। बालादित्य ने बौद्ध धर्म अपना लिया था।

हर्षवर्धन  

Disamb2.jpgहर्षवर्धनएक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- हर्षवर्धन (बहुविकल्पी)

हर्षवर्धन या हर्ष (606ई.-647ई.), राज्यवर्धन के बाद लगभग 606 ई. में थानेश्वर के सिंहासन पर बैठा। हर्ष के विषय में हमें बाणभट्ट के हर्षचरित से व्यापक जानकारी मिलती है। हर्ष ने लगभग 41 वर्ष शासन किया। इन वर्षों में हर्ष ने अपने साम्राज्य का विस्तार जालंधरपंजाबकश्मीरनेपाल एवं बल्लभीपुर तक कर लिया। इसने आर्यावर्त को भी अपने अधीन किया। हर्ष को बादामी के चालुक्यवंशीशासक पुलकेशिन द्वितीय से पराजित होना पड़ा। ऐहोल प्रशस्ति (634 ई.) में इसका उल्लेख मिलता है।

कांचीपुरम  

कांचीपुरम
कैलाशनाथ मंदिर, कांचीपुरम
विवरणकांचीपुरम उत्तरी तमिलनाडु के प्राचीन व मशहूर शहरों में से एक है।
राज्यतमिलनाडु
ज़िलाकांचीपुरम
भौगोलिक स्थितिउत्तर- 12° 49' 12.00", पूर्व- 79° 42' 36.00"
मार्ग स्थितिकांचीपुरम महाबलीपुरम से लगभग 67 किमी और चेन्नई से लगभग 73 किमी. की दूरी पर स्थित है।
प्रसिद्धिकांचीपुरम सिल्क फैब्रिक और हाथ से बुनी रेशमी साड़ियों के लिए भी यह देश-दुनिया में मशहूर है।
कब जाएँजनवरी से फरवरी और अक्टूबर से दिसम्बर
कैसे पहुँचेंहवाई जहाज़, रेल, बस आदि
हवाई अड्डाचेन्नई अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा
रेलवे स्टेशनचेन्नई रेलवे स्टेशन, चेंगलपट्टु रेलवे स्टेशन
यातायातऑटो-रिक्शा, सिटी बस
क्या देखेंवरदराज पेरुमल मंदिरएकम्बरनाथर मंदिरकामाक्षी अम्मान मंदिरकैलाशनाथ मंदिर
कहाँ ठहरेंहोटल, धर्मशाला, अतिथि ग्रह
क्या ख़रीदेंसिल्क की साड़ियाँ
एस.टी.डी. कोड04112
ए.टी.एमलगभग सभी
Map-icon.gifगूगल मानचित्र
संबंधित लेखऊटीमहाबलीपुरमकन्याकुमारीचेन्नई
अन्य जानकारीकांचीपुरम 7वीं शताब्दी से लेकर 9वीं शताब्दीमें पल्लव साम्राज्य का ऐतिहासिक शहर व राजधानी हुआ करती थी।
बाहरी कड़ियाँकांचीपुरम
अद्यतन‎

कांचीपुरम उत्तरी तमिलनाडु के प्राचीन व मशहूर शहरों में से एक है। कांचीपुरम तीर्थपुरी दक्षिण की काशी मानी जाती है, जो मद्रास से 45 मील की दूरी पर दक्षिण–पश्चिम में स्थित है। कांचीपुरम को पूर्व में कांची और कांचीअम्पाठी भी कहा जाता था। यह आधुनिक काल में कांचीवरम के नाम से भी प्रसिद्ध है। कांचीपुरम को द गोल्डन सिटी ऑफ़ 1000 टेंपल भी कहा जाता है। कांचीपुरम को भारत के सात पवित्र शहरों में से एक का दर्जा भी प्राप्त है।

कांचीपुरम का अर्थ

कांची का अर्थ (ब्रह्मा), आंची का अर्थ (पूजा) और पुरम का अर्थ (शहर) होता है यानी ब्रह्मा को पूजने वाला पवित्र स्थान। शायद इसलिए यहाँ विष्णु के अनेक मंदिर स्थापित किए गये हैं, जिस कारण इसे यह नाम दिया गया है।

सप्त पुरियों में गणना

  • ऐसी अनुश्रुति है कि इस क्षेत्र में प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने देवी के दर्शन के लिये तप किया था।
  • ऐसा माना जाता है कि जो भी यहाँ जाता है, उसे आंतरिक खुशी के साथ-साथ मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।
  • मोक्षदायिनी सप्त पुरियों अयोध्यामथुराद्वारका, माया(हरिद्वार), काशी और अवन्तिका (उज्जैन) में इसकी गणना है।
  • कांची हरिहरात्मक पुरी है। इसके दो भाग शिवकांची और विष्णुकांची हैं। सम्भवत: कामाक्षी अम्मान मंदिर ही यहाँ का शक्तिपीठ है। दक्षिण के पंच तत्वलिंगो में से भूतत्वलिंग के सम्बन्ध में कुछ मतभेद है। कुछ लोग कांची के एकाम्रेश्वर लिंग को भूतत्वलिंग मानते हैं, और कुछ लोग तिरुवारूर की त्यागराजलिंग मूर्ति को। इसका माहात्म्य निम्नलिखित हैं:-
रहस्यं सम्प्रवक्ष्यामि लोपामुद्रापते श्रृणु।

नेत्रद्वयं महेशस्य काशीकाञ्चीपुरीद्वयम्॥
विख्यातं वैष्णवं क्षेत्रं शिवसांनिध्यकाकम्।
काञ्चीक्षेत्रें पुरा धाता सर्वलोकपितामह:॥
श्रीदेवीदर्शनार्थाय तपस्तेपे सुदुष्करम्।
प्रादुरास पुरो लक्ष्मी: पद्महस्तपुरस्सरा।
पद्मासने च तिष्ठ्न्ती विष्णुना जिष्णुना सह।

सर्वश्रृगांर वेषाढया सर्वाभरण्भूषिता॥[1]
कांचीपुरम मंदिर, कांचीपुरम

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  ब्रह्माण्डपु. ललितोपाख्यान 35

बादामी  

यील्लाम्मा मंदिर, बादामी

बादामी नगर उत्तरी कर्नाटक (भूतपूर्व मैसूर) राज्य के दक्षिण-पश्चिमी भारत में है। इस नगर को प्राचीन समय में वातापी के नाम से जाना जाता था। और यह चालुक्य राजाओं की पहली राजधानी था।

इतिहास

छठी-सातवीं शती ई. में वातापी नगरी चालुक्य वंश की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध थी। पहली बार यहाँ 550 ई. के लगभग पुलकेशी प्रथम ने अपनी राजधानी स्थापित की थी। उसने वातापी में अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न करके अपने वंश की सुदृढ़ नींव स्थापित की थी। 608 ई. में पुलकेशी द्वितीयवातापी के सिंहासन पर आसीन हुआ। यह बहुत प्रतापी राजा था। इसने प्रायः 20 वर्षों में गुजरातराजस्थानमालवाकोंकणवेंगी आदि प्रदेश को विजित किया। 620 ई. के आसपास नर्मदा नदी के दक्षिण में वातापी नरेश की सर्वत्र दुंदुभि बज रही थी और उसके समान यशस्वी राजा दक्षिण भारत में दूसरा नहीं था। मुसलमान इतिहास लेखक तबरी के अनुसार 625-626 ई. में ईरान के बादशाह ख़ुसरो द्वितीय ने पुलकेशियन की राज्यसभा में अपना एक दूत भेजकर उसके प्रति अपना सम्मान प्रदर्शित किया था।

शिव के मंदिर पर नक़्क़ाशी

शायद इसी घटना का दृश्य अजन्ता के एक चित्र (गुहा संख्या 1) में अंकित किया गया है। वातापी नगरी इस समय अपनी समृद्धी के मध्याह्न काल में थी। किन्तु 642 ई. में पल्लवनरेश नरसिंह वर्मन ने पुलकेशियन को युद्ध में परास्त कर सत्ता का अन्त कर दिया। पुलकेशियन स्वंय भी इस युद्ध में आहत हुआ। वातापी को जीतकर नरसिंह वर्मन ने नगर में खूब लूटमार मचाई। पल्लवों और चालुक्यों की शत्रुता इसके पश्चात् भी चलती रही। 750 ई. में राष्ट्रकूटों ने वातापी तथा परिवर्ति प्रदेश पर अधिकार कर लिया। वातापी पर चालुक्यों का 200 वर्षों तक राज्य रहा। इस काल में वातापि ने बहुत उन्नति की। हिन्दूबौद्ध और जैनतीनों ही सम्पद्रायों ने अनेक मन्दिरों तथा कलाकृतियों से इस नगरी को सुशोभित किया। छठी शती के अन्त में मंगलेश चालुक्य ने वातापी में एक गुहामन्दिर बनवाया था जिसकी वास्तुकला बौद्ध गुहा मन्दिरों के जैसी है। वातापी के राष्ट्रकूट नरेशों में दंन्तिदुर्ग और कृष्ण प्रथम प्रमुख हैं। कृष्ण के समय में एलौरा का जगत् प्रसिद्ध मन्दिर बना था किन्तु राष्ट्रकूटों के शासनकाल में वातापी का चालुक्यकालीन गौरव फिर न उभर सका और इसकी ख्याति धीरे-धीरे विलुप्त हो गई।

चालुक्य वंश

चालुक्यों की उत्पत्ति का विषय अत्यंत ही विवादास्पद है। वराहमिहिर की 'बृहत्संहिता' में इन्हें 'शूलिक' जाति का माना गया है, जबकि पृथ्वीराजरासो में इनकी उत्पति आबू पर्वत पर किये गये यज्ञ के अग्निकुण्ड से बतायी गयी है। 'विक्रमांकदेवचरित' में इस वंश की उत्पत्ति भगवान ब्रह्म के चुलुक से बताई गई है। इतिहासविद् 'विन्सेण्ट ए. स्मिथ' इन्हें विदेशी मानते हैं। 'एफ. फ्लीट' तथा 'के.ए. नीलकण्ठ शास्त्री' ने इस वंश का नाम 'चलक्य' बताया है। 'आर.जी. भण्डारकरे' ने इस वंश का प्रारम्भिक नाम 'चालुक्य' का उल्लेख किया है। ह्वेनसांग ने चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय को क्षत्रिय कहा है। इस प्रकार चालुक्य नरेशों की वंश एवं उत्पत्ति का कोई अभिलेखीय साक्ष्य नहीं मिलता है।


शिवस्कन्द वर्मन  

शिवस्कन्द वर्मन ने कांची को अपनी राजधानी बनाया था। प्राकृत भाषा के ताम्रलेखों से पता चलता है कि प्रथम पल्लव शासक सिंह वर्मा था।



विष्णुगोप  

विष्णुगोप (चौथा शती ई. के मध्य काल) से लेकर सिंह वर्मा (लगभग छठी शती ई. का उत्तरार्ध) के बीच लगभग आठ शासकों ने शासन किया।

  • प्रयाग प्रशस्ति के विवरण से स्पष्ट होता है कि, जिस समय समुद्रगुप्त ने दक्षिणापथ को जीता, उस समय कांची पर विष्णुगोप शासन कर रहा था।
  • विष्णुगोप के बाद ईसा की पांचवीं एवं छठीं शताब्दी में पल्लव वंश का इतिहास अंधेरे में था।
  • समुद्रगुप्त द्वारा विष्णुगुप्त के पराजित होने के बाद पल्लव राज्य विघटन के कागार पर पहुँच गया था।
  • विभिन्न शासको ने भिन्न-भिन्न प्रदेशों में अपनी स्वतंत्रता घोषित कर स्वतंत्र शाखाओं की स्थापना कर ली थी।
  • इन शासकों में-कुमार विष्णु प्रथम, बुद्ध वर्मा, कुमार विष्णु द्वितीय, स्कन्द वर्मा द्वितीय, सिंह वर्मा, स्कंद वर्मा तृतीय, नन्दिवर्मा प्रथम तथा शान्तिवर्मा चण्डदण्ड आदि प्रमुख थे।
  • सिंह वर्मा प्रथम के काल में प्रसिद्ध जैन ग्रंथ लोक विभाग की रचना की गईं।

सिंह विष्णु  

सिंह विष्णु (575-600 ई.) के समय में पल्लव इतिहास का नया अध्याय आरम्भ हुआ। सिंह विष्णु के दरबार में संस्कृत का महान् कवि भारवि रहता था।

  • सिंह विष्णु को सिंह विष्णुयोत्तर युग एवं अवनिसिंह भी कहा जाता था।
  • कशाक्कुडि लेख के अनुसार इसने कलभों, मालवोंचोलोपाण्ड्यों, केरलों तथा सिंहल के शासकों के साथ युद्ध किया।
  • उसने चोलों को परास्त कर कावेरी नदी के मुहाने तक अपने राज्य को विस्तृत कर लिया और चोलमण्डल की विजय के बाद ही उसने अवनि सिंह तथा शिंगविष्णु पेरुमार की उपाधि धारण की।
  • भारवि वैष्णव धर्म का अनुयायी था। उसके समय में ही मामल्लपुरम के आदिवराह गुहा मंदिर का निर्माण किया गया।
  • इस मंदिर में सिंह विष्णु एवं उसकी दो रानियों की प्रतिमा भी स्थापित की गई है।

महेन्द्र वर्मन प्रथम  

महेन्द्र वर्मन प्रथम (600-30ई.) सिंह विष्णु का पुत्र एवं उत्तराधिकारी था। छठी सदी से पल्लवों का इतिहास अधिक स्पष्ट हो जाता है।

  • इस सदी के अन्तिम भाग में सिंह विष्णु नाम के राजा ने दूर-दूर तक विजय यात्राएँ कर अपनी शक्ति का उत्कर्ष किया और दक्षिण दिशा में आक्रमण कर उसने चोल और पांड्य राज्यों को जीत लिया।
  • प्रसिद्ध चालुक्य सम्राट पुलकेशी द्वितीय के समय में पल्लव वंश का राजा महेन्द्र वर्मन प्रथम था, जो सातवीं सदी के शुरू में हुआ था।
  • पल्लवराज महेन्द्र वर्मन प्रथम के साथ पुलकेशी द्वितीय के अनेक युद्ध हुए, जिनमें पुलकेशी द्वितीय विजयी हुआ।
  • पुलकेशी द्वितीय से परास्त हो जाने पर भी महेन्द्र वर्मन प्रथम कांची में अपनी स्वतंत्र सत्ता क़ायम रखने में सफल रहा।
  • कसक्कुडी ताम्रपत्रों से ज्ञात होता है कि, किसी युद्ध में महेन्द्र वर्मन प्रथम ने भी पुलकेशी को परास्त किया था।
  • उसके समय में पल्लव साम्राज्य न केवल राजनीतिक दृष्टि से, बल्कि सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं कलात्मक दृष्टि से भी अपने चरमोत्कर्ष पर था।
  • उसने 'मत्तविलास' 'विचित्र चित्त' एवं 'गुणभर शत्रुमल्ल, ललिताकुर, अवनिविभाजन, संर्कीणजाति, महेन्द्र विक्रम, अलुप्तकाम कलहप्रीथ आदि प्रशंसासूचक पदवी धारण की थी।
  • उसकी उपाधियां 'चेत्थकारी' और 'चित्रकारपुल्ली' भी थीं।
  • उसके समय में ही दक्षिण भारत में प्रभुसत्ता की स्थापना के लिए पल्लव-चालुक्य एवं पल्लव-पाण्ड्यसंघर्ष शुरू हो गया था।
  • पल्लव वंश के इतिहास में इस राजा का बहुत अधिक महत्त्व है। उसने ब्रह्माविष्णु और शिव के बहुत से मन्दिर अपने राज्य में बनवाये, और 'चैत्यकारी' का विरुद धारण किया।
  • एहोल अभिलेख के उल्लेख के आधार पर कहा जाता है कि, पुलकेशी द्वितीय ने पल्लवों से वेंगी को छीन लिया था।
  • नंदि वर्मन द्वितीय के कशाक्कुडि अभिलेख से ज्ञात होता है कि, महेन्द्र वर्मन प्रथम ने पुल्ललूर में अपने प्रमुख शत्रु को पराजित किया था।
  • उसने 'मत्तविलास प्रहसन' तथा 'भगवदज्जुकीयम' जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। 'मत्तविलास प्रहसन' एक हास्य ग्रंथ है।
  • इसमें कपालियों तथा भिक्षुओं पर व्यंग्य कसा गया है। उसके संरक्षण में ही संगीतशास्त्र पर आधारित ग्रंथ 'कुडमिमालय' की रचना हुई, जो वीणाशास्त्र पर आधारित है।
  • महेन्द्र वर्मन प्रथम ने सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ रुद्राचार्य के निर्देशन में संगीत का अध्ययन किया था।
  • प्रारम्भ में यह जैन था, किन्तु बाद में अय्यर नामक शैव संत के प्रभाव में आकर शैव धर्म अपना लिया।
  • कहा जाता है कि, इसने पारलिपुरम के जैन मंदिर को तुड़वाकर उनके अवशेषों से तिवाड़ि (दक्षिण अर्काट) में एक जैन मंदिर बनवाया था।
  • महेन्द्र वर्मन प्रथम ने सर्वप्रथम दक्षिण भारत में आडम्बरयुक्त मंदिरों के स्थान पर सीधी-सादी आकर्षक शैल मण्डप वास्तु शैली प्रोत्साहित की।

नरसिंह वर्मन प्रथम  

नरसिंह वर्मन प्रथम (630-668ई.) अपने पिता महेन्द्र वर्मन प्रथम की मुत्यु के बाद गद्दी पर बैठा।

  • वह अपने अभिलेखों में 'वातापीकोड' के रूप में उद्धृत है। वह पल्लव वंश का सबसे प्रतापी और शक्तिशाली राजा था।
  • असाधारण धैर्य एवं पराक्रम के कारण उसे 'महामल्ल' भी कहा गया है।
  • 'कुर्रम दान पत्र' अभिलेख से ज्ञात होता है कि, नरसिंह वर्मन प्रथम ने चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय को परिमल, मणिमंगलाई एवं शूरमार के युद्धों में परास्त किया था।
  • नरसिंह वर्मन प्रथम की सेना के साथ युद्ध करते हुए ही पुलकेशी द्वितीय ने वीरगति प्राप्त की थी।
  • नरसिंह वर्मन ने पुलकेशी द्वितीय की पीठ पर 'विजय' शब्द अंकित करवाया था।
  • इस विजय का उल्लेख बादामी में मल्लिकार्जुन मंदिर के पीछे एक पाषाण पर उत्कीर्ण है, जिसे उसके सेनापति शिरुतोण्ड ने उत्कीर्ण करवाया था।
  • नरसिंह वर्मन प्रथम के काशाक्कुटि ताम्रपत्र अभिलेख एवं महावंश के उल्लेख से उसकी लंका विजय प्रमाणित होती है।
  • राजपद के अन्यतम उम्मीदवार मानवम्म ने नरसिंह वर्मन की शरण ली, और उसकी सहायता के लिए पल्लवराज ने दो बार नौसेना द्वारा लंका पर आक्रमण किया।
  • इसी कारण इस लेख में नरसिंह वर्मा प्रथम की तुलना लंका विजय राम से की गई।
  • महावंश के 47वें अध्याय के अनुसार लंका का राजकुमार मारवर्मन भारतीय राजा नरसिंह वर्मन के दरबार में रहता था।
  • कांची के निकट एक बन्दरगाह वाला नगर महामल्लपुरम (महाबलीपुरम) बसाने का श्रेय भी नरसिंह वर्मन प्रथम को दिया जाता है।
  • उसके शासन काल में चीनी यात्री ह्वेनसांग कांची गया था।
  • इस प्रसिद्ध चीनी यात्री के अनुसार कांची में 100 संघाराम थे, जिनमें 1000 भिक्षु निवास करते थे।
  • बौद्ध विहारों के अतिरिक्त अन्य धर्मों के भी 80 मन्दिर और बहुत से चैत्य वहाँ पर थे।
  • इसके समय में सिंह शीर्षक स्तम्भ की नई शैली का विकास हुआ, जिसे इसके नाम पर मामल्य शैलीका नाम दिया गया।
  • महाबलीपुरम के सप्तरथ इसी के शासनकाल में बनाए गए थे। इनका नामकरण पाण्डवद्रौपदी तथा गणेश के नाम पर किया गया था।
  • प्रतापी चालुक्यों को परास्त कर उसकी राजधानी बादामी को जीत लेना, नरसिंह वर्मन प्रथम के जीवन की गौरवमयी घटना है। इसीलिए उसने 'वातापीकोड' का विरुद भी अपने नाम के साथ जोड़ लिया।

महेन्द्र वर्मन द्वितीय  

महेन्द्र वर्मन द्वितीय (668-70ई.) नरसिंह वर्मन प्रथम का पुत्र एवं उत्तराधिकारी था।

  • उसने बहुत कम समय तक शासन किया था।
  • काशाक्कृदिलेख के वर्णन के आधार पर कहा जाता है कि, उसने घटिका (विद्वान् ब्राह्मणों की संस्था) का विस्तार किया।
  • कुछ लेखों में इसे ‘मध्यम लोकपाल‘ कहा गया है।


परमेश्वर वर्मन प्रथम  

परमेश्वर वर्मन प्रथम (670-95ई.) महेन्द्र वर्मन द्वितीय का पुत्र एवं उत्तराधिकारी था।

  • उसका संघर्ष सबसे पहले चालुक्य नरेश विक्रमादित्य प्रथम से हुआ, जो पुलकेशी द्वितीय के समान ही वीर और विजेता था।
  • इस संघर्ष का परिणाम संदेहास्पद है, क्योंकि चालुक्यों के गदवल अभिलेख में विक्रमादित्य की विजय एवं पल्लवों के कुर्म अभिलेख में परमेश्वर वर्मन प्रथम व ईश्वर पोत की विजय प्रमाणित होती है।
  • शीघ्र ही परमेश्वर वर्मन प्रथम ने अपनी सैन्यशक्ति को पुनः संगठित कर लिया, और पेरुडनंल्लुर के युद्ध में चालुक्यराज विक्रमादित्य से अपनी पहली पराजय का बदला लिया।
  • दोनों ओर के अभिलेखीय साक्ष्यों के अध्ययन के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि, चालुक्य-पल्लव संघर्ष में पहले चालुक्यों की और अन्तिम रूप से पल्लवों की विजय हुई।
  • परमेश्वर वर्मन प्रथम ने विद्याविनीत उग्रदण्ड, लोकादित्य, चित्रमान, गुणाभाजन, श्रीभर एकमल्ल, रणंजय आदि विरुद धारण किए।
  • इसके समय में मामल्लपुर का प्रसिद्ध गणेश मंदिर निर्मित हुआ तथा कूरम के शिव मंदिर का निर्माण हुआ।
  • यह परम शैव था। यह बात इसकी परमाहेश्वर की उपाधि से प्रमाणित हो जाती है।
  • कूरम के शिव मंदिर का नामकरण इसी के नाम पर विद्या विनीत पल्लव परमेश्वरगहम किया।

नरसिंह वर्मन द्वितीय  

नरसिंह वर्मन द्वितीय (695-720 ई.) का समय सांस्कृतिक उपलब्धियों का रहा है। उसके महत्त्वपूर्ण निर्माण कार्यों में महाबलीपुरम का समुद्रतटीय मंदिर, कांचीका कैलाशनाथार मंदिर एवं 'ऐरावतेश्वर मंदिर' की गणना की जाती है।

  • परमेश्वर वर्मन प्रथम के प्रताप और पराक्रम से पल्लवों की शक्ति इतनी बढ़ गई थी, कि जब सातवीं सदी के अन्त में उसकी मृत्यु के बाद नरसिंह वर्मन द्वितीय कांची के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ, तो उसे किसी बड़े युद्ध में जुझने की आवश्यकता नहीं हुई।
  • 'राजसिंह', 'आगमप्रिय' एवं 'शंकर भक्त' की सर्वप्रिय उपाधियाँ नरसिंह वर्मन द्वितीय ने धारण की थीं।
  • नरसिंह वर्मन द्वितीय को 'राज सिद्धेश्वर' भी कहा जाता था।
  • इसके अतिरिक्त प्रशस्तियों में इसे अन्यन्तकाम, रणंजय, श्रीभर, उग्रदण्ड, अपराजित, शिवचुड़मणि, यित्रकार्मुक, रणविक्रम, आमित्रमल, आहवकेशरी, परमचक्रमर्दन, पाथविक्रय, समरधनन्जय आदि उपाधियों से भी विभूषित किया गया है।
  • मंदिर निर्माण की शैली में नरसिंह वर्मन द्वितीय ने एक नई शैली 'राज सिंह शैली' का प्रयोग किया था।
  • महाकवि 'दण्डिन' संभवतः उसका समकालीन था। इसकी वाद्यविद्याधर, वीणानारद, अंतोदय-तुम्बुरु उपाधियाँ उसकी संगीत के प्रति रुझान की परिचायक हैं।
  • नरसिंह वर्मन द्वितीय का शासन काल शान्ति और व्यवस्था का काल था, इसीलिए वह अपनी शक्ति को निश्चिन्तता पूर्वक मन्दिरों के निर्माण में लगा सका।

परमेश्वर वर्मन द्वितीय  

परमेश्वर वर्मन द्वितीय (720-731 ई.) नरसिंह वर्मन द्वितीय का छोटा पुत्र और उसका उत्तराधिकारी था।

  • कशाक्कुडि-अभिलेख में इसे 'बृहस्पति नीति का आदर्श', 'संरक्षक' एवं 'कुशल प्रशासक' कहा गया है।
  • चालुक्यों के उलचल- अभिलेख से ज्ञात होता है कि, चालुक्य राजा विक्रमादित्य द्वितीय ने गंग शासक दुर्विनीत ऐरयप्प की सहायता से पल्लव नरेश परमेश्वर वर्मन द्वितीय पर आक्रमण कर उसे परास्त कर दिया और फिर उसकी हत्या कर दी।

नन्दि वर्मन द्वितीय  

नन्दि वर्मन द्वितीय (731-795 ई.) के शासन काल में पल्लवों का चालुक्योंपाण्ड्यों तथा राष्ट्रकूटों से संघर्ष हुआ।

  • यद्यपि पूर्वी चालुक्य राज्य पर नन्दि वर्मन द्वितीय ने क़ब्ज़ा कर लिया, किन्तु राष्ट्रकूटों ने कांची को विजित कर लिया।
  • गोविन्द तृतीय के अभिलेख से यह प्रमाणित होता है कि, राष्ट्रकूट नरेश दंतिदुर्ग ने पल्लवों की राजधानी कांची पर विजय प्राप्त कर अपनी पुत्री का विवाह नन्दि वर्मन द्वितीय से कर दिया था।
  • इन दोनों के संयोग से दंति वर्मन नामक पुत्र ने जन्म लिया।
  • उदय चन्द्र नरसिंह वर्मन द्वितीय का योग्य सेनापति था।
  • नन्दि वर्मन द्वितीय वैष्णव धर्म का अनुयायी था।
  • उसके समय में समकालीन वैष्णव सन्त तिरुमंगै अलवार ने वैष्णव धर्म का प्रचार-प्रसार किया।
  • नन्दि वर्मन द्वितीय ने बैकुंठ, पेरुमल एवं मुक्तेश्वर मन्दिर का निर्माण करवाया था।
  • कशाक्कुण्डि लेख में इसके लिए पल्लवमल्ल, क्षत्रिय मल्ल, राजाधिराज, परमेश्वर एवं महाराज आदि उपाधियों का प्रयोग किया गया है।
  • इसने पल्लव राजाओं में सबसे अधिक समय (65 वर्ष) तक शासन किया।

दंति वर्मन  

दंति वर्मन (796-847ई.) नंदि वर्मन द्वितीय एवं राजमहिषी रेवा का पुत्र था।

  • नंदि वर्मन द्वितीय के बाद दंति वर्मन ही अगला पल्लव राजा था।
  • उसके समय में पल्लव राज्य पर राष्ट्रकूट नरेश गोविन्द तृतीय एवं पाण्ड्य शासकों ने आक्रमण किया।
  • दंति वर्मन को अभिलेखों में 'पल्लवकुल भूषण' कहा गया है।
  • उसने मद्रास के निकट बने पार्थसारथी मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।
  • गोविन्द तृतीय ने मनने अभिलेख में दंति वर्मन को 'समधिगतपंचमहाशब्द' एवं 'महासामन्ताधिपति' की उपाधि दी हैं।

नंदि वर्मन तृतीय  

नंदि वर्मन तृतीय (847-869 ई.), दंति वर्मन का पुत्र एवं उत्तराधिकारी था। उसने अपने बाहुबल एवं पराक्रम से चोलोंपाण्ड्यों एवं चेरों को पराजित कर पुनः एक बार पल्लव साम्राज्य को शक्ति प्रदान की।

  • यह महान् पल्लव शासकों की पंक्ति का अंतिम पराक्रमी शासक था।
  • तमिल साहित्य के महान् कवि 'पोरुन्देवनार' को नंदि वर्मन का राजाश्रय मिला हुआ था।
  • तमिल काव्य 'नन्दिक्कलम्बकम' की रचना से इसके द्वारा विजित युद्धों के बारें में जानकारी मिलती है।
  • इसके समय में मामल्लपुर तथा महाबलीपुरम के नगर अत्यन्त प्रसिद्ध हुए।
  • नंदि वर्मन तृतीय की उपाधि 'अवनिनारायण' थी, 'नंदिप्कलम्बकम्' में इसे "चारों समुद्रों का स्वामी" कहा गया है।
  • इसके संरक्षण में तमिल कवि 'पेरुन्देवनार' ने 'भारत वेणवा' नामक काव्य की रचना की थी।
  • वैलूर पाल्यम् अभिलेख में नंदि वर्मन तृतीय को विष्णु का अवतार कहा गया है।

नृपत्तुंग वर्मन  

नृपत्तुंग वर्मन (870-879 ई.) नन्दि वर्मन तृतीय का पुत्र था। नन्दि वर्मन तृतीय के बाद नृपत्तुंग वर्मन गद्दी का वास्तविक अधिकारी था।

  • उसका शासन काल शांति का काल था, उसके शासन काल के अंतिम दिनों में सौतेले भाई अपराजित ने विद्रोह कर दिया।
  • विद्रोह में पाण्ड्यों ने नृपत्तुंग का एवं चोलों तथा पश्चिमी गंग ने अपराजित का साथ दिया।
  • दोनों ओर की सेनाओं की बीच श्रीपुरम्बियम के मैदान में घमासान संघर्ष हुआ, इस संघर्ष में नृपतुंग वर्मन पराजित हुआ।

अपराजित  

अपराजित (878-897 ई.) ने नृपत्तुंग वर्मन को अपदस्थ करके पल्लव वंश का राज्याधिकार प्राप्त किया।

  • उसने पल्लव वंश के अन्तिम शासक के रूप में शासन किया।
  • अपराजित काँची का अन्तिम पल्लव राजा था।
  • उसके समय में चोल शासक आदित्य प्रथम ने 'तोंडमंडलम्' पर अधिकार कर लिया।
  • इस प्रकार दक्षिण भारत में एक नवीन शक्ति के रूप में चोलों का उदय हुआ।
  • अपराजित ने विरुक्तनि में 'वीरट्टानेश्वर मंदिर' को निर्मित करवाया।
  • अपराजित के बाद नन्दि वर्मन तृतीयनन्दि वर्मन चतुर्थकम्प वर्मन आदि ने कुछ समय तक पल्लव शक्ति को बचाने का प्रयास किया, पर असफल रहे।
  • उसने नवीं शताब्दी ई. के उत्तरार्ध में राज्य किया।
  • 862-63 ई. में अपराजित ने पांड्य राजा वरगुण वर्मा को श्री पुरम्बिया के युद्ध में पराजित किया था, लेकिन बाद में नवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में वह स्वयं चोल राजा आदित्य प्रथम (880-907 ई.) से पराजित हुआ और मारा गया।
  • अपराजित की मृत्यु के बाद पल्लव राजवंश का अन्त हो गया।

सातवाहन वंश  

सातवाहन वंश (60 ई.पू. से 240 ई.) भारत का प्राचीन राजवंश था, जिसने केन्द्रीय दक्षिण भारत पर शासन किया था। भारतीय इतिहास में यह राजवंश 'आन्ध्र वंश' के नाम से भी विख्यात है। सातवाहन वंश का प्रारम्भिक राजा सिमुक था। इस वंश के राजाओं ने विदेशी आक्रमणकारियों से जमकर संघर्ष किया था। इन राजाओं ने शक आक्रांताओं को सहजता से भारत में पैर नहीं जमाने दिये।

इतिहास

भारतीय परिवार, जो पुराणों (प्राचीन धार्मिक तथा किंवदंतियों का साहित्य) पर आधारित कुछ व्याख्याओं के अनुसार आंध्र जाति (जनजाति) का था और 'दक्षिणापथ' अर्थात दक्षिणी क्षेत्र में साम्राज्य की स्थापना करने वाला पहला दक्कनी वंश था। इस वंश का आरंभ 'सिभुक' अथवा 'सिंधुक' नामक व्यक्ति ने दक्षिण में कृष्णा और गोदावरीनदियों की घाटी में किया था। इस वश को 'आंध्र राजवंश' के नाम भी जाना जाता है। सातवाहन वंश के अनेक प्रतापी सम्राटों ने विदेशी शक आक्रान्ताओं के विरुद्ध भी अनुपम सफलता प्राप्त की थी। दक्षिणापथ के इन राजाओं का वृत्तान्त न केवल उनके सिक्कों और शिलालेखों से जाना जाता है, अपितु अनेक ऐसे साहित्यिक ग्रंथ भी उपलब्ध हैं, जिनसे इस राजवंश के कतिपय राजाओं के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण बातें ज्ञात होती हैं।

शासक राजा

सातवाहन वंश के राजाओं के नाम निम्नलिखित हैं-

  1. सिमुक
  2. सातकर्णि
  3. गौतमीपुत्र सातकर्णि
  4. वासिष्ठी पुत्र पुलुमावि
  5. कृष्ण द्वितीय सातवाहन
  6. राजा हाल
  7. महेन्द्र सातकर्णि
  8. कुन्तल सातकर्णि

पार्थिया  

पार्थ या पार्थिया (अंग्रेज़ीParthiaबैक्ट्रिया के पश्चिम और कैस्पियन सागर के दक्षिण पूर्व में स्थित एक ऐतिहासिक प्रदेश था, जिसके निवासी जातीय दृष्टि से ग्रीक लोगों से सर्वथा भिन्न थे।

  • यहाँ कभी पार्थी लोग अपना साम्राज्य चलाया करते थे, जो 247 ईसा पूर्व से 224 ईसवी तक चला। इस साम्राज्य को 'अशकानी साम्राज्य' के नाम से भी जाना जाता है।
  • सीरियन साम्राज्य की निर्बलता से लाभ उठाकर पार्थी लोगों ने विद्रोह कर दिया था और 248 ई. पू. के लगभग स्वतंत्र पार्थियन राज्य की स्थापना हुई।
  • पार्थियन लोगों के इस विद्रोह के नेता 'अरसक' और 'तिरिदात' नामक दो भाई थे। इन भाइयों ने धीरे-धीरे पार्थियन राज्य की शक्ति को बहुत बढ़ा लिया, और कुछ समय बाद सम्पूर्ण ईरान उनकी अधीनता में आ गया।

द्रोणाचार्य  

द्रोणाचार्य 
Dronacharya

महर्षि भारद्वाज का वीर्य किसी द्रोणी (यज्ञकलश अथवा पर्वत की गुफ़ा) में स्खलित होने से जिस पुत्र का जन्म हुआ, उसे द्रोण कहा गया। ऐसा उल्लेख भी मिलता है कि भारद्वाज ने गंगा में स्नान करती घृताची को देखा, आसक्त होने के कारण जो वीर्य स्खलन हुआ, उसे उन्होंने द्रोण (यज्ञकलश) में रख दिया। उससे उत्पन्न बालक द्रोण कहलाया। द्रोणाचार्य भारद्वाज मुनि के पुत्र थे। ये संसार के श्रेष्ठ धनुर्धर थे। द्रोण अपने पिता भारद्वाज मुनि के आश्रम में ही रहते हुये चारों वेदों तथा अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान में पारंगत हो गये थे। द्रोण का जन्म उत्तरांचल की राजधानी देहरादून में बताया जाता है, जिसे हम देहराद्रोण (मिट्टी का सकोरा) भी कहते थे। द्रोण के साथ प्रषत् नामक राजा के पुत्र द्रुपद भी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे तथा दोनों में प्रगाढ़ मैत्री हो गई। भारद्वाज मुनि के आश्रम में द्रुपद भी द्रोण के साथ ही विद्याध्ययन करते थे। भारद्वाज मुनि के शरीरान्त होने के बाद द्रोण वहीं रहकर तपस्या करने लगे। वेद-वेदागों में पारंगत तथा तपस्या के धनी द्रोण का यश थोड़े ही समय में चारों ओर फैल गया।

विवाह

द्रोणाचार्य का विवाह कृपाचार्य की बहिन कृपि से हो गया और उनका अश्वत्थामा नामक पुत्र पैदा हो गया। अत्यन्त शोचनीय आर्थिक स्थिति होने के कारण जब अश्वत्थामा ने अपनी माँ से दूध पीने को माँगा तो कृपि ने अपने पुत्र को पानी में आटा घोलकर दूध बताकर पीने को दे दिया। द्रोणाचार्य को इस बात का पता चलने पर अपार कष्ट हुआ, उन्हें द्रुपद का आधा राज्य देने का वचन याद आया किन्तु द्रुपद ने द्रोणाचार्य को अपनी राज्यसभा में अपमानित किया।

अश्वत्थामा  

अश्वत्थामा द्रोणाचार्य के पुत्र थे। द्रोणाचार्य ने शिव को अपनी तपस्या से प्रसन्न करके उन्हीं के अंश से अश्वत्थामा नामक पुत्र को प्राप्त किया। इनकी माता का नाम कृपा था जो शरद्वान की लड़की थी। जन्म ग्रहण करते ही इनके कण्ठ से हिनहिनाने की सी ध्वनि हुई जिससे इनका नाम अश्वत्थामा पड़ा। महाभारत युद्ध में ये कौरव-पक्ष के एक सेनापति थे। एक बार रात में ये पाण्डवों के शिविर में गये और सोते में अपने पिता के हनन करने वाले धृष्टद्युम्न और शिखंडी तथा पाण्डवों के पाँचों लड़कों को मार डाला। पुत्र वियोग के कारण द्रौपदी करुण विलाप करने लगी। इस पर क्षुब्ध हो अश्वत्थामा को अर्जुन ने चुनौती दी। अश्वत्थामा ने अर्जुन पर ऐशिकास्त्र से आक्रमण किया। अर्जुन ने प्रत्याक्रमण के लिए ब्रह्माशिरास्त्र उठाया, तब ये भागे 'अश्वत्थामा भय कर भग्यो'। व्यासनारदयुधिष्ठिर आदि ने अर्जुन को अस्त्र-प्रयोग करने से रोका। द्रौपदी ने इनकी मणि उतार लेने का सुझाव दिया। अत: अर्जुन ने इनकी मुकुट मणि लेकर प्राणदान दे दिया। अर्जुन ने यह मणि द्रौपदी को दे दी जिसे द्रौपदी ने युधिष्ठिर के अधिकार में दे दिया।


महाभारत के युद्ध में उन्होंने सक्रिय भाग लिया था। उन्होंने भीम-पुत्र घटोत्कच को परास्त किया तथा घटोत्कच पुत्र अंजनपर्वा का वध किया। उसके अतिरिक्त द्रुपदकुमार, शत्रुंजय, बलानीक, जयानीक, जयाश्व तथा राजा श्रुताहु को भी मार डाला था। उन्होंने कुंतीभोज के दस पुत्रों का वध किया। महाभारत युद्ध में धोखे से किये गये द्रोणाचार्य के वध के विषय में जानकर अश्वत्थामा का ख़ून खौल उठा। पूर्वकाल में द्रोण ने नारायण को प्रसन्न करके नारायणास्त्र की प्राप्ति की थी। फिर अपने बेटे अश्वत्थामा को नारायणास्त्र प्रदान करके उन्होंने किसी पर सहसा उसका आघात करने को मना किया। अश्वत्थामा ने धृष्टद्युम्न को उसी अस्त्र से मारने का निश्चय किया। धृष्टद्युम्न पर जब उन्होंने नारायणास्त्र का प्रयोग किया तब कृष्ण ने अपनी ओर के सब सैनिकों को रथ से उतर-कर हथियार डालने के लिए कहा क्योंकि यही एकमात्र उसके निराकरण का उपाय था। भीम ने कृष्ण की बात नहीं मानी तो सबको छोड़कर नारायणास्त्र उसी के मस्तक पर प्रहार करने लगा। कृष्ण ने उसे बलात रथ से उतारकर नारायणास्त्र के प्रभाव को शांत किया। अश्वत्थामा ने आग्नेयास्त्र का प्रयोग किया किंतु श्रीकृष्ण तथा अर्जुन पर उसका प्रभाव नहीं हुआ, शेष समस्त सेना व्याकुल और घायल हो गयी। अश्वत्थामा बड़े असमंजस में पड़ गये, तभी व्यास ने प्रकट होकर उन्हें बताया कि श्रीकृष्ण साक्षात विष्णु हैं, जिन्होंने आराधना से शिव को प्रसन्न कर रखा है। उन्हीं के तप से महामुनि नर (अर्जुन) प्रकट हुए। अत: अर्जुन और कृष्ण साक्षात नरनारायण हैं। अश्वत्थामा ने मन ही मन शिव, नर और नारायण को नमस्कार किया और सेना सहित शिविर की ओर प्रस्थान किया। कर्ण के सेनापतित्व में युद्ध करते हुए अश्वत्थामा ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक धृष्टद्युम्न को नहीं मार डालेंगे, अपना कवच नहीं उतारेंगे।

ब्रह्मास्त्र का प्रयोग

अठारह दिन तक युद्ध चलता रहा। अश्वत्थामा को जब दुर्योधन के अधर्म-पूर्वक किये गये वध के विषय में पता चला तो वे क्रोध से अंधे हो गये। उन्होंने शिविर में सोते हुए समस्त पांचालों को मार डाला। द्रौपदी को समाचार मिला तो उसने आमरण अनशन कर लिया और कहा कि वह अनशन तभी तोड़ेगी, जब कि अश्वत्थामा के मस्तक पर सदैव बनी रहने वाली मणि उसे प्राप्त होगी। कौरव-पांडवोंके युद्ध में अश्वत्थामा ने अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था। शिव-प्रदत्त पाशुपत अस्त्र से अर्जुन ने ब्रह्मास्त्र का निवारण किया। [1] पांडवों को जड़-मूल से नष्ट करने के लिए अश्वत्थामा ने गर्भवती उत्तरा पर भी वार किया था। अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र छोड़ा, प्रत्युत्तर में अर्जुन ने भी छोड़ा। अश्वत्थामा ने पांडवों के नाश के लिए छोड़ा था और अर्जुन ने उसके ब्रह्मास्त्र को नष्ट करने के लिए। नारद तथा व्यास के कहने से अर्जुन ने अपने ब्रह्मास्त्र का उपसंहार कर दिया किंतु अश्वत्थामा ने वापस लेने की सामर्थ्य की न्यूनता बताते हुए पांडव परिवार के गर्भों को नष्ट करने के लिए छोड़ा। कृष्ण ने कहा- 'उत्तरा को परीक्षित नामक बालक के जन्म का वर प्राप्त है। उसका पुत्र होगा ही। यदि तेरे शस्त्र-प्रयोग के कारण मृत हुआ तो भी मैं उसे जीवनदान करूंगा। वह भूमि का सम्राट होगा और तू? नीच अश्वत्थामा! तू इतने वधों का पाप ढोता हुआ तीन हज़ार वर्ष तक निर्जन स्थानों में भटकेगा। तेरे शरीर से सदैव रक्त की दुर्गंध नि:सृत होती रहेगी। तू अनेक रोगों से पीड़ित रहेगा।' व्यास ने श्रीकृष्ण के वचनों का अनुमोदन किया। अश्वत्थामा ने कहा कि वह मनुष्यों में केवल व्यास मुनि के साथ रहना चाहता है। जन्म से ही अश्वत्थामा के मस्तक में एक अमूल्य मणि विद्यमान थी जो कि उसे दैत्य, दानव, अस्त्र शस्त्र, व्याधि, देवता, नाग आदि से निर्भय रखती थी। वही मणि द्रौपदी ने मांगी थी। व्यास तथा नारद के कहने से उसने वह मणि द्रौपदी के लिए दे दी। [2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  शिव पुराण, 7।52
  2.  महाभारत, द्रोणपर्व, 156, 190 से 201 तक, कर्णपर्व, अध्याय, 57, सौप्तिक पर्व 1-16, श्लोक 8-9
  3.  श्रीमद् भागवत, प्रथम स्कंध, अध्याय 7

रुद्रदामन  

रुद्रदामन 'कार्दम वंशी' चष्टन का पौत्र था, जिसे चष्टन के बाद गद्दी पर बैठाया गया था। यह इस वंश का सर्वाधिक योग्य शासक था और इसका शासन काल 130 से 150 ई. माना जाता है। रुद्रदामन एक अच्छा प्रजापालक, तर्कशास्त्र का विद्वान् तथा संगीत का प्रेमी था। इसके समय में उज्जयिनी शिक्षा का बहुत ही महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन चुकी थी।

  • रुद्रदामन के विषय में विस्तृत जानकारी उसके जूनागढ़ (गिरनार) से शक संवत 72 (150 ई.) के अभिलेख से मिलती है।
  • रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख से उसके साम्राज्य के पूर्वी एवं पश्चिमी मालवाद्वारका के आस-पास के क्षेत्र, सौराष्ट्रकच्छसिंधु नदी का मुहाना, उत्तरी कोंकण आदि तक विस्तृत होने का उल्लेख मिलता है।
  • इसी अभिलेख में रुद्रदामन द्वारा सातवाहन नरेश दक्षिण पथस्वामी में ही उसे 'भ्रष्ट-राज-प्रतिष्ठापक' कहा गया है।
  • इसने चन्द्रगुप्त मौर्य के मंत्री द्वारा बनवायी गई, सुदर्शन झील के पुननिर्माण में भारी धन व्यय करवाया था।
  • रुद्रदामन कुशल राजनीतिज्ञ के अतिरिक्त प्रजापालक, संगीत एवं तर्कशास्त्र के क्षेत्र का विद्वान् था।
  • इसके समय में संस्कृत साहित्य का बहुत विकास हुआ था।
  • रुद्रदामन ने सबसे पहले विशुद्ध संस्कृत भाषा में लम्बा अभिलेख (जूनागढ़ अभिलेख) जारी किया।
  • उसके समय में उज्जयिनी शिक्षा का प्रमुख केन्द्र थी।
  • पश्चिमी भारत का अन्तिम शक नरेश रुद्रसिंह तृतीय था।
  • चौथी शताब्दी ई. के अन्त में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्यने इस वंश के अन्तिम रुद्रसिंह तृतीय की हत्या कर शकों के क्षेत्रों को गुप्त साम्राज्य में मिला लिया।

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