मौखरि वंश

मौखरि वंश  

मौखरि वंश की स्थापना उत्तर गुप्तकाल के पतन के बाद हुई थी। गया ज़िले के निवासी मौखरि लोग चक्रवर्ती गुप्त राजवंश के समय में उत्तर गुप्तवंश के लोगों की तरह ही सामन्त थे। 

इस वंश के लोग जो अधिकतर उत्तर प्रदेश के कन्‍नौज में और राजस्थान के बड़वा क्षेत्र में फैले हुए थे, तीसरी सदी में इनका प्रमाण मिलता है।

  • मौखरि वंश के राजाओं का उत्तर गुप्तवंश के चौथे शासक कुमारगुप्त के साथ युद्ध हुआ था, इस युद्ध में ईशानवर्मा ने मौखरि वंश के शासकों से मगध प्रदेश को छीन लिया था।
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️

कुमारगुप्त प्रथम महेन्द्रादित्य  

कुमारगुप्त प्रथम (414-455 ई.) गुप्तवंशीय सम्राट था। पिता चंद्रगुप्त द्वितीय की मृत्यु के बाद वह राजगद्दी पर बैठा था। वह पट्टमहादेवी ध्रुवदेवी का पुत्र था। उसके शासन काल में विशाल गुप्त साम्राज्य अक्षुण रूप से क़ायम रहा। बल्ख से बंगाल की खाड़ी तक उसका अबाधित शासन था। सब राजा, सामन्त, गणराज्य और प्रत्यंतवर्ती जनपद कुमारगुप्त के वशवर्ती थे। गुप्त वंश की शक्ति उसके शासन काल में अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई थी। कुमारगुप्त को विद्रोही राजाओं को वश में लाने के लिए कोई युद्ध नहीं करने पड़े।

अभिलेख

कुमारगुप्त प्रथम के समय के लगभग 16 अभिलेख और बड़ी मात्रा में स्वर्ण के सिक्के प्राप्त हुए हैं। उनसे उसके अनेक विरुदों, यथा- 'परमदैवत', 'परमभट्टारक', 'महाराजाधिराज', 'अश्वमेघमहेंद्र', 'महेंद्रादित्य', 'श्रीमहेंद्र', 'महेंद्रसिंह' आदि की जानकारी मिलती है। इसमें से कुछ तो वंश के परंपरागत विरुद्ध हैं, जो उनके सम्राट पद के बोधक हैं। कुछ उसकी नई विजयों के द्योतक जान पड़ते हैं। सिक्कों से ज्ञात होता है कि कुमारगुप्त प्रथम ने दो अश्वमेघ यज्ञ किए थे। उसके अभिलेखों और सिक्कों के प्राप्ति स्थानों से उसके विस्तृत साम्राज्य का ज्ञान होता है। वे पूर्व में उत्तर-पश्चिम बंगाल से लेकर पश्चिम में भावनगर, अहमदाबादउत्तर प्रदेश और बिहार में उनकी संख्या अधिक है। उसके अभिलेखों से साम्राज्य के प्रशासन और प्रांतीय उपरिकों[1] का भी ज्ञान होता है।[2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  गवर्नरों
  2.  कुमारगुप्त प्रथम (हिन्दी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 13 फरवरी, 2015।
  3.  म्लेच्छों को
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️
  • मौखरि वंश के शासकों ने अपनी राजधानी कन्‍नौज बनाई और शासन किया।
  • कन्‍नौज का प्रथम मौखरि वंश का शासक हरिवर्मा था। हरिवर्मा ने 510 ई. में शासन किया था। उसका वैवाहिक सम्बन्ध उत्तरवंशीय राजकुमारी हर्ष गुप्त के साथ हुआ था।
🌼♨️🌼♨️🌼♨️🌼♨️🌼♨️🌼♨️🌼♨️🌼♨️🌼

हर्ष गुप्त  

  • कृष्ण गुप्त का उत्तराधिकारी उसका पुत्र हर्ष गुप्त था।
  • इसका शासनकाल लगभग 500 ईस्वी से 520 ईस्वी तक था।
  • अफ़सढ़ अभिलेख में कहा गया है कि इसने अनेक दुधर्ष युद्धों में विजय प्राप्त की था। इसका शासन काल भी हूणों के आक्रमण के कारण उथल-पुथल का काल था। यह हूण आक्रान्ता तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल दोनों का समकालीन था। इस समय गुप्तसम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य हूणों के साथ संघर्ष में उलझा हुआ था।
  • कुछ विद्वानों का यह मानना है कि नरसिंह गुप्त का शासन मगध क्षेत्र में ही सीमित था, जबकि बंगाल के क्षेत्र में कदाचित वैन्य गुप्त ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था तथा मालवा क्षेत्र में सम्भवतः भानु गुप्त हूणों के विरुद्ध संघर्षरत था।
  • अफ़सढ़ अभिलेख में हर्ष गुप्त के लिए स्वतंत्र शासक के लिए प्रयुक्त होने वाली किसी उपाधि का प्रयोग नहीं है। अतः उसकी स्थिति एक सामन्त की ही प्रतीत होती है। यह कहना कठिन है कि वह तत्कालीन गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य अथवा भानु गुप्त के अधीन शासन कर रहा था या उसने हूणों की अधिसत्ता स्वीकार कर ली थी। यह भी सम्भावना व्यक्त की गयी है कि वह मालवा के यशोवर्मन का भी समकालीन था। किंतु दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है।
  • हर्ष गुप्त की बहन का विवाह मौखरी नरेश आदित्यवर्मा के साथ हुआ था। इस प्रकार हर्ष गुप्त के शासनकाल में उत्तर गुप्त एवं मौखरी राजकुलों के पारस्परिक सम्बन्ध मित्रतापूर्ण दिखाई देते हैं।
  • वस्तुतः ये दोनों ही राजकुल विकासोन्मुख थे। अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ये परस्पर सहयोगी बनें और मैत्री सम्बन्ध को सु़दृढ़ करने के लिए वैवाहिक सम्बन्ध का आश्रय लिया।
🌼♨️🌼♨️🌼♨️🌼♨️🌼♨️🌼♨️🌼♨️🌼♨️🌼
  • ईश्वरवर्मा का विवाह भी उत्तर गुप्तवंशीय राजकुमारी उपगुप्त के साथ हुआ था। इनका शासन कन्‍नौज तक ही सीमित रहा, ये उसका विस्तार नहीं कर पाये।
  • यह राजवंश तीन पीढ़ियों तक शासक रहा।
  • हरदा से प्राप्त लेख से यह स्पष्ट होता है कि सूर्यवर्मा ईशानवर्मा का छोटा भाई था।
  • अवंतिवर्मा इस वंश का सबसे शक्‍तिशाली तथा प्रतापी राजा था और इसके बाद ही मौखरि वंश का अन्त हो गया!
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️

अवन्ति वर्मन  

अवन्ति वर्मन अथवा 'अवन्तिवर्मा' कश्मीर के उत्पल वंशका संस्थापक था। उसका शासन काल 855 से 883 ई. तक माना जाता है।

  • अवन्ति वर्मन ने शासन काल का अधिकांश समय लोकोपकारी कार्यो में व्यतीत किया था।
  • उसने कृषि के विकास हेतु अभियन्ता 'सुय्य' निरीक्षण में कई नहरों का निर्माण करवाया।
  • नगरों एवं कस्बों के निर्माण के अन्तर्गत अवन्ति वर्मन ने अविन्तपुर नामक नगर एवं 'सुय्यापुरा' (आधुनिक सोपारा) नामक कस्बे का निर्माण करवाया।
  • उसके संरक्षण में दो कवि रत्नाकर एवं 'आनन्द वर्धन' उसके दरबार की शोभा बढ़ाते थे।
  • अवन्ति वर्मन ने अपने सुयोग्य मंत्री सूर के साथ सफल शासन किया।
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️

ईशानवर्मा  

ईशानवर्मा कन्नौज के मौखरि राजवंश का चौथा राजा था। 

👉उसके पहले के तीन राजा अधिकतर उत्तर युगीन मागध गुप्तों के सामंत नृपति रहे थे।

  • ईशानवर्मा 554 ई. के आसपास राज्य करता था।
  • ईशानवर्मन ने उत्तर गुप्तों का आधिपत्य कन्नौज से हटाकर अपनी स्वतंत्रता घोषित कर ली थी।
  • उसकी प्रशस्ति में लिखा है कि- "उसने आन्ध्रों को परास्त किया और गौड़ों को अपनी सीमा के भीतर रहने के लिए मजबूर कर दिया। इसमें संदेह नहीं कि यह प्रशस्ति मात्र प्रशस्ति है, क्योंकि ईशानवर्मन् के आन्ध्रों अथवा गौड़ राजा के संपर्क में आने की संभावना अत्यंत कम थी।
  • गौड़ों और मौखरियों के बीच तो स्वयं उत्तर कालीन गुप्त ही थे, जिनके राजा कुमारगुप्त ने, जैसा कि उसके अभिलेख से विदित होता है, ईशानवर्मन को परास्त कर उसके राज्य का कुछ भाग छीन लिया था।[1]
  • महाराजाधिराज की पदवी धारण करने वाला यह मौखरि राजा था।[2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  औंकारनाथ उपाध्याय, हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 2, पृष्ठ संख्या 38
  2.  हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 2 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 39 |

ईश्वर वर्मा  

ईश्वर वर्मा कन्नौज के मौखरि वंश का तीसरा राजा था। वह छठी शताब्दी ई. के द्वितीय चतुर्थांश में राज्य करता था। ईश्वर वर्मा का शासन केवल कन्‍नौज तक ही सीमित रहा। वह अपने राज्य का अधिक विस्तार नहीं कर सका।[1]

  • अपने राज्य काल के दौरान ईश्वर वर्मा को महाराज की पदवी प्राप्त थी।
  • सम्भवत: गुप्त राजकुमारी उपगुप्ता के साथ उसने विवाह किया था।
  • ईशान वर्मा उसका पुत्र था, जो बाद में ईश्वर वर्मा का उत्तराधिकारी हुआ।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  भारतीय इतिहास कोश |लेखक: सच्चिदानन्द भट्टाचार्य |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 57 |

गृहवर्मा  

गृहवर्मा मौखरि वंश के राजा अवंतिवर्मा का ज्येष्ठ पुत्र था। उसका विवाह वर्धन वंश के राजा प्रभाकरवर्धन की पुत्री राज्यश्री के साथ हुआ था।

♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️

वर्धन वंश  

वर्धन वंश की नींव छठी शती के प्रारम्भ में पुष्यभूतिवर्धनने थानेश्वर में डाली। इस वंश का पाँचवा और शक्तिशाली राजा प्रभाकरनवर्धन (लगभग 583 - 605 ई.) हुआ था। उसकी उपाधि 'परम भट्टारक महाराजाधिराज' थी। उपाधि से ज्ञात होता है कि प्रभाकरवर्धन ने अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया था।

  • बाणभट्ट द्वारा रचित 'हर्षचरित' से पता चलता है कि इस शासक ने सिंधगुजरात और मालवा पर अधिकार कर लिया था।
  • गांधार प्रदेश तक के शासक प्रभाकरवर्धन से डरते थे तथा उसने हूणों को भी पराजित किया था।
  • राजा प्रभाकरवर्धन के दो पुत्र राज्यवर्धनहर्षवर्धनऔर एक पुत्री राज्यश्री थी।
  • राज्यश्री का विवाह कन्नौज के मौखरी वंश के शासक गृहवर्मन से हुआ था। उस वैवाहिक संबंध के कारण उत्तरी भारत के दो प्रसिद्ध मौखरी और वर्धन राज्य प्रेम-सूत्र में बँध गये थे, जिससे उन दोनों की शक्ति बहुत बढ़ गई थी।
  • 'हर्षचरित' से ज्ञात होता है कि प्रभाकरवर्धन ने अपनी मृत्यु से पहले राज्यवर्धन को उत्तर दिशा में हूणों का दमन करने के लिए भेजा था। संभवत: उस समय हूणों का अधिकार उत्तरी पंजाब और कश्मीरके कुछ भाग पर ही था।
  • शक्तिशाली प्रभाकरवर्धन का शासन पश्चिम में व्यास नदी से लेकर पूर्व में यमुना तक था।

पुष्यभूतिवर्धन  

पुष्यभूतिवर्धन भारत के प्रसिद्ध राजवंशों में से एक वर्धन वंश का संस्थापक था।



थानेश्वर  

  • थानेश्वर संस्कृत साहित्य में वर्णित एक प्रख्यात प्राचीन नगर है।
  • यह आधुनिक दिल्ली तथा प्राचीन इंद्रप्रस्थ नगर के उत्तर में अम्बाला और करनाल के बीच स्थित था।
  • यह ब्रह्मावर्त क्षेत्र का केन्द्रबिन्दु था, जहाँ भारतीय आर्यों का सबसे पहले विस्तार हुआ।
  • इसी के निकट ही कुरुक्षेत्र स्थित है। जहाँ पर कौरवोंतथा पाण्डवों के बीच अठारह दिनों तक विश्व प्रसिद्ध युद्ध हुआ था, जो महाभारत महाकाव्य का प्रमुख विषय है।
  • थानेश्वर को 'स्थानेश्वर' भी कहते हैं, जो कि शिव का पवित्र स्थान था।
  • छठी शताब्दी के अन्त में यह पुष्यभूति वंश की राजधानी बना और इसके शासक प्रभाकरनवर्धन ने इसे एक विशाल साम्राज्य, जिसके अंतर्गत मालवा, उत्तर-पश्चिम पंजाब और राजपूताना का कुछ भाग आता था, केन्द्रीय नगर बनाया।
  • प्रभाकरनवर्धन के छोटे पुत्र हर्षवर्धन के काल (606-647) में इसका महत्त्व घट गया। उसने अपने अपेक्षाकृत अधिक विशाल साम्राज्य की राजधानी कन्नौज को बनाया।
  • सातवीं और आठवीं शताब्दी में हूण आक्रमणों के फलस्वरूप इस नगर का तेज़ी से पतन हो गया। फिर भी यह हिन्दुओं का पवित्र तीर्थ स्थान बना रहा।
  • 1014 ई. में यह सुल्तान महमूद द्वारा लूटा तथा नष्ट कर दिया गया और अन्तत: पंजाब के गजनवी राज्य का एक अंग हो गया।
  • यह दिल्ली जाने वाली सड़क पर स्थित है।
  • इसके इर्द-गिर्द क्षेत्र में तराइन के दो तथा पानीपत के तीन युद्ध हुए, जिन्होंने कई बार भारत के भाग्य का निर्णय किया।
  • तृतीय मराठा युद्ध के उपरान्त यह भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य का अंग हो गया।

राज्यवर्धन  

राज्यवर्धन थानेश्वर के शासक प्रभाकरवर्धन का ज्येष्ठ पुत्र था। वह अपने भाई हर्षवर्धन और बहन राज्यश्री से बड़ा था। राज्यवर्धन हर्षवर्धन से चार वर्ष बड़ा था। तीनों बहन-भाइयों में अगाध प्रेम था। एक भीषण युद्ध के फलस्वरूप बंगाल के राजा शशांक द्वारा राज्यवर्धन का वध हुआ।

  • राज्यवर्धन की बहन राज्यश्री का विवाह कन्नौज के मौखरि वंश के शासक गृहवर्मन से हुआ था।
  • प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के उपरान्त ही देवगुप्त का आक्रमण कन्नौज पर हुआ और एक भयंकर युद्ध प्रारम्भ हो गया।
  • युद्ध में गृहवर्मन मालवा के राजा देवगुप्त के हाथों मारा गया और उसकी पत्नी राज्यश्री को बन्दी बनाकर कन्नौज के काराग़ार में डाल दिया गया।
  • सूचना मिलते ही राज्यश्री के ज्येष्ठ अग्रज राज्यवर्धन ने अपनी बहन को काराग़ार से मुक्त कराने के लिए कन्नौज की ओर प्रस्थान किया।
  • राज्यवर्धन ने मालवा के शासक देवगुप्त को पराजित करके मार डाला, किंतु वह स्वयं देवगुप्त के सहायक और बंगाल के शासक शशांक द्वारा मारा गया।
  • इस समय राज्य में व्याप्त भारी उथल-पुथल से राज्यश्री काराग़ार से भाग निकली और उसने विन्ध्यांचल के जंगलों में शरण ली।
  • बाद में राज्यवर्धन के उत्तराधिकारी सम्राट हर्षवर्धनने राज्यश्री को विन्ध्यांचल के जंगलों में उस समय ढूँढ निकाला, जब वह निराश होकर चिता में प्रवेश करने ही वाली थी। हर्षवर्धन उसे कन्नौज वापस लौटा लाया और आजीवन उसको सम्मान दिया।

हर्षवर्धन  


दक्षिण में असफलताहर्षवर्धन या हर्ष (606ई.-647ई.), राज्यवर्धन के बाद लगभग 606 ई. में थानेश्वर के सिंहासन पर बैठा। हर्ष के विषय में हमें बाणभट्ट के हर्षचरित से व्यापक जानकारी मिलती है। हर्ष ने लगभग 41 वर्ष शासन किया। इन वर्षों में हर्ष ने अपने साम्राज्य का विस्तार जालंधरपंजाबकश्मीरनेपाल एवं बल्लभीपुर तक कर लिया। इसने आर्यावर्त को भी अपने अधीन किया। हर्ष को बादामी के चालुक्यवंशीशासक पुलकेशिन द्वितीय से पराजित होना पड़ा। ऐहोल प्रशस्ति (634 ई.) में इसका उल्लेख मिलता है।

यात्रियों में राजकुमारनीति का पण्डित एवं वर्तमान शाक्यमुनि कहे जाने वाला चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 630 से 640 ई. के बीच भारत की धरती पर पदार्पण किया। हर्ष के विषय में ह्वेनसांग से विस्तृत जानकारी मिलती है। हर्ष ने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया। हर्ष को एक और नाम शिलादित्य से भी जाना जाता है। इसने परम् भट्टारकमगध नरेश की उपाधि ग्रहण की। हर्ष को अपने दक्षिण के अभियान में असफलता हाथ लगी। चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय ने हर्ष को ताप्ती नदी के किनारे परास्त किया।

नाटककार एवं कवि

हर्ष एक प्रतिष्ठित नाटककार एवं कवि था। इसने 'नागानन्द', 'रत्नावली' एवं 'प्रियदर्शिका' नामक नाटकों की रचना की। इसके दरबार में बाणभट्टहरिदत्त एवं जयसेनजैसे प्रसिद्ध कवि एवं लेखक शोभा बढ़ाते थे। हर्ष बौद्ध धर्मकी महायान शाखा का समर्थक होने के साथ-साथ विष्णुएवं शिव की भी स्तुति करता था। ऐसा माना जाता है कि हर्ष प्रतिदिन 500 ब्राह्मणों एवं 1000 बौद्ध भिक्षुओं को भोजन कराता था। हर्ष ने लगभग 643ई. में कन्नौज तथा प्रयाग में दो विशाल धार्मिक सभाओं का आयोजन किया था। हर्ष द्वारा प्रयाग में आयोजित सभा को मोक्षपरिषद्कहा गया है।

प्रभाकरवर्धन  

प्रभाकरवर्धन थानेश्वर का राजा था, जो पुष्यभूति वंश का था और छठी शताब्दी के अंत में राज्य करता था।

♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️
  • गृहवर्मा का बंगाल के शासक शशांक और मालवा के देवगुप्त के साथ युद्ध हुआ था।
  • इस युद्ध में गृहवर्मा की पराजय हुई और उसकी हत्या कर दी गई।

शशांक  

शशांक को बंगाल के यशस्वी शासकों में गिना जाता है। उसने बंगाल प्रदेश की सीमाओं के बाहर भी अपने राज्य का बहुत विस्तार किया। उसका वंश अज्ञात है और गुप्त वंश के साथ उसको सम्बन्धित करना केवल अनुमान मात्र है। उसकी उत्पत्ति चाहे जिस वंश में भी हुई हो, लेकिन इतना निश्चित है कि 606 ई. के पूर्व ही वह गौड़ अथवा बंगाल का शासक बन चुका था और उसकी राजधानी 'कर्णसुवर्ण' थी, जिसकी पहचान मुर्शिदाबाद ज़िले के अंतर्गत 'रांगामाटी' नामक कस्बे से की गयी है।

साम्राज्य विस्तार

यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि दक्षिण और पूर्वी बंगाल शशांक के राज्य के अंतर्गत थे अथवा नहीं। लेकिन पश्चिम में उसका राज्य मगध तक और दक्षिण में उड़ीसा की चिल्का झील तक अवश्य विस्तृत था। पश्चिम की ओर साम्राज्य विस्तार करने के प्रयास में शशांक को मौखरिशासकों से संघर्ष करना आवश्यक हो गया और उसने मौखरियों के शत्रु और मालवा के शासक देवगुप्त से सन्धि कर ली।

कन्नौज की विजय

देवगुप्त ने अपने मौखरि प्रतिद्वन्द्वी गृहवर्मा को पराजित करके मार डाला और अपने मित्र के सहायतार्थ आगे बढ़कर शशांक ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया। इस पर राज्यवर्धन ने, जो उन्हीं दिनों थानेश्वर का शासक हुआ था और जिसकी बहन राज्यश्री गृहवर्मा के मारे जाने से विधवा हो गई थी, शशांक पर आक्रमण कर दिया। घटनाओं का क्रम क्या रहा, यह निश्चय करना कठिन है, किन्तु राज्यवर्धन को शशांक अथवा उसके अनुचरों ने मार डाला।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

भारतीय इतिहास कोश |लेखक: सच्चिदानन्द भट्टाचार्य |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 445 |

मालवा  

मालवा / मालव / मालबा

मालवा ज्वालामुखी के उद्गार से बना पश्चिमी भारत का एक अंचल है जो वर्तमान में मध्य प्रदेश प्रांत के पश्चिमी भाग में स्थित है। इसे प्राचीनकाल में मालवा या मालव के नाम से जाना जाता था। मालव 'देवी लक्ष्मी के आवास का हिस्सा' कहलाता है। समुद्र तल से इसकी औसत ऊँचाई 496 मीटर है। आकरअवंति पूर्व तथा पश्चिम मालवा का संयुक्त नाम है। यह कर्क रेखा द्वारा दो हिस्सों में विभाजित है। इस क्षेत्र में इंदौरभोपालग्वालियर व जबलपुर संभागों के लगभग 18 ज़िले और महाराष्ट्र व राजस्थान के कुछ हिस्से शामिल हैं। इसमें प्राचीन अवंति, अकारा और दरसन के कुछ क्षेत्र शामिल हैं। मालवा का अधिकांश भाग चंबल नदी तथा इसकी शाखाओं द्वारा संचित है, पश्चिमी भाग माही नदीद्वारा संचित है।

नामकरण

मालवा का नाम नर्मदा - चंबल के उपजाऊ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौतिक क्षेत्र में बसने वाले लोगों के नाम पर पड़ा। मालवा के अधिकांश भाग का गठन जिस पठारद्वारा हुआ है उसका नाम भी इसी अंचल के नाम से मालवा का पठार है। मालवा का उक्त नाम 'मालव' नामक जाति के आधार पर पड़ा इस जाति का उल्लेख सर्वप्रथम ई. पू. चौथी सदी में मिलता है, जब इस जाति की सेना सिकंदर से युद्ध में पराजित हुई थी। ये मालव प्रारंभ में पंजाब तथा राजपूताना क्षेत्रों के निवासी थी, लेकिन सिकंदर से पराजित होकर वे अवन्ति व उसके आस-पास के क्षेत्रों में बस गये। उन्होंने आकर (दशार्ण) तथा अवन्ति को अपनी राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बनाया।

दशार्ण की राजधानी विदिशा थी तथा अवन्ति की राजधानी उज्जयिनी थी। कालांतर में यही दोनों प्रदेश मिलकर मालवा कहलाये। इस प्रकार एक भौगोलिक घटक के रूप में 'मालवा' का नाम लगभग प्रथम ईस्वी सदी में मिलता है।

♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️

राज्यश्री  

राज्यश्री थानेश्वर के शासक प्रभाकरवर्धन की पुत्री और सम्राट हर्षवर्धन की 'भगिनी' (बहन) थी। उसका विवाहकन्नौज के मौखरि वंश के शासक गृहवर्मन से हुआ था, जिसका वध मालवा के राजा देवगुप्त के हाथों हुआ।

जीवन वृतांत

प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के उपरान्त ही देवगुप्त का आक्रमण कन्नौज पर हुआ और एक युद्ध प्रारम्भ हो गया। इस युद्ध में ग्रहवर्मा मारा गया और राज्यश्री को बन्दी बनाकर कन्नौज के काराग़ार में डाल दिया गया। इसकी सूचना मिलते ही राज्यश्री के ज्येष्ठ अग्रज राज्यवर्धन ने उसे काराग़ार से मुक्त कराने के लिए कन्नौज की ओर प्रस्थान किया। राज्यवर्धन ने मालवा के शासक देवगुप्त को पराजित करके मार डाला, किंतु वह स्वयं देवगुप्त के सहायक और बंगाल के शासक शशांक द्वारा मारा गया। इसी उथल-पुथल में राज्यश्री काराग़ार से भाग निकली और विन्ध्यांचल के जंगलों में उसने शरण ली। इस बीच राज्यश्री का कनिष्ठ अग्रज हर्षवर्धन, राज्यवर्धन का उत्तराधिकारी बन चुका था। उसने राज्यश्री को विन्ध्यांचल के जंगलों में उस समय ढूँढ निकाला, जब वह निराश होकर चिता में प्रवेश करने ही वाली थी। हर्षवर्धन उसे कन्नौज वापस लौटा लाया और आजीवन उसको सम्मान दिया। उसने कन्नौज से ही अपने विशाल साम्राज्य का शासन कार्य किया। चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार वह प्राय राज्यश्री से राज्यकार्य में परामर्श लेता था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

भारतीय इतिहास कोश |लेखक: सच्चिदानन्द भट्टाचार्य |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 402 |

♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️

अवन्ति वर्मन  

अवन्ति वर्मन अथवा 'अवन्तिवर्मा' कश्मीर के उत्पल वंशका संस्थापक था। उसका शासन काल 855 से 883 ई. तक माना जाता है।

  • अवन्ति वर्मन ने शासन काल का अधिकांश समय लोकोपकारी कार्यो में व्यतीत किया था।
  • उसने कृषि के विकास हेतु अभियन्ता 'सुय्य' निरीक्षण में कई नहरों का निर्माण करवाया।
  • नगरों एवं कस्बों के निर्माण के अन्तर्गत अवन्ति वर्मन ने अविन्तपुर नामक नगर एवं 'सुय्यापुरा' (आधुनिक सोपारा) नामक कस्बे का निर्माण करवाया।
  • उसके संरक्षण में दो कवि रत्नाकर एवं 'आनन्द वर्धन' उसके दरबार की शोभा बढ़ाते थे।
  • अवन्ति वर्मन ने अपने सुयोग्य मंत्री सूर के साथ सफल शासन किया।


शंकर वर्मन  

शंकरवर्मन ने 885 से 902 ई. तक शासन किया।

  • अवन्ति वर्मन के बाद सिंहासनारूढ़ शंकर वर्मन ने अपने साम्राज्य विस्तार के अन्तर्गत दार्वाभिसार, त्रिगर्त, एवं गुर्जर को जीता।
  • लगातार युद्ध के कारण धनाभाव की पूर्ति हेतु उसने अपनी प्रजा पर करों का बोझ बढ़ा दिया, इस कारण वह काफ़ी अलोकप्रिय हो गया था।
  • रानी दिद्दा का उस पर अत्यधिक प्रभाव था।
  • उसके सिक्कों पर उसके नाम के साथ दिद्दा का नाम भी अंकित है।
  • इस कारण लोगों ने उसका नाम दिद्दाक्षेपा रख दिया।

गोपाल वर्मन  

गोपाल वर्मन ने 902 से 904 ई. तक शासन किया। शंकर वर्मन के बाद गोपाल वर्मन कश्मीर का शासक हुआ।

  • उसके शासन काल में कश्मीर में चारों ओर अव्यवस्था एवं अशान्ति की स्थिति व्याप्त हो गयी।
  • इसका फ़ायदा उठाकर 939 ई. में ब्राह्मण कुल में उत्पन्न यशस्कर ने कश्मीर की सत्ता ग्रहण किया।
  • इस प्रकार उसके शासन काल में शान्ति व्यवस्था की स्थिति पुनः क़ायम हो सकी।
  • 948 ई. में यशस्कर की मृत्यु के बाद उसका मंत्री 'पर्वगुप्त' सिंहासनारूढ़ हुआ।
  • एक वर्ष के शासन के उपरान्त 950 ई. में उसके पुत्र 'क्षेमगुप्त' ने कश्मीर की राजगद्दी ग्रहण की।
  • उसने लगभग 958 ई. तक शासन किया।
  • इसका विवाह हिन्दुशाही वंश की राजकुमारी दिद्दा से हुआ था।
  • पति क्षेमेन्द्रगुप्त की मृत्यु के बाद रानी दिद्दा ने शासन की वागडोर संभाली।
  • उसने लगभग 50 वर्षो तक कुशलता से कश्मीर पर शासन किया।
  • 1003 ई. में रानी दिद्दा की मृत्यु के बाद उसके भतीजे संग्रामराज ने कश्मीर में लोहार वंश की स्थापना की।

उन्मत्तावंती  

उन्मत्तावंती (937-39 ई.) यह कश्मीर के प्रसिद्ध उत्पल राजवंश का अंतिम औरस राजा था, अपने समूचे राजकुल में क्रूरतम। उसकी क्रूरता की कहानी इतिहासप्रसिद्ध है और उसका वर्णन कल्हण ने अपनी राजतरंगिणी में विशद रूप से किया है। क्रूरता के कार्य उसे असाधारण आह्लाद प्रदान करते थे। गर्भवती स्त्रियों के बच्चों को मार डालने में उसे असाधारण आनंद मिलता था। उसके पहले कश्मीर की दशा आंतरिक युद्धों और पदाधिकारियों की बेईमानियों से क्षतविक्षत हो रही थी। उन्मत्तावंती के पिता पार्थ ने विरक्त होकर जयंद्रविहार में रहना आरंभ किया बा। अस्वाभाविक पुत्र उन्मत्तावंती ने विरक्त पिता की भी हत्या कर डाली और अपने सारे भाइयों को मरवा डाला। परंतु बहुत काल तक वह भी राज न कर सका और केवल दो वर्ष के क्रूर शासन के बाद राज्य का अधिकार उसके अनौरस पुत्र सूरवर्मन्‌ के हाथ में चला गया।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 2 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 110 |

Comments

Popular posts from this blog

मेवाड़ में जातिगत सामाजिक ढ़ाँचा : एक विश्लेषण

सिसोदिया (राजपूत)

मेवाड़ की शासक वंशावली