ग़ुलाम वंश (1206-1290 ई.) (कार्यकाल 84 वर्ष)
अलाउद्दीन मसूद
- अलाउद्दीन मसूद (1242 - 1246 ई.), रुकुनुद्दीन फ़ीरोज़शाह का पौत्र तथा मुइज़ुद्दीन बहरामशाह का पुत्र था।
- उसके समय में नाइब का पद ग़ैर तुर्की सरदारों के दल के नेता मलिक कुतुबुद्दीन हसन को मिला।
- क्योंकि अन्य पदों पर तुर्की सरदारों के गुट के लोगों का प्रभुत्व था, इसलिए नाइब के पद का कोई विशेष महत्त्व नहीं रह गया था।
- शासन का वास्तविक अधिकार वज़ीर मुहाजबुद्दीन के पास था, जो जाति से ताजिक (ग़ैर तुर्क) था।
- तुर्की सरदारों के विरोध के परिणामस्वरूप यह पद नजुमुद्दीन अबू बक्र को प्राप्त हुआ।
- इसी के समय में बलबन को हाँसी का अक्ता प्राप्त हुआ।
- ‘अमीरे हाजिब’ का पद इल्तुतमिश के ‘चालीस तुर्कों के दल’ के सदस्य ग़यासुद्दीन बलबन को प्राप्त हुआ।
- 1245 में मंगोलों ने उच्छ पर अधिकार कर लिया, परन्तु बलबन ने मंगोलों को उच्छ से खदेड़ दिया, इससे बलबन की प्रतिष्ठा बढ़ गयी।
- अमीरे हाजिब के पद पर बने रह कर बलबन ने शासन का वास्तविक अधिकार अपने हाथ में ले लिया।
- अन्ततः बलबन ने नसीरूद्दीन महमूद एवं उसकी माँ से मिलकर अलाउद्दीन मसूद को सिंहासन से हटाने का षडयंत्र रचा।
- जून, 1246 में उसे इसमें सफलता मिली। बलबन ने अलाउद्दीन मसूद के स्थान पर इल्तुतमिश के प्रपौत्र नसीरूद्दीन महमूद को सुल्तान बनाया।
- मसूद का शासन तुलनात्मक दृष्टि से शांतिपूर्ण रहा। इस समय सुल्तान तथा सरदारों के मध्य संघर्ष नहीं हुए।
- वास्तव में यह काल बलबन की 'शांति निर्माण' का काल था।
आरामशाह
कुतुबुद्दीन ऐबक के मरने के बाद लाहौर के तुर्क सरदारों ने आरामशाह को 1210 में सुल्तान घोषित कर दिया और आरामशाह ने 'मुज़फ़्फ़्रर सुल्तान महमूद शाह' की उपाधि ली और अपने नाम की मुद्राएँ चलायीं। आरामशाह में सुल्तान बनने के गुण नहीं थे। सल्तनत की स्थिति भी संकटग्रस्त थी और आरामशाह के लिए स्थिति को सम्भालना दुष्कर काम था। इस बात पर भी सन्देह किया जाता है कि वह ऐबक का पुत्र था। विद्वानों की धारणा है कि वह ऐबक का पुत्र नहीं था वरन् उसका प्रिय व्यक्ति था।
- इस बात का समर्थन इतिहासकार मिनहाज-उस-सिराज ने लिखा है कि -'लाहौर के अमीरों ने शांति और सुव्यवस्था बनाये रखने के लिए आरामशाह को सिंहासन पर बैठा दिया।
- अब्दुल्ला वस्साफ ने लिखा है कि कुतुबुद्दीन का कोई पुत्र न था।
- अबुल फजल के मतानुसार आरामशाह कुतुबुद्दीन ऐबक का भाई था।
इल्तुतमिश
इल्तुतमिश (1210- 1236 ई.) एक इल्बारी तुर्क था। खोखरों के विरुद्ध इल्तुतमिश की कार्य कुशलता से प्रभावित होकर मुहम्मद ग़ोरी ने उसे “अमीरूल उमरा” नामक महत्त्वपूर्ण पद दिया था। अकस्मात् मुत्यु के कारण कुतुबद्दीन ऐबक अपने किसी उत्तराधिकारी का चुनाव नहीं कर सका था। अतः लाहौर के तुर्क अधिकारियों ने कुतुबद्दीन ऐबक के विवादित पुत्र आरामशाह (जिसे इतिहासकार नहीं मानते) को लाहौर की गद्दी पर बैठाया, परन्तु दिल्ली के तुर्को सरदारों एवं नागरिकों के विरोध के फलस्वरूप कुतुबद्दीन ऐबक के दामाद इल्तुतमिश, जो उस समय बदायूँ का सूबेदार था, को दिल्ली आमंत्रित कर राज्यसिंहासन पर बैठाया गया। आरामशाह एवं इल्तुतमिश के बीच दिल्ली के निकट जड़ नामक स्थान पर संघर्ष हुआ, जिसमें आरामशाह को बन्दी बनाकर बाद में उसकी हत्या कर दी गयी और इस तरह ऐबक वंश के बाद इल्बारी वंश का शासन प्रारम्भ हुआ।
कठिनाइयों से सामना
सुल्तान का पद प्राप्त करने के बाद इल्तुतमिश को कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसके अन्तर्गत इल्तुतमिश ने सर्वप्रथम ‘कुल्बी’ अर्थात् कुतुबद्दीन ऐबक के समय सरदार तथा ‘मुइज्जी’ अर्थात् मुहम्मद ग़ोरी के समय के सरदारों के विद्रोह का दमन किया। इल्तुमिश ने इन विद्रोही सरदारों पर विश्वास न करते हुए अपने 40 ग़ुलाम सरदारों का एक गुट या संगठन बनाया, जिसे ‘तुर्कान-ए-चिहालगानी’ का नाम दिया गया। इस संगठन को ‘चरगान’ भी कहा जाता है। इल्तुतिमिश के समय में ही अवध में पिर्थू विद्रोह हुआ।
1215 से 1217 ई. के बीच इल्तुतिमिश को अपने दो प्रबल प्रतिद्वन्द्धी 'एल्दौज' और 'नासिरुद्दीन क़बाचा' से संघर्ष करना पड़ा। 1215 ई. में इल्तुतिमिश ने एल्दौज को तराइन के मैदान में पराजित किया। 1217 ई. में इल्तुतिमिश ने कुबाचा से लाहौर छीन लिया तथा 1228 में उच्छ पर अधिकार कर कुबाचा से बिना शर्त आत्मसमर्पण के लिए कहा। अन्त में कुबाचा ने सिन्धु नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली। इस तरह इन दोनों प्रबल विरोधियों का अन्त हुआ।
क़ुतुबुद्दीन ऐबक
क़ुतुबुद्दीन ऐबक | |
| पूरा नाम | कुतुबुद्दीन ऐबक |
| जन्म भूमि | तुर्किस्तान |
| मृत्यु तिथि | 1210 ई. |
| मृत्यु स्थान | लाहौर |
| शासन काल | 1206 ई. से 1210 ई. तक |
| राज्याभिषेक | जून, 1206 ई., लाहौर |
| धार्मिक मान्यता | इस्लाम |
| युद्ध | तराइन का युद्ध मुहम्मद गोरी की ओर से, छंदवाड़ का युद्ध |
| निर्माण | 'कुव्वत-उल-इस्लाम', दिल्ली; 'ढाई दिन का झोपड़ा', अजमेर ; कुतुबमीनार। |
| मक़बरा | कुतुबुद्दीन ऐबक का मक़बरा लाहौर में |
| अद्यतन | 17:42, 3 नवम्बर 2016 (IST) |
कुतुबुद्दीन ऐबक (1206-1210 ई.) एक तुर्क जनजाति का व्यक्ति था। ऐबक एक तुर्की शब्द है, जिसका अर्थ होता है- “चन्द्रमा का देवता”। कुतुबुद्दीन का जन्म तुर्किस्तान में हुआ था। बचपन में ही वह अपने परिवार से बिछुड़ गया और उसे एक व्यापारी द्वारा निशापुर के बाज़ार में ले जाया गया, जहाँ 'क़ाज़ी फ़खरुद्दीन अजीज़ कूफ़ी' (जो इमाम अबू हनीफ़ के वंशज थे) ने उसे ख़रीद लिया। क़ाज़ी ने अपने पुत्र की भाँति ऐबक की परवरिश की तथा उसके लिए धनुर्विद्या और घुड़सवारी की सुविधाएँ उपलब्ध कराईं। कुतुबुद्दीन ऐबक बाल्याकाल से ही प्रतिभा का धनी था। उसने शीघ्र ही सभी कलाओं में कुशलता प्राप्त कर ली। उसने अत्यन्त सुरीले स्वर में क़ुरान पढ़ना सीख लिया, इसलिए वह 'क़ुरान ख़ाँ' (क़ुरान का पाठ करने वाला) के नाम से प्रसिद्ध हो गया। कुछ समय बाद क़ाज़ी की भी मृत्यु हो गयी। उसके पुत्रों ने उसे एक व्यापारी के हाथों बेच दिया, जो उसे ग़ज़नी ले गया, जहाँ उसे मुहम्मद ग़ोरी ने ख़रीद लिया और यहीं से उसकी जीवनचर्चा का एक नया अध्याय आरम्भ हुआ, जिसने अन्त में उसे दिल्ली के सिंहासन पर बैठाया।
बुद्धिमान और स्वामीभक्त
अपनी ईमानदारी, बुद्धिमानी और स्वामीभक्ति के बल पर कुतुबुद्दीन ने मुहम्मद ग़ोरी का विश्वास प्राप्त कर लिया। ग़ोरी ने उसके समस्त प्रशंसनीय गुणों से प्रभावित होकर उसे 'अमीर-ए-आखूर' (अस्तबलों का प्रधान) नियुक्त किया, जो उस समय एक महत्त्वपूर्ण पद था। इस पद पर रहते हुए ऐबक ने गोर, बामियान और ग़ज़नी के युद्धों में सुल्तान की सेवा की। 1192 ई. में ऐबक ने तराइन के युद्ध में कुशलतापूर्वक भाग लिया। तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद मुहम्मद ग़ोरी ने ऐबक को भारत के प्रदेशों का सूबेदार नियुक्त कर दिया। ग़ोरी के वापस जाने के बाद ऐबक ने अजमेर, मेरठ आदि स्थानों के विद्रोहों को दबाया। 1194 में मुहम्मद ग़ोरी और कन्नौज के शासक जयचन्द्र के बीच हुए युद्ध में ऐबक ने अपने स्वामी की ओर से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1197 ई. में ऐबक ने गुजरात की राजधानी अन्हिलवाड़ को लूटा तथा वहाँ के शासक भीमदेव को दण्डित किया। 1202 ई. में उसने बुन्देलखण्डके राजा परमार्दिदेव को परास्त किया तथा कालिंजर, महोबा और खजुराहो पर अधिकार कर लिया। 1205 ई. उसने खोक्खर के विरुद्ध मुहम्मद ग़ोरी का हाथ बँटाया। इस प्रकार ऐबक ने मुहम्मद ग़ोरी की सैनिक योजनाओं को एक मूर्तरूप दिया। इसलिए भारतीय तुर्क अधिकारियों ने उसे अपना प्रधान स्वीकार किया।
ग़यासुद्दीन बलबन
ग़यासुद्दीन बलबन (1266-1286 ई.) इल्बारि जाति का व्यक्ति था, जिसने एक नये राजवंश ‘बलबनी वंश’ की स्थापना की थी। ग़यासुद्दीन बलबन ग़ुलाम वंश का नवाँ सुल्तान था। बलबन मूलतः सुल्तान इल्तुतमिश का तुर्की ग़ुलाम था। बलबन को ख़्वाजा 'जमालुद्दीन बसरी' नाम का एक व्यक्ति ख़रीद कर 1232-33 ई. में दिल्ली लाया था। इल्तुतमिश ने ग्वालियर को जीतने के उपरान्त बलबन को ख़रीद लिया। अपनी योग्यता के कारण ही बलबन इल्तुतमिश के समय में, विशेषकर रज़िया सुल्तान के समय में 'अमीर-ए-शिकार', मुइज़ुद्दीन बहरामशाह के समय में 'अमीर-ए-आखूर', अलाउद्दीन मसूद के समय में 'अमीर-ए-हाजिब' एवं सुल्तान नसीरूद्दीन महमूद के समय में 'अमीर-ए-हाजिब' व नाइन के रूप में राज्य की सम्पूर्ण शक्ति का केन्द्र बन गया। बलबन की पुत्री सुल्तान मुईजुद्दीन बहरामशाह (1246-66 ई.) को ब्याही थी। जिसने उसे अपना मंत्री तथा सहायक नियुक्त किया था। नसिरुद्दीन की मृत्यु के उपरान्त 1266 ई. में अमीर सरदारों के सहयोग से वह 'ग़यासुद्दीन बलबन' के नाम से दिल्ली के राजसिंहासन पर बैठा। इस प्रकार वह इल्बारि जाति का द्वितीय शासक बना। बलबन जातीय श्रेष्ठता में विश्वास रखता था। इसीलिए उसने अपना संबंध फ़िरदौसी के 'शाहनामा' में उल्लिखित तुरानी शासक के वंश 'अफ़रासियाब' से जोड़ा। अपने पौत्रों का नामकरण मध्य एशिया के ख्याति प्राप्त शासक 'कैखुसरो', कैकुबाद इत्यादि के नाम पर किया। उसने प्रशासन में सिर्फ़ कुलीन व्यक्तियों को नियुक्त किया। उसका कहना था कि “जब मै किसी तुच्छ परिवार के व्यक्ति को देखता हूँ तो, मेरे शरीर की प्रत्येक नाड़ी उत्तेजित हो जाती है।”
विद्रोह का दमन
बलबन ने इल्तुतमिश द्वारा स्थापित 40 तुर्की सरदारों के दल को समाप्त कर दिया, तुर्क अमीरों को शक्तिशाली होने से रोका, अपने शासन काल में हुए एक मात्र बंगाल का तुर्क विद्रोह, जहाँ के शासक तुगरिल ख़ाँ वेग ने अपने को स्वतन्त्र घोषित कर दिया था, की सूचना पाकर बलबन ने अवध के सूबेदार अमीन ख़ाँ को भेजा, परन्तु वह असफल होकर लौटा। अतः क्रोधित होकर बलबन ने उसकी हत्या करवा दी और उसका सिर अयोध्या के फाटक पर लटका दिया और स्वंय इस विद्रोह का वखूबी दमन किया। बंगाल की तत्कालीन राजधनी लखनौती को उस समय ‘विद्रोह का नगर’ कहा जाता था। तुगरिल वेग को पकड़ने एवं उसकी हत्या करने का श्रेय मलिक मुकद्दीर को मिला, चूंकि इसके पहले तुगरिल को पकड़ने में काफ़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा था, इसलिए मुकद्दीर की सफलता से प्रसन्न होकर बलबन ने उसे ‘तुगरिलकुश’ (तुगरिल की हत्या करने वाला) की उपाधि प्रदान की। अपने पुत्र बुखरा ख़ाँ को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया। इसके अतिरिक्त बलबन ने मेवातियों एवं कटेहर में हुए विद्रोह का भी दमन किया तथा दोआब एवं पंजाब क्षेत्र में शान्ति स्थापित की। इस प्रकार अपनी शक्ति को समेकित करने के बाद बलबन ने भव्य उपाधि 'जिल्ले-इलाही' धारण को किया।
ग़ुलाम वंश
स्थापना
ग़ुलाम वंश दिल्ली में कुतुबद्दीन ऐबक द्वारा 1206 ई. में स्थापित किया गया था। यह वंश 1290 ई. तक शासन करता रहा। इसका नाम ग़ुलाम वंश इस कारण पड़ा कि इसका संस्थापक और उसके इल्तुतमिश और बलबन जैसे महान् उत्तराधिकारी प्रारम्भ में ग़ुलाम अथवा दास थे और बाद में वे दिल्ली का सिंहासन प्राप्त करने में समर्थ हुए। कुतुबद्दीन (1206-10 ई.) मूलत: शहाबुद्दीन मोहम्मद ग़ोरीका तुर्क दास था और 1192 ई. के 'तराइन के युद्ध' में विजय प्राप्त करने में उसने अपने स्वामी की विशेष सहायता की। उसने अपने स्वामी की ओर से दिल्ली पर अधिकार कर लिया और मुसलमानों की सल्तनत पश्चिम में गुजरात तथा पूर्व में बिहार और बंगाल तक, 1206 ई. में ग़ोरी की मृत्यु के पूर्व में ही, विस्तृत कर दी।
- दिल्ली के सिंहासन पर यह वंश 1206 ई. से 1290 ई. तक आरूढ़ रहा। इसका संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक मुहम्मद गोरी का तुर्क दास था। पर उसकी योग्यता देखकर गोरी ने उसे दासता से मुक्त कर दिया। कुतुबुद्दीन मूलत: ग़ुलाम था। इसलिए यह राजवंश ग़ुलाम वंश कहलाता है। वह 1210 ई. तक गद्दी पर रहा। कहते हैं, दिल्ली की क़ुतुबमीनार का निर्माण-कार्य उसने ही आरंभ कराया था। वह योग्य शासक माना जाता है।
- इस वंश का दूसरा प्रसिद्ध शासक इल्तुतमिश था जिसने 1211 ई. से 1236 ई. तक शासन किया। उसके समय में साम्राज्य का बहुत विस्तार हुआ और कश्मीर से नर्मदा तक तथा बंगाल से सिंधु तक का भू-भाग ग़ुलाम वंश के अधीन आ गया। इल्तुतमिश के बेटे बड़े विलासी थे। अत: कुछ समय बाद (1236 ई. में) उसकी पुत्री रजिया बेगम गद्दी पर बैठी। रजिया बड़ी बुद्धिमान महिला थी। वह मर्दाने वस्त्र पहनकर दरबार में बैठती थी। पर षड्यंत्रों से अपने को नहीं बचा सकी और 1240 ई. में उसकी हत्या कर दी गई।
- इसी वंश में एक और प्रमुख शासक हुआ- सुलतान ग़यासुद्दीन बलबन। बलबन भी मूलत: इल्तुतमिश का ग़ुलाम था इसने 1266 से 1287 ई. तक शासन किया। इसके समय में राज्य में शांति व्यवस्था की स्थिति बहुत अच्छी हो गई थी। अमीर खुसरों ग़ुलाम शासकों के ही संरक्षित विद्वान् थे।
नसिरुद्दीन महमूद
नसिरुद्दीन महमूद (1246-1266 ई.) इल्तुतमिश का कनिष्ठ पुत्र तथा ग़ुलाम वंश सुल्तान था। यह 10 जून1246 ई. को सिंहासन पर बैठा। उसके सिंहासन पर बैठने के बाद अमीर सरदारों एवं सुल्तान के बीच शक्ति के लिए चल रहा संघर्ष पूर्णत: समाप्त हो गया। नसिरुद्दीन विद्या प्रेमी और बहुत ही शांत स्वभाव का व्यक्ति था। शासन का सम्पूर्ण भार 'उलूग ख़ाँ' अथवा ग़यासुद्दीन बलबन पर छोड़कर वह सादा जीवन व्यतीत करता था। बलबन की पुत्री का विवाह नसिरुद्दीन के साथ हुआ था।
धर्मपरायण व्यक्ति
नसिरुद्दीन महमूद की स्थिति का वर्णन करते हुए इतिहासकार इसामी लिखते हैं कि "वह तुर्की अधिकारियों की पूर्व आज्ञा के बिना अपनी कोई भी राय व्यक्त नहीं कर सकता था। वह बिना तुर्की अधिकारियों की आज्ञा के हाथ पैर तक नहीं हिलाता था। कहा गया है कि सुल्तान नसिरुद्दीन महमूद महात्वाकांक्षाओं से रहित एक धर्मपरायण व्यक्ति था। वह क़ुरान की नकल करता था तथा उसको बेचकर जीविका चलाता था।
तुर्क सरदारों की साजिश
नसिरुद्दीन महमूद ने 7 अक्टूबर, 1246 ई. में बलबन को 'उलूग ख़ाँ' की उपाधि प्रदान की और इसके तदुपरान्त उसे 'अमीर-हाजिब' बनाया गया। अगस्त, 1249 ई. में नसिरुद्दीन महमूद के साथ बलबन ने अपनी लड़की का विवाह कर दिया। बलबन की सुल्तान से निकटता एवं उसके बढ़ते हुए प्रभाव से अन्य तुर्की सरदारों ने नसिरुद्दीन महमूद की माँ एवं कुछ भारतीय मुसलमानों के साथ एक दल बनाया, जिसका नेता रायहान को बनाया गया था। उसे 'वकीलदर' के पद पर नियुक्त किया गया, परन्तु यह परिवर्तन बहुत दिन तक नहीं चल सका। भारतीय मुसलमान रायहान को अधिक दिन तक तुर्क सरदार नहीं सह सके। वे पुनः बलबन से जा मिले। इस तरह दोनों विरोधी सेनाओं के बीच आमना-सामना हुआ, परन्तु अन्ततः एक समझौते के तहत नसिरुद्दीन महमूद ने रायहान को 'नाइब' के पद से मुक्त कर पुनः बलबन को यह पद दे दिया। रायहान को एक धर्मच्युत[1] शक्ति का अपहरणकर्ता, षड़यंत्रकारी आदि कहा गया है। कुछ समय पश्चात् रायहान की हत्या कर दी गयी।
टीका टिप्पणी और संदर्भ
मुइज़ुद्दीन बहरामशाह
- रज़िया सुल्तान को अपदस्थ करके तुर्की सरदारों ने मुइज़ुद्दीन बहरामशाह (1240-1242 ई.) को दिल्लीके तख्त पर बैठाया।
- सुल्तान के अधिकार को कम करने के लिए तुर्क सरदारों ने एक नये पद ‘नाइब’ अर्थात 'नाइब-ए-मुमलिकात' का सृजन किया।
- इस पद पर नियुक्त व्यक्ति संपूर्ण अधिकारों का स्वामी होता था।
- मुइज़ुद्दीन बहरामशाह के समय में इस पद पर सर्वप्रथम मलिक इख्तियारुद्दीन एतगीन को नियुक्त किया गया।
- अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के लिए एतगीन ने बहरामशाह की तलाक़शुदा बहन से विवाह कर लिया।
- कालान्तर में इख्तियारुद्दीन एतगीन की शक्ति इतनी बढ़ गई कि, उसने अपने महल के सामने सुल्तान की तरह नौबत एवं हाथी रखना आरम्भ कर दिया था।
- सुल्तान ने इसे अपने अधिकारों में हस्तक्षेप समझ कर उसकी हत्या करवा दी।
- एतगीन की मृत्यु के बाद नाइब के सारे अधिकार ‘अमीर-ए-हाजिब’ बदरुद्दीन संकर रूमी ख़ाँ के हाथों में आ गए।
- रूमी ख़ाँ द्वारा सुल्तान की हत्या हेतु षडयंत्र रचने के कारण उसकी एवं सरदार सैयद ताजुद्दीन की हत्या कर दी गई।
- इन हत्याओं के कारण सुल्तान के विरुद्ध अमीरों और तुर्की सरदारों में भयानक असन्तोष व्याप्त हो गया।
- 1241 ई. में मंगोल आक्रमणकारियों द्वारा पंजाब पर आक्रमण के समय रक्षा के लिए भेजी गयी सेना को बहरामशाह के विरुद्ध भड़का दिया गया।
- सेना वापस दिल्ली की ओर मुड़ गई और मई, 1241 ई. में तुर्क सरदारों ने दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर बहरामशाह का वध कर दिया।
- तुर्क सरदारों ने बहरामशाह के पौत्र अलाउद्दीन मसूदको अगला सुल्तान बनाया।
रज़िया सुल्तान
रज़िया का पूरा नाम-रज़िया अल्-दीन (1205– अक्टूबर 14/15, 1240), सुल्तान जलालत उद-दीन रज़िया था। वह इल्तुतमिश की पुत्री तथा भारत की पहली मुस्लिम शासिका थी।
रज़िया को उत्तराधिकार
अपने अंतिम दिनों में इल्तुतमिश अपने उत्तराधिकार के सवाल को लेकर चिन्तित था। इल्तुतमिश के सबसे बड़े पुत्र नसीरूद्दीन महमूद की, जो अपने पिता के प्रतिनिधि के रूप में बंगाल पर शासन कर रहा था, 1229 ई. को अप्रैल में मृत्यु हो गई। सुल्तान के शेष जीवित पुत्र शासन कार्य के किसी भी प्रकार से योग्य नहीं थे। अत: इल्तुतमिश ने अपनी मृत्यु शैय्या पर से अपनी पुत्री रज़िया को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। उसने अपने सरदारों और उल्माओं को इस बात के लिए राज़ी किया। यद्यपि स्त्रियों ने प्राचीन मिस्र और ईरान में रानियों के रूप में शासन किया था और इसके अलावा शासक राजकुमारों के छोटे होने के कारण राज्य का कारोबार सम्भाला था, तथापि इस प्रकार पुत्रों के होते हुए सिंहासन के लिए स्त्री को चुनना एक नया क़दम था।
टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ वह मूल रूप से एक तुर्क़ी दासी थी
- ↑ रैबर्टी, जिल्द 1, पृष्ठ 642
- ↑ ब्रिग्स, जिल्द 1, पृष्ठ 220
- ↑ 'क्रॉनिकल्स ऑफ़ द पठान किंग्स', पृष्ठ संख्या 106
रुकुनुद्दीन फ़ीरोज़शाह
- इल्तुतमिश ने अपनी पुत्री रज़िया सुल्तान को अपना उत्तराधिकारी बनाया था।
- लेकिन इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद, इल्तुतमिश के बड़े पुत्र रुकुनुद्दीन फ़ीरोज़शाह (1236 ई.) को दिल्लीकी गद्दी पर बैठाया गया।
- सुल्तान बनने से पहले वह बदायूँ और लाहौर की सरकार का प्रबन्ध संभाल चुका था।
- वह विलासी प्रवृत्ति का होने के कारण शासन के कार्यो में रुचि नहीं लेता था। इसलिए उसे विलास-प्रेमी जीव कहा गया है।
- रूकनुद्दीन में सुल्तान बनने के गुणों का सर्वथा अभाव था।
- यद्यपी रुकुनुद्दीन फ़ीरोज़शाह शासक था, फिर भी शासन की बागडोर उसकी माँ शाहतुर्कान के हाथों में थी, जो मूलतः एक तुर्की दासी थी।
- रूकनुद्दीन एवं उसकी माँ शाहतुर्कान के अत्याचारों से चारों ओर विद्रोह फूट पड़ा।
- इस विद्रोह को दबाने के लिए जैसे ही रूकनुद्दीन राजधानी से बाहर गया, रज़िया सुल्तान ने लाल वस्त्र धारण कर (लाल वस्त्र पहन कर ही न्याय की माँग की जाती थी) जनता के सामने उपस्थित होकर शाहतुर्कान के विरुद्ध सहायता मांगी।
- जनता ने उत्साह के साथ रज़िया सुल्तान को रुकुनुद्दीन फ़ीरोज़शाह के दिल्ली में घुसने के पूर्व ही दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया।
- बाद में रुकुनुद्दीन फ़ीरोज़शाह को क़ैद कर लिया गया और उसकी हत्या कर दी गई।
कैकुबाद
कैकुबाद अथवा 'कैकोबाद' (1287-1290 ई.) को 17-18 वर्ष की अवस्था में दिल्ली की गद्दी पर बैठाया गया था। वह सुल्तान बलबन का पोता और उसके सबसे पुत्र बुगरा ख़ाँ का लड़का था। कैकूबाद के पूर्व बलबन ने अपनी मृत्यु के पूर्व कैख़ुसरो को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। लेकिन दिल्ली के कोतवाल फ़ख़रुद्दीन मुहम्मद ने बलबन की मृत्यु के बाद कूटनीति के द्वारा कैख़ुसरो को मुल्तान की सूबेदारी देकर कैकुबाद को दिल्ली की राजगद्दी पर बैठा दिया।
- फ़ख़रुद्दीन के दामाद निज़ामुद्दीन ने अपने कुचक्र के द्वारा सुल्तान को भोग विलास में लिप्त कर स्वयं सुल्तान के सम्पूर्ण अधिकारों को ‘नाइब’ बन कर प्राप्त कर लिया।
- निज़ामुद्दीन के प्रभाव से मुक्त होने के बाद कैकुबाद ने उसे ज़हर देकर मरवा दिया।
- कैकुबाद ने ग़ैर तुर्क सरदार जलालुद्दीन ख़िलजी को अपना सेनापति बनाया, जिसका तुर्क सरदारों पर बुरा प्रभाव पड़ा।
- मंगोलों ने तामर ख़ाँ के नेतृत्व में समाना पर आक्रमण किया, हालाँकि कैकुबाद की सेना द्वारा उन्हें वापस खदेड़ दिया गया।
- अफ़्रीकी यात्री इब्नबतूता ने कैकुबाद के समय में यात्रा की थी, उसने सुल्तान के शासन काल को 'एक बड़ा समारोह' की संज्ञा दी।
- तुर्क सरदार बदला लेने की बात को सोच ही रहे थे कि, कैकुबाद को लकवा मार गया।
- लकवे का रोगी बन जाने के कारण कैकुबाद प्रशासन के कार्यों में अक्षम हो गया।
शमसुद्दीन क्यूमर्स
- कैकुबाद को लकवा मार जाने के कारण वह प्रशासन के कार्यों में पूरी तरह से अक्षम हो चुका था।
- प्रशासन के कार्यों में उसे अक्षम देखकर तुर्क सरदारों ने उसके तीन वर्षीय पुत्र शम्सुद्दीन क्यूमर्स को सुल्तान घोषित कर दिया।
- कालान्तर में जलालुद्दीन फ़िरोज ख़िलजी ने उचित अवसर देखकर शम्सुद्दीन का वध कर दिया।
- शम्सुद्दीन की हत्या के बाद जलालुद्दीन फ़िरोज ख़िलजी ने दिल्ली के तख्त पर स्वंय अधिकार कर लिया।
- इस प्रकार से बाद में दिल्ली की राजगद्दी पर ख़िलजी वंश की स्थापना हुई।
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