पाल वंश(750-1174)( कार्यकाल -424 वर्ष)
पाल वंश
पाल वंश का उद्भव बंगाल में लगभग 750 ई. में गोपाल से हुआ। इस वंश ने बिहार और अखण्डित बंगाल पर लगभग 750 से 1174 ई. तक शासन किया।
इस वंश की स्थापना गोपाल ने की थी, जो एक स्थानीय प्रमुख था। गोपाल आठवीं शताब्दी के मध्य में अराजकता के माहौल में सत्ताधारी बन बैठा। उसके उत्तराधिकारी धर्मपाल(शासनकाल, लगभग 770-810 ई.) ने अपने शासनकाल में साम्राज्य का काफ़ी विस्तार किया और कुछ समय तक कन्नौज, उत्तर प्रदेश तथा उत्तर भारत पर भी उसका नियंत्रण रहा।
उत्थान व पतन का क्रम
| शासक | शासनकाल |
|---|---|
| गोपाल प्रथम | (लगभग 750 - 770 ई.) |
| धर्मपाल | (लगभग 770 - 810 ई.) |
| देवपाल | (लगभग 810 - 850 ई.) |
| विग्रहपाल | (लगभग 850 - 860 ई.) |
| नारायणपाल | (लगभग 860 - 915 ई.) |
| गोपाल द्वितीय | (लगभग 940 - 957 ई.) |
| महिपाल प्रथम | (लगभग 978 - 1030 ई.) |
| नयपाल | (लगभग 1030 - 1055 ई.) |
| महिपाल द्वितीय | (लगभग 1070 - 1075 ई.) |
| रामपाल | (लगभग 1075 - 1120 ई.) |
| गोपाल तृतीय | (लगभग 1145 ई.) |
| मदनपाल | (लगभग 1144 - 1162 ई.) |
| गोविन्द पाल | (लगभग 1162 - 1174 ई.) |
देवपाल (शासनकाल, लगभग 810-850 ई.) के शासनकाल में भी पाल वंश एक शक्ति बना रहा, उन्होंने देश के उत्तरी और प्राय:द्वीपीय भारत, दोनों पर हमले जारी रखे, लेकिन इसके बाद से साम्राज्य का पतन शुरू हो गया। कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार वंश के शासक महेन्द्र पाल (नौवीं शताब्दी के उत्तरार्ध्द से आरंभिक दसवीं शताब्दी) ने उत्तरी बंगाल तक हमले किए। 810 से 978 ई. तक का समय पाल वंश के इतिहास का पतन काल माना जाता है। इस समय के कमज़ोर एवं अयोग्य शासकों में विग्रहपाल की गणना की जाती है। भागलपुर से प्राप्त शिलालेख के अनुसार, नारायण पाल ने बुद्धगिरि (मुंगेर), तीरभुक्ति(तिरहुत) में शिव के मन्दिर हेतु एक गाँव दान दिया, तथा एक हज़ार मन्दिरों का निर्माण कराया। पाल वंश की सत्ता को एक बार फिर से महिपाल, (शासनकाल, लगभग 978 -1030 ई.) ने पुनर्स्थापित किया। उनका प्रभुत्व वाराणसी(वर्तमान बनारस, उत्तर प्रदेश) तक फैल गया, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद साम्राज्य एक बार फिर से कमज़ोर हो गया। पाल वंश के अंतिम महत्त्वपूर्ण शासक रामपाल(शासनकाल, लगभग 1075 -1120) ने बंगाल में वंश को ताकतवर बनाने के लिये बहुत कुछ किया और अपनी सत्ता को असम तथा उड़ीसा तक फैला दिया।
गोपाल प्रथम
गोपाल प्रथम | |
| पूरा नाम | गोपाल प्रथम |
| पिता/माता | पिता-'वप्यट' |
| धार्मिक मान्यता | बौद्ध धर्म |
| वंश | पाल वंश |
| शासन काल | लगभग 750 - 770 ई. |
| अन्य जानकारी | गोपाल के शासन की तुलना पृथु और सगर के शासनों से की गई है। धार्मिक विश्वासों में वह संभवत: बौद्ध था और तारानाथ का कथन है कि उसने पटना ज़िले में स्थित विहार के पास नलेंद्र (नालंदा) विहार की स्थापना की। |
गोपाल प्रथम (अंग्रेज़ी-Gopala I) गौड़ (उत्तरी बंगाल) पाल वंश का प्रथम[1] राजा तथा बंगाल और बिहार पर लगभग चार शताब्दी तक शासन करने वाले पाल वंश का संस्थापक था। गोपाल प्रथम का शासन लगभग 750 से 770 ई. तक था। उसके पिता का नाम 'वप्यट' और पितामह का नाम 'दयितविष्णु' था। इन दोनों का सम्बन्ध सम्भवत: किसी राजकुल से नहीं था। पाल वंश के अधिकांश राजा बौद्ध थे। गोपाल प्रथम के द्वारा स्थापित पाल वंश ने दीर्घकाल तक शासन किया। 12वीं शताब्दी तक बंगाल-बिहार पर इस वंश के राजाओं का शासन रहा था।
मत्स्य न्याय
शशांक की मृत्यु तथा हर्षवर्धन के पश्चात् बंगाल की राजनीतिक स्थिति काफ़ी अस्त-व्यस्त हो गयी थी। इस स्थिति को अभिलेखों में 'मत्स्य न्याय' की संज्ञा दी गयी है, इसके अन्तर्गत अधिक शक्तिशाली व्यक्ति कमज़ोर व्यक्ति का शोषण करता था। 'खालिमपुर अभिलेख' में कहा गया है कि 'मत्स्य न्याय' से छुटकारा पाने के लिए प्रकृतियों[2] ने गोपाल प्रथम को लक्ष्मी का बांह ग्रहण कराई तथा उसे अपना शासक नियुक्त किया। इसके द्वारा कहाँ-कहाँ विजय प्राप्त की गईं, इस बारे में ठीक से कुछ भी ज्ञात नहीं है। तिब्बती लामा एवं इतिहासकार तारानाथ के अनुसार गोपाल प्रथम ने ओदान्तपुर में एक मठ का निर्माण करवाया था तथा 1197 ई. में मुसलमानों ने इस पर विजय प्राप्त कर ली।
टीका टिप्पणी और संदर्भ
भट्टाचार्य, सच्चिदानन्द भारतीय इतिहास कोश, द्वितीय संस्करण-1989 (हिन्दी), भारत डिस्कवरी पुस्तकालय: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, 134।
- ↑ 8वीं सदी
- ↑ सामान्य जनता
- ↑ 3.0 3.1 3.2 गोपाल प्रथम (हिन्दी) भरतखोज। अभिगमन तिथि: 1 अगस्त, 2015।
- ↑ दक्षिणपूर्वी बंगाल
धर्मपाल
![]() | एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- धर्मपाल (बहुविकल्पी) |
धर्मपाल पाल वंश के गोपाल प्रथम का पुत्र एवं उत्तराधिकारी व एक योग्यतम शासक था। उसका शासन काल लगभग 770 से 810 ई. तक माना जाता है। उसकी महत्त्वपूर्ण सफलता थी, कन्नौज के शासक 'इंद्रायुध' को परास्त कर 'चक्रायुध' को अपने संरक्षण में कन्नौज की गद्दी पर बैठाना।
- धर्मपाल ने पश्चिम में पंजाब से लेकर पूर्व में बंगालतक तथा उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में बरारतक अपनी शक्ति स्थापित की थी।
- उसने 'महाराजाधिराज', 'परमेश्वर' और 'परभट्टारक' जैसी उपाधियाँ धारण की थीं।
- 'खलीमपुर' ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि, उसने कन्नौज में एक दरबार किया था, जिसमें
- भोज(बरार),
- मत्स्य (जयपुर),
- मद्र (पंजाब),
- कुरु (थानेश्वर),
- यदु (मथुरा या द्वारका),
- यवन (सिन्ध का अरब शासक),
- अवन्ति (मालवा), गांधार (उत्तर-पश्चिमी सीमा) तथा
- कीड़ (कांगड़ा) के शासकों ने भाग लिया था।
- 11 वीं शताब्दी के कवि 'सोड्ढल' (गुजराती) ने 'उदयसुन्दरी कथा' में 'धर्मपाल' को 'उत्तरापथस्वामिन' कहा है।
- धर्मपाल प्रतिहार वंशी शासक नागभट्ट द्वितीय से पराजित हुआ था।
- उसे राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव ने भी पराजित किया था।
- धर्मपाल बौद्ध धर्म का अनुयायी था, तथा इसने 'परमसौगत' की उपाधि धारण की थी।
- 'नारायणपाल' अभिलेख में उसे उचित कर लगाने वाला अर्थात् सबसे साथ समान व्यवहार करने वाला (समकर) कहा गया है।
- उसने प्रसिद्ध बौद्ध विद्धान 'हरिभद्र' को संरक्षण दिया था, तथा वह सभी धर्मों का आदर करता था।
- धर्मपाल ने बोधगया में चतुर्भुज महादेव मंदिर की स्थापना की थी, उसका मंत्री गर्ग एक ब्राह्मण था।
- उसके शासन काल में प्रसिद्ध यात्री सुलेमान आया था, जिसने धर्मपाल को 'रुद्रमा' कहा था।
- धर्मपाल द्वारा बहुत से बिहार एवं मठों का निर्माण करवाया गया था।
- उसने प्रसिद्ध विक्रमशिला विश्वविद्यालय और नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना 'पाथरघाट भागलपुर' (बिहार) में की थी।
- धर्मपाल ने नालंदा विश्वविद्यालय के ख़र्च के लिए 200 गाँवों को दान में दिया था।
देवपाल
- देवपाल (प्रतिहार वंश)- कन्नौज का प्रतिहार वंशीय शासक।
- देवपाल (पाल वंश)- एक पाल वंशीय शासक।
विग्रहपाल
विग्रहपाल (लगभग 850-860 ई.) पाल वंश के राजा देवपाल का उत्तराधिकारी था। 810 से 978 ई. तक का समय पाल वंश के इतिहास का पतन काल माना जाता है। इस समय के कमज़ोर एवं अयोग्य शासकों में विग्रहपाल की भी गणना की जाती है।
- तीन या चार वर्ष की अल्प शासन अवधि के बाद ही विग्रहपाल ने गद्दी त्याग दी।
- विग्रहपाल के पुत्र और उत्तराधिकारी नारायणपाल(लगभग 860-915 ई.) की शासन अवधि लम्बी थी।
नारायणपाल
नारायणपाल (लगभग 860-915 ई.) पाल वंश के विग्रहपाल का पुत्र और उत्तराधिकारी था। इसका शासन काल काफ़ी बड़ा था।
- राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष ने पाल शासक नारायणपाल को पराजित किया था।
- प्रतिहारों ने भी धीरे-धीरे पूर्व की ओर अपनी शक्ति का विस्तार करना प्रारम्भ कर दिया था।
- ऐसे समय में नारायणपाल को न सिर्फ़ मगध से हाथ धोना पड़ा, अपितु पाल राज्य का मुख्य भाग उत्तरी बंगाल भी उसके हाथ से निकल गया।
- अपने शासन के अंतिम चरणों में नारायणपाल ने प्रतिहारों से उत्तरी बंगाल और दक्षिणी बिहार को छीन लिया था, क्योंकि प्रतिहार राष्ट्रकूटों के आक्रमण के कारण काफ़ी कमज़ोर हो गये थे।
- नारायणपाल का उत्तराधिकारी उसका पुत्र राज्यपाल था।[1]
टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ परवर्ती पाल (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 17 अक्टूबर, 2013।
गोपाल द्वितीय
- गोपाल द्वितीय बंगाल के पाल वंश का एक परवर्ती राजा था।
- यह अपने पिता 'राज्यपाल' के बाद राजगद्दी पर बैठा था।
- इसने लगभग 940 - 957 ई. तक शासन किया था।
- गोपाल द्वितीय के द्वारा किये गए कार्यों के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है।
महिपाल प्रथम
- महिपाल प्रथम 'विग्रहपाल' का पुत्र तथा उसका उत्तराधिकारी था।
- इसका शासनकाल 978 से 1038 ई. तक माना जाता है।
- महिपाल प्रथम का राज्य मगध तक काफ़ी बड़े क्षेत्रफल में विस्तृत था।
- उसने पाल वंश की खोई हुई शक्ति को पुनर्जीवन देने के लिए कठिन प्रयत्न किया।
- महिपाल प्रथम को चोल वंश के राजेन्द्र प्रथम एवं कलचुरी वंश के गांगेयदेव से युद्ध में परास्त होना पड़ा।
- महिपाल प्रथम को पाल वंश का द्वितीय संस्थापक भी माना जाता है।
- महिपाल ने बौद्ध भिक्षु अतिशा के नेतृत्व में तिब्बत में एक 'धर्म प्रचारक मण्डल' भेजा था।
रामपाल
![]() | एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- रामपाल (बहुविकल्पी) |
रामपाल बंगाल तथा बिहार का 14वाँ पाल वंशीय शासक था। उसने लगभग 42 वर्षों (1075 - 1120 ई.) तक राज्य किया।
- रामपाल से पूर्व उसका ज्येष्ठ भ्राता महिपाल द्वितीयशासक था, किंतु कैवतों के मुखिया 'दिव्य' अथवा 'दिव्योक' के नेतृत्व में जनता द्वारा विद्रोह करने पर उसे सिंहासन और अपने जीवन से भी हाथ धोना पड़ा।
- कुछ समय उपरांत दिव्य का उत्तराधिकारी 'भीम' सिंहासन पर आसीन हुआ, किंतु रामपाल ने उसे अपदस्थ करके परिवार के सभी सदस्यों सहित उसका वध कर डाला।
- इसके बाद रामपाल ने राज्य में फैली अव्यवस्था को दूर करके सर्वत्र शांति और व्यवस्था स्थापित कर दी।
- रामपाल ने आसाम और उड़ीसा पर विजय प्राप्त की और कन्नौज के गहड़वाल शासक को बिहार की ओर साम्राज्य विस्तार करने से सफलतापूर्वक रोका।
- 'संध्याकर नंदी' ने अपने विलक्षण काव्य ग्रंथ 'रामपालचरित' में रामपाल की उपलब्धियों का वर्णन किया है।
गोपाल तृतीय
- गोपाल तृतीय बंगाल के पाल वंश का परवर्ती राजा था।
- यह अपने पिता 'कुमारपाल' के बाद पाल साम्राज्य की राजगद्दी पर आसीन हुआ।
- यह राजा रामपाल का प्रपौत्र था।
- गोपाल तृतीय के चाचा 'मदनपाल' ने 1145 ई. में इसे गद्दी से उतार दिया।
- गोपाल तृतीय के बारे में भी अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
अखण्डित बंगाल
![]() | एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- बंगाल (बहुविकल्पी) |
अखण्डित बंगाल | |
| विवरण | बंगाल अथवा 'अखण्डित बंगाल' उत्तरपूर्वी दक्षिण एशिया में एक क्षेत्र है। |
| विभाजन | सन् 1905 में भारत के ब्रिटिश वाइसरॉय लॉर्ड कर्ज़न द्वारा भारतीय राष्ट्रवादियों के भारी विरोध के बावजूद बंगाल का विभाजन (पश्चिम बंगाल और पूर्वी बंगाल) किया गया था। जिसमें पूर्वी बंगाल बाद में बांग्लादेश के रूप में स्वतन्त्र राष्ट्र बना। |
| राष्ट्रीय शोक दिवस | विभाजन के दिन 16 अक्टूबर, 1905 ई. को पूरे बंगाल में 'राष्ट्रीय शोक दिवस' के रूप में मनाने की घोषणा की गयी। |
| विभाजन के ख़िलाफ़ आंदोलन | विभाजन के ख़िलाफ़ आंदोलन के लिए जनसभाएं, ग्रामीण आंदोलन और ब्रिटिश वस्तुओं के आयात के बहिष्कार के लिए स्वदेशी आंदोलन छेड़ा गया। तमाम आंदोलनों के बावजूद विभाजन हुआ और चरमपंथी विरोधी आतंकवादी आंदोलन चलाने के लिए भूमिगत हो जाए। 1911 में जब देश की राजधानी कलकत्ता से दिल्लीले जाई गई, तो पूर्व और पश्चिम बंगाल पुन: एक हो गए। |
| मुख्य शहर | कोलकाता (भारत) और ढाका (बांग्लादेश) |
| भाषा | बांग्ला |
| क्षेत्रफल | 232,752 वर्ग किमी |
| जनसंख्या | 245,598,679 (2001) |
| अन्य जानकारी | विभाजन के सम्बन्ध में लॉर्ड कर्ज़न का तर्क था कि तत्कालीन बंगाल, जिसमें बिहार और उड़ीसा भी शामिल थे, जो काफ़ी विस्तृत है और अकेला लेफ्टिनेंट गवर्नर उसका प्रशासन भली-भाँति नहीं चला सकता है। |
बंगाल मुग़ल साम्राज्य के अन्तर्गत आने वाले प्रान्तों में सर्वाधिक सम्पन्न था। अंग्रेज़ों ने बंगाल में अपनी प्रथम कोठी 1651 ई. में हुगली में तत्कालीन बंगाल के सूबेदार 'शाहशुजा' (शाहजहाँ के दूसरे पुत्र) की अनुमति से बनायी तथा बंगाल से शोरे, रेशम और चीनी का व्यापार आरम्भ किया। ये बंगाल के निर्यात की प्रमुख वस्तुऐं थीं। उसी वर्ष मुग़ल राजवंश की एक स्त्री की, डाक्टर बौटन द्वारा चिकित्सा करने पर उसने अंग्रेज़ों को 3,000 रु. वार्षिक में बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में मुक्त व्यापार की अनुमति प्रदान की। शीघ्र ही अंग्रेज़ों ने कासिम बाज़ार, पटना तथा अन्य स्थानों पर कोठियाँ बना लीं।
सूबेदारों की स्वतंत्रता
| नवाब | शासन काल |
|---|---|
| मुर्शीदकुली ख़ाँ | 1717-1727 ई. |
| शुजाउद्दीन | 1727-1739 ई. |
| सरफ़राज ख़ाँ | 1739-1740 ई. |
| अलीवर्दी ख़ाँ | 1740-1756 ई. |
| सिराजुद्दौला | 1756-1757 ई. |
| मीर ज़ाफ़र | 1757-1760 ई. |
| मीर कासिम | 1760-1763 ई. |
| मीर ज़ाफ़र (दूसरी बार) | 1763-1765 ई. |
| नजमुद्दौला | 1765-1766 ई. |
| शैफ-उद्-दौला | 1766-1770 ई. |
| मुबारक-उद्-दौला | 1770-1775 ई. |
1658 ई. में औरंगज़ेब ने मीर जुमला को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया। उसने अंग्रेज़ों के व्यापार पर कठोर प्रतिबन्ध लगा दिया, परिणामस्वरूप 1658 से 1663 ई. तक अंग्रेज़ों को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा। किन्तु 1698 ई. में सूबेदार अजीमुश्शान द्वारा अंग्रेज़ों को सूतानाती, कालीघाट एवं गोविन्दपुर की ज़मींदारी दे दी गयी, जिससे अंग्रेज़ों को व्यापार करने में काफ़ी लाभ प्राप्त हुआ। 18वीं शताब्दी के प्रारम्भिक दौर में यहाँ के सूबेदारों ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर नवाब की उपाधि धारण की। मुर्शीदकुली जफ़र ख़ाँ, जो औरंगज़ेब के समय में बंगाल का दीवान तथा मुर्शिदाबाद का फ़ौजदार था, बादशाह की मुत्यु के बाद 1717 में बंगाल का स्वतंत्र शासक बन गया। मुर्शीदकुली ख़ाँ ने बंगाल की राजधानी को ढाका से मुर्शिदाबाद हस्तांतरित कर दिया। उसके शासन काल में तीन विद्रोह हुए-
- सीतारात राय, उदय नारायण तथा ग़ुलाम मुहम्मद का विद्रोह,
- शुजात ख़ाँ का विद्रोह,
- नजात ख़ाँ का विद्रोह, इसको हराने के बाद मुर्शीदकुली ख़ाँ ने उसकी ज़मींदारियों को अपने कृपापात्र रामजीवन को दे दिया।
भू-राजस्व बन्दोबस्त
मुर्शिद कुली ख़ाँ ने नए सिरे से बंगाल के वित्तीय मामले का प्रबन्ध किया। उसने नए भू-राजस्व बन्दोबस्त के जरिए जागीर भूमि के एक बड़े भाग को खालसा भूमि बना दिया तथा 'इजारा व्यवस्था' (ठेके पर भू-राजस्व वसूल करने की व्यवस्था) आरम्भ की। 1732 ई. में बंगाल के नवाब द्वारा अलीवर्दी ख़ाँ को बिहार का सूबेदार नियुक्त किया गया। 1740 ई. में अलीवर्दी ख़ाँ ने बंगाल के नवाब शुजाउद्दीन के पुत्र सरफ़राज को घेरिया के युद्ध में परास्त कर बंगाल की सूबेदारी प्राप्त कर ली ओर वह अब बंगाल, बिहार और उड़ीसा के सम्मिलित प्रदेश का नवाब बन गया। यही नहीं, इसने तत्कालीन मुग़ल सम्राट मुहम्मदशाह से 2 करोड़ रुपये नज़राने के बदलें में स्वीकृति भी प्राप्त कर लिया। उसने लगभग 15 वर्ष तक मराठों से संघर्ष किया। अलीवर्दी ख़ाँ ने यूरोपियों की तुलना मधुमक्खियों से करते हुए कहा कि 'यदि उन्हें छेड़ा न जाय, तो वे शहद देंगी और यदि छेड़ा जाय तो काट-काट कर मार डालेंगी।'
1756 ई. में अलीवर्दी ख़ाँ के मरने के बाद उसके पौत्र सिराजुद्दौला ने गद्दी को ग्रहण किया। पूर्णिया का नवाब 'शौकतजंग' (सिराज की मौसी का लडका) तथा घसीटी बेगम (सिराज की मौसी), दोनों ही सिराजुद्दौला के प्रबल विरोधी थे। उसका सबसे 'प्रबल शत्रु' बंगाल की सेना का सेनानायक और अलीवर्दी ख़ाँ का बहनाई-मीरजाफ़र अली था। दूसरी ओर, चूंकि अंग्रेज़, फ़्राँसीसियों से भयभीत थे, अतः उन्होंने कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) की फ़ोर्ट विलियम कोठी की क़िलेबन्दी कर डाली। अंग्रेज़ों ने शौकतजंग एवं घसीटी बेगम का समर्थन किया। अंग्रेज़ों के इस कार्य से रुष्ट होकर सिराजुद्दौला ने 15 जून, 1756 को फ़ोर्ट विलियम का घेराव कर अंग्रेज़ों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया। अन्ततः नवाब ने कलकत्ता मानिकचन्द्र को सौंप दिया और स्वयं मुर्शिदाबाद आ गया। यही वह समय था, जब बंगाल में 'ब्लैक होल घटना' (कालकोठरी) घटी, जिसके लिये नवाब सिराजुद्दौला को ज़िम्मेदार ठहराया गया।


Comments
Post a Comment